आपका-अख्तर खान "अकेला"
तुम अपने किरदार को इतना बुलंद करो कि दूसरे मज़हब के लोग देख कर कहें कि अगर उम्मत ऐसी होती है,तो नबी कैसे होंगे? गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे.
29 जून 2026
कोटा अभिभाषक परिषद के सदस्य ,पूर्व महासचिव ,राष्ट्रिय किसान संघ के राष्ट्रिय महासचिव भाई जगदीश शर्मा ,वकालत के साथ साथ एक सिद्धांतवादी कृषक के रूप में भी जेनेरिक खेती खुद भी कर रहे हैं और वोह, इसके लिए अन्य कृषकों में भी जेनेरिक खेती के लिए जागरूकता कार्यक्रम चला रहे हैं
300 एनसीसी कैडेट्स बनेंगे अंगदान जागरूकता के दूत, घर-घर पहुँचाएंगे जीवनदान का संदे
2. जीवनदान का संदेश लेकर निकलेंगे एनसीसी कैडेट्स, अंगदान पर हुआ विशेष जागरूकता सत्र
कोटा। नेत्रदान, अंगदान एवं देहदान के क्षेत्र में पिछले 15 वर्षों से निरंतर कार्यरत शाइन इंडिया फाउंडेशन द्वारा संचालित अंगदान जागरूकता अभियान के अंतर्गत मंगलवार को 7 राज बटालियन एनसीसी (एयर विंग) के इंजीनियरिंग कॉलेज में आयोजित सात दिवसीय वार्षिक प्रशिक्षण शिविर में 300 से अधिक एनसीसी कैडेट्स को, शुक्रवार को अंगदान के महत्व एवं प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी दी गई।
कार्यक्रम में शाइन इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक डॉ. कुलवंत गौड़ ने कैडेट्स को संबोधित करते हुए कहा कि अंगदान केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि किसी दूसरे व्यक्ति को नया जीवन देने का सबसे बड़ा मानवीय उपहार है।
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने परिवार, मित्रों और समाज में अंगदान को चर्चा का विषय बनाकर सही एवं वैज्ञानिक जानकारी लोगों तक पहुँचाएं, ताकि भ्रांतियाँ दूर हों और अधिक से अधिक लोग इस महादान के लिए प्रेरित हो सकें।
डॉ. गौड़ ने बताया कि किसी ब्रेन-डेड व्यक्ति के परिजन यदि सही समय पर अंगदान के बारे में सटीक जानकारी प्राप्त करें, तो उनके द्वारा अंगदान की सहमति देने की संभावना काफी बढ़ जाती है। ऐसे एक निर्णय से कई गंभीर मरीजों को नया जीवन मिल सकता है।
उन्होंने बताया कि राजस्थान सरकार के राज्य ऊतक एवं अंग प्रत्यारोपण संस्थान (SOTTO Rajasthan) के सहयोग से प्रदेशभर में सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। अब तक प्रदेश में 87 ब्रेन-डेड अंगदाताओं के माध्यम से 200 से अधिक गंभीर मरीजों को नया जीवन मिल चुका है, जो अंगों के अभाव में जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे।
कार्यक्रम के दौरान कैडेट्स ने नेत्रदान एवं अंगदान से जुड़ी अनेक जिज्ञासाएँ और भ्रांतियाँ सामने रखीं जिनका संस्था की संस्थापिका डॉ संगीता गौड़ ने वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर विस्तार से समाधान किया। जागरूकता सत्र के बाद आयोजित प्रश्नोत्तरी में कैडेट्स ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और अंगदान से संबंधित अधिकांश प्रश्नों के सही उत्तर देकर विषय की गहरी समझ का परिचय दिया।
