और अगर ये लोग तुमसे फरेब करना चाहते है तो ख़़ुदा से पहले ही फरेब कर चुके हैं तो (उसकी सज़ा में) ख़़ुदा ने उन पर तुम्हें क़ाबू दे दिया और ख़़ुदा तो बड़ा वाकि़फकार हिकमत वाला है (71)
जिन लोगों ने ईमान क़़ुबूल किया और हिजरत की और अपने अपने जान माल से ख़ुदा की राह में जिहाद किया और जिन लोगों ने (हिजरत करने वालों को जगह दी और हर (तरह) उनकी ख़बर गीरी (मदद) की यही लोग एक दूसरे के (बाहम) सरपरस्त दोस्त हैं और जिन लेागों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत नहीं की तो तुम लोगों को उनकी सरपरस्ती से कुछ सरोकार नहीं-यहाँ तक कि वह हिजरत एख़्तियार करें और (हा) मगर दीनी अम्र में तुम से मदद के ख़्वाहा हो तो तुम पर (उनकी मदद करना लाजि़म व वाजिब है मगर उन लोगों के मुक़ाबले में (नहीं) जिनमें और तुममें बाहम (सुलह का) एहदो पैमान है और जो कुछ तुम करते हो ख़ुदा (सबको) देख रहा है (72)
और जो लोग काफि़र हैं वह भी (बाहम) एक दूसरे के सरपरस्त हैं अगर तुम (इस तरह) वायदा न करोगे तो रूए ज़मीन पर फि़तना (फ़साद) बरपा हो जाएगा और बड़ा फ़साद होगा (73)
और जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और ख़़ुदा की राह में लड़े भिड़े और जिन लोगों ने (ऐसे नाज़ुक वक़्त में मुहाजिरीन को जगह ही और उनकी हर तरह ख़बरगीरी (मदद) की यही लोग सच्चे ईमानदार हैं उन्हीं के वास्ते मग़फिरत और इज़्ज़त व आबरु वाली रोज़ी है (74)
और जिन लोगों ने (सुलह हुदैबिया के) बाद ईमान क़ुबूल किया और हिजरत की और तुम्हारे साथ मिलकर जिहाद किया वह लोग भी तुम्हीं में से हैं और साहबाने क़राबत ख़़ुदा की किताब में बाहम एक दूसरे के (बनिस्बत औरों के) ज़्यादा हक़दार हैं बेशक ख़़ुदा हर चीज़ से ख़ूब वाकि़फ हैं (75)
आपका-अख्तर खान "अकेला"
तुम अपने किरदार को इतना बुलंद करो कि दूसरे मज़हब के लोग देख कर कहें कि अगर उम्मत ऐसी होती है,तो नबी कैसे होंगे? गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे.
03 अक्टूबर 2026
और अगर ये लोग तुमसे फरेब करना चाहते है तो ख़़ुदा से पहले ही फरेब कर चुके हैं तो (उसकी सज़ा में) ख़़ुदा ने उन पर तुम्हें क़ाबू दे दिया और ख़़ुदा तो बड़ा वाकि़फकार हिकमत वाला है
02 अक्टूबर 2026
कोटा से गांधी, गांधी की स्मृतियां जुड़ी हैं, लेकिन कोंग्रेस ओर कोटा वासियों ने गांधी का सम्मान, गांधी के स्मारक बार बार चेताने के बाद भी संरक्षित कारवां जनता के लिये महिमा मंडित नहीं किये, देश ही नहीं विश्व जानता है,
कोटा से गांधी, गांधी की स्मृतियां जुड़ी हैं, लेकिन कोंग्रेस ओर कोटा वासियों ने गांधी का सम्मान, गांधी के स्मारक बार बार चेताने के बाद भी संरक्षित कारवां जनता के लिये महिमा मंडित नहीं किये, देश ही नहीं विश्व जानता है, अपना सब कुछ त्याग कर, सब्र, शुक्र, उपवास, अनशन, लाठी, लँगोटी के दम पर अंग्रेजों की तोपों , बंदूक़ों, भारत के गद्दारों के मुक़ाबिल होकर, भारत को अंग्रेजों से आज़ाद कराने वाले मोहन दास करम चंद गांधी, जिन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा अधिसूचना जारी कर नही दिया गया, फिर भी वोह राष्ट्रपिता है, वोह सब कुछ त्याग कर महात्मा बने, इसलिये महात्मा हैं, गांधी के मुंह पर , है राम था, ओर नाथू राम गोडसे ने रूप बदल कर, गांधी की हत्या ही कर दी, खेर कोंग्रेस जो महात्मा गांधी के नाम पर ही आज तक रॉयल्टी ले रही है, उस कोंग्रेस सरकार ने , गांधी को राष्ट्रपिता का लिखित दर्जा नहीं दिया, गांधी को अपमानित करने , उनके विरुद्ध दुष्प्रचार करने वालों को दण्डित करने , मरणोपरांत गांधी की गरिमा को कानूनी रूप से संरक्षित करने का कोई क़ानून ही नहीं बनाया, हालात यह रहे , की राजस्थान में करोड़ों, अरबों गांधी के नाम पर खर्च हुए, गांधी वादी विचारक , भाजपा में ट्रांसफर पर गए हुए है, गांधी स्मारक का संरक्षण नहीं हुआ , यहां तक कोटा श्रीपुरा पुराना बस स्टैंड, महात्मा गांधी भवन को टुकड़े टुकड़े किया गया, भाजपा ने उसका नाम ही बदल दिया , आज भी गांधी स्मृति की पट्टिका श्रीपुरा कोटा न्यास भवन की गवाह है, कोंग्रेस, भाजपा बोर्ड में मैने , इस भवन का नाम फिर से महात्मा गांधी भवन करने के लिए लिखा, प्रस्ताव भी पास हुआ, लेकिन महात्मा को महात्मा गांधी का नाम नहीं मिला, तात्कालिक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को शिकायत की उन्होंने भी कोई कार्यवाही , गाँधी स्मारक संरक्षण के लिये कोई कदम नहीं उठाया, गाँधी की जन्म तिथि पर उन्हें सेल्यूट, श्रद्धांजलि, कोटा और महात्मा गांधी का संबंध केवल गांधीजी के नाम पर बने संस्थानों तक सीमित नहीं है; कोटा का स्वतंत्रता आंदोलन, प्रजामंडल आंदोलन, गांधीवादी कार्यकर्ताओं की गतिविधियां और सबसे बढ़कर 1948 में गांधीजी की अस्थियों का चम्बल में विसर्जन—ये सभी इस संबंध को ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बनाते हैं,
महात्मा गांधी और कोटा : बापू से जुड़ी वह ऐतिहासिक विरासत, जिसे चम्बल आज भी अपने भीतर संजोए है
स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर गांधीजी की अस्थियों के चम्बल-विसर्जन तक—कोटा का गांधी से ऐतिहासिक रिश्ता
कोटा को सामान्यतः हाड़ौती की राजधानी, चम्बल की नगरी और आधुनिक औद्योगिक-शैक्षणिक शहर के रूप में जाना जाता है, लेकिन कोटा के इतिहास का एक ऐसा अध्याय भी है, जिसका राष्ट्रीय महत्व है—महात्मा गांधी और कोटा का संबंध, किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, इसके सूत्र कोटा की राजनीतिक जागृति, खादी और गांधी टोपी, प्रजामंडल आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन के स्वतंत्रता सेनानियों और अंततः 12 फरवरी 1948 को महात्मा गांधी की अस्थियों के चम्बल में विसर्जन तक फैले हुए हैं।
कोटा में गांधीवादी विचारों की शुरुआती दस्तक, राजस्थान के रियासती क्षेत्रों में राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप ब्रिटिश भारत से कुछ अलग था,, यहां संघर्ष केवल अंग्रेजी शासन के विरुद्ध नहीं, बल्कि देशी रियासतों में उत्तरदायी शासन, नागरिक अधिकार और जनता की राजनीतिक भागीदारी के लिए भी था, कोटा में भी 1918 के आसपास राजनीतिक चेतना के प्रारंभिक संगठन दिखाई देते हैं, बाद के वर्षों में खादी, गांधी टोपी और राष्ट्रीय विचारों ने इस चेतना को मजबूत किया, उपलब्ध शोध-सामग्री में कोटा की प्रारंभिक राजनीतिक गतिविधियों के साथ गांधी टोपी और खादी के प्रसार का उल्लेख मिलता है, इसलिए कोटा में गांधी का प्रभाव केवल किसी एक सभा या यात्रा का परिणाम नहीं था; गांधीवादी राजनीतिक संस्कृति धीरे-धीरे कोटा के जनजीवन में प्रवेश कर रही थी,
नयनूराम शर्मा और कोटा का गांधीवादी, स्वतंत्रता आंदोलन का उल्लेख पंडित नयनूराम शर्मा के बिना अधूरा है,
नयनूराम शर्मा ने कोटा में बेगार-विरोधी आंदोलन और जन-जागरण को आगे बढ़ाया, राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलनों पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र की सामग्री के अनुसार, उन्होंने अन्य सहयोगियों के साथ हाड़ौती प्रजामंडल की स्थापना की और बाद में 1938 में कोटा राज्य प्रजामंडल अस्तित्व में आया, उसके प्रथम अधिवेशन का संबंध मांगरोल से था,
