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11 February 2012

बच्चों को दिया गया ऐसा प्यार उनके लिए ही खतरा बनता है...



बच्चों के लाड़ प्यार में मां-बाप अक्सर भूल जाते हैं कि उनके बच्चों के लिए क्या सही है और क्या गलत। बच्चों को अच्छी परवरिश देना, उन्हें हर तरह की सहूलियतें देना ठीक है लेकिन इस पर भी विचार किया जाए कि उनके लिए क्या सही है और क्या गलत। अक्सर लाड़-प्यार में भविष्य की परेशानियों को अनदेखा कर दिया जाता है। जहां तक बच्चों की शिक्षा और संस्कार देने का सवाल है, इसमें सख्ती बरती जानी चाहिए।

शिक्षा में बरती गई थोड़ी सी लापरवाही भविष्य में संतान और माता-पिता दोनों के लिए परेशानी का कारण बन जाती है। महाभारत इसका सबसे श्रेष्ठ उदाहरण है। गुरु द्रौण और उनके पुत्र अश्वत्थामा का रिश्ता ऐसा ही था। द्रौण को अपने पुत्र से बहुत प्यार था। शिक्षा में भी अन्य छात्रों से भेदभाव करते थे। जब उन्हें सभी कौरव और पांडव राजकुमारों को चक्रव्यूह की रचना और उसे तोडऩे के तरीके सिखाने थे, उन्होंने शर्त रख दी कि जो राजकुमार नदी से घड़ा भरकर सबसे पहले पहुंचेगा, उसे ही चक्रव्यूह की रचना सिखाई जाएगी। सभी राजकुमारों को बड़े घड़े दिए जाते लेकिन अश्वत्थामा को छोटा घड़ा देते ताकि वो जल्दी से भरकर पहुंच सके। सिर्फ अर्जुन ही ये बात समझ पाया और अर्जुन भी जल्दी ही घड़ा भरकर पहुंच जाते।

जब ब्रह्मास्त्र का उपयोग करने की बारी आई तो भी द्रौणाचार्य के पास दो ही लोग पहुंचे। अर्जुन और अश्वत्थामा। अश्वत्थामा ने पूरे मन से इसकी विधि नहीं सीखी। ब्रह्मास्त्र चलाना तो सीख लिया लेकिन लौटाने की विधि नहीं सीखी। उसने सोचा गुरु तो मेरे पिता ही हैं। कभी भी सीख सकता हूं। द्रौणाचार्य ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा। जब महाभारत युद्ध के बाद अर्जुन और अश्वत्थामा ने एक-दूसरे पर ब्रह्मास्त्र चलाया। वेद व्यास के कहने पर अर्जुन ने तो अपना अस्त्र लौटा लिया लेकिन अश्वत्थामा ने नहीं लौटाया क्योंकि उसे इसकी विधि नहीं पता थी। जिसके कारण उसे शाप मिला। उसकी मणि निकाल ली गई और कलयुग के अंत तक उसे धरती पर भटकने के लिए छोड़ दिया गया।

अगर द्रौणाचार्य अपने पुत्र मोह पर नियंत्रण रखकर उसे शिक्षा देते, उसके और अन्य राजकुमारों के बीच भेदभाव नहीं करते तो शायद अश्वत्थामा को कभी इस तरह सजा नहीं भुगतनी पड़ती।

सावधान! अगले दिन पर न टालें काम, क्योंकि..

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शांत, सुखी, संपन्न व सफल जीवन का एक अहम सूत्र है - वक्त की कद्र करना यानी जीवन से जुड़े अहम लक्ष्यों को बिना वक्त गंवाए सही सोच, योजना व चेष्टा के साथ पाते चले जाना। शास्त्रों में भी मन, वचन और कर्म से किसी भी तरह के आलस्य दरिद्रता माना गया है, जो असफलता व अनचाहे दु:ख का कारण बनती है।

आलसीपन या कर्महीनता में डूबे व्यक्ति को समय का मोल समझाने व जीवन को सफल बनाने के लिए संत कबीरदास ने बहुत ही सीधी नसीहत देकर चेताया है। लिखा गया है कि -

पाव पलक की सुधि नहीं, करै काल का साज।

काल अचानक मारसी, ज्यों तीतर को बाज॥

भाव यही है कि जीवन अनिश्चित है। जिसमें पल भर में क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता है। इसलिए किसी भी काम को टालने या अगले दिन करने की सोच या आदत बड़े नुकसान या पछतावे का कारण बन सकती है। क्योंकि मृत्यु भी अटल सत्य है, जो सांसों को अचानक वैसे ही थाम देती है, जैसे बाज, तीतर पर अचानक वार कर उसे ले उड़ता है।

संत कबीर का दर्शन यही है कि जीवन में कर्म, परिश्रम व पुरुषार्थ को महत्व दें व पल-पल का सदुपयोग करें। साथ ही जाने-अनजाने हुए अच्छे-बुरे कामों का मंथन करते रहें।

जानिए, विनाश से कैसे बचाती है मृत्युञ्जय की शक्ति?



