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20 सितंबर 2021

जन-जन के लाड़ले जन टीवी चैनल के बेयुरोचीफ को जन्मदिन पर बधाई

 

जन-जन के लाड़ले जन टीवी चैनल के बेयुरोचीफ को जन्मदिन पर
बधाई
के डी अब्बासी
कोटा सितम्बर। जन टीवी के ब्यूरोचीफ, मिलनसार, हसमुख, पत्रकारिता के कार्य के लिये दिन-रात एक कर देने वाले शानदार व्यक्तित्व के धनी पत्रकार हरिराज सिंह के जन्मदिन पर आज उनके परिजन, साथी मित्रगण जिनमें शाकिर अली, के.डी. अब्बासी, अर्जुन अरविंद, मुकेश शाक्यवाल, नियाज़ मोहम्मद, गुल मोहम्मद सहित कई प्रियजन उनको
बधाई
और मुबारकबाद दे रहे हैं। उनका जन्मदिन उनके परिवारजनों ने जोरदार तरीके से मनाया। हरिराज को देखने के बाद आज भी लगता है की पुराने जमाने वाली मेहनत और ईमानदारी वाली पत्रकारिता करने वाले पत्रकार आज भी जिंदा है। पहले पत्रकार साधनों के अभाव में भी पत्रकारिता करता था लेकिन साधन पाने के लिये वह ईमानदारी से समझौता नही करता था। वह कभी भी किसी भी पार्टी का पट्टा गले मे नही डालता था बल्कि जज की भूमिका में रहता था और सच लिखता था। बिल्कुल वैसे ही पत्रकार की छवि है हरिराज सिंह की। हरिराज सिंह बूंदी जिले में रहते है जोकि रोजाना पत्रकारिता करने के लिये कोटा आते है। उनके बेग उनके चेनल की माइक आईडी , कैमरा और दिन के लिये खाने का डिब्बा। सिंह रोजाना बस से कोटा आते है और कोटा में सूचना मिलने पर तत्काल ही घटना स्थल पर पहुंच जाते हैं इसी कारण कभी भी उनसे कोई खबर नही चूकती है। चैनल से मिलने वाली वेतन से अपने घर का खर्च चलाते है। भले ही उनके पास साधन नही है लेकिन ऐसे खुद्दार है कि साधन पाने के लिये किसी भी पार्टी का पट्टा अपने गले मे डालना पसन्द नही करते है। सिंह को जब भूख लगती है तो अपना टिफिन निकालकर खाना खा लेते है। हरिराज सिंह पिछले 11 वर्षों से पत्रकारिता कर रहे है। सिंह ने न्यूज़ एक्स्प्रेस, न्यूज़ इंडिया, टाइम्स नाउ, सहारा समय न्यूज़ चैनल में काम कर चुके है और वर्तमान में कोटा में जन टीवी के ब्यूरोचीफ के पद पर कार्य कर रहे है।

पिता ने बेटे को सौंपा अपना देहदान-संकल्प पत्र

 

पिता ने बेटे को सौंपा अपना देहदान-संकल्प पत्र
पुत्र की मौजूदगी में,पिता ने लिया देहदान संकल्प

शाइन इंडिया फाउंडेशन के अनवरत चलाये जा रहे नैत्रदान जागरूकता अभियान के बाद से आम-जन में अब देहदान के प्रति भी लोगों में जागरूकता काफ़ी बढ़ी है। 

कोरोना काल के दौरान लोगों ने जब अपने करीबी रिश्तेदारों को बहुत कम समय मे मृत्यु को प्राप्त होते देखा तो, सभी के मन में यह भाव आये की, मृत्यु के समय का कोई भरोसा नहीं है,यह किसी भी समय आ सकती है,हम जीवन भर किसी के काम आये न आये,पर देहदान का संकल्प भर देने से,कम से कम अंत समय पर यह देहदान का कार्य तो पूरा हो सकेगा ।

इसी क्रम में कल स्टेशन क्षेत्र के श्री सुरेश चंद जैन ने अपने 73वें जन्मदिन पर शाइन इंडिया फाउंडेशन का देहदान संकल्प पत्र भरकर के बेटे धर्मिष्ट के समक्ष ज्योति-मित्र मुकेश अग्रवाल को सौंपा। 

