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16 जनवरी 2019

तो परवाह नहीं करते

और उनके लिए (मेरी कु़दरत) की एक निशानी ये है कि उनके बुज़ुर्गों को (नूह की) भरी हुयी कश्ती में सवार किया (41)
और उस कशती के मिसल उन लोगों के वास्ते भी वह चीज़े (कश्तियाँ) जहाज़ पैदा कर दी (42)
जिन पर ये लोग सवार हुआ करते हैं और अगर हम चाहें तो उन सब लोगों को डुबा मारें फिर न कोई उन का फरियाद रस होगा और न वह लोग छुटकारा ही पा सकते हैं (43)
मगर हमारी मेहरबानी से और चूँकि एक (ख़ास) वक़्त तक (उनको) चैन करने देना (मंज़ूर) है (44)
और जब उन कुफ़्फ़ार से कहा जाता है कि इस (अज़ाब से) बचो (हर वक़्त तुम्हारे साथ-साथ) तुम्हारे सामने और तुम्हारे पीछे (मौजूद) है ताकि तुम पर रहम किया जाए (45)
(तो परवाह नहीं करते) और उनकी हालत ये है कि जब उनके परवरदिगार की निशानियों में से कोई निशानी उनके पास आयी तो ये लोग मुँह मोड़े बग़ैर कभी नहीं रहे (46)
और जब उन (कुफ़्फ़ार) से कहा जाता है कि (माले दुनिया से) जो खु़दा ने तुम्हें दिया है उसमें से कुछ (खु़दा की राह में भी) ख़र्च करो तो (ये) कुफ़्फ़ार ईमानवालों से कहते हैं कि भला हम उस शख़्स को खिलाएँ जिसे (तुम्हारे ख़्याल के मुवाफि़क़) खु़दा चाहता तो उसको खु़द खिलाता कि तुम लोग बस सरीही गुमराही में (पड़े हुए) हो (47)
और कहते हैं कि (भला) अगर तुम लोग (अपने दावे में सच्चे हो) तो आखि़र ये (क़यामत का) वायदा कब पूरा होगा (48)
(ऐ रसूल) ये लोग एक सख़्त चिंघाड़ (सूर) के मुनतजि़र हैं जो उन्हें (उस वक़्त) ले डालेगी (49)
जब ये लोग बाहम झगड़ रहे होगें फिर न तो ये लोग वसीयत ही करने पायेंगे और न अपने लड़के बालों ही की तरफ लौट कर जा सकेगें (50)

