आपका-अख्तर खान

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22 फ़रवरी 2011

एक गजल फिर एडवोकेट रघुनाथ मिश्र जी की पेश हे

लटक रही हें रोटियाँ आकाश में
सोचेंगे इसी प्रश्न को अवकाश में
पूंछा एक सवाल तो गुनहगार हो गया
ऐसा देखा ना सूना आसपास में
घर में ही रखी चीज़ का पता ना चल सका
पूरी ऊमर भी कम पढ़ गयी थी जिसकी तलाश में
लड़ेंगे अंधकार से मिलजुल कर जब सभी
तेरेंगे सभी एक दिन जभी उजले प्रकाश में
होना ना था कभी जो अचानक हुआ वही
शामिल किया गया हे यही तथ्य ख़ास में
इंसान से अपेक्षित हे वोह निर्णय करे सही
जो भी करे जेसा करे वोह करे होशो हवास में
एडवोकेट रघुनाथ मिश्र सम्पर्क ३ के ३० तलवंडी कोटा राजस्थान
संकलन करता ॥ अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

1 टिप्पणी:

  1. Akhtar bhai,namaskaar.pyar bhari,anyathaa liye bina shikayat sweekaren.ghazal prakashan mein pandulipi ka anusharasn karne yaa samajh mein likhawat nahin aapane se ashuddhiyan akharne va samajhne mein dikkatjada ho gai hain.punah nivedan hai ki kripaya apne mitra ki vinamra aalochna ko sakaratmak lete hue sadbhavik bane rahen.yah sab mitrawat hi hai.snehadhin,
    RAGHUNATH MISRA,ADVOCATE,3-K-30,TALWANDI-324005(RAJASTHAN)

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