शिक्षा-विभाग से सेवानिवृत्त ,सुरेश जी की धर्मपत्नि शैलबाला जैन का 2 वर्ष पूर्व आकस्मिक निधन के बाद से,सुरेश जी अपना ज्यादातर समय समाज सेवा के कामों में लगाते थे। समाचार पत्रों में आये दिन नैत्रदान-अंगदान-देहदान की खबरों को पढ़ने के बाद से उन्होंने मन बना लिया थ, कि जल्द ही वह देहदान का संकल्प करेंगे । 2 साल से वैश्विक बीमारी कोरोना के कारण   मेडिकल कॉलेज जाना संभव नहीं हो रहा था,तो ऐसे में संस्था के देहदान अभियान के बारे में पढ़ा,और उनको घर बुलाया । 

संस्था सदस्यों ने घर आकर बेटे धर्मिष्ट शाह को भी इस संकल्प कार्य के बारे में पूरी जानकारी दी। सब कुछ अच्छे से समझ पाने के बाद सुरेश जी ने अपने 73 वें जन्मदिवस पर धर्मिष्ट की उपस्थिति में अपना देहदान संकल्प पत्र भरा । बहुत समय बाद मन की इच्छा पूरी होने से सुरेश जी के चहेरे पर काफ़ी संतुष्टि का भाव नज़र आ रहा था। 

संभाग में देहदान संकल्प भरने के लिये आप शाइन इंडिया फाउंडेशन के 8386900102 पर मिस्ड कॉल कर सकते हैं, जिसके बाद आप घर बैठे देहदान संकल्प और उससे सम्बंधित सभी जानकारी को प्राप्त कर सकते हैं। 

संस्था सदस्यों ने बताया कि,8 महीने से चलाए जा रहे इस देहदान जागरूकता अभियान में संभाग के 130 लोगों ने मरणोपरांत देहदान का संकल्प किया है । एक साल पहले तक लोगों में देहदान के प्रति इतनी जागरूकता नहीं थी,पर अब शहरों के साथ-साथ गाँव-ढाणी में भी देहदान संकल्प होने लगे हैं। 


