
सोचता हूँ
तुझ से मिलने
तेरे घर तक
आना भी तो हो,
जी तो बहुत
चाहता हे
तुझ से मिलने को
लेकिन सोचता हूँ
इसके लियें
एक खुबसुरत सा
बहाना भी तो हो
उफ़ तेरी याद में देख
आज में मोम की तरह
जलता हूँ
जल कर भी
मोम की तरह ही
पिघलता हूँ
लेकिन
मुझ पर फ़िदा होने वाला
तुझ सा कोई
परवाना भी तो हो।
अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
दोस्तों, कुछ गिले-शिकवे और कुछ सुझाव भी देते जाओ. जनाब! मेरा यह ब्लॉग आप सभी भाईयों का अपना ब्लॉग है. इसमें आपका स्वागत है. इसकी गलतियों (दोषों व कमियों) को सुधारने के लिए मेहरबानी करके मुझे सुझाव दें. मैं आपका आभारी रहूँगा. अख्तर खान "अकेला" कोटा(राजस्थान)