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21 अक्तूबर 2020

फ़ूल, थाली पर जेब खाली (सन्दर्भ: मेडिकल इंटर्न स्ट्राइक, राजस्थान)

 

*फ़ूल, थाली पर जेब खाली (सन्दर्भ: मेडिकल इंटर्न स्ट्राइक, राजस्थान)*
*क्या आधे अधूरे संसाधनों, एक अनपढ़ मजदूर से भी कम मानदेय देकर के अदृश्य विषाणु द्वारा जनित महामारी को फतह किया का सकता है?*
*© डॉ सुरेश पाण्डेय, नेत्र सर्जन, कोटा*
देश भर में लगभग 19 लाख विद्यार्थी नीट एग्जाम में बैठते हैं उनसे से लगभग 41 हज़ार सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस कोर्स के लिए चयनित होते हैं। साढे चार वर्ष तक मेडिकल कोर्स में जी तोड़ मेहनत करने के बाद एमबीबीएस फाइनल ईयर उत्तीर्ण करने के बाद
इंटर्नशिप का एक वर्ष आता है। राजस्थान के मेडिकल कॉलेज के इंटर्नशिप कर रहे सभी मेडिकल स्टूडेंट का स्टाइपेंड मात्र सात सजार रुपए प्रति माह है जो देश में सबसे कम है। दो सौ तेंतीस रुपए प्रति दिन में तो आज एक अनपढ़ दिहाड़ी मजदूर (डेली वेज लेबरर) भी नहीं मिलता है। क्या एमबीबीएस पास करने के बाद देश के युवा डॉक्टर्स की यही योग्यता है? क्या आज भी उनको अपने खर्चे चलाने के लिए माता पिता के सामने हाथ फैलाने होंगे?
क्या इन युवा डॉक्टर्स को देश की संसद की कैंटीन की तरह खाने की कोई सब्सिडी मिलती है? क्या रेंट, ग्रोसरी, पेट्रोल, टैक्स आदि की छूट मिलती है। क्या ये युवा डॉक्टर्स मात्र दिन रात अनवरत रोगियों की सेवा करने के लिए भगवान का दूसरा नाम है, जिसकी ना तो विशेष सांसारिक आवश्यकताएं हैं, ना ही इन डॉक्टर्स के कोई विशेष ख़र्चे नहीं होते है, पब्लिक एवं सरकार का तो शायद यही परसेप्शन है। क्या 233 रुपए प्रति दिन या सात हजार रूपए प्रति माह में मंहगाई के इस युग में खर्चा चलाना संभव है? अथवा पच्चीस वर्ष की आयु में भी इन युवा चिकित्सकों को अपने माता पिता से मासिक ख़र्च भेजने की आशा करनी होगी जिन्होंने बड़े अरमानों से अपने खर्चों में कटौती कर इन्हें डॉक्टर बनने भेजा?
कोरोना काल खण्ड के दौरान थाली बजाने, अस्पतालों पर फ़ूल बरसाकर, डॉक्टर्स का मिथ्या महिमा मंडन करने का क्या तुक था? सरकार द्वारा समय समय पर कोविड वार्ड में ड्यूटी डे रहे डॉक्टर्स को महामारी के आरंभिक दिनों में पी पी ई किट, ग्लव्स, मास्कस, भी पर्याप्त संख्या में नियमित रूप से उपलब्ध नहीं कराए गए। वैश्विक महामारी के इस कठिन समय में देश के कुछ स्थानों से डॉक्टर्स को सेलरी नहीं मिलने या सैलरी काटने के भी समाचार भी प्रकाशित हुएं हैं।
देश के छुट भैया नेता अस्पतालों में धरना प्रदर्शन घेराव करने में माहिर हो चुके हैं क्योंकि सरकारी अस्पतालों से बेहतर कोई अच्छी जगह नहीं है जहां इंसानियत एवम् मानवता की आड़ में राजनीती चमकाई जा सके एवम् मिडिया में गरीबों के मसीहा बनकर न्यूज़ कवरेज लिया जा सके। सरकारी अस्पताल की इमरजेंसी सर्विसेज का अधिकांश काम रेजिडेंट डॉक्टरों द्वारा देखा जाता है। इन युवा चिकित्सकों में मरणासन्न/चोटिल रोगी को बचाने, इमरजेंसी रोगी की रात रात भर जागकर इलाज करने की भावना प्रबल होती हैं। दुर्भाग्य वश यदि गंभीर रोगी को यदि बचाना संभव नहीं हो पाता तो रोगियों के उत्तेजित परिजन, छुट भैया नेता इन युवा चिकित्सकों को धमकाने एवम् धोंस जमाने में अपनी शान समझते हैं, जिसके कारण आए दिन अस्पतालों में अपमान/मारपीट/वॉयलेंस का दंश भी इन ट्रेनी इंटर्न/रेजिडेंट डॉक्टरों को ही झेलना पड़ता है। कोरोना काल खण्ड के दौरान इंटर्न/ रेजिडेंट्स डॉक्टर्स की कोविड अस्पतालों में ड्यूटी देश के कई राज्यों में लगाई गई है। क्या आधे अधूरे सासाधनों, एक अनपढ़ मजदूर से भी कम मानदेय देकर के किसी मोर्चे को फतह किया का सका है? लम्बे संघर्ष के बाद राजस्थान सरकार ने मेडिकल इंटर्न का मानदेय 14,000 रुपए कर दिया है लेकिन यह देर से उठाया क़दम है।
आशा है कि कोरोना महामारी से सबक लेते हुए देश की स्वास्थ्य नीति में आमूल चूल परिवर्तन होगा। देश के डिफेंस सेक्टर के समान स्वास्थ्य का बजट (एक प्रतिशत जी डी पी से बढ़कर तीन प्रतिशत) भी बढ़ेगा, स्वास्थ्य सैनिकों (चिकित्सकों) को उचित मानदेय मिलेगा एवम् उनको अस्पताल में काम करते हुए अनुकूल परिणाम नहीं मिलने पर रोगियों के परिजनों द्वारा किए गए अपमान/ मारपीट आदि की घटनाओं को कानून एवं सुरक्षा कवच द्वारा बचाया जा सकेगा जिससे उनका मनोबल कम न हो सके। उनको साजो समान (पी पी ई किट, ग्लव्स, मास्क आदि) उपलब्ध कराए जा सकेगें जिससे कोविड 19 नामक इस अदृश्य विषाणु से जारी युद्ध में वे पूरे मन से अपनी सक्रिय भागीदारी निभा सकें।
*© डॉ सुरेश पाण्डेय*
नेत्र सर्जन, सुवि नेत्र चिकित्सालय एवम् लेसिक लेज़र सेंटर, कोटा, राजस्थान
लेखक: सीक्रेट्स ऑफ सक्सेसफुल डॉक्टर्स एवम् ए हिप्पोक्रेटिक ओडिसी: लेसन्स फ्रॉम ए डॉक्टर कपल ऑन लाइफ इन मेडिसिन, चैलेंजेज एंड डॉक्टरप्रेन्यूरशिप।

