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22 जून 2018

शरीक ऐ हयात ,अगर शुक्र ,,सब्र वाली ,मददगार हो ,तो शोहर के लिए जन्नत का माहौल होता है

शरीक ऐ हयात ,अगर शुक्र ,,सब्र वाली ,मददगार हो ,तो शोहर के लिए जन्नत का माहौल होता है ,और इस जन्नत के माहौल में ,शोहर अपनी शरीक ऐ हयात के प्यार में डूब कर ,अड़ोस ,पड़ोस ,,मोहल्ले ,,कस्बे ,ज़िले ,,सभी जगह ,प्यार की खुशबु महकाता है ,प्यार बांटता है ,और ऐसा शोहर अगर नफरत के इस माहौल उसके इस ,,मोहब्बत के पैगाम ,,की लगातार कामयाबी के लिए गुलपोशी के साथ सम्मानित होता रहे तो ऐसी शरीक ऐ हयात ,उनके शोहर के लिए फख्र की बात होती है ,,जी हाँ दोस्तों में बात कर रहा हूँ ,,मोहब्बत का पैगाम बांटने वाले एक शख्स बहादुर भाई ,नफरत के इस माहौल में बढ़ी बहादुरी से सीना तानकर मोहब्बत का पैगाम देता है ,दुसरो के सुख दुःख का साथी होता है ,नफरत के माहौल को प्यार के माहौल में बदलता है ,न हिन्दू हो ,न तुम हो मुसलमान ,बस तुम इंसान ,सिर्फ इंसान हो ,के पैगाम को लोगो में मुस्कुराहट के साथ बांटता है ,अलबत्ता ,इस कोशिश में बहादुर भाई के पैरों में कभी छाले होते है ,कभी अपनी पारिवारिक मसरूफियात को भी दरगुज़र कर वोह अपने इस कार ऐ खेर को बखूबी अंजाम देते है ,नफरत के खिलाफ मोहब्बत की इस जंग में भाई बहादुर हमेशा जीतते है ,लेकिन इसके लिए उनके साथ उनकी शरीक ऐ हयात ,हमारी भाभीजान भी मुबारकबाद की हक़दार है क्योंकि उनके वक़्त में से चोरी करके बहादुर भाई अपने वक़्त को इस कार ऐ खेर ,,मोहब्बत के पैगाम ,,की खुशबु बिखेरने में लगाते है ,सोमवार 25 जून को ,,मोहब्बत बांटने वाले इस खूबसूरत जोड़े का गठबंधन हुआ ,,और ऐसा गठबंधन जो माशाअल्लाह ,अपनी खुशियों के साथ समाज में ,शहर में ,मोहल्ले में सिर्फ और सिर्फ खुशियां तलाशता है ,खुशियां बांटता है ,ऐसे मोहब्बत के पैगाम देने वाली खूबसूरत जोड़ी को उनकी शादी की सालगिरह पर बेशुमार दुआओं के साथ बधाई ,मुबारकबाद ,,,
मेने पहले भी लिखा था ,,,हर एक दिल का ,,जिसे दर्द सुनाई देता है ,,,उसी शेख बहादुर को ,,सारा ज़माना बधाई देता है ,, दोस्तों राजस्थान का एक छोटा सा बारां जिला ,,जहां काम मिस्त्री का लेकिन जज़्बा क़ौमी एकता ,,राष्ट्रीयता ,,समाजसेवा का ,,बस इसी जज़्बे ने शेख बहादुर को ,,बारां ही पुरे राजस्थान में हर दिल अज़ीज़ कर दिया ,,लोगों ने इनके काम और जज़्बे को देखकर इनके घर को प्रशंसा पत्र और पुरस्कार प्रतीक चिन्हो से भर दिया ,,शेख बहादुर कहते है ,,के रोटी की भूख मिटाने के साथ साथ खिदमत ऐ ख़ल्क़ ,,यानी दुनिया की खिदमत भी ज़िंदगी के लिए ज़रूरी है ,,वोह कहते है ,,इस्लाम नहीं सिखाता ,,आपस में बेर रखना ,,हिंदी है हम ,,हिंदुस्तान हमारा ,,बस इसी जज़्बे को लेकर शेख बहादुर घर घर ,,बस्ती बस्ती जाकर लोगों की तकलीफ देखते है और बिना कहे ,,बिना धर्म ,,ज़ात पात देखे ,,उसकी खिदमत उसकी सेवा में जुट जाते है ,,गरीब की खिदमत उन्हें हाथ उठाकर दुआएं दिलवाती है ,,जबकि अमीरो के लिए भी उनकी समाजसेवा ज़रूरत बन गयी है ,,सियासत से दूर ,,दलगत राजनीति से दूर ,,अहंकार ,,हिन्दू मुस्लिम के जज़्बे से दूर ,,इंसानियत सिर्फ इंसानियत के जज़्बे के साथ ,,समाजसेवा में लगे भाई शेख बहादुर उनके अनुकरणीय कार्यो के चलते बारां जिला प्रशासन द्वारा सात से भी अधिक बार सम्मानित हो चुके है ,,शेख बहादुर अपने छात्र जीवन से ही समाजसेवा और दुसरो की मदद का जज़्बा रखते थे ,,इसीलिए वोह इनके दोस्तों में ,,मददगार के नाम से जाने जाते थे ,,जैसा नाम वैसा काम ,एक तो शेख ,,यानि अपने घर के रईस ,,दूसरे बहादुर ,,यानि निर्भीक ,किसी का कोई खौफ नहीं ,बस सच और ईमानदारी के साथ मज़लूम की