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01 अप्रैल 2016

चाहे जो हो जाए, युवतियों का इसलिए जरूरी है शादी के बाद भी नौकरी करना और न छोड़ना



चाहे जो हो जाए, युवतियों का इसलिए जरूरी है शादी के बाद भी नौकरी करना और न छोड़ना
‘जिस दिन आप अपनी दर्द भरी दास्तां सुनाएं - और आपको रोना न आए - उसी दिन जान लीजिए कि आपका घाव भर गया है।
वैसे, किसे सुनाई आपने अपने दिल की इतनी गहरी बात? कहीं उसकी आंखें तो नहीं भीग गईं?’ - अज्ञात

पढ़ी-लिखी युवा महिलाएं यदि कोई काम नहीं करतीं -तो कानून उनके विरुद्ध हो जाता है। यदि ऐसी युवतियों को कभी दुर्भाग्यपूर्ण तलाक जैसी स्थितियों का सामना करना पड़े। एक तरह से उन्हें सज़ा सुनाता है। अन्याय तो, ख़ैर, करता ही है।

इसी हफ्ते पुणे से आए एक फैसले में जज ने कहा -युवती पढ़ी-लिखी है। पहले काम कर भी चुकी है। पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सकती है। इसलिए तलाक के साथ गुजारा भत्ता नहीं मिलेगा।

ऐसा ही एक फैसला दिल्ली से भी पिछले हफ्ते आया। इसमें अदालत ने कहा कि युवती खूब पढ़ी-लिखी है -एमएससी गोल्ड मेडलिस्ट- इसलिए वह नौकरी ढूंढ़े -गुजारा भत्ता नहीं।
इस केस में कई गंभीर सबक छिपे हैं। इसमें पुरुष का अहं है। क्योंकि वह पत्नी से कम पढ़ा-लिखा है। जिला जज ने कहा महिला ने स्वयं स्वीकारा है कि वह पति से अधिक पढ़ी है। सक्षम है। इसलिए ऐसा नहीं हो सकता कि वह घर बैठे। और अपना खर्च (तलाकशुदा) पति पर डाल दे।

पुणे वाले केस में एक सबक यह मिला है कि कानून युवतियों को शादी के बाद नौकरी छोड़ देने को ग़लत मानता है। या कम से कम उसके पक्ष में तो नहीं ही मानता।

दिल्ली के केस में एक महत्वपूर्ण बिन्दु था कि युवती ने कभी कोई नौकरी की ही नहीं। उसने कहा कि वह इस तरह कभी अकेले घर से बाहर भी नहीं निकली। इसलिए वो कैसे नौकरी ढूंढ़ेगी? किन्तु जज ने कहा -एसएमएस और ईमेल पर बातचीत कीजिए। और अकेले कभी बाहर नहीं निकली -इससे क्या मतलब? केस लड़ने अकेले कोर्ट आती हैं कि नहीं? इसी तरह नौकरी ढूंढ़िए।

हो सकता है हिन्दू मैरिज एक्ट या संबंधित जटिल धाराओं के अनुसार यह एक अच्छा फैसला हो। तर्कसंगत हो।
किन्तु व्यावहारिक रूप से यह एक धक्का पहुंचाने वाला फैसला है। इसे अब नज़ीर बनाकर लगातार अनेक प्रकरणों में इस्तेमाल किया जाएगा।

गुजारा भत्ता यानी एलिमनी एंड मेन्टेनेन्स वो पैसा है जो तलाक के बाद, गुजारे के लिए दिया जाता है। एलिमनी और मेन्टेनेन्स वैसे एक ही आशय के शब्द हैं। किन्तु कानूनन इनमें एक महीन अंतर है। जब तक तलाक का मुकदमा चल रहा है -उस दौरान अलग रह रही या छोड़ दी गई पत्नी को दिया जा रहा पैसा मेन्टेनेन्स है। तलाक के बाद गुजारा एलिमनी है। वैसे ‘स्पाउज़ सपोर्ट’ शब्द भी अब प्रचलित है।

किन्तु आपत्ति यहीं है। सपोर्ट किस बात का? तलाक का कारण हमेशा कोई नकारात्मक बात ही तो होगी। दहेज, प्रताड़ना, शक, धोखा। किसी भी तरफ़ से हो -तबाह दोनों होंगे। बच्चे हों तो बर्बादी उनकी सबसे बड़ी।

ऐसे में सीधी बात तो यही है कि तलाक का नुकसान युवती को अधिक होगा। क्योंकि वह भावनात्मक रूप से तो टूटेगी ही, आर्थिक रूप से अलग बिखर जाएगी। पुरुष भी भावनात्मक दृष्टि से बराबर आहत होगा -किन्तु उसकी आमदनी उसका साथ देगी। उसका काम उसे
व्यस्त रखेगा।

इन ताज़ा फैसलों में इस पहलू को महिलाएं रख ही नहीं पाईं। क्योंकि यह सच है कि अदालतें यह लगातार चेतावनी देती आ रही हैं। कि कानून के नाम पर गुजारा भत्ता व्यर्थ वसूलने नहीं दिया जाएगा। किन्तु यह भी सच है कि तमाम कानून के तर्कों के बावजूद न्याय स्पष्ट है। वह महिलाओं के पक्ष में है।

न्याय का, किन्तु एक दुखद पक्ष है। कि न्याय लिया जाता है। प्राप्त किया जाता है। कोई देता नहीं। मतलब आसानी से नहीं मिलता।