यह आंदोलन गांधीजी के व्यापक राजनीतिक दर्शन से जुड़ी उस मांग का हिस्सा था जिसमें जनता को शासन में अधिकार और रियासतों में उत्तरदायी शासन देने की मांग की जा रही थी, राजस्थान स्टेट आर्काइव्स के शोध पर आधारित प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, कोटा के स्वतंत्रता सेनानी रमेश्वर दयाल सक्सेना और उनके साथियों ने दिल्ली जाकर महात्मा गांधी से मुलाकात की तथा उन्हें कोटा और राजपूताना की रियासतों में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन की जानकारी दी, राजस्थान राज्य अभिलेखागार के तत्कालीन निदेशक के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि गांधीजी ने उनके आंदोलन को समर्थन दिया, यह तथ्य कोटा और गांधी के संबंध को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण है—गांधीजी को कोटा के आंदोलन की जानकारी थी और कोटा के कार्यकर्ताओं का गांधीजी से संपर्क था 1938-40 का कोटा प्रजामंडल का उद्देश्य जनता को राजनीतिक अधिकार दिलाना और रियासत में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के विवरण के अनुसार, 1938 में कोटा राज्य प्रजामंडल बना और नयनूराम शर्मा इसके प्रमुख नेताओं में थे। 1941 में नयनूराम शर्मा की हत्या के बाद नेतृत्व का भार अभिन्न हरि आदि कार्यकर्ताओं पर आया, अन्य शोध-सामग्री में 1939 में मांगरोल में कोटा राज्य प्रजामंडल के प्रथम अधिवेशन और 1940 में कोटा में इसके अधिवेशन का उल्लेख मिलता है, इस पूरे आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि में सत्याग्रह, अहिंसा, स्वदेशी, जन-अधिकार और उत्तरदायी शासन जैसे गांधीवादी तत्व स्पष्ट दिखाई देते हैं। 8 अगस्त 1942 को बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया और गांधीजी ने "करो या मरो" का आह्वान किया, इसका प्रभाव कोटा तक भी पहुंच, राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन के अभिलेखीय विवरण के अनुसार, 1942 में कोटा के प्रजामंडल कार्यकर्ताओं—अभिन्न हरि, शंभूदयाल सक्सेना, वेणी माधव, बागमल बांठिया और मोतीलाल जैन आदि—की गिरफ्तारियां हुईं, इसके बाद आंदोलन और तेज हुआ तथा कोटा में जनता ने कोतवाली पर राष्ट्रीय झंडा फहराया, राजस्थान राज्य अभिलेखागार के शोध पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 1942 में कोटा शहर में स्वतंत्रता सेनानियों ने अभूतपूर्व प्रतिरोध किया और कई दिनों तक शहर में प्रशासन के विरुद्ध जन-प्रदर्शन चला, इस प्रकार गांधीजी के भारत छोड़ो आंदोलन की गूंज कोटा की गलियों तक पहुंची और यहां के लोगों ने उसे अपने तरीके से आगे बढ़ाया, कोटा और गांधी का सबसे बड़ा भौतिक स्मृति- सम्बन्ध 1948 से है, जो कोटा को गांधीजी के इतिहास से सीधे जोड़ता है, 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हुई,