कल का वाकया, एक सच

 

कल का वाकया, एक सच........📷
सरकार का नारा,बेटी पढ़ाओ,बेटी बचाओ कहने और सुनने में हर महिला को सुकून देता है पर हक़ीक़त में बेटियो के हालात बद से बदतर से है यह हम सब जानते है।सभ्रांत परिवार से लेकर देश के हर तबके की बेटियां हक़ीक़त में आज भी सिसक ही रही है।महिला उत्पीड़न के बढ़ते ताज़ा मामले इसके उदाहरण है।ऐसा कोई दिन नही जाता जिस दिन हमे यह खबर ना मिले की आज फला जगह फला महिला का सामूहिक बलात्कार हो गया,या किसी बहु को दहेज के लिए घर से निकाल दिया या उसे मार दिया गया है।बेटियों के साथ उनके ससुराल में उनको मानसिक संताप देना एक परम्परा सी हो चली है। बढ़ती हिंसक प्रवर्ति से तो हालात इससे बदतर हो गए है कि बड़े शहरों से लेकर गांव ढाणी तक में छोटी छोटी बच्चियों के साथ सामूहिक कुकृत्य आम बात हो गई है।इसकी विशेष वजह में हमारी न्याय व्यवस्था को मानती हूं।अभी कल ही कोटा के पास के गांव की एक नाबालिक लड़की अपनी दादी के साथ मुझसे मदद मांगने आई।उन्होंने मुझे बताया कि गांव के चार युवकों ने उसे जबरन घर मे पकड़कर कुकृत्य करने की कोशिश की व विरोध करने पर परिवार के सभी महिला पुरुषों को पीटा व पीड़ित परिवारजन को ही थाने में बंद करवा दिवा।ये कैसी न्याय व्यवस्था है की इज्जत ओर न्याय की गुहार लगाने वाले पीड़ित पक्ष को ही पुलिस प्रताड़ित कर रही है।पीड़िता की दादी ने बताया कि वह बहुत गरीब है व दुराचारी प्रभावशाली है जिसके चलते उनकी नही सुनी जा रही।कहने का मर्म सिर्फ इतना है कि प्रभावशाली होने का मतलब क्या किसी मजबूर को कुचलना होता है।सिर्फ इसी मामले में नही बल्कि महिला अत्याचार से जुड़ी हर घटना के लिए जिम्मदार समाज से पूंछना चाहती हु की निर्बल परिवारों की बहू बेटियां सिर्फ खिलौना होती है क्या ?
मेरा यह सवाल तबके के हर उस पुरुष ओर कानून व्यवस्था से है जो महिला सुरक्षा,सम्मान एवं अधिकार की बात तो करते है पर जब इन्ही अधिकारों को निभाने का वक़्त आता है तो अपनी जिम्मदारीयो से मुँह फेर लेते है।
में इस पोस्ट के माध्यम से आप सभी से महिला होने के नाते विनम्र निवेदन करती हूं कि समाज की हर महिला को वह सम्मान दे जो आप आपकी मां,बेटी के लिये चाहते है।
आपकी अपनी
डॉ एकता धारीवाल

एक भाई शर्ट खरीदने के लिये एक प्रतिष्ठित शो रूम के लिए गाड़ी से जा रहा था कि फोन की घण्टी बज उठी,

 

