दर्द मेरा हर बार वो कुछ इस तरह सहती गई
ओठों पर मुस्कान, खुशियाँ गीत में कहती गई
पाप मेरे धुल जायें और बह खो जाये उन संग
गंग बन कर अश्रुधारा उस आँख से बहती गई
तुम पढ़ो कि वो पढ़े, पढ़ जाये इक माँ भी इसे
नई बात हर बार क्यूँ, यह बात ही लगती गई...
-समीर लाल ’समीर’
दर्द मेरा हर बार वो कुछ इस तरह सहती गई
ओठों पर मुस्कान, खुशियाँ गीत में कहती गई
पाप मेरे धुल जायें और बह खो जाये उन संग
गंग बन कर अश्रुधारा उस आँख से बहती गई
तुम पढ़ो कि वो पढ़े, पढ़ जाये इक माँ भी इसे
नई बात हर बार क्यूँ, यह बात ही लगती गई...
-समीर लाल ’समीर’
ओठों पर मुस्कान, खुशियाँ गीत में कहती गई
पाप मेरे धुल जायें और बह खो जाये उन संग
गंग बन कर अश्रुधारा उस आँख से बहती गई
तुम पढ़ो कि वो पढ़े, पढ़ जाये इक माँ भी इसे
नई बात हर बार क्यूँ, यह बात ही लगती गई...
-समीर लाल ’समीर’
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