उनकी अस्थियों को देश के विभिन्न हिस्सों में ले जाकर नदियों और जलाशयों में विसर्जित किया गया, 12 फरवरी 1948 को देश के अनेक स्थानों पर यह अंतिम श्रद्धांजलि कार्यक्रम हुआ, नेहरू अभिलेखागार में भी 12 फरवरी 1948 को गांधीजी की अस्थियों के विसर्जन के अवसर पर जवाहरलाल नेहरू के भाषण का मूल संदर्भ उपलब्ध है, इसी क्रम में कोटा को भी गांधीजी की अस्थियों का एक कलश प्राप्त हुआ। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, स्वतंत्रता सेनानी नगेन्द्र बाला दिल्ली से गांधीजी की अस्थियों का कलश लेकर कोटा पहुंचीं, 11 फरवरी को कलश को रामपुरा स्थित महात्मा गांधी विद्यालय के झरोखे में रखा गया और लोगों ने श्रद्धापूर्वक दर्शन किए, अगले दिन अस्थियों का चम्बल में विसर्जन किया गया। रामपुरा का महात्मा गांधी विद्यालय बना अस्थि-कलश का साक्षी, यह तथ्य कोटा के इतिहास के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, रामपुरा का महात्मा गांधी विद्यालय केवल गांधीजी के नाम वाला विद्यालय नहीं रहा; प्रकाशित विवरणों के अनुसार, गांधीजी के निधन के बाद उनकी अस्थियों का कलश यहां जनता के दर्शनार्थ रखा गया था, इससे रामपुरा और महात्मा गांधी के बीच एक अत्यंत भावनात्मक ऐतिहासिक कड़ी बनती है, 12 फरवरी 1948—चम्बल ने अपने भीतर गांधी की अस्थियां समाईं, 12 फरवरी 1948 को कोटा में गांधीजी की अस्थियों का चम्बल नदी में विसर्जन किया गया,
स्थानीय ऐतिहासिक रिपोर्टों के अनुसार, यह विसर्जन छोटी समाध क्षेत्र, चम्बल घाट से हुआ, उस अवसर पर बड़ी संख्या में लोग गांधीजी को अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे, यह केवल धार्मिक अथवा अंतिम संस्कार की घटना नहीं थी, यह उस समय की जनता के लिए राष्ट्रीय शोक, स्वतंत्रता-संग्राम की स्मृति और गांधी के प्रति श्रद्धा का सार्वजनिक समारोह था,
कोटा के तत्कालीन शासक महाराव भीमसिंह द्वितीय का भी इस प्रसंग से संबंध बताया जाता है, प्रकाशित स्थानीय विवरण के अनुसार, गांधीजी की अस्थियों के चम्बल-विसर्जन की स्मृति को स्थायी बनाने के लिए महाराव भीमसिंह द्वितीय द्वारा चम्बल तट पर स्मृति-स्थल बनवाया गया, अर्थात उस समय गांधीजी केवल कांग्रेस या स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यकर्ताओं के नेता नहीं थे—कोटा रियासत की ओर से भी उनकी स्मृति को सम्मान दिया गया, इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह केवल मौखिक परंपरा नहीं है,
चम्बल किनारे गांधीजी की अस्थि-विसर्जन स्मृति से संबंधित शिलालेख/स्मृति-शिला का उल्लेख स्थानीय रिपोर्टों में मिलता है, 1986 की भीषण बाढ़ में स्मृति-स्थल को नुकसान पहुंचा और प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार मूल स्मृति-शिला को सुरक्षित रखने के लिए कोट की दीवार में चुनवा दिया गया था, इसलिए यह स्थान कोटा की गांधी-स्मृति का प्रत्यक्ष भौतिक प्रमाण है, नगेन्द्र बाला—गांधी की अस्थियों को कोटा तक लाने वाली स्वतंत्रता सेनानी नगेन्द्र बाला का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है, उपलब्ध जीवनी-स्रोतों में उन्हें कोटा की स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेविका और बाद में देश की पहली महिला जिला प्रमुखों में अग्रणी बताया गया है, उनके बारे में प्रकाशित सामग्री में स्पष्ट उल्लेख है कि गांधीजी के निधन के बाद वे दिल्ली से अस्थि-कलश लेकर कोटा आईं और चम्बल में अस्थियों का विसर्जन किया, राजस्थान राज्य अभिलेखागार के अनुसार कोटा के अभिलेख 1675 से 1948 तक उपलब्ध हैं और इनमें हाड़ौती, अंग्रेजी तथा उर्दू में सामग्री सुरक्षित है,
चम्बल में केवल अस्थियां नहीं, एक युग की स्मृति प्रवाहित हुई थी, कोटा और महात्मा गांधी का रिश्ता किसी एक सड़क, प्रतिमा या विद्यालय के नाम से नहीं बनता, यह रिश्ता बना—
गांधी के विचारों से,
खादी और स्वदेशी से,
कोटा के प्रजामंडल आंदोलन से,