मदद ,,उसके लिए इंसाफ का संघर्ष इनकी बहादुरी को ज़िंदाबाद करता है ,,,किसी को खून की ज़रूरत हो ,,लोग शेख बहादुर को तलाशते है ,,किसी को रोटी की ज़रूरत हो ,, किसी को कपड़े की ज़रूरत हो ,,किसी को इलाज के लिए मदद की ज़रूरत हो ,,दवा की ज़रूरत हो ,,रात रात भर जागकर अस्पताल में मदद की ज़रूरत हो ,,,बच्चो को कपड़े ,,फीस ,,स्कूल की किताबो की ज़रूरत हो ,,छात्रव्रत्ति की ज़रूरत हो ,,,,विकलांगो को बैसाखी की ज़रूरत हो ,,वाहन की ज़रूरत हो ,,हर ज़रूरत का एक ही इलाज ,,एक ही दवा ,,शेख बहादुर ,,शेख बहादुर ,,विकट परिस्थितियों में जब नफरत की आंधी चल रही थी ,,धर्म मज़हब के नाम पर लोग एक दूसरे के खून के प्यासे थे ,,तब शेख बहादुर डंके की चोट पर ,,बारां में प्यार ,,मज़हबी एकता का संदेश देते हुए ,,बारां के भड़काऊ लोगों की नाक में नकेल डालकर कई अनहोनी घटनाओ को रोक रहे थे ,,,बस शेख बहादुर इनकी इन अदाओ से ही बारां के हर वर्ग ,,हर समाज में हर दिल अज़ीज़ बने ,,सभी समाज सेवी संस्थाओ ने इन्हे अपने साथ जोड़ा ,रोटरी क्लब हो ,,लॉयन्स क्लब हो ,,जिला परिषद हो ,,पंचायत हो ,,पालिका हो ,,जिला प्रशासन हो ,,पुलिस प्रशासन हो ,,मंत्री हो संत्री हो ,,अमीर हो गरीब हो ,,दुखी हो खुशहाल हो ,सभी लोगों में शेख बहादुर ज़िंदाबाद है ,,समाजसेवा की एक जांबाज़ समर्पण के जज़्बे की मिसाल है ,,,अपने रोज़गार के साथ साथ ,,, अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ ,,,अपने निजी कामकाज के साथ साथ समाज की सेवा सीमित साधनो से करना असम्भव है लेकिन इस असम्भव को सम्भव कर दिखाया है ,,भाई शेख बहादुर ने ,,,दर्जन से भी अधिक बार ,,हर साल बारां जिला प्रशासन द्वारा अलग अलग कार्यो के लिए इनका लगातार सम्मान ,,,कोटा संभागीय आयुक्त द्वारा इनका सम्मान ,,,पांच दर्जन से भी अधिक संस्थाओ द्वारा इनका सम्मान अपने आप में इनकी सेवा का पुरस्कार है ,,लोगों के दिलों में इनके लिए प्यार का जज़्बा इनके लिए इनाम है ,,,शेख बहादुर ने स्वर्गीय एडवोकेट अशफ़ाक़ भाईजान से पत्र के ज़रिये अपनी खुशिया बांटने की कला सीखी ,,प्रशासन और लोगों तक अपने लोगों की ,,अपने क्षेत्र की समस्याएं भेजने और उनका समाधान करने का ज़रिया ढूंढा और बस समाजसेवा के जज़्बे के साथ साथ ,,शेख बहादुर बारां की हर समस्या के समाधान के लिए प्रशासन को पत्र लिखने लगे ,,लोगों को बधाई ,,मुबारकबाद ,,समाजसेवा का संदेश भेजने लगे ,वोह लिखते गए ,,वोह लिखते गए ,,लोग पढ़ते रहे ,,उन्हें याद करते रहे और वर्ष उन्नीस सो चौरासी से आज तक वक़्त गुज़रा शेख बहादुर के एक मित्र ने उनके द्वारा लिखित संदेश पत्रो को जब हिसाब जोड़ा तो यह आंकड़ा अठ्ठावन हज़ार का हो गया ,,सब चोंक गए ,,,बहादुर को इस पत्र लेखन के लिए बारां की समाज सेवी संस्थाओ ने प्रुस्कृत किया ,,,अब बारां में अनूठी समाज सेवा और उनके पत्र लिखकर लोगों में सुधार का प्रयास करने ,,लोगों को समाजसेवा ,,दुसरो की मदद ,,सरकार की सेवाओ का लाभ दुसरो तक पहुंचाने का जज़्बा पैदा किया ,,सेकड़ो लोग सेकड़ो लोग ऐसे है जिनकी ज़िंदगी शेख बहादुर के एक पत्र ने बदल दी ,,एक संदेश ,,और जागरूकता की मिसाल बनती गई ,,छुआछूत के खिलाफ पत्र अभियान ,,बेटी पढ़ाओ ,,बेटी बचाओ के लिए पत्र अभियान ,,वृद्धो के सम्मान के लिए पत्र अभियान ,,,समस्याओ के निराकरण के लिए पत्र अभियान ,,,छात्र छात्राओ में शिक्षा की जागृति ,,,राष्ट्रिय एकता ,,राष्ट्रिय सम्मान ,,,अभिमान ,,गौरव और राष्ट्रिय एकता के जज़्बे के लिए इनके पत्रो का अपना महत्व आज भी है ,,,ऐसी अनूठी शख्सियत ,शेख बहादुर बारा वालों को मेरा सलाम ,,बधाई मुबारकबाद ,,,,,,,,,,,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