और जिन लोगों ने कुफ्र एख़्तेयार किया उन की मिसाल तो उस शख्स की मिसाल है

 और जिन लोगों ने कुफ्र एख़्तेयार किया उन की मिसाल तो उस शख्स की मिसाल है जो ऐसे जानवर को पुकार के अपना हलक़ फाड़े जो आवाज़ और पुकार के सिवा सुनता (समझता ख़ाक) न हो ये लोग बहरे गूँगे अन्धें हैं कि ख़ाक नहीं समझते (171)
ऐ ईमानदारों जो कुछ हम ने तुम्हें दिया है उस में से सुथरी चीज़ें (षौक़ से) खाओं और अगर ख़ुदा ही की इबादत करते हो तो उसी का शुक्र करो (172)
उसने तो तुम पर बस मुर्दा जानवर और खू़न और सूअर का गोश्त और वह जिस पर ज़िबह के वक़्त ख़ुदा के सिवा और किसी का नाम लिया गया हो हराम किया है बस जो शख्स मजबूर हो और सरकशी करने वाला और ज़्यादती करने वाला न हो (और उनमे से कोई चीज़ खा ले) तो उसपर गुनाह नहीं है बेशक ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है (173)
बेशक जो लोग इन बातों को जो ख़ुदा ने किताब में नाजि़ल की है छुपाते हैं और उसके बदले थोड़ी सी क़ीमत (दुनयावी नफ़ा) ले लेतें है ये लोग बस अँगारों से अपने पेट भरते हैं और क़यामत के दिन ख़ुदा उन से बात तक तो करेगा नहीं और न उन्हें (गुनाहों से) पाक करेगा और उन्हीं के लिए दर्दनाक अज़ाब है (174)
यही लोग वह हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही मोल ली और बख्शिश (ख़ुदा की) के बदले अज़ाब बस वह लोग दोज़ख़ की आग को क्योंकर बरदाश्त करेंगे (175)
ये इसलिए कि ख़ुदा ने बरहक़ किताब नाजि़ल की और बेशक जिन लोगों ने किताबे ख़ुदा में रद्दो बदल की वह लोग बड़े पल्ले दरजे की मुख़ालफत में हैं (176)
नेकी कुछ यही थोड़ी है कि नमाज़ में अपने मुँह पूरब या पश्चिम की तरफ़ कर लो बल्कि नेकी तो उसकी है जो ख़ुदा और रोज़े आखि़रत और फरिश्तों और ख़ुदा की किताबों और पैग़म्बरों पर ईमान लाए और उसकी उलफ़त में अपना माल क़राबत दारों और यतीमों और मोहताजो और परदेसियों और माँगने वालों और लौन्डी ग़ुलाम (के गुलू खलासी) में सर्फ करे और पाबन्दी से नमाज़ पढे़ और ज़कात देता रहे और जब कोई एहद किया तो अपने क़ौल के पूरे हो और फ़क्र व फाक़ा रन्ज और घुटन के वक़्त साबित क़दम रहे यही लोग वह हैं जो दावे ईमान में सच्चे निकले और यही लोग परहेज़गार है (177)
ऐ मोमिनों जो लोग (नाहक़) मार डाले जाएँ उनके बदले में तुम को जान के बदले जान लेने का हुक्म दिया जाता है आज़ाद के बदले आज़ाद और ग़ुलाम के बदले ग़ुलाम और औरत के बदले औरत बस जिस (क़ातिल) को उसके ईमानी भाई के़सास की तरफ से कुछ माफ़ कर दिया जाये तो उसे भी उसके क़दम ब क़दम नेकी करना और ख़ुश मआमलती से (ख़ून बहा) अदा कर देना चाहिए ये तुम्हारे परवरदिगार की तरफ आसानी और मेहरबानी है फिर उसके बाद जो ज़्यादती करे तो उस के लिए दर्दनाक अज़ाब है (178)
और ऐ अक़लमनदों केसास (के क़वाएद मुक़र्रर कर देने) में तुम्हारी जि़न्दगी है (और इसीलिए जारी किया गया है ताकि तुम खुनरेज़ी से) परहेज़ करो (179)
(मुसलमानों) तुम को हुक्म दिया जाता है कि जब तुम में से किसी के सामने मौत आ खड़ी हो बशर्ते कि वह कुछ माल छोड़ जाएं तो माँ बाप और क़राबतदारों के लिए अच्छी वसीयत करें जो ख़ुदा से डरते हैं उन पर ये एक हक़ है (180)

19 सितंबर 2021

यक़ीनन साहित्य व्यापार नहीं होता , बेचने के लिए नहीं होता , सिर्फ साहित्य एक सृजन होता है , एक अनुभव होता है , एक दर्पण होता है , पुराने अनुभवों के साथ , भविष्य के बदलाव का ,, भविष्य के सुधार का संकेत होता है , कमोबेश यही सोच , यही विचार , , प्रसिद्ध साहित्यकार ,भाई बृजेन्द्र कौशिक के है