स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष से,
1942 के जन-आंदोलन से,
नगेन्द्र बाला के हाथों कोटा पहुंची गांधीजी की अस्थियों से,
रामपुरा के महात्मा गांधी विद्यालय से, और 12 फरवरी 1948 को चम्बल में हुए उस ऐतिहासिक अस्थि-विसर्जन से, कोटा के लिए चम्बल का वह घाट केवल एक नदी-तट नहीं है, वह स्वतंत्र भारत के आरंभिक दिनों की ऐसी ऐतिहासिक स्मृति है, जहां देश ने अपने राष्ट्रपिता को अंतिम श्रद्धांजलि दी थी,
और शायद इसीलिए कोटा की गांधी-कथा का सबसे मार्मिक वाक्य यही हो सकता है—
"गांधीजी शायद कोटा की धरती पर अपने जीवनकाल में आए हों या न आए हों—इस तथ्य की पुष्टि के लिए प्राथमिक दस्तावेजों की और खोज आवश्यक है; लेकिन उनकी अस्थियां कोटा की धरती पर आईं, रामपुरा की जनता ने उन्हें श्रद्धांजलि दी और चम्बल ने उन्हें अपने भीतर समा लिया—यह कोटा के इतिहास का दस्तावेजी और स्मारकीय सत्य है,, अख़्तर खान अकेला कोटा राजस्थान 9829086339
कोटा में चाकूबाजी और अवैध हथियारों पर पुलिस का शिकंजा, आज से शुरू हुआ ‘हॉक’ स्पेशल अभियान
कोटा में चाकूबाजी और अवैध हथियारों पर पुलिस का शिकंजा, आज से शुरू हुआ ‘हॉक’ स्पेशल अभियान
कोटा शहर में चाकूबाजी और फायरिंग की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण के लिए पुलिस ने बड़ा कदम उठाया है। आईजी के निर्देश पर 2 अक्टूबर से पूरे महीने ‘हॉक’ यानी Hunt Against Weapons and Knives स्पेशल अभियान शुरू किया गया है।
अभियान के तहत कोटा शहर को 9 हिस्सों में बांटा गया है। 9 विशेष वाहनों में प्रशिक्षित पुलिसकर्मियों की टीमें तैनात रहेंगी। हर टीम में 6 पुलिसकर्मी होंगे और तीन-तीन थानों की टीम को मिलाकर संवेदनशील इलाकों में निगरानी एवं औचक चेकिंग की जाएगी।
पुलिस की इन टीमों के पास हैंड मेटल डिटेक्टर रहेंगे। टीमों को पहले विशेष ट्रेनिंग दी गई है, ताकि संदिग्ध लोगों की प्रभावी चेकिंग की जा सके। पुलिस किसी एक तय स्थान या समय की जानकारी सार्वजनिक नहीं करेगी और ये स्टेल्थ टीमें शहर में कहीं भी औचक निरीक्षण कर सकती हैं।
पुलिस की नजर बाजार, सार्वजनिक स्थान, पार्क, चाय की थड़ी, गर्ल्स स्कूल के आसपास और उन सभी संवेदनशील स्थानों पर रहेगी, जहां चाकूबाजी या हथियारों से जुड़ी गतिविधियों की आशंका रहती है।
पुलिस ने स्पष्ट किया है कि आर्म्स एक्ट के तहत अवैध हथियार रखना ही नहीं, बल्कि उनकी अवैध बिक्री भी अपराध है। धारदार हथियारों से जुड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी। हथियार मिलने पर एफआईआर और गिरफ्तारी की कार्रवाई भी की जा सकती है।
अभियान का फोकस तीन चरणों पर रहेगा—डिटेक्ट, डिटेन और दिशा। पहले ऐसे स्थानों और लोगों को चिन्हित किया जाएगा, जहां हथियारों से जुड़ी गतिविधियां सामने आ रही हैं। इसके बाद संदिग्धों की जांच और पूछताछ की जाएगी और जरूरत के अनुसार सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
अगर कोई व्यक्ति बार-बार इस तरह के अपराध में शामिल पाया जाता है या उसके खिलाफ पुराने आपराधिक मामले हैं, तो नए आपराधिक कानूनों के तहत उपलब्ध प्रावधानों के अनुसार अतिरिक्त सख्त कार्रवाई की जाएगी।