एक भाई शर्ट खरीदने के लिये एक प्रतिष्ठित शो रूम के लिए गाड़ी से जा रहा था कि फोन की घण्टी बज उठी,
*“सर, महावीर होटल से बोल रहे हैं, हमारे यहाँ गुजराती-फ़ूड-फेस्टिवल चल रहा है।*
*पिछली बार भी आप आये थे। आप विजिटर बुक में अच्छे कमेंट्स देकर गए थे, सर!”*
“देखता हूँ”, कहकर उसने फोन बंद कर दिया।
गाड़ी, थोड़ी आगे चली ही होगी कि फिर से एक कॉल आया,
*"सर, आपके जूते घिस गए होंगे। नए ले लीजिए।"*
"कौन बोल रहे हो, भाई? आपको कैसे पता चला मेरे जूते घिस गए हैं?"
*"सर, मैं सुंदर फुटवियर से बोल रहा हूँ। हमारी दुकान से आपने डेढ़ साल पहले जूते खरीदे थे। हमारा कंप्यूटर बता रहा है आपके जूते फट रहे होंगे या फटने ही वाले होंगे!”*
"भैया, क्या ये जरुरी है कि मेरे पास एक जोड़ी जूते ही हों? वक़्त-बेवक्त इस तरह फोन करना कहाँ की सभ्यता है, मेरे भाई?", कह कर फिर फोन काट दिया।
फोन काटा ही था कि घण्टी वापस घनघना उठी,
*“सर, आपकी गाड़ी की सर्विसिंग ड्यू हो गई है, छह महीने हो गए हैं।”*
"भाई, आपको क्यों परेशानी हो रही है? मेरी गाड़ी की मैं सर्विसिंग करवाऊँ या न करवाऊँ? मेरी मर्ज़ी।
कोई प्राइवेसी नाम की भी चीज़ होती है, दुनिया में?"
गुस्से में उसने फोन काट तो दिया पर वो एक बार फिर बज उठा,
*“सर, कल पैडमैन की आइनॉक्स में मैटिनी शो की टिकट बुक कर दूँ।"* इस बार एक लड़की थी।
"क्यूँ मैडम?”
*"सर, हमारा सिस्टम बता रहा है कि आप अक्षय कुमार की हर मूवी देखते हैं, इसलिये!”*
वो मना करते-करते थक चुका था, सो पीछा छुड़ाते हुए बोला, “चलो, बुक कर दो।"
*"ठीक है, सर! मैं मोबाइल नम्बर नाइन नाइन टू..... वाली मैडम को भी बता देती हूँ।* *हमारा सिस्टम बता रहा है वो हमेशा आपके साथ टिकट बुक कराती रही हैं।" 🚶🏻*
अब तो वो घबरा गया,
“आप रहने दीजिए।” कहते हुये उसने एक बार फिर फोन काट दिया।
शो रूम पहुँचकर उसने एक शर्ट खरीदी। बिल काउंटर पर गया तो उसने पूछा,
*“सर, आपका मोबाइल नम्बर??”*
"मैं नहीं दूँगा।"
*"सर, मोबाइल नंबर देने से आपको २०% लॉयल्टी डिस्काउंट मिलेगा।"*
"भाई, भले ही मेरे प्राण माँग लो, लेकिन मोबाइल नम्बर नहीं दूँगा।"
उसने दृढ़ता से जवाब दिया।
*"सर, इतनी नाराजगी क्यों?"💕*
"इस मोबाइल के चक्कर में मेरी प्रायवेसी की ऐसी की तैसी हो गई है।
मेरा नम्बर, पता नहीं कितनों में बँट गया है?
कल को नाई कहेगा, “सर, आपके बाल बढ़ गए होंगे!”
मुझे तो डर है की 60 की उम्र आते आते अर्थी वाला भी ये न कह दे कि,
“समय और बच्चों का आजकल कोई भरोसा नहीं है
अंतिम यात्रा के लिए एक सुन्दर-सी अर्थी बुक करवा लीजिये"
🤪😆😜😨😆
*व्यंग शास्र से मोबाइल नम्बर के दुरुपयोग पर कटु सत्य*

*गुस्से को शान्त करने का एक सुंदर उदाहरण*

 