 यक़ीनन साहित्य व्यापार नहीं होता , बेचने के लिए नहीं होता , सिर्फ साहित्य एक सृजन होता है , एक अनुभव होता है , एक दर्पण होता है , पुराने अनुभवों के साथ , भविष्य के बदलाव का ,, भविष्य के सुधार का संकेत होता है , कमोबेश यही सोच , यही विचार , , प्रसिद्ध साहित्यकार ,भाई बृजेन्द्र कौशिक के है , ,जो उनके द्वारा लिखित साहित्यिक पुस्तकों का सृजन करते है , वितरण करते है , लेकिन विक्रय नहीं करते , उनकी पुस्तक पर नोट अंकित है , कौशिक जी का साहित्य बेचने के लिए नहीं है , लेकिन शोधार्थी निशुल्क  प्राप्त कर सकते है , कहने को छोटी सी  बात है , लेकिन साहित्य को व्यवसाय बनाने वाले , प्रकाशकों के लिए , इनके यह वचन ,, इनकी यह सीख , एक बदलाव के संकेत है , यक़ीनन समाज बदल रहा है ,रोज़ नए क़िस्से , नई कहानियां , नए अनुभव् , नए दर्द , नई खुशियां , हर शख्स की ज़िंदगी में  मचल रहे  है , ,लेकिन इन अनुभवों को , छोटे छोटे अल्फ़ाज़ों में , एक अतुकांत कविता के रूप में , एक गद्य , पद्य के रूप में साहित्यिक सृजन बनाकर , आम लोगों के दिलों को झकझोरने वाला प्रकाशन बनाकर पेश करने की कला , सिर्फ , और सिर्फ , भाई बृजेन्द्र कौशिक साहिब की है , उन्हें उनके लेखन के लिए बधाई , मुबारकबाद , अभी एक हफ्ते पहले , फोन की घंटी बजी , बृजेन्द्र कौशिक जी ने ,डाक का पता पूंछा , में विचलित हो गया , क्योंकि डाक का पता पूंछते ही , मेरे  अंदर की घंटियां बजने लगीं , ,सोचने लगा , बहुत दिनों बात , बहुत महीनों बाद , आज के नए हालातों पर , मुझे कुछ ना कुछ , नए अनुभवों की सीख एक पुस्तक के रूप में , एक साहित्य के रूप में मिलने वाली है , मेरी बेचैनियां रोज़ बढ़ रही थीं , नियमित में अपने दफ्तर में , कोई किताब आयी क्या ,, एक सवाल के साथ ,पूंछता था , खेर इन्तिज़ार की घड़ियां खत्म हुईं  ,,, शनिवार को ,दफ्तर में मुझे , एक पुस्तक , कल कभी नहीं आता , के नाम से दिखी ,, मेने सभी काम छोड़कर ,तुरतं उस पुस्तक को झपट लिया , यक़ीन मानिये ,, ना खाना खाया , ना ही पेंडिंग काम किया , , कल कभी नहीं आता ,, पुस्तक को झपट्टा मारा , और पढ़ना  शुरू किया ,, 104 पृष्ठ की इस पुस्तक में , हर एक ज्वलंत मुद्दे पर ,  104  शीर्षक से अलग अलग ,, मुद्दों पर ,, जीवंत साहित्य था ,, रोज़ मर्रा की ज़िंदगी की कहानियां थी , में पढ़ता रहा , मुझे मेरी  आत्मा कभी झकझोरती ,, कभी कोरोना की यादों में ले जाती , कभी लोकडाउन की बेरोज़गारी , भुखमरी ,, बेबसी , लाचारी क  की तरफ हालातों की याद दिलाती , कभी गरीबों  की गरीबी का अहसास होता , तो कभी , पंद्रह अगस्त , छब्बीस जनवरी जैसे पर्व पर , हर ज़िले , हर कस्बे , सहित राजधानियों में आयोजित कार्यक्रमों पर , अरबों  अरब रूपये खर्च के बाद ,, गिनती के लोगों की मौजूदगी में , एक समाज के लिए हिक़ारत की नज़र से देखे जाने वाले व्यक्ति के निर्वाचन के बाद , उसी से इस पर्व के झंडे के लहराने के उन पलों को याद करता , कभी किसान की मजबूरी , तो मज़दूर की तड़प , तो कभी एक पिता का कर्तव्य , तो कभी पति , पत्नी की नोकझोंक , कभी मालिक नौकर के क़िस्से , तो कभी अमीरी , गरीबी के बीच , मानवीयता का फ़र्क़ , तो कभी सूदखोर बनिये का अनुभव , तो कभी मददगार क़र्ज़ा देने वाले , बिना सूद देने वाले मददगार की हैसियत का अहसास होता , कभी भूखों को खाना खिलाकर , सुकून हांसिल करने वाले की तृप्ति , तो कभी सास , बहु की खटखटाहट , तो कभी पिता की पुत्र को सीख , तो कभी एक बेबस लाचार माँ , लाचार बाप की अपने बच्चों के लिए , दो रोटी तलाश का दर्दनाक अहसास , सभी कुछ तो इस पुस्तक में , है , हर क़िस्सा कुछ अल्फ़ाज़ों में ही , जीवंत है , अहसास है ,ज़िंदगी का हर पड़ाव इस पुस्तक की 104 लघु कथाओं में छुपा है , जज़्बात ,  अनुभव ,  होते है , लेकिन अल्फ़ाज़ों में उन्हें उकेरना ,, यक़ीनन