15 जनवरी 2019

एक शख्स जो कोटा की सर ज़मीन पर सियासत से जुड़ा था

एक शख्स जो कोटा की सर ज़मीन पर सियासत से जुड़ा था ,,लोकसभा ,,विधानसभा चुनावों में अपना हस्तक्षेप रखता था ,वोह शख्स अचानक ,खुदा के हुक्म से ,रूहानी हो जाता है ,उसे जानलेवा ,लाइलाज बिमारियों के इलाज की शिफा का फार्मूला मिलता है ,और वोह खुद को स्थापित करने के लिए ,,,खुदा के इस दिए गए रूहानी अमल को आज़माने के लिए मरीज़ तलाशता है ,ऐसे वक़्त में मेने उनकी सच्चाई जानी ,भरोसा किया ,,मेरे अख़बार में उनकी इस दावेदारी को जगह दी ,कोटा आकाशवाणी में उनका साक्षात्कार करवाया ,,मरीज़ का इलाज और उनकी दवा से फायदा भी मेने महसूस किया ,दोस्तों उस वक़्त अलबत्ता कुछ अख़बार ,,मिडिया से जुड़े लोग ,,अल्लाह के हुक्म से रूहानी ताक़त वाली ऐसी दवा जो असाध्य ,लाइलाज बीमारी में फायदा पहुंचाती है ,मज़ाक़ समझ रहे थे ,लेकिन खुदा का शुक्र है मेने जो महसूस किया ,जो अख़बार में लिखा ,जो रूहानी ताक़त ,कोटा के मुनीर खान की दवा में महसूस की ,अल्लाह ने उसे सच कर दिखाया ,आज मुंबई में यह अज़ीम शख्सियत स्थापित होकर ,कोटा की धरती का नाम रोशन कर रही है ,,मुनीर खान जिन्होंने लाइलाज बिमारी कैंसर की बीमारी के इलाज की दवा की शुरुआत की आज माशा अल्लाह बॉडी रिवाइवल ,हर तरह की बिमारी के इलाज की दावेदारी इनके ज़रिये हो रही है ,गुपचुप तरीके से नहीं ,,खुले रूप में इनकी दवा की शीशियां मुंबई ,दिल्ली ,दुबई ,अमेरिका ,,लंदन सभी जगह पर मरीज़ों के लिए मंगाई जा रही है ,इनकी दवा पेटेंट है ,कहते है ,खुदा ऐसे कामों में आज़माइश करता है ,मुनीर खान की भी आज़माइश हुई ,डॉक्टरों की यूनियन और कुछ मरीज़ों के षड्यंत्र का शिकार हुए मुनीर खान पर इलज़ाम लगे ,इन्हे पुलिस जांच से गुज़रना पढ़ा ,,अल्लाह का शुक्र है जांच में दूध का दूध पानी का पानी हुआ ,सच सामने आया ,अब फिर से खुले आम साइंटिस्ट मुनीर खान ,इस दवा के ज़रिये दूरदराज़ से निराश ,मायूस लोगो का इलाज कर रहे है ,उन्हें फायदा भी पहुंच रहा है ,,इनकी दवा का प्रचार फिल्म स्टार करते है ,कई सरकारों ने ,कई सरकारी एजेंसियों ने इनकी दवा की जांच करवाई ,लेकिन इसमें वोह कोई क़ानूनी नुस्ख नहीं निकाल पाए है ,वोह आज़ादी के साथ अपना रूहानी ,शिफा के इस कारोबार को पुर खुलूस तरीके से प्यार मोहब्बत से कर रहे है ,कई नेता ,कई समाज सेवक ,कुछ पत्रकार भी इनकी इस रूहानी दवा से फ़ैज़याब हुए है ऐसा उनका दावा है ,,हाल ही में उन्हें उत्तराखंड सरकार की तरफ से इनकी इस खिदमात पर एवार्ड से नवाजा गया ,,मुनीर खान ,अमीर मरीज़ों से इलाज की दवा के रूपये लेते है ,लेकिन गरीबों के लिए उनकी यह मदद ,यह शिफा का ,ज़रिया अल्लाह नाम पर भी रहता है ,,ज़ीरो से हीरो बने ,मुनीर खान आज कोटा सहित पुरे देश की विभिन्न समाजसेवी संस्थाओं से जुड़े है ,ज़रूरत मंदों के मददगार भी बने है ,,आज इनकी सालगिरह है ,,खुदा से दुआ है ,अल्लाह इनके जायज़ कामों में बरकत दे ,इनकी रूहानी शिफा की ताक़त में इज़ाफ़ा करे ,इनको दरियादिल बनाये ,,गरीबों की हमदर्दी का जज़्बा इनमे और मज़बूत हो ,, कोटा की धरती पर इन्होने जन्म लिया ,,इस शोहरत की शुरुआत कोटा की धरती से इनकी हुई ,इसलिए खुदा इनके दिल दिमाग में सद्क़ाए जारिया के रूप में ,,कोटा में एक कोचिंग अल्पसंख्यक छात्र छात्राओं के लिए हॉस्टल सुविधा के साथ चलाने की तौफ़ीक़ अता फरमाए ,जिसमे इनके ट्रस्टी ,,इनके प्रबन्धःक ,क्लास आठ के बाद पचास बच्चों को ,उनकी प्रतिभा के हिसाब से डॉक्टर ,इंजीनियर ,प्रशासनिक सेवा ,कॉमर्शियल सेवा ,जहाँ भी वोह प्रतिभावान बच्चे अपना रूहझान दिखाए ,उस तरफ ,इनके कल्याणकारी कोष से उन्हें भवन ,हॉस्टल ,खाने पीने रहने ,यूनिफॉर्म की सुविधा के साथ ,शैक्षणिक प्रशिक्षण ,मिले ,कोचिंग मिले ,अल्लाह उन्हें यह तौफ़ीक़ अता फरमाए ,, भाई मुनीर खान को जायज़ कामों में तरक़्क़ी मिले ,कामयाबी मिले ,शोहरत मिले ,अल्लाह उनकी दवाओं में ईमानदारी ,और शिफा पैदा करे ,इसी दुआओ के साथ मुनीर भाई को एक बार फिर उनकी योम ऐ पैदाइश पर एक बार फिर मुबारकबाद ,बधाई ,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

