हमें चाहने वाले मित्र

03 जुलाई 2015

कल मज़हब पूछकर,,,,,

कल मज़हब पूछकर जिसने बख्श दी थी जाँ मेरी।
आज फिरका पूछकर उसने ही ले ली जाँ मेरी....
मत करो रफादेन पर इतनी बहस मुसलमानों
नमाज़ तो उनकी भी हो जाती है
जिनके हाथ नही होते।।

तुम हाथ बाँधने और हाथ छोड़ने
पर बहस में लगे हो
और दुश्मन तुम्हारे हाथ काटने की
साजिश में लगे हैै
ज़िन्दगी के फरेब में हम ने हजारों सज्दे क़ज़ा कर डाले....
हमारे जन्नत के सरदार ने तो तीरों की बरसात में भी नमाज़ क़ज़ा नही की..

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

दोस्तों, कुछ गिले-शिकवे और कुछ सुझाव भी देते जाओ. जनाब! मेरा यह ब्लॉग आप सभी भाईयों का अपना ब्लॉग है. इसमें आपका स्वागत है. इसकी गलतियों (दोषों व कमियों) को सुधारने के लिए मेहरबानी करके मुझे सुझाव दें. मैं आपका आभारी रहूँगा. अख्तर खान "अकेला" कोटा(राजस्थान)

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...