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03 अगस्त 2015

दबाव का असर? UPA का ही लैंड बिल अपनाएगी सरकार, अपने बिल पर जोर नहीं


दबाव का असर? UPA का ही लैंड बिल अपनाएगी सरकार, अपने बिल पर जोर नहीं
 
नई दिल्ली. पार्लियामेंट में अपोजिशन के साथ जारी टकराव का असर मोदी सरकार की रणनीति पर भी पड़ता दिख रहा है। सरकार ने अब फैसला किया है कि वह यूपीए के वक्त के जमीन कानून में किए गए अपने बदलावों को वापस लेगी। यानी एनडीए सरकार अब यूपीए के ही लैंड बिल पर अागे बढ़ेगी। सरकार यूपीए के कानून में 6 बदलाव चाहती थी। लेकिन अब वह सभी 6 बदलाव वापस लेने पर राजी हो गई है। बता दें कि यह बिल अभी पार्लियामेंट की ज्वाइंट कमेटी के पास है।
एक साल से कैसे गरमाया मुद्दा?
यूपीए सरकार 2013 में नया लैंड एक्ट (राइट टु फेयर कम्पेनसेशन एंड ट्रांसपरेंसी इन लैंड एक्विजशन रीसेटलमेंट एंड रिहैबिलिटेशन एक्ट) लेकर आई। इसका मकसद था कि सिर्फ पब्लिक वेलफेयर वाले प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन ली जाए। ऐसा करते वक्त जमीन मालिकों को सही मुआवजा मिले। लेकिन 2014 में एनडीए की सरकार बनने के बाद इसमें बदलाव की बात होने लगी। इस बिल को कांग्रेस और बाकी विपक्षी दलों ने किसान विरोधी करार दिया था। इस पर अब ज्वाइंट कमेटी विचार कर रही है। इसकी रिपोर्ट 3 दिन में आ सकती है।
अपने रुख से क्यों पलटी सरकार?
- इस मामले से जुड़े सूत्रों ने dainikbhaskar.com को बताया कि संसद में चल रहे हंगामे के कारण सरकार झुकने को राजी हुई है। सरकार को यह लग रहा है कि 3 दिन बाद अगर ज्वाइंट कमेटी की रिपोर्ट पेश होती है तो उस पर भी भारी हंगामा हो सकता है और बिल फिर टल सकता है।
- दूसरी वजह यह भी है कि कांग्रेस की अगुवाई में कई दल एनडीए सरकार के लाए बिल के विरोध में हैं। सरकार के लिए आम सहमति बनाना मुश्किल था।
- तीसरी वजह यह है कि सरकार अपने बिल को राज्यसभा में पास नहीं करा सकती। राज्यसभा में एनडीए के 62 सांसद ही हैं। जबकि अपोजिशन मेंबर्स 109 हैं।
- आखिरी वजह यह है कि यह लैंड बिल ज्वाइंट कमेटी के पास है जिसकी रिपोर्ट मानना सरकार के लिए जरूरी है। लिहाजा, सरकार रिपोर्ट पेश होने के बाद होने वाले डैमेज से बचना चाहती थी।
यूपीए और एनडीए के बिल में क्या था फर्क?
यूपीए का बनाया जमीन कानून एनडीए का लैंड बिल
प्राइवेट प्रोजेक्ट के लिए जमीन लेनी हो तो 80%, जबकि पीपीपी के लिए 70% लोगों की रजामंदी जरूरी। डिफेंस, रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर, सोशल इन्फ्रास्ट्रक्चर, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए जमीन लेने पर किसी की रजामंदी जरूरी नहीं।
सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट करना जरूरी। ऊपर की कैटेगरी के लिए जमीन ली जाए तो असेसमेंट जरूरी नहीं। सरकार सिर्फ नोटिफिकेशन जारी करेगी।
खेती की जमीन नहीं ली जा सकती। खेती की जमीन जरूरी प्रायोरिटी वाले प्रोजेक्ट्स के लिए लीजा सकती है।
किसान कोर्ट जा सकता है। अगर जमीन 5 साल तक इस्तेमाल नहीं हुई, तो वह मालिक को लौटा दी जाएगी। कोर्ट जाने का हक नहीं, किसान का नोटिस माना नहीं जाएगा। जमीन का इस्तेमाल नहीं होने पर उसे कब लौटाना है, उसका वक्त प्रोजेक्ट शुरू करने के समय तय होगा।
राज्य अपने हिसाब से अलग-अलग कानून बना सकेंगे। राज्यों को अलग-अलग कानून की मंजूरी नहीं। एक ही सेंट्रल लॉ होगा। हालांकि बाद में एनडीए सरकार इस रुख पर पलटती दिखी थी।
जमीन कानून का पालन नहीं करने वाले अफसरों पर केस चलेगा। अगर प्राइवेट इंटिटी के मामले में जमीन कानून का पालन नहीं हुआ, तभी केस चलेगा।

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