कार्यक्रम के अंत में सभी कैडेट्स ने अपने-अपने परिवार एवं समाज में अंगदान जागरूकता का संदेश पहुँचाने तथा अधिक से अधिक लोगों को इस जीवनदायी अभियान से जोड़ने का संकल्प लिया।
जब उनसे उनके परवरदिगार ने कहा इस्लाम कु़बूल करो तो अजऱ् में की सारे जहाँ के परवरदिगार पर इस्लाम लाया
जब उनसे उनके परवरदिगार ने कहा इस्लाम कु़बूल करो तो अजऱ् में की सारे जहाँ के परवरदिगार पर इस्लाम लाया (131)
और इसी तरीके़ की इबराहीम ने अपनी औलाद से वसीयत की और याकू़ब ने (भी)
कि ऐ फरज़न्दों खु़दा ने तुम्हारे वास्ते इस दीन (इस्लाम) को पसन्द फरमाया
है बस तुम हरगिज़ न मरना मगर मुसलमान ही होकर (132)
(ऐ यहूद) क्या तुम उस वक़्त मौजूद थे जब याकू़ब के सर पर मौत आ खड़ी
हुई उस वक़्त उन्होंने अपने बेटों से कहा कि मेरे बाद किसी की इबादत करोगे
कहने लगे हम आप के माबूद और आप के बाप दादाओं इबराहीम व इस्माइल व इसहाक़
के माबूद व यकता खु़दा की इबादत करेंगे और हम उसके फरमाबरदार हैं (133)
(ऐ यहूद) वह लोग थे जो चल बसे जो उन्होंने कमाया उनके आगे आया और जो
तुम कमाओगे तुम्हारे आगे आएगा और जो कुछ भी वह करते थे उसकी पूछगछ तुमसे
नहीं होगी (134)
(यहूदी ईसाई मुसलमानों से) कहते हैं कि यहूद या नसारानी हो जाओ तो राहे
रास्त पर आ जाओगे (ऐ रसूल उनसे) कह दो कि हम इबराहीम के तरीक़े पर हैं जो
बातिल से कतरा कर चलते थे और मुशरेकीन से न थे (135)
(और ऐ मुसलमानों तुम ये) कहो कि हम तो खु़दा पर ईमान लाए हैं और उस पर
जो हम पर नाजि़ल किया गया (कु़रान) और जो सहीफ़े इबराहीम व इसमाइल व इसहाक़
व याकू़ब और औलादे याकू़ब पर नाजि़ल हुए थे (उन पर) और जो किताब मूसा व
ईसा को दी गई (उस पर) और जो और पैग़म्बरों को उनके परवरदिगार की तरफ से
उन्हें दिया गया (उस पर) हम तो उनमें से किसी (एक) में भी तफरीक़ नहीं करते
और हम तो खु़दा ही के फरमाबरदार हैं (136)
बस अगर ये लोग भी उसी तरह ईमान लाए हैं जिस तरह तुम तो अलबत्ता राहे
रास्त पर आ गए और अगर वह इस तरीके़ से मुँह फेर लें तो बस वह सिर्फ
तुम्हारी ही जि़द पर है तो (ऐ रसूल) उन (के शर) से (बचाने को) तुम्हारे लिए
खु़दा काफ़ी होगा और वह (सबकी हालत) खू़ब जानता (और) सुनता है (137)
(मुसलमानों से कहो कि) रंग तो खु़दा ही का रंग है जिसमें तुम रंगे गए
और खुदाई रंग से बेहतर कौन रंग होगा और हम तो उसी की इबादत करते हैं (138)
(ऐ रसूल) तुम उनसे पूछो कि क्या तुम हम से खु़दा के बारे झगड़ते हो
हालाँकि वही हमारा (भी) परवरदिगार है (वही) तुम्हारा भी (परवरदिगार है)
हमारे लिए है हमारी कारगुज़ारियाँ और तुम्हारे लिए तुम्हारी कारसतानियाँ और
हम तो निरेखरे उसी के हैं (139)
क्या तुम कहते हो कि इबराहीम व इसमाइल व इसहाक़ व आलौदें याकू़ब सब के
सब यहूदी या नसारानी थे (ऐ रसूल उनसे) पूछो तो कि तुम ज़्यादा वाकि़फ़ हो
या खु़दा और उससे बढ़कर कौन ज़ालिम होगा जिसके पास खु़दा की तरफ से गवाही
(मौजूद) हो (कि वह यहूदी न थे) और फिर वह छिपाए और जो कुछ तुम करते हो
खु़दा उससे बेख़बर नहीं (140)
28 जून 2026