एक वकील ने सुनाया हुआ एक हृदयस्पर्शी किस्सा -
"मै अपने चेंबर में बैठा हुआ था, एक आदमी दनदनाता हुआ अन्दर घुसा।
उसके हाथ में कागज़ो का बंडल, धूप में काला हुआ चेहरा, बढ़ी हुई दाढ़ी, सफेद कपड़े जिनमें पांयचों के पास मिट्टी लगी थी।"
उसने कहा - "उसके पूरे फ्लैट पर स्टे लगाना है, बताइए, क्या क्या कागज और चाहिए... क्या लगेगा खर्चा... "
मैंने उन्हें बैठने का कहा -
"रग्घू, पानी दे इधर" मैंने आवाज़ लगाई
वो कुर्सी पर बैठे
उनके सारे कागजात मैंने देखे, उनसे सारी जानकारी ली, आधा पौना घंटा गुजर गया।
"मै इन कागज़ो को देख लेता हूँ फिर आपकी केस पर विचार करेंगे। आप ऐसा कीजिए, अगले शनिवार को मिलिए मुझसे।"
चार दिन बाद वो फिर से आए- वैसे ही कपड़े
बहुत डेस्परेट लग रहे थे
अपने भाई पर गुस्सा थे बहुत
मैंने उन्हें बैठने का कहा
वो बैठे
ऑफिस में अजीब सी खामोशी गूंज रही थी।
मैंने बात की शुरुआत की बाबा, मैंने आपके सारे पेपर्स देख लिए।
और आपके परिवार के बारे में और आपकी निजी जिंदगी के बारे में भी मैंने बहुत जानकारी हासिल की।
मेरी जानकारी के अनुसार:
आप दो भाई है, एक बहन है,
आपके माँ-बाप बचपन में ही गुजर गए।
बाबा आप नौवीं पास है और आपका छोटा भाई इंजिनियर है।
आपने छोटे भाई की पढ़ाई के लिए आपने स्कूल छोड़ा, लोगो के खेतों में दिहाड़ी पर काम किया,
कभी अंग भर कपड़ा और पेट भर खाना आपको नहीं मिला फिर भी भाई के पढ़ाई के लिए पैसों की कमी आपने नहीं होने दी।
एक बार खेलते खेलते भाई पर किसी बैल ने सींग घुसा दिए तब भाई लहूलुहान हो गया।
फिर आपने उसे कंधे पर उठा कर 5 किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल लेे गए।
सही देखा जाए तो आपकी उम्र भी नहीं थी ये समझने की, पर भाई में जान बसी थी आपकी।
माँ बाप के बाद मै ही इन का माँ-बाप… ये भावना थी आपके मन में।
फिर आपका भाई इंजीनियरिंग में अच्छे कॉलेज में एडमिशन ले पाया और आपका दिल खुशी से भरा हुआ था।
फिर आपने जी तोड़ मेहनत की।
80,000 की सालाना फीस भरने के लिए आपने रात दिन एक कर दिया यानि बीवी के गहने गिरवी रख के, कभी साहूकार कार से पैसा ले कर आपने उसकी हर जरूरत पूरी की।
फिर अचानक उसे किडनी की तकलीफ शुरू हो गई, डॉक्टर ने किडनी निकालने का कहा और
तुम ने अगले मिनट में अपनी किडनी उसे दे दी यह कह कर कि कल तुझे अफसर बनना है,
नौकरी करनी है, कहाँ कहाँ घूमेगा बीमार शरीर लेे के। मुझे गाँव में ही रहना है, ये कह कर किडनी दे दी उसे।
फिर भाई मास्टर्स के लिए हॉस्टल पर रहने गया।लड्डू बने, देने जाओ, खेत में मकई खाने तैयार हुई, भाई को देने जाओ, कोई तीज त्योहार हो, भाई को कपड़े करो।
घर से हॉस्टल 25 किलोमीटर तुम उसे डिब्बा देने साइकिल पर गए।हाथ का निवाला पहले भाई को खिलाया तुमने।
फिर वो मास्टर्स पास हुआ, तुमने गाँव को खाना खिलाया।फिर उसने उसी के कॉलेज की लड़की जो दिखने में एकदम सुंदर थी से शादी कर ली तुम सिर्फ समय पर ही वहाँ गए।भाई को नौकरी लगी, 3 साल पहले उसकी शादी हुई, अब तुम्हारा बोझ हल्का होने वाला था।