साहित्यकार बृजेन्द्र कौशिक साहिब की कारीगरी ही कही जायेगी , बृजेन्द्र कौशिक एक कॉमरेड है , लाल सलाम ज़िंदाबाद हैं , इनकी  लेखनी में , मशहूर साहित्यकार , प्रेमचंद का अक्स है , रोज़ मर्रा की ज़िंदगी है , रोज़मर्रा की ज़िंदगी के अनुभव , कड़वाहट , मिठास , शामिल है ,  व्यवस्थाओं के खिलाफ बगावत है , तो वर्तमान नफरत भरी सियासत के माहौल में , मोहब्बत , प्यार , क़ौमी एकता का पैगाम है , इनकी कहानियों में किरदार कालपनिक हो सकते है , लेकिन ,इन सब में  अधिकतम , इनके अपने नज़दीकी ,,  लोगों के नाम है ,  कमोबेश इनके अनुभव भी इसमें शामिल किये गए है , इनकी इन कहानियों में , रात भी है , दिन भी है , भूख भी है , गरीबी भी है , मदद भी है , तिरस्कार भी है , अनुभवों की सीख भी है , बुज़ुर्गों का सम्मान भी है , गाँव भी है , उद्योग भी है , कॉर्पोरेट सर्विस भी है , शहर का बदलाव भी है , संस्कार भी है , तो बिगड़ैल लोगों की कहानियां भी है , सब कुछ एक ज़िंदगी का सच ,, या यूँ कहे एक ज़िंदगी का अनुभव , कड़वा सच , उसमे बदलाव के लिए संकेत , इनके इस साहित्य , कल कभी नहीं आता , में शामिल है , यक़ीनन यह पुस्तक , बाल मनोविज्ञान , साहित्य के सृजन माध्यम से , लोगों की सोच बदलने , उन्हें मुख्यधारा में जोड़कर , नफरत से मोहब्बत की तरफ खेंचने , एक संवेदना विहीन व्यवस्था से , संवेदनशील व्यवस्था में ले जाने के लिए,  एक टॉनिक , एक दवा है , जो हर स्कूल में , प्रिटेबल माइंड ,, यानी वोह छोटे बच्चे , जिनके दिमाग में जो बात हम बिठाएंगे , वोह आगे ज़िंदगी उसी तरह से जीने में जुट जाएंगे , ऐसे उम्र के बच्चों के लिए इनकी यह पुस्तक , आदर्श समाज , मददगार समाज , हिम्मतवाला समाज , विकासशील समाज , नफरत के माहौल में मोहब्बत की तरफ के नए एहसास का समाज ,, तरक़्क़ी की तरफ , ईमानदारी से काम करने वाला समाज बनाने के लिए काफी है , जन  कवि ब्रजेन्द्र  कौशिक यूँ तो किसी परिचय के मोहताज नहीं ,, इन्होने सर्जना सृजन प्रकाशन केंद्र की 15 जून 1965 में  स्थापना की , इन्होने कोटा  के गली , मोहल्ले , उद्योग  , सियासी लोगों के हर बदलाव को अपनी इस उम्र के पड़ाव में , नज़दीकी से देखा है , अनुभव किया है , , ब्रजेन्द्र कौशिक को जन कवि , जन साहित्यकार , प्रगतिशील साहित्यकार के रूप में यूँ तो सैकड़ों नहीं , हज़ारों सम्मान मिल चुके है , उनके गीत संग्रह श्वेत पत्र , साक्षी है सदी ,,, ओ  सुबह की हवा , जंगलों  के बीच  ,  कविता संग्रह , दूसरों के सहारे नहीं , खोल दी खिडकियां ,, ग़ज़ल संग्रह हम भी नहीं मोम की  मूरत , कहना है जो ज़रूरी , सबके सपने जैसे अपने , सरोकार ,, , काव्य कृतियों में , रूबरू आपसे हज़ार दोहे , किस घाट  उतरें , नए छंद में , हर किसी के मन में  नए छ्ंद,,,  नहीं असंभव  कुछ ,, मुक्त त्रिपदियाँ,,, हाट से ह्ठ कर नए छ्ंद में ,,  गर्म नदियां तेर कर , नए छ्ंद में ,, कहानी संग्रह , उत्तरकाण्ड के बाद , सितंबर 89,,, ओर वोह केसी है ,, नया लघु कथा संग्रह ,, कल  कभी नहीं आता ,, पुस्तकों का प्रकाशन किया है , जो रोज़ पढ़ी जाने वाली पुस्तकें है , ,, जो साहित्य से अलग थलग होकर भी , रोज़ रोज़ हर जिदंगी की कड़वाहट , मिठास , अनुभवों की सांझेदारी है , ज़िम्मेदारी है , ,बदलाव के लिए एक मार्गदर्शक   दस्तावेज़ है , जन कवि ,                                       बर्जेंदर कोशिक जी का पता सर्जना , सृजन   प्रकाशन केंद्र , 2/38  बसन्त बिहार कोटा राजस्थान मोबाइल नंबर 9414596298  है ,, बृजेन्द्र कोशिक की ज्वलंत मुद्दों पर , रोज़ मर्रा की जिदंगी पर , साहित्यकार , मुंशी प्रेम चंद की शेली , के साथ , जो साहित्य की सर्जना है इसके लिए उन्हे बधाई , मुबारकबाद , सेल्यूट , ओर कॉमरेड भाई होने के नाते , लाल सलाम ,, अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