जिन लोगों को हमने किताब (कु़रान) दी है वह लोग उसे इस तरह पढ़ते रहते हैं जो उसके पढ़ने का हक़ है यही लोग उस पर ईमान लाते हैं और जो उससे इनकार करते हैं वही लोग घाटे में हैं
जिन लोगों को हमने किताब (कु़रान) दी है वह लोग उसे इस तरह पढ़ते रहते हैं
जो उसके पढ़ने का हक़ है यही लोग उस पर ईमान लाते हैं और जो उससे इनकार
करते हैं वही लोग घाटे में हैं (121)
बनी इसराईल मेरी उन नेअमतों को याद करो जो मैंनं तुम को दी हैं और ये कि मैंने तुमको सारे जहाँन पर फज़ीलत दी (122)
और उस दिन से डरो जिस दिन कोई शख़्स किसी की तरफ से न फिदया हो सकेगा
और न उसकी तरफ से कोई मुआवेज़ा क़ुबूल किया जाएगा और न कोई सिफारिश ही
फायदा पहुचाँ सकेगी, और न लोग मदद दिए जाएँगे (123)
(ऐ रसूल) बनी इसराईल को वह वक़्त भी याद दिलाओ जब इबराहीम को उनके
परवरदिगार ने चन्द बातों में आज़माया और उन्होंने पूरा कर दिया तो खु़दा ने
फरमाया मैं तुमको (लोगों का) पेशवा बनाने वाला हूँ (हज़रत इबराहीम ने)
अजऱ् की और मेरी औलाद में से फरमाया (हाँ मगर) मेरे इस ओहदे पर ज़ालिमों
में से कोई शख़्स फ़ायज़ नहीं हो सकता (124)
(ऐ रसूल वह वक़्त भी याद दिलाओ) जब हमने ख़ानए काबा को लोगों के सवाब
और पनाह की जगह क़रार दी और हुक्म दिया गया कि इबराहीम की (इस) जगह को
नमाज़ की जगह बनाओ और इबराहीम व इसमाइल से अहद व पैमान लिया कि मेरे (इस)
घर को तवाफ़ और एतक़ाफ़ और रूकू और सजदा करने वालों के वास्ते साफ सुथरा
रखो (125)
और (ऐ रसूल वह वक़्त भी याद दिलाओ) जब इबराहीम ने दुआ माँगी कि ऐ मेरे
परवरदिगार इस (शहर) को पनाह व अमन का शहर बना, और उसके रहने वालों में से
जो खु़दा और रोज़े आखि़रत पर ईमान लाए उसको तरह-तरह के फल खाने को दें
खु़दा ने फरमाया (अच्छा मगर) जो कुफ्र इख़तेयार करेगा उसकी दुनिया में चन्द
रोज़ (उन चीज़ो से) फायदा उठाने दूँगा फिर (आख़ेरत में) उसको मजबूर करके
दोज़ख़ की तरफ खींच ले जाऊँगा और वह बहुत बुरा ठिकाना है (126)
और (वह वक़्त याद दिलाओ) जब इबराहीम व इसमाईल ख़ानाए काबा की बुनियादें
बुलन्द कर रहे थे (और दुआ) माँगते जाते थे कि ऐ हमारे परवरदिगार हमारी (यह
खि़दमत) कु़बूल कर बेशक तू ही (दूआ का) सुनने वाला (और उसका) जानने वाला
है (127)
(और) ऐ हमारे पालने वाले तू हमें अपना फरमाबरदार बन्दा बना और हमारी
औलाद से एक गिरोह (पैदा कर) जो तेरा फरमाबरदार हो, और हमको हमारे हज की
जगहों दिखा दे और हमारी तौबा क़ुबूल कर, बेशक तू ही बड़ा तौबा कु़बूल करने
वाला मेहरबान है (128)
(और) ऐ हमारे पालने वाले मक्के वालों में उन्हीं में से एक रसूल को भेज
जो उनको तेरी आयतें पढ़कर सुनाए और आसमानी किताब और अक़्ल की बातें सिखाए
और उन (के नुफ़ूस) के पाकीज़ा कर दें बेशक तू ही ग़ालिब और साहिबे तदबीर है
(129)
और कौन है जो इबराहीम के तरीक़े से नफरत करे मगर जो अपने को अहमक़ बनाए
और बेशक हमने उनको दुनिया में भी मुन्तखब कर लिया और वह ज़रूर आख़ेरत में
भी अच्छों ही में से होगे (130)
27 जून 2026