शैतान आदमी का खुला हुआ दुष्मन है

मैं) उस ख़़ुदा के नाम से (शुरु करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है
अलिफ़ लाम रा ये वाज़ेए व रौशन किताब की आयतें है (1)
हमने इस किताब (क़ुरान) को अरबी में नाजि़ल किया है ताकि तुम समझो (2)
(ऐ रसूल) हम तुम पर ये क़ुरान नाजि़ल करके तुम से एक निहायत उम्दा कि़स्सा बयान करते हैं अगरचे तुम इसके पहले (उससे) बिल्कुल बेख़बर थे (3)
(वह वक़्त याद करो) जब यूसूफ ने अपने बाप से कहा ऐ अब्बा मैने ग्यारह सितारों और सूरज चाँद को (ख़्वाब में) देखा है मैने देखा है कि ये सब मुझे सजदा कर रहे हैं (4)
याक़ूब ने कहा ऐ बेटा (देखो ख़बरदार) कहीं अपना ख़्वाब अपने भाईयों से न दोहराना (वरना) वह लोग तुम्हारे लिए मक्कारी की तदबीर करने लगेगें इसमें तो शक ही नहीं कि शैतान आदमी का खुला हुआ दुष्मन है (5)
और (जो तुमने देखा है) ऐसा ही होगा कि तुम्हारा परवरदिगार तुमको बरगुज़ीदा (इज़्जतदार) करेगा और तुम्हें ख़्वाबो की ताबीर सिखाएगा और जिस तरह इससे पहले तुम्हारे दादा परदादा इबराहीम और इसहाक़ पर अपनी नेअमत पूरी कर चुका है और इसी तरह तुम पर और याक़ूब की औलाद पर अपनी नेअमत पूरी करेगा बेशक तुम्हारा परवरदिगार बड़ा वाकि़फकार हकीम है (6)
(ऐ रसूल) यूसुफ और उनके भाइयों के किस्से में पूछने वाले (यहूद) के लिए (तुम्हारी नुबूवत) की यक़ीनन बहुत सी निशनियाँ हैं (7)
कि जब (यूसूफ के भाइयों ने) कहा कि बावजूद कि हमारी बड़ी जमाअत है फिर भी यूसुफ़ और उसका हकीक़ी भाई (इब्ने यामीन) हमारे वालिद के नज़दीक बहुत ज़्यादा प्यारे हैं इसमें कुछ शक नहीं कि हमारे वालिद यक़ीनन सरीही (खुली हुयी) ग़लती में पड़े हैं (8)
(ख़ैर तो अब मुनासिब ये है कि या तो) युसूफ को मार डालो या (कम से कम) उसको किसी जगह (चल कर) फेंक आओ तो अलबत्ता तुम्हारे वालिद की तवज्जो सिर्फ तुम्हारी तरफ हो जाएगा और उसके बाद तुम सबके सब (बाप की तवजज्जो से) भले आदमी हो जाओगें (9)
उनमें से एक कहने वाला बोल उठा कि यूसुफ को जान से तो न मारो हाँ अगर तुमको ऐसा ही करना है तो उसको किसी अन्धे कुएँ में (ले जाकर) डाल दो कोई राहगीर उसे निकालकर ले जाएगा (और तुम्हारा मतलब हासिल हो जाएगा) (10)

