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10 अक्तूबर 2015

गंगा हमारी पहचान का हिस्सा

वर्तमान भारत की संस्कृति सभ्यता राजनीति बयानों से धूमिल हो रहीं हैं।बयान भी ऐसे जहां शर्म भी खुद से शर्म महसूस करें !! हर जगह हर बिजेपी और संघ समर्थक बीफ बीफ की रट लगाए बैठें हैं।भाजपा सांसद योगी आदित्य नाथ हमेशा अपनी सांम्प्रदायिक भाषा के लिए प्रख्यात हैं"अब थोड़ा इस महामुर्ख की टिप्पणी सुनिए !! "गंगा अपवित्र बकरा ईद से होतीं हैं" अब थोड़ा बिना ज्ञान के पटपोली, बिना दिमाग के बकबोली नाथ थोड़ा सुप्रीम कोर्ट का बयान देख लीजिए.... और जहां तक हमने पढ़ा है और सुना हैं की,
मगर पिछले कुछ दशकों से मनुष्य ने विकास की अंधी दौड़ में गंगा के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में गंगा सूख चुकी होगी और भारत की अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी। सिर्फ पटना की बात करें, तो एक साल में गंगा के किनारे 9000 अंतिम संस्कार किए जाते हैं। करीब 400 टन राख गंगा में हर साल प्रवाहित की जाती है। इससे भी बुरा हाल गंगा का बनारस में है। वहां हर साल पैतीस हजार शव का अंतिम संस्कार गंगा के तट पर किया जाता है। कानपुर में तो गंगा की जो दुर्दशा है इसका बयान कना भी मुश्किल है। पटना में करीब 80 लाख लोग रोजी-रोटी के लिए गंगा पर आश्रित हैं।
ऐसा नहीं हैं कि गंगा को बचाने की पहल नहीं की गई। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1886 की धारा 15 ए में स्पष्ट लिखा हैं कि किसी भी संस्था या व्यक्ति द्वारा गंगा में गंदगी फैलाने पर पांच साल की सजा और एक लाख रुपए जुमाने देना होगा। इसके बावजूद गंगा मैली होती जा रही हैं। अतिक्रमण, प्रदूषण और भूजल दोहण ने गंगा का असली रूप छीन लिया है। हम मनुष्य यही चाहते हैं कि गंगा अपने मूल रूप से सदनीरा बनी रहे। पर जब तक हम इस नदी का आदर नहीं करेंगे, तब तक आम नागरिक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे। पर्यटन स्थलों पर नदियों में गंदगी फेंकने पर रोक लगाना बेहद जरूरी है।
उत्तराखंड में गंगा का दुरूपयोग साफ दिखाई देता हैं। यहां से निकलने वाली गंगा से खिलवाड़ किया जा रहा है। बिजली बनाने के नाम पर गंगा के अस्तित्व से छेड़छाड़ के लिए न सिर्फ आम नागरिक बल्कि वहां की सरकार भी उतनी ही जिम्मेदार है।आपकी केंद्र के अंदर सरकार है और उत्तरप्रदेश के अंदर समाजवादी की सरकार पहल कीजिए...हजारों करोड़ों रुपये डकार गई उमा भारती और दोष बकरा ईद का....हम भारतीय है और हर भारतीय ऐतिहासिक स्थल की देखरेख करना हमारा दायित्व है... एक मुसलमान दिखा दीजिए जिसने गंगा को अपवित्र किया ?????
गंगा हमारी पहचान का हिस्सा है। इसके बिना प्रयागराज और वाराणसी जैसे जगहों का कोई महत्व नहीं रह जाएगा। गंगा को साफ रखने की पहल हर किसी को करनी होगी। कचरा, गंदगी, मल-मूत्र का डिस्पोजन करने के लिए अलग इंतजाम करना पड़ेगा। गंगा की सफाई से पहले यमुना की सफाई ज्यादा जरूरी है वहां आप क्यों नहीं बोलते ????