शिव को अविनाशी भी पुकारा जाता है। यह शब्द और भाव ही शिव की अनंत शक्तियों, मंगलमयी रूप व नाम की महिमा प्रकट करता है। जब शिव ने विषपान किया तो नीलकंठ बने, गंगा को सिर पर धारण किया तो गंगाधर। वहीं भूतों के स्वामी होने से भूतभावन भी कहलाते हैं।

इसी कड़ी में शिव का एक अद्भुत स्वरूप हैं - मृत्युंजय। माना गया है कि इस शिव स्वरूप की दिव्य शक्तियों के आगे काल भी पराजित हो जाता है। मृत्यु्ञ्जय का मतलब भी होता है - मृत्यु को जीतने वाला। काल के अलावा यह शिव शक्ति सभी सांसारिक पीड़ा व भय को हर लेती है।

कैसा है मृत्यंञ्जय स्वरूप?

शास्त्रों के मुताबिक शिव का मृत्यंञ्जय स्वरुप अष्टभुजाधारी है। सिर पर बालचन्द्र धारण किए हुए हैं। कमल पर विराजित हैं। ऊपर के हाथों से स्वयं पर अमृत कलश से अमृत धारा अर्पित कर रहें हैं। बीच के दो हाथों में रुद्राक्ष माला व मृगमुद्रा। नीचे के हाथों में अमृत कलश थामें हैं।

कैसे मृत्युञ्जय के आगे काल भी हो जाता है पस्त ?

महामृत्युञ्जय के काल को पराजित करने के पीछे शास्त्रों के मुताबिक दर्शन यह भी है कि असल में यह स्वरुप आनंद, विज्ञान, मन, प्राण व वाक यानी शब्द, वाणी, बोल इन पांच कलाओं का स्वामी है। व्यावहारिक जीवन में भी जो इंसान इन कलाओं से दक्ष और पूर्ण हो जाता है, वह सुखी, निरोगी, पीड़ा और तनाव मुक्त हो लंबी आयु को प्राप्त करता है। यही नहीं माना जाता है कि इन पांच विद्याओं की शक्ति के बूते सृष्टि का चक्र चलता रहता है यानी ये संसार को विनाश से बचाती है।

इस तरह आनंद व प्राण स्वरूप महामृत्युञ्जय शिव की उपासना से जुड़ी ऐसी आस्था और विश्वास के आगे मौत ही मात नहीं खाती, बल्कि निर्भय व निरोगी जीवन भी प्राप्त होता है। जिसके लिए महामृत्युञ्जय मंत्र का स्मरण बेहद असरदार माना गया है।

आज से 20 तक शिव नवरात्रि..शुभ चाहें तो 9 दिन न चूकें ऐसी शिव पूजा



हिन्दू धर्म पंचांग के मुताबिक फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी (20 फरवरी) महाशिवरात्रि के रूप में प्रसिद्ध है। क्योंकि यह शिव के दिव्य ज्योर्तिंलिंग के प्राकट्य की बड़ी ही शुभ रात्रि के साथ ही प्रकृति व पुरुष के मिलन की प्रतीकात्मक दृष्टि से शिव विवाह का मंगल अवसर भी। शिव भक्ति के इस विशेष काल में शिव भक्ति सभी सांसारिक इच्छाओं का पूरा करने वाली मानी गई है।

यह शिव भक्ति 9 दिन की जाती है। जिसकी शुरुआत फाल्गुन कृष्ण पंचमी (12 फरवरी से) से होती है। खासतौर पर उज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योर्तिलिङ्ग में इस दौरान शिव के अनेक स्वरूपों के दर्शन होते हैं। यहां यह पुण्य काल शिव नवरात्रि के रूप में भी प्रसिद्ध है।

ऐसे काल में अगर आप भी जीवन में शुभ व मंगल चाहते हैं तो शिव नवरात्रि के हर दिन जल, बिल्वपत्र, दूध व दूध की मिठाई चढ़ा शिव पूजा कर भावना और आस्था के साथ एक विशेष शिव आरती कर जीवन को खुशहाल बना सकते हैं। यह है गंगाधर की आरती ।