तो न्याय की महिलाओं के पक्ष में होने की जो बात थी -उसके मूल में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला है। बल्कि उसे परिभाषा मान लीजिए। उस जटिल वाक्य की -जो सारे ऐसे झगड़ों की जड़ है। वाक्य है ‘गुजारा न चला पाना’ अनेबल टू मेन्टेन। सुप्रीम कोर्ट जज, जस्टिस अरिजित पसायत और जस्टिस आफ़ताब आलम ने अति-महत्वपूर्ण आदेश में कहा था कि गुजारे का स्पष्ट अर्थ है -उस तरह का गुजारा जब वह पति के साथ रह रही थी। न कि उसके बाद, पति से अलग होने पर किए गए प्रयासों के बाद बनी स्थितियों में गुजारा।

यानी सुप्रीम कोर्ट महिलाओं के ‘स्तरीय’ गुजारा प्राप्त करने के पक्ष में है। इस आदेश में यह कहा गया है कि ‘भले ही महिला कमा रही हो, वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार है।’
इस तरह न्याय महिलाओं के संघर्ष का सम्मान करते हुए नज़र आता है।

तलाक के बाद एक महिला किस तरह संसार में जीती है, एक त्रासदी ही है। तलाक के बाद किस तरह उसे समाज का सामना करना पड़ता है, यह सिर्फ वो ही समझ सकती है। शादी नष्ट होने का संताप संभवत: जीवन के सबसे बड़े दु:खों में दूसरे क्रम का दुख होगा।

सबसे बड़ा दुख, जहां तक सुना-समझा है -माता-पिता के सामने उनके बढ़ते-खिलते बच्चों, जवान होते बेटे-बेटियों में से किसी की मृत्यु का है। दारुण दुख।

इसके बाद शादी टूटने का दुख है। कलेजा हिल जाता है। विशेषकर, जब अलग हुई या की गई युवती को घर चलाने के पैसे जुटाने पड़ें। और, एक सहज स्तर की सुप्रीम कोर्ट की बात बहुत प्रभावशाली है। न्यायपूर्ण है।

एक विदेशी एयरलाइन्स में एयर होस्टेस का चर्चित केस ऐसा ही था। तब की एयर इंडिया का फ्लाइट कमांडर तलाक के बाद उसे 20 हजार रु. महीना देने को राजी नहीं था। जबकि युवती के वकील ने 20 हजार महीना या 20 लाख एकमुश्त देने की पैरवी की थी। सारी लड़ाई इसी बात पर लड़ी गई कि शादी के बाद पति तो तरक्की करता गया -किन्तु पत्नी पर दबाव डालकर उसने उससे वह उच्च आमदनी वाली नौकरी छुड़वा दी। ताकि वह घर चलाए। और वो कमाए। अंतत: उसे 40 लाख एकमुश्त या 40 हजार रु. महीना देने का आदेश दिया गया। यही कहकर कि एक ‘स्तर’ को बनाए रखने लायक गुजारा तो देना पड़ेगा।

आज हालािक 40 हजार रु. प्रतिमाह एक ट्रेनी की तनख्वाह होती है। जो पढ़ाई पूरी करके बस किसी कंपनी में लगा ही होता है। ऐसे में कानून बनाने वाले -या कि कानून को लागू करवाने वाले- और विशेषकर न्यायाधीश गुजारा भत्ता कितना हो, इसे नए तरह से देखेंगे -तो ही न्याय हो पाएगा।

जो बड़े सबक मिल रहे हैं -वो तो यही हैं कि :
* युवतियों को अपनी पढ़ाई पूरी करनी चाहिए
* पति या बच्चों के कारण पढ़ाई रुक गई हो - तो फिर शुरू करनी चाहिए
* पति के कारण अपना काम छोड़ना नहीं चाहिए
* पढ़ाई के कारण, प्रतिभा के बल पर मिली नौकरी तो कभी नहीं छोड़नी चाहिए
* यदि आमदनी नहीं भी चाहिए तो भी कोई व्यस्तता हो, बाहर जाने का कारण हो
* और काम न करने का फैसला उसका स्वयं का हो। थोपा हुआ न हो।

हालांकि कई जगह यह लड़कियों के हाथ में नहीं है। बल्कि अधिकतर जगह। और यूं भी हमारे भारतीय वातावरण में परिवार को ही सर्वोच्च महत्व दिया जाता है। जो सही भी है। और ऐसे में पत्नी को अपना निर्णय, चाहकर भी, करने की कहां गुंजाइश छोड़ी जाती है? फिर भी, नए जमाने की युवतियां यदि एक प्रतिशत भी काम करना चाहती हंै -तो बाकी 99 प्रतिशत प्रोत्साहन हमें, मिलजुलकर उनमें भरना होगा।

आज के युवक इस बात को बखूबी समझते हैं। घर चलाने में उन्हें साथ मिल जाता है। जीवन स्तर ऊंचा रखने में दो योगदान हो जाते हैं। किन्तु कई बार युवक के माता-पिता तैयार नहीं होते। और तलाक के नाज़ुक मामलों में तो सास-ससुर की भूमिका बहुत अलग होती है। गुजारा तो वो कभी भी देने नहीं देते। परिवार अदालतों के पन्ने रंगे हुए हैं ऐसे किस्सों से।
शायद इसीलिए, पिछले साल, लॉ कमीशन ने सरकार से कहा है कि कानून बदलना चाहिए। सास-ससुर दें गुजारा, यदि पति न दे।
होना तो यह चाहिए कि तलाक ही न हों।

तलाक रोके जाएं। असंभव है किन्तु रोकने ही होंगे। और जो हों -तो युवतियों को कम से कम पैसों की कमी न झेलनी पड़े। न्याय इतना सख्त हो, कि तलाक देने-लेने से पहले एक करोड़ बार सोचना पड़े।

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