और रही बात बीफ की तो रिजूज जैसे मंत्री आपकी सरकार के अंदर रहते हुए कह रहें है"हाँ हम बीफ खाते है.... आप क्यों पद पर बैठाकर बैठें हैं ???? आज भारत के अंदर जितने भी बड़े कत्लगाह है वह सब ब्राह्मण लोगों के हैं ???? कुछ राज्यों में बीफ का कारोबार बैन किया गया। इसके पीछे मूल भावना यह रही कि गाय हिंदुओं के लिए एक पवित्र जानवर है, इसलिए इसका वध नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि तीन राज्यों को छोड़कर देश में लगभग सभी जगह गोहत्या पर 1976 से ही रोक लगी हुई है। इसके बावजूद गोवंश की तादाद घट रही है। 2012 में पशुओं की गणना हुई थी, तो गोवंश का दूसरे मवेशियों के मुकाबले प्रतिशत 37.28 था, जबकि 1951 में यह प्रतिशत 53.04 फीसदी था।
अगर गोवंश पर प्रतिबंध है और किसान हिंदू मान्यताओं में बंधे होने के कारण दूध नहीं देने वाली गायों को कसाइयों के हाथ नहीं बेचते तो संख्या में यह गिरावट क्यों? यह मान्यता भी गलत है कि बीफ का कारोबार सिर्फ मुसलमान करते हैं। इस व्यवसाय में अल-कबीर एक्सपोर्ट्स (मालिक- अतुल सभरवाल), अल नूर एक्सपोर्ट्स (मालिक- अजय सूद) और महेश जगदाले ऐंड कंपनी जैसे नाम साबित करते हैं कि इसमें हिंदुओं की भी भागीदारी है। इसके बावजूद बीफ के कारोबार को एक ही मजहब से जोड़कर देखना गलत है।
इसी तरह बीफ खाना अधर्म या गैरहिंदूवादी बात है, इसे लेकर काफी नाराजगी हाल में दिखी है। हाल में गोमांस बेचने और गोहत्या पर महाराष्ट्र में लगी पाबंदी पर विरोध जाहिर करते हुए बॉलिवुड ऐक्टर ऋषि कपूर ने ट्विटर पर लिखा - मैं गुस्से में हूं। कोई क्या खाता है, इससे उसके धर्म को क्यों जोड़ा जा रहा है। मैं हिंदू हूं और बीफ खाता हूं। क्या ऐसा करने से मैं कम धार्मिक हो जाता हूं?
अब बताइए यहां कोई मुसलमान होता या मुसलमान कहता तो ??????
" खैर"
इस साल गणतंत्र दिवस के मौके पर केंद्र सरकार ने एक विज्ञापन जारी किया था, जिसमें
जारी किया था, जिसमें धर्म निरपेक्षता और समाजवाद शब्द गायब थे। यह एक मानवीय चूक थी या जान-बूझकर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की दिशा में उठाया गया सोचा-समझा कदम, यह सवाल बहुतों के मन में उठा। राजनीतिक हलके में संभावना यह भी जताई गई कि बीजेपी सरकार ने एक योजना के तहत सरकारी विज्ञापन से इन दोनों शब्दों को हटाया था। दरअसल, बीजेपी और आरएसएस इन शब्दों को हटाकर आम जनमानस की प्रतिक्रिया से वाकिफ होना चाहते थे। राजनीतिक हलकों में जब इन शब्दों को हटाने को लेकर तीव्र प्रतिक्रिया हुई, तो केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को आश्वासन देना पड़ा कि केंद्र सरकार भविष्य में इन बातों को ध्यान में रखेगी। अब भी हम नहीं समझें खैर कोई बात नहीं हम भारतीय है जल्दी नहीं समझते !!
भारत में धार्मिक असहिष्णुता वैश्विक चिंता का सबब बनती जा रही है। इस चिंता ने तब और जोर पकड़ा, जब गणतंत्र दिवस पर चीफ गेस्ट बनकर आए अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा ने एक पखवाड़े में सावर्जनिक रूप से दो बार भारत में बढ़ रही धार्मिक असहिष्णुता का जिक्र किया। दिल्ली में उन्होंने कहा कि लोगों को सांप्रदायिकता या अन्य आधार पर बांटने की कोशिशों के खिलाफ सतर्क होना ह

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