पौराणिक मान्यता है कि पवित्र गंगा जब पृथ्वी पर उतरी तो उसके तेज प्रवाह पर महादेव शिव की जटाओं ने काबू पाया। शिव की जटाओं में गंगा को धारण करना प्रतीकात्मक संदेश देता है कि जीवन की आपाधापी में सफल होने के लिए सोच, विचार और मन को गंगा की भांति पावन यानी साफ रखने के साथ ही महादेव की भांति धैर्य व बड़प्पन के साथ सभी की भलाई के भाव रखे जाएं। ऐसे ही भाव के साथ करें यह आरती -

ॐ जय गंगाधर जय हर जय गिरिजाधीशा।
त्वं मां पालय नित्यं कृपया जगदीशा॥
कैलासे गिरिशिखरे कल्पद्रुमविपिने।
गुंजति मधुकरपुंजे कुंजवने गहने॥
कोकिलकूजित खेलत हंसावन ललिता।
रचयति कलाकलापं नृत्यति मुदसहिता ॥
तस्मिंल्ललितसुदेशे शाला मणिरचिता।
तन्मध्ये हरनिकटे गौरी मुदसहिता॥
क्रीडा रचयति भूषारंचित निजमीशम्‌।
इंद्रादिक सुर सेवत नामयते शीशम्‌ ॥
बिबुधबधू बहु नृत्यत नामयते मुदसहिता।
किन्नर गायन कुरुते सप्त स्वर सहिता॥
धिनकत थै थै धिनकत मृदंग वादयते।
क्वण क्वण ललिता वेणुं मधुरं नाटयते ॥
रुण रुण चरणे रचयति नूपुरमुज्ज्वलिता।
चक्रावर्ते भ्रमयति कुरुते तां धिक तां॥
तां तां लुप चुप तां तां डमरू वादयते।
अंगुष्ठांगुलिनादं लासकतां कुरुते ॥
कपूर्रद्युतिगौरं पंचाननसहितम्‌।
त्रिनयनशशिधरमौलिं विषधरकण्ठयुतम्‌॥
सुन्दरजटायकलापं पावकयुतभालम्‌।
डमरुत्रिशूलपिनाकं करधृतनृकपालम्‌ ॥
मुण्डै रचयति माला पन्नगमुपवीतम्‌।
वामविभागे गिरिजारूपं अतिललितम्‌॥
सुन्दरसकलशरीरे कृतभस्माभरणम्‌।
इति वृषभध्वजरूपं तापत्रयहरणं ॥
शंखनिनादं कृत्वा झल्लरि नादयते।
नीराजयते ब्रह्मा वेदऋचां पठते॥
अतिमृदुचरणसरोजं हृत्कमले धृत्वा।
अवलोकयति महेशं ईशं अभिनत्वा॥
ध्यानं आरति समये हृदये अति कृत्वा।
रामस्त्रिजटानाथं ईशं अभिनत्वा॥
संगतिमेवं प्रतिदिन पठनं यः कुरुते।
शिवसायुज्यं गच्छति भक्त्या यः श्रृणुते ॥

सौ साल के एक आम के पेड़ से बंधे हैं दो कुनबे!

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रावतभाटा (कोटा).भैंसरोडगढ़ का सौ साल से भी ज्यादा पुराना पेड़ दो परिवारों का रिश्ता बांधे हुए है। इस पेड़ को 90 साल पहले यहां के तत्कालीन जागीरदार राव हिम्मतसिंह ने शंकरलाल चौबे के परिवार को दान किया था।

60 साल पहले जागीरदार ने उस जमीन को एक किसान नबीबख्श को बेच दिया, जिस पर यह आम का पेड़ लगा था। लेकिन इस सौदे में यह शर्त डाल दी कि पेड़ शंकरलाल के परिवार का भी रहेगा। शंकरलाल और नबीबख्श के परिवारों ने इस पेड़ के आम का बंटवारा करना तय किया।

यह आज भी जारी है। नबीबख्श के पुत्र अख्तर हुसैन परमाणु बिजलीघर में नौकरी करते थे। वे कहते हैं आम का यह बंटवारा दोनों परिवारों में मेल-जोल का जरिया भी है। शंकरलाल के पुत्र रमेश दशोरा मानते हैं, कि यह दोनों परिवारों के बीच ऐसी परंपरा बन गई है, जिसे हमारी अगली पीढ़ी भी जारी रखना चाहेगी।
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