पर किसी की नज़र लग गई आपके इस प्यार को।
शादी के बाद भाई ने आना बंद कर दिया।
पूछा तो कहता है मैंने बीवी को वचन दिया है।
घर पैसा देता नहीं, पूछा तो कहता है कर्ज़ा सिर पे है।
पिछले साल शहर में फ्लैट खरीदा।पैसे कहाँ से आए पूछा तो कहता है कर्ज लिया है।
मैंने मना किया तो कहता है भाई, तुझे कुछ नहीं मालूम, तू निरा गवार ही रह गया।
अब तुम्हारा भाई चाहता है गाँंव की आधी खेती बेच कर उसे पैसा दे दे।
इतना कह के मैं रुका - रग्घू ने लाई चाय की प्याली मैंने मुँह से लगाई -
"तुम चाहते हो भाई ने जो मांगा वो उसे ना दे कर उसके ही फ्लैट पर स्टे लगाया जाए - क्यों यही चाहते हो तुम..."
वो तुरंत बोला, "हां"
मैंने कहा - हम स्टे लेे सकते है, भाई के प्रॉपर्टी में हिस्सा भी माँग सकते हैं
*पर….*
1) तुमने उसके लिए जो खून पसीना एक किया है वो नहीं मिलेगा
2) तुम्हारीे दी हुई किडनी वापस नहीं मिलेगी
3) तुमने उसके लिए जो ज़िन्दगी खर्च की है वो भी वापस नहीं मिलेगी।
मुझे लगता है इन सब चीजों के सामने उस फ्लैट की कीमत शुन्य है।
भाई की नीयत फिर गई, वो अपने रास्ते चला गया अब तुम भी उसी कृतघ्न सड़क पर मत जाओ।
वो भिखारी निकला,
तुम दिलदार थे।
दिलदार ही रहो …..
तुम्हारा हाथ ऊपर था,
ऊपर ही रखो।
कोर्ट कचहरी करने की बजाय बच्चों को पढ़ाओ लिखाओ।पढ़ाई कर के तुम्हारा भाई बिगड़ गया लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारे बच्चे भी ऐसा करेंगे।"
वो मेरे मुँह को ताकने लगा।
उठ के खड़ा हुआ, सब काग़ज़ात उठाए और आँखे पोछते हुए बोला - "चलता हूँ, वकील साहब।"
उसकी रूलाई फुट रही थी और वो मुझे दिख ना जाए ऐसी कोशिश कर रहा था।
इस बात को अरसा गुजर गया
*कल वो*
अचानक मेरे ऑफिस में आया।
कलमों में सफेदी झाँक रही थी उसके। साथ में एक नौजवान था और हाथ में थैली।
मैंने कहा- "बाबा, बैठो"
उसने कहा, "बैठने नहीं आया वकील साहब, मिठाई खिलाने आया हूँ । ये मेरा बेटा, बैंगलोर रहता है, कल आया गाँव।अब तीन मंजिला मकान बना लिया है वहाँ।थोड़ी थोड़ी कर के 10–12 एकड़ खेती खरीद ली अब।"
मै उसके चेहरे से टपकते हुए खुशी को महसूस कर रहा था
"वकील साहब, आपने मुझे कहा - कोर्ट कचहरी के चक्कर में मत पड़ो आपने बहुत नेक सलाह दी और मुझे उलझन से बचा लिया।
जबकि गाँव में सब लोग मुझे भाई के खिलाफ उकसा रहे थे।
मैंने उनकी नहीं, आपकी बात सुन ली और मैंने अपने बच्चो को लाइन से लगाया और भाई के पीछे अपनी ज़िंदगी बरबाद नहीं होने दी।
कल भाई और उनकी पत्नी भी घर आए थे।
पाँव छू छूकर माफी मांगने लगे।
मैंने अपने भाई को गले से लगा लिया।
और मेरी धर्मपत्नी ने उसकी धर्मपत्नी को गले से लगा लिया।
हमारे पूरे परिवार ने बहुत दिनों बाद एक साथ भोजन किया।
बस फिर क्या था आनंद की लहर घर में दौड़ने लगी।
मेरे हाथ का पेडा हाथ में ही रह गया
मेरे आंसू टपक ही गए आखिर. .. .
गुस्से को योग्य दिशा में मोड़ा जाए तो पछताने की जरूरत नहीं पड़े कभी
बहुत ही अच्छा है कोई को समझना और अमल में लाना चाहिए।
यह एक सच्ची घटना है और बेमिसाल भी है ।
*👍यथार्थ घटना 👍*

