सफाईकर्मियों को रोज चाय-नाश्ता, जरूरतमंदों के लिए हमेशा खुले दरवाजे… इंसानियत की मिसाल हैं मेल एक्सप्रेस ट्रेन मैनेजर
रविन्द्र शर्मा
रेलवे की ड्यूटी के साथ समाजसेवा का जुनून, बिना भेदभाव हर जरूरतमंद की मदद; मिलनसार और हंसमुख स्वभाव से मोहल्ले से लेकर समाज तक में बनाई खास पहचान
के. डी. अब्बासी
कोटा। किसी की मदद के लिए आगे बढ़ना, हर चेहरे पर मुस्कान लाना और बिना किसी भेदभाव के इंसानियत का रिश्ता निभाना ही सच्ची समाजसेवा है। इसी भावना को अपने जीवन का मूलमंत्र बनाकर चल रहे हैं रेलवे के मेल एक्सप्रेस ट्रेन मैनेजर रविन्द्र शर्मा। मिलनसार, हंसमुख, निडर, धार्मिक और मददगार व्यक्तित्व के धनी शर्मा अपने सेवाभाव और आत्मीय व्यवहार से लोगों के दिलों में खास जगह बनाए हुए हैं। उनके लिए समाजसेवा कोई दिखावा नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है।
सफाईकर्मियों के सम्मान में रोज सजती है चाय-नाश्ते की मेज
रविन्द्र शर्मा के सेवाभाव की सबसे अनूठी मिसाल उनके मोहल्ले में देखने को मिलती है। रोजाना बिना नागा सफाई करने आने वाले कर्मचारियों के लिए वे चाय-नाश्ते की व्यवस्था करते हैं। सफाईकर्मियों को केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि अपने परिवार का हिस्सा मानकर उनका सम्मान करते हैं।
उनका यह छोटा-सा लेकिन दिल छू लेने वाला प्रयास समाज को बड़ा संदेश देता है कि इंसान की पहचान उसके पद या काम से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व और कर्मों से होती है। समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचकर उसकी मदद करना और उसे अपनापन देना ही रविन्द्र शर्मा की असली पहचान है।
हर सुख-दुख में साथ, बिना भेदभाव मदद के लिए तत्पर
शर्मा का स्वभाव ऐसा है कि जो भी उनके संपर्क में आता है, वह उनसे आत्मीयता महसूस करता है। जरूरतमंद हो या परिचित, हर किसी की परेशानी को अपनी परेशानी समझकर समाधान के लिए प्रयास करना उनकी आदत में शुमार है। धार्मिक उत्सवों और सामाजिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर भाग लेना, लोगों को साथ लेकर चलना और समाज में प्रेम-सद्भाव बनाए रखना उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा है।
उनकी नजर में समाजसेवा के लिए न कोई जाति का बंधन है, न धर्म का और न ही किसी बड़े-छोटे का भेद। यही वजह है कि वे विभिन्न वर्गों के लोगों के बीच सम्मान और विश्वास के पात्र बने हुए हैं।
1990 में शुरू हुआ रेलवे का सफर, आज भी रेलकर्मियों की आवाज बने है,
हरियाणा के रेवाड़ी में जन्मे रविन्द्र शर्मा के पिता स्वर्गीय मनोहर लाल शर्मा का निधन उस समय हो गया था, जब वे महज 10 वर्ष के थे। कम उम्र में पिता का साया उठ जाने के बाद भी उन्होंने मेहनत, लगन और संघर्ष के साथ जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता चुना।
उनकी शिक्षा नदबई के सीनियर सेकेंडरी स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने बीजीएमसी, कोटा यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1990 में ट्रेन क्लर्क के रूप में रेलवे में उनकी पहली पोस्टिंग हुई। अपने सेवाकाल में आगे बढ़ते हुए आज वे कोटा में मेल एक्सप्रेस ट्रेन मैनेजर के पद पर कार्यरत हैं।
रेलवे की व्यस्त जिम्मेदारियों के बावजूद समाजसेवा के प्रति उनका समर्पण कम नहीं हुआ। रेल मजदूर संघ में सहायक मंडल सचिव के पद पर रहते हुए वे रेल कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान और उनके हितों के लिए सक्रिय भूमिका निभाते हैं। रेलकर्मियों की आवाज उठाना और उनकी समस्याओं को संबंधित स्तर तक पहुंचाना भी उनकी कार्यशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
परिवार में संस्कार, जीवन में सेवा और साहित्य से लगाव
रविन्द्र शर्मा के व्यक्तित्व में सामाजिक सरोकारों के साथ धार्मिक आस्था और साहित्य के प्रति रुचि भी झलकती है। धार्मिक आयोजनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रहती है। खाली समय में साहित्य पढ़ना और शतरंज खेलना उन्हें पसंद है।
पारिवारिक जीवन में भी उन्होंने बच्चों को शिक्षा और संस्कारों से जोड़कर आगे बढ़ाया है। उनके बेटे मैकिंज़ी कंपनी में टाउन प्लानर कंसल्टेंट हैं और बहू फिजियोथैरेपी डॉक्टर हैं। बेटी गौरवी शर्मा प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र से जुड़ी हैं, जबकि दामाद बैंक में मैनेजर हैं।
रविन्द्र शर्मा का व्यक्तित्व बताता है कि असली सम्मान पद से नहीं, बल्कि उस व्यवहार से मिलता है, जो दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाए। सफाईकर्मियों को रोज चाय-नाश्ता कराना हो, जरूरतमंद की मदद करना हो या रेलकर्मियों की समस्या के लिए आवाज उठाना—हर जगह उनका सेवाभाव दिखाई देता है। समाज के हर वर्ग को अपना समझने और बिना किसी भेदभाव के प्यार बांटने की यही सोच उन्हें लोगों के दिलों में खास स्थान दिलाती है।
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