21 जून 2018

तुम्हारा परवरदिगार ऐसा (बे इन्साफ) कभी न था कि बस्तियों को जबरदस्ती उजाड़ देता

और इसमें तो शक ही नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार उनकी कारस्तानियों का बदला भरपूर देगा (क्यूंकि) जो उनकी करतूतें हैं उससे वह खूब वाकि़फ है (111)
तो (ऐ रसूल) जैसा तुम्हें हुक्म दिया है तुम और वह लोग भी जिन्होंने तुम्हारे साथ (कुफ्र से) तौबा की है ठीक साबित क़दम रहो और सरकशी न करो (क्योंकि) तुम लोग जो कुछ भी करते हो वह यक़ीनन देख रहा है (112)
और (मुसलमानों) जिन लोगों ने (हमारी नाफरमानी करके) अपने ऊपर ज़ुल्म किया है उनकी तरफ माएल (झुकना) न होना और वरना तुम तक भी (दोज़ख़) की आग आ लपटेगी और ख़ुदा के सिवा और लोग तुम्हारे सरपरस्त भी नहीं हैं फिर तुम्हारी मदद कोई भी नहीं करेगा (113)
और (ऐ रसूल) दिन के दोनो किनारे और कुछ रात गए नमाज़ पढ़ा करो (क्योंकि) नेकियाँ यक़ीनन गुनाहों को दूर कर देती हैं और (हमारी) याद करने वालो के लिए ये (बातें) नसीहत व इबरत हैं (114)
और (ऐ रसूल) तुम सब्र करो क्योंकि ख़ुदा नेकी करने वालों का अज्र बरबाद नहीं करता (115)
फिर जो लोग तुमसे पहले गुज़र चुके हैं उनमें कुछ लोग ऐसे अक़ल वाले क्यों न हुए जो (लोगों को) रुए ज़मीन पर फसाद फैलाने से रोका करते (ऐसे लोग थे तो) मगर बहुत थोड़े से और ये उन्हीं लोगों से थे जिनको हमने अज़ाब से बचा लिया और जिन लोगों ने नाफरमानी की थी वह उन्हीं (लज़्ज़तों) के पीछे पड़े रहे और जो उन्हें दी गई थी और ये लोग मुजरिम थे ही (116)
और तुम्हारा परवरदिगार ऐसा (बे इन्साफ) कभी न था कि बस्तियों को जबरदस्ती उजाड़ देता और वहाँ के लोग नेक चलन हों (117)
और अगर तुम्हारा परवरदिगार चाहता तो बेशक तमाम लोगों को एक ही (किस्म की) उम्मत बना देता (मगर) उसने न चाहा इसी (वजह से) लोग हमेषा आपस में फूट डाला करेगें (118)
मगर जिस पर तुम्हारा परवरदिगार रहम फरमाए और इसलिए तो उसने उन लोगों को पैदा किया (और इसी वजह से तो) तुम्हारा परवरदिगार का हुक्म क़तई पूरा होकर रहा कि हम यक़ीनन जहन्नुम को तमाम जिन्नात और आदमियों से भर देगें (119)
और (ऐ रसूल) पैग़म्बरों के हालत में से हम उन तमाम कि़स्सों को तुम से बयान किए देते हैं जिनसे हम तुम्हारे दिल को मज़बूत कर देगें और उन्हीं कि़स्सों में तुम्हारे पास हक़ (क़ुरान) और मोमिनीन के लिए नसीहत और याद दहानी भी आ गई (120)
और (ऐ रसूल) जो लोग ईमान नहीं लाते उनसे कहो कि तुम बजाए ख़ुद अमल करो हम भी कुछ (अमल) करते हैं (121)
(नतीजे का) तुम भी इन्तज़ार करो हम (भी) मुन्तिजि़र है (122)
और सारे आसमान व ज़मीन की पोशीदा बातों का इल्म ख़ास ख़ुदा ही को है और उसी की तरफ हर काम हिर फिर कर लौटता है तुम उसी की इबादत करो और उसी पर भरोसा रखो और जो कुछ तुम लोग करते हो उससे ख़ुदा बेख़बर नहीं (123)