ऐ ईमानदारों मुसीबत के वक़्त सब्र और नमाज़ के ज़रिए से ख़ुदा की मदद माँगों बेशक ख़ुदा सब्र करने वालों ही का साथी है

 और तीसरा फायदा ये है ताकि तुम हिदायत पाओ मुसलमानों ये एहसान भी वैसा ही है जैसे हम ने तुम में तुमही में का एक रसूल भेजा जो तुमको हमारी आयतें पढ़ कर सुनाए और तुम्हारे नफ़्स को पाकीज़ा करे और तुम्हें किताब क़ुरान और अक़्ल की बातें सिखाए और तुम को वह बातें बतांए जिन की तुम्हें पहले से खबर भी न थी (151)
बस तुम हमारी याद रखो तो मै भी तुम्हारा जि़क्र (खै़र) किया करुगाँ और मेरा शुक्रिया अदा करते रहो और नाशुक्री न करो (152)
ऐ ईमानदारों मुसीबत के वक़्त सब्र और नमाज़ के ज़रिए से ख़ुदा की मदद माँगों बेशक ख़ुदा सब्र करने वालों ही का साथी है (153)
और जो लोग ख़ुदा की राह में मारे गए उन्हें कभी मुर्दा न कहना बल्कि वह लोग जि़न्दा हैं मगर तुम उनकी जि़न्दगी की हक़ीकत का कुछ भी शऊर नहीं रखते (154)
और हम तुम्हें कुछ खौफ़ और भूख से और मालों और जानों और फलों की कमी से ज़रुर आज़माएगें और (ऐ रसूल) ऐसे सब्र करने वालों को खुशख़बरी दे दो (155)
कि जब उन पर कोई मुसीबत आ पड़ी तो वह (बेसाख़्ता) बोल उठे हम तो ख़ुदा ही के हैं और हम उसी की तरफ लौट कर जाने वाले हैं (156)
उन्हीं लोगों पर उनके परवरदिगार की तरफ से इनायतें हैं और रहमत और यही लोग हिदायत याफ़्ता है (157)
बेशक (कोहे) सफ़ा और (कोह) मरवा ख़ुदा की निशानियों में से हैं बस जो शख़्स ख़ानए काबा का हज या उमरा करे उस पर उन दोनो के (दरमियान) तवाफ़ (आमद ओ रफ्त) करने में कुछ गुनाह नहीं (बल्कि सवाब है) और जो शख़्स खुश खुश नेक काम करे तो फिर ख़ुदा भी क़द्रदान (और) वाकि़फ़कार है (158)
बेशक जो लोग हमारी इन रौशन दलीलों और हिदायतों को जिन्हें हमने नाजि़ल किया उसके बाद छिपाते हैं जबकि हम किताब तौरैत में लोगों के सामने साफ़ साफ़ बयान कर चुके हैं तो यही लोग हैं जिन पर ख़ुदा भी लानत करता है और लानत करने वाले भी लानत करते हैं (159)
मगर जिन लोगों ने (हक़ छिपाने से) तौबा की और अपनी ख़राबी की इसलाह कर ली और जो किताबे ख़ुदा में है साफ़ साफ़ बयान कर दिया बस उन की तौबा मै क़ुबूल करता हूँ और मै तो बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान हूँ (160)

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