(ऐ रसूल) ये लोग एक सख़्त चिंघाड़ (सूर) के मुनतजि़र हैं

और उनके लिए (मेरी कु़दरत) की एक निशानी ये है कि उनके बुज़ुर्गों को (नूह की) भरी हुयी कश्ती में सवार किया (41)
और उस कशती के मिसल उन लोगों के वास्ते भी वह चीज़े (कश्तियाँ) जहाज़ पैदा कर दी (42)
जिन पर ये लोग सवार हुआ करते हैं और अगर हम चाहें तो उन सब लोगों को डुबा मारें फिर न कोई उन का फरियाद रस होगा और न वह लोग छुटकारा ही पा सकते हैं (43)
मगर हमारी मेहरबानी से और चूँकि एक (ख़ास) वक़्त तक (उनको) चैन करने देना (मंज़ूर) है (44)
और जब उन कुफ़्फ़ार से कहा जाता है कि इस (अज़ाब से) बचो (हर वक़्त तुम्हारे साथ-साथ) तुम्हारे सामने और तुम्हारे पीछे (मौजूद) है ताकि तुम पर रहम किया जाए (45)
(तो परवाह नहीं करते) और उनकी हालत ये है कि जब उनके परवरदिगार की निशानियों में से कोई निशानी उनके पास आयी तो ये लोग मुँह मोड़े बग़ैर कभी नहीं रहे (46)
और जब उन (कुफ़्फ़ार) से कहा जाता है कि (माले दुनिया से) जो खु़दा ने तुम्हें दिया है उसमें से कुछ (खु़दा की राह में भी) ख़र्च करो तो (ये) कुफ़्फ़ार ईमानवालों से कहते हैं कि भला हम उस शख़्स को खिलाएँ जिसे (तुम्हारे ख़्याल के मुवाफि़क़) खु़दा चाहता तो उसको खु़द खिलाता कि तुम लोग बस सरीही गुमराही में (पड़े हुए) हो (47)
और कहते हैं कि (भला) अगर तुम लोग (अपने दावे में सच्चे हो) तो आखि़र ये (क़यामत का) वायदा कब पूरा होगा (48)
(ऐ रसूल) ये लोग एक सख़्त चिंघाड़ (सूर) के मुनतजि़र हैं जो उन्हें (उस वक़्त) ले डालेगी (49)
जब ये लोग बाहम झगड़ रहे होगें फिर न तो ये लोग वसीयत ही करने पायेंगे और न अपने लड़के बालों ही की तरफ लौट कर जा सकेगें (50)