इसके साथ ही चाकू कहां से आ रहे हैं, इसकी भी जांच होगी। यदि ऑनलाइन चाकुओं की बिक्री सामने आती है तो साइबर अपराध शाखा और संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस ने आम जनता से भी अपील की है कि यदि किसी संवेदनशील स्थान पर संदिग्ध लोगों का जमावड़ा रहता है या किसी व्यक्ति के पास अवैध हथियार होने की जानकारी है, तो पुलिस कंट्रोल रूम या हेल्पलाइन नंबर पर सूचना दें। प्राप्त सूचना के आधार पर हॉक टीमों को संबंधित स्थान पर भेजकर कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक इस अभियान का उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों पर चाकूबाजी और अवैध हथियारों के इस्तेमाल पर प्रभावी रोक लगाना है, ताकि आम लोगों में भय का माहौल पैदा न हो।
पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक चाकूबाजी के मामलों में कमी आई है। पिछले साल अगस्त तक 64 मामले दर्ज हुए थे, जबकि इस साल अगस्त तक यह संख्या घटकर 54 रह गई है। इसके बावजूद पुलिस ने इन घटनाओं पर और प्रभावी नियंत्रण के लिए पूरे अक्टूबर महीने तक यह विशेष अभियान चलाने का फैसला किया है।
गांधी के अहिंसा संदेश को जीवन में उतारें युवा : पंकज मेहता
गांधी के अहिंसा संदेश को जीवन में उतारें युवा : पंकज मेहता
कला कन्या महाविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस पर कार्यक्रम, छात्राओं ने लिया स्वच्छता का संकल्प
के डी अब्बासी
कोटा। राजकीय कला कन्या महाविद्यालय में शुक्रवार को महात्मा गांधी एवं लाल बहादुर शास्त्री जयंती के अवसर पर अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष एवं गांधीवादी विचारक पंकज मेहता ने छात्राओं को गांधीजी के अहिंसक विचारों तथा शास्त्रीजी के दृढ़ संकल्प और ईमानदारी को जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम की शुरुआत गांधीजी और शास्त्रीजी के चित्रों पर दीप प्रज्वलन एवं माल्यार्पण से हुई। संगीत विभाग द्वारा ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये’ तथा सामूहिक रूप से ‘रघुपति राघव राजा राम’ भजन प्रस्तुत किया गया। गांधी अध्ययन केंद्र प्रभारी डॉ. सुबोध कुमार ने गांधीजी के सत्य और अहिंसा के दर्शन पर प्रकाश डाला।
प्राचार्य डॉ. सीमा चौहान ने कर्तव्यनिष्ठा, सादगी और राष्ट्रसेवा का संदेश दिया। अंत में ‘सेवा मेरा योगदान’ के तहत एनएसएस स्वयंसेविकाओं ने महाविद्यालय परिसर में स्वच्छता अभियान चलाया। कार्यक्रम का संचालन धन्नाराम गुर्जर ने किया। वरिष्ठ संकाय सदस्य मीरा गुप्ता ने आभार जताया।
ब्रह्मचर्य पर मुनि योगसागर जी का संदेश
ब्रह्मचर्य पर मुनि योगसागर जी का संदेश
ब्रह्मचर्य केवल संयम नहीं, आत्मा में रमण की साधना : मुनि योगसागर जी
के डी अब्बासी
कोटा, 2 अक्टूबर। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार की प्रवचन श्रृंखला में ब्रह्मचर्याणुव्रत का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि ब्रह्म का अर्थ आत्मा है और आत्मा में लीन होने की दिशा में निरंतर बढ़ना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है।
मुनि श्री ने कहा कि ब्रह्मचर्य केवल बाहरी आचरण नहीं, बल्कि मन, वचन और काय के परिणामों की शुद्धि की साधना है। विषय-वासनाओं, राग-द्वेष और कषायों से सावधान रहकर आत्मस्वरूप में रमण करना ही इसका उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि काया, वचन और अंततः मन का संयम साधक को आत्मानुभूति की ओर ले जाता है।
मुनि श्री ने ब्रह्मचर्य व्रत के अतिचारों से बचने के लिए निरंतर जागरूकता, आचार-शास्त्र के अध्ययन और स्वाध्याय को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि अंतरंग विकारों पर विजय प्राप्त करना ही आत्मकल्याण के मार्ग को प्रशस्त करता है।
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