20 जून 2018

राहुल_गाँधी के जन्मदिन पर Hafeez Kidwai की बेहतरीन पोस्ट..

#राहुल_गाँधी के जन्मदिन पर Hafeez Kidwai की बेहतरीन पोस्ट...
एक नज़र उनकी तस्वीर पर डाली।सिर से पाँव तक मासूमियत।झूठ का कहीं कोई वजूद नही।कभी मज़ाक उड़ाने से उबर पाना तो यह सोचना की आखिर तुम्हे उसके जैसा बचपन मिला होता तो तुम कैसे होते।पड़ोस के शहर में जब कोई हादसों में मारा जाता है तो आसपास के बच्चे सहम जाते हैं।घर की चौखट पर, दुनिया को हिला देने वाली उसकी दादी को जब मारा गया तब उसके बालमन पर क्या प्रभाव पड़ा होगा।इस सबके बीच जब उसके बाप के ख़ून से लथपथ जूते उसके हाथ में रखे गए होंगे तब उसके दिल पर क्या बीती होगी।हाँ तुम मज़ाक उड़ा सकते हो,उसका जीभर मज़ाक उड़ाओ।
अभी कुछ लोग यहीं आएँगे और अपने संस्कारो का खुला प्रदर्शन करेंगे।बीस बीस रूपये पर पोस्ट पर कमाई करने वाले उसके चरित्र की धज्जिया उड़ाएंगे।लेकिन मैं कहता हूँ कुछ भी करो,मगर शुचिता से तो करो।मुझे मालूम है की इधर तुम यही कामो के लिए खासकर बेरोज़गार बनाए गए हो,तो बेरोज़गारी में गाली लिखने के पैसे मिले भला उसमे क्या बुरा है।तुम्हे सीधे तो नौकरी मिल ही नही सकती तो गाली गलौज से रोटी चल जाए इससे अच्छा क्या है।इन्हें शुक्र मनाना चाहिए की उनके घर में खाना पहुँचाने के लिए ऐसा चरित्र मिला है जो कल पलट करभी इनसे बदला नही लेगा,बल्कि इनकी फ़िक्र ही करेगा।तुम सबको उसके बड़े खूबसूरत दिल के बारे में अच्छे से पता है ।उसके ख़ून में अवाम को इस्तेमाल करना शामिल ही नही है, बल्कि इनके लिए मरना ही है।
संगीन के साए में वह बड़ा हुआ।उसके इर्द गिर्द ऐसी सख़्ती की दोस्त जैसी चीज़ ही खत्म हो गई।रिश्तेदार के नाम पर माँ और बहन की ही छाँव रह गई।उसके ना चाहते हुए भी उसे सुरक्षा घेरे में क़ैद कर दिया गया।अब ज़रा सोचना यह सब तोड़ते हुए उसे कितनी जद्दोजहद खुद में करनी पड़ी होगी।फिर भी ख़ुशी है वह जैसा है बिना मक्कारी झूठ फ़रेब वह सबके सामने है।
रही बात उसकी समझ की तो उसे समझने से पहले अपने दिमाग में जमी काई को हटाना पड़ेगा।विषयों पर उसकी पकड़ को देखना हो तो अपनी आँखों पर जमी पीत पत्रकारिता की परत हटानी ही होगी।आज उसका जन्मदिन है।बड़े बड़े जिस्म वाले मगर छोटे से दिल वाले भी उसे बधाई नही देंगे।मुझे इतना पता है वह बहुत उम्दा शख्सियत है।सच्चा है,सीधा है, जैसा है वैसा दिखता है।हमारी जनता ने उसे एक नही कई बार चुना है, वह भी मोहब्बत के साथ।
राजनीती में वैसे तो कोई स्तर रहा ही नही है, समाज ने भी अपना चरित्र खोया ही है।वह भी भीड़ की तरह चल रहा है, बुरा भला कहते हुए।खैर राहुल गाँधी को उनके जन्मदिन की हार्दिक बधाई।ईश्वर उनसे और बेहद ज़रूरी काम ले।राहुल में किसी तरह की कोई कमी नही है।मुझे ख़ुशी है की दुष्प्रचार के बावजूद उसने अपने आपा नही खोया।कहीं पर ज़बान को इतना गिरने नही दिया की शर्मिंदगी हो।ज़बरदस्त कीचड़ उछालते लोगों के बीच वह मुस्कुराता हुआ अपने काम में लगा है।ईश्वर उसकी मेहनत के साथ न्याय करेगा।फ़िलहाल राहुल गाँधी को जन्मदिन की हार्दिक हार्दिक बधाई