14 जनवरी 2019

उसे खु़दा का हुक्म हुआ

तब उन पैग़म्बरों ने कहा हमारा परवरदिगार जानता है कि हम यक़ीन्न उसी के भेजे हुए (आए) हैं और (तुम मानो या न मानो) (16)
हम पर तो बस खुल्लम खुल्ला एहकामे खु़दा का पहुँचा देना फज्र है (17)
वह बोले हमने तुम लोगों को बहुत नहस क़दम पाया कि (तुम्हारे आते ही क़हत में मुबतेला हुए) तो अगर तुम (अपनी बातों से) बाज़ न आओगे तो हम लोग तुम्हें ज़रूर संगसार कर देगें और तुमको यक़ीनी हमारा दर्दनाक अज़ाब पहुँचेगा (18)
पैग़म्बरों ने कहा कि तुम्हारी बद शुगूनी (तुम्हारी करनी से) तुम्हारे साथ है क्या जब नसीहत की जाती है (तो तुम उसे बदफ़ाली कहते हो नहीं) बल्कि तुम खु़द (अपनी) हद से बढ़ गए हो (19)
और (इतने में) शहर के उस सिरे से एक शख़्स (हबीब नज्जार) दौड़ता हुआ आया और कहने लगा कि ऐ मेरी क़ौम (इन) पैग़म्बरों का कहना मानो (20)
ऐसे लोगों का (ज़रूर) कहना मानो जो तुमसे (तबलीख़े रिसालत की) कुछ मज़दूरी नहीं माँगते और वह लोग हिदायत याफ्ता भी हैं (21)
और मुझे क्या (ख़ब्त) हुआ है कि जिसने मुझे पैदा किया है उसकी इबादत न करूँ हालाँकि तुम सब के बस (आखि़र) उसी की तरफ लौटकर जाओगे (22)
क्या मैं उसे छोड़कर दूसरों को माबूद बना लूँ अगर खु़दा मुझे कोई तकलीफ पहुँचाना चाहे तो न उनकी सिफारिश ही मेरे कुछ काम आएगी और न ये लोग मुझे (इस मुसीबत से) छुड़ा ही सकेंगें (23)
(अगर ऐसा करूँ) तो उस वक़्त मैं यक़ीनी सरीही गुमराही में हूँ (24)
मैं तो तुम्हारे परवरदिगार पर ईमान ला चुका हूँ मेरी बात सुनो और मानो ;मगर उन लोगों ने उसे संगसार कर डाला (25)
तब उसे खु़दा का हुक्म हुआ कि बेहिश्त में जा (उस वक़्त भी उसको क़ौम का ख़्याल आया तो कहा) (26)
मेरे परवरदिगार ने जो मुझे बख़्श दिया और मुझे बुज़ुर्ग लोगों में शामिल कर दिया काश इसको मेरी क़ौम के लोग जान लेते और ईमान लाते (27)
और हमने उसके मरने के बाद उसकी क़ौम पर उनकी तबाही के लिए न तो आसमान से कोई लशकर उतारा और न हम कभी इतनी सी बात के वास्ते लशकर उतारने वाले थे (28)
वह तो सिर्फ एक चिंघाड थी (जो कर दी गयी बस) फिर तो वह फौरन चिराग़े सहरी की तरह बुझ के रह गए (29)
हाए अफसोस बन्दों के हाल पर कि कभी उनके पास कोई रसूल नहीं आया मगर उन लोगों ने उसके साथ मसख़रापन ज़रूर किया (30)