और (यहूद) कहते हैं कि यहूद (के सिवा) और (नसारा कहते हैं कि) नसारा के सिवा कोई बेहिश्त में जाने ही न पाएगा ये उनके ख़्याली पुलाव है (ऐ रसूल) तुम उन से कहो कि भला अगर तुम सच्चे हो कि हम ही बेहिश्त में जाएँगे तो अपनी दलील पेश करो
और (यहूद) कहते हैं कि यहूद (के सिवा) और (नसारा कहते हैं कि) नसारा के
सिवा कोई बेहिश्त में जाने ही न पाएगा ये उनके ख़्याली पुलाव है (ऐ रसूल)
तुम उन से कहो कि भला अगर तुम सच्चे हो कि हम ही बेहिश्त में जाएँगे तो
अपनी दलील पेश करो (111)
हाँ अलबत्ता जिस शख़्स ने खु़दा के आगे अपना सर झुका दिया और अच्छे काम
भी करता है तो उसके लिए उसके परवरदिगार के यहाँ उसका बदला (मौजूद) है और
(आख़ेरत में) ऐसे लोगों पर न किसी तरह का ख़ौफ़ होगा और न ऐसे लोग ग़मग़ीन
होगे (112)
और यहूद कहते हैं कि नसारा का मज़हब कुछ (ठीक) नहीं और नसारा कहते हैं
कि यहूद का मज़हब कुछ (ठीक) नहीं हालाँकि ये दोनों फरीक़ किताबे (खु़दा)
पढ़ते रहते हैं इसी तरह उन्हीं जैसी बातें वह (मुशरेकीन अरब) भी किया करते
हैं जो (खु़दा के एहकाम) कुछ नहीं जानते तो जिस बात में ये लोग पड़े झगड़ते
हैं (दुनिया में तो तय न होगा) क़यामत के दिन खु़दा उनके दरमियान ठीक
फैसला कर देगा (113)
और उससे बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो खु़दा की मसजिदों में उसका नाम लिए
जाने से (लोगों को) रोके और उनकी बरबादी के दर पे हो, ऐसों ही को उसमें
जाना मुनासिब नहीं मगर सहमे हुए ऐसे ही लोगों के लिए दुनिया में रूसवाई है
और ऐसे ही लोगों के लिए आख़ेरत में बड़ा भारी अज़ाब है (114)
(तुम्हारे मसजिद में रोकने से क्या होता है क्योंकि सारी ज़मीन) खु़दा
ही की है (क्या) पूरब (क्या) पच्छिम बस जहाँ कहीं कि़ब्ले की तरफ रूख़ करो
वही खु़दा का सामना है बेशक खु़दा बड़ी गुन्जाइश वाला और खू़ब वाकि़फ है
(115)
और यहूद कहने लगे कि खु़दा औलाद रखता है हालाँकि वह (इस बखेड़े से) पाक
है बल्कि जो कुछ ज़मीन व आसमान में है सब उसी का है और सब उसी के
फ़रमाबरदार हैं (116)
(वही) आसमान व ज़मीन का मोजिद है और जब किसी काम का करना ठान लेता है
तो उसकी निसबत सिर्फ कह देता है कि “हो जा” बस वह (खु़द ब खु़द) हो जाता है
(117)
और जो (मुशरेकीन) कुछ नहीं जानते कहते हैं कि खु़दा हमसे (खु़द) कलाम
क्यों नहीं करता, या हमारे पास (खु़द) कोई निशानी क्यों नहीं आती, इसी तरह
उन्हीं की सी बाते वह कर चुके हैं जो उनसे पहले थे इन सब के दिल आपस में
मिलते जुलते हैं जो लोग यक़ीन रखते हैं उनको तो अपनी निशानियाँ क्यों
साफतौर पर दिखा चुके (118)
(ऐ रसूल) हमने तुमको दीने हक़ के साथ (बेहिश्त की) खु़शख़बरी देने वाला
और (अज़ाब से) डराने वाला बनाकर भेजा है और दोज़खि़यों के बारे में तुमसे
कुछ न पूछा जाएगा (119)
और (ऐ रसूल) न तो यहूदी कभी तुमसे रज़ामंद होगे न नसारा यहाँ तक कि तुम
उनके मज़हब की पैरवी करो (ऐ रसूल उनसे) कह दो कि बस खु़दा ही की हिदायत तो
हिदायत है (बाक़ी ढकोसला है) और अगर तुम इसके बाद भी कि तुम्हारे पास इल्म
(क़ुरान) आ चुका है उनकी ख़्वाहिशों पर चले तो (याद रहे कि फिर) तुमको
खु़दा (के ग़ज़ब) से बचाने वाला न कोई सरपरस्त होगा न मददगार (120)