हमने किसी तरह उन पर ज़ल्म नहीं किया

और हमने किसी तरह उन पर ज़ल्म नहीं किया बल्कि उन लोगों ने आप अपने ऊपर (नाफरमानी करके) ज़ुल्म किया फिर जब तुम्हारे परवरदिगार का (अज़ाब का) हुक्म आ पहुँचा तो न उसके वह माबूद ही काम आए जिन्हें ख़ुदा को छोड़कर पुकारा करते थें और न उन माबूदों ने हलाक करने के सिवा कुछ फायदा ही पहुँचाया बल्कि उन्हीं की परसतिश की बदौलत अज़ाब आया (101)
और (ऐ रसूल) बस्तियों के लोगों की सरकशी से जब तुम्हारा परवरदिगार अज़ाब में पकड़ता है तो उसकी पकड़ ऐसी ही होती है बेशक पकड़ तो दर्दनाक (और सख़्त) होती है (102)
इसमें तो शक नहीं कि उस शख़्स के वास्ते जो अज़ाब आखि़रत से डरता है (हमारी कुदरत की) एक निशानी है ये वह रोज़ होगा कि सारे (जहाँन) के लोग जमा किए जायंगे और यही वह दिन होगा कि (हमारी बारगाह में) सब हाजि़र किए जायंगे (103)
और हम बस एक मुअय्युन मुद्दत तक इसमें देर कर रहे है (104)
जिस दिन वह आ पहुँचेगा तो बग़ैर हुक्मे ख़़ुदा कोई शख़्स बात भी तो नहीं कर सकेगा फिर कुछ लोग उनमे से बदबख़्त होगें और कुछ लोग नेक बख़्त (105)
तो जो लोग बदबख़्त है वह दोज़ख़ में होगें और उसी में उनकी हाए वाए और चीख़ पुकार होगी (106)
वह लोग जब तक आसमान और ज़मीन में है हमेशा उसी मे रहेगें मगर जब तुम्हारा परवरदिगार (नजात देना) चाहे बेशक तुम्हारा परवरदिगार जो चाहता है कर ही डालता है (107)
और जो लोग नेक बख़्त हैं वह तो बेहेशत में होगें (और) जब तक आसमान व ज़मीन (बाक़ी) है वह हमेशा उसी में रहेगें मगर जब तेरा परवरदिगार चाहे (सज़ा देकर आखि़र में जन्नत में ले जाए (108)
ये वह बख़्शिश है जो कभी मनक़तआ (खत्म) न होगी तो ये लोग (ख़ुदा के अलावा) जिसकी परसतिश करते हैं तुम उससे शक में न पड़ना ये लोग तो बस वैसी इबादत करते हैं जैसी उनसे पहले उनके बाप दादा करते थे और हम ज़रुर (क़यामत के दिन) उनको (अज़ाब का) पूरा पूरा हिस्सा बग़ैर कम किए देगें (109)
और हमने मूसा को किताब तौरैत अता की तो उसमें (भी) झगड़े डाले गए और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से हुक्म कोइ पहले ही न हो चुका होता तो उनके दरमियान (कब का) फैसला यक़ीनन हो गया होता और ये लोग (कुफ़्फ़ारे मक्का) भी इस (क़ुरान) की तरफ से बहुत गहरे शक में पड़े हैं (110)
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