13 जनवरी 2019

कितनी अजीब बात है ,जिस चीन का विरोध करके हमारे देश के लोग सियासत करते है

कितनी अजीब बात है ,जिस चीन का विरोध करके हमारे देश के लोग सियासत करते है ,विशिष्ठ विचारधारा के संगठन चीन के बने सामानों के बहिष्कार का नारा देते ,है आंदोलन चलाते है ,उसी चीन की ,अविष्कारिक ,पतंग को हम हवा में उढ़ाकर अपने त्यौहार ,अपने जश्न मनाते है ,चीन की इस संस्कृति को हम यूँ ही आगे नहीं ,बढ़ाते हम चाइना मांझे का इस्तेमाल कर चाइना की अविष्कारिक इस पतंग को हमारे देश में उड़ाने की ज़िद करते है ,और देखिये नतीजा ,लोग इस चायनीज़ मांझे से लहूलुहान होते है ,कट्टे है ,कुछ मोत के आगोश में भी गंभीर घायल होकर सो जाते है ,चीन आज भी चायनीज़ मांझे के नाम पर हमारे ही देश के लोगों को हथियार बनाकर ,गुमराह ,कर हमारे देश के आम नागरिकों के साथ हादसे करवा रहा ,हमारा ,देश ,हमारा क़ानून ,,हमारे सुरक्षाकर्मी ,हमारे स्वदेशी की बात करने वाले चुनावी नेताओं के बंधक बने कथित राष्ट्रभक्त अपनी बोलती इस मुद्दे पर बंद कर चुके है ,,तो जनाब यह कड़वा सच है ,जिसे हमे स्वीकार तो करना ही होगा ,कुतर्क चाहे करके इस सच को सत्तर सालों में क्या हुआ कहकर हम झुंठला दे ,लेकिन सच यही है ,शतुरमुर्ग की तरह ,ज़मीन में ,रेत में मुंह छुपाने से खून का प्यासा बना यह चाइनीज़ हमलावर बना मांझा हमे लहू लुहान करता रहेगा ,और हम ,चीन से नफरत के नाम पर वोट मांगेंगे ,चीन के उत्पाद के सामानों के बहिष्कार के नाम पर लोगो को गुमराह कर स्वदेशी आंदोलन के नाम पर खुद कोई देश भक्ति बघारेंगे ,लेकिन सच आपके सामने है ,,,दोस्तों ऐसा माना जाता है कि दुनिया में सबसे पहले पतंग का आविष्कार चीन में हुआ था. लगभग 2000 साल पहले पूर्वी चीन के शानडोंग नामक प्रांत तो पतंग का घर कहा जाता था.एक मान्यता के अनुसार एक चीनी किसान अपनी टोपी को हवा में उड़ने से बचाने के लिए उसे एक रस्सी से बांधकर रखता था जिससे आगे चलकर पतंग का आविष्कार किया गया,,,माना जाता है कि पतंग का आविष्कार ईसा पूर्व तीसरी सदी में चीन में हुआ था। दुनिया की पहली पतंग एक चीनी दार्शनिक "हुआंग थेग"ने बनाई थी। इस प्रकार पतंग का इतिहास लगभग २,३०० वर्ष पुराना है। पतंग बनाने का उपयुक्त सामान चीन में उप्लब्ध था जैसे:- रेशम का कपडा़, पतंग उडाने के लिये मज़बूत रेशम का धागा और पतंग के आकार को सहारा देने वाला हल्का और मज़बूत बाँस वगेरा ,,तो दोस्तों पतंग तो पतंग है ,,यह एक खेल ,एक धार्मिक मान्यता हो सकती है ,एक मनोरंजन हो सकता है ,लेकिन सच तो यही है ,के हम चायनीज़ अविष्कारक पतंग को ,,अपने मांझे से भी उड़ाने में नाकाम है ,हम चायनीज़ मांझे के इस्तेमाल से हमारे ही इस देश के राहगीरों ,पंछियों ,जानवरों ,बच्चों ,बूढ़ों ,को लहूलुहान कर रहे है ,बेमौत ,चायनीज़ मांझे के हथियार से उनकी हत्या कर रहे है ,जहाँ का यह मांझा है ,जहाँ का यह अविष्कार है ,वहां ,ऐसा लहूलुहान का खेल नहीं होता ,वहां ,ऐसा क़ातिल मांझे का उपयोग नहीं होता ,,लेकिन देश में राष्ट्रभक्त ,ठेकेदार ,तो बस ,गिरेहबान में झांकते ही नहीं ,,क्योंकि ,,,,,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
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