और न कोई दिलबन्द दोस्त

 और न कोई दिलबन्द दोस्त हैं (101)
तो काश हमें अब दुनिया में दोबारा जाने का मौक़ा मिलता तो हम (ज़रुर) इमान वालों से होते (102)
इबराहीम के इस किस्से में भी यक़ीनन एक बड़ी इबरत है और इनमें से अक्सर इमान लाने वाले थे भी नहीं (103)
और इसमे तो शक ही नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार (सब पर) ग़ालिब और बड़ा मेहरबान है (104)
(यूँ ही) नूह की क़ौम ने पैग़म्बरो को झुठलाया (105)
कि जब उनसे उन के भाई नूह ने कहा कि तुम लोग (ख़ुदा से) क्यों नहीं डरते मै तो तुम्हारा यक़ीनी अमानत दार पैग़म्बर हूँ (106)
तुम खु़दा से डरो और मेरी इताअत करो (107)
और मैं इस (तबलीग़े रिसालत) पर कुछ उजरत तो माँगता नहीं (108)
मेरी उजरत तो बस सारे जहाँ के पालने वाले ख़ुदा पर है (109)
तो ख़ुदा से डरो और मेरी इताअत करो वह लोग बोले जब कमीनो मज़दूरों वग़ैरह ने (लालच से) तुम्हारी पैरवी कर ली है (110)

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