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07 जुलाई 2026

कहने को तो समान नागरिक संहिता है ,, लेकिन मुस्लिम सहित सभी धर्मों के विशेषज्ञ प्रतिनिधि उसमे सदस्य तक नहीं

 

कहने को तो समान नागरिक संहिता है ,, लेकिन मुस्लिम सहित सभी धर्मों के विशेषज्ञ प्रतिनिधि उसमे सदस्य तक नहीं
प्रस्तावित समान नागरिक संहिता में लिव इन रिलेशन शिप को पूरी तरह खत्म करने , तलाक़ में अगर सहमति हो तो तुरंत संयुक्त प्रार्थना पत्र पर तलाक़ होने ,, नाता प्रथा के नाम पर खरीद फरोख्त खत्म करने , नौकरियों में समान अंकों के आधार पर ही नौकरी देने , देश के संविधान को कलंकित करणे वाले पंडित नेहरू आरक्षण सर्कुलर 1952 में केवल हिन्दुओं के लिए शब्द हटा कर देश के हर नागरिक को समान रूप से उसके आरक्षण का लाभ देने सहित कई सुझावों के साथ मुख्यमंत्री को जिला कलेक्टर के माध्यम से , ह्यूमन रिलीफ सोसायटी के महासचिव एडवोकेट अख्तर खान अकेला ने मुख्यमंत्री राजस्थान सरकार को सुझाव भिजवाए
कोटा 7 जुलाई ,राजस्थान में प्रस्तावित समान नागरिक संहिता को लेकर कोटा में प्रस्तावित जन सुनवाई 7 जुलाई की रद्द हो गई जबकि 8 जुलाई को जिला परिषद कोटा के सभागार में जन सुनवाई का कार्यकम है , ह्यूमन रिलीफ सोसायटी के महासचिव एडवोकेट अख्तर खान अकेला का कहना है की यह संवेदनशील मामला , सभी धर्मों के परसनल लॉ से जुड़ा है ,,मांनव अधिकारों का संरक्षण भी इसमें ज़ररी है ऐसे में उक्त समान नागरिक समिति में मुस्लिम सहित अन्य धर्मों के प्रतिनिधि नहीं होना उपेक्षित धर्मों के पर्सनल लो के साथ कुठाराघात है ऐसे में सिक्ख ,, क्रिश्चियन , जैन ,, मुस्लिम ,बौद्ध समाजों को परफेक्ट न्याय कैसे मिल सकेगा इस लिए एडवोकेट अख्तर खान अकेला ने उक्त समिति का विस्तार करते हुए इसमें सभी धर्मों के एक एक विशेषज्ञ प्रतिनिधि को और जोड़ने की मांग की है ,, एडवोकेट अख्तर खान अकेला ने कोटा जिला कलेक्टर के माध्यम से मुख्यमंत्री राजस्थान सरकार को भेजे गए सुझाव ज्ञापन में ,, लिव इन रिलेशन शिप को अय्याशीउ और समाज में गंदगी फैलाने वाला बताते हुए इसपर तुरंत रोक लगाकर इसे दंडात्मक बनांने ,, नौकरियों में सिर्फ मेरिट अंकों के आधार पर सभी धर्म ,,समाजों को समानता के आधार पर वरीयता से नौकरी का प्रावधान लागू हो,यही समानता का नियम अंकों की मेरिट के आधार पर स्कूल कॉलेज , मेडिकल ,, आई आई टी अन्य व्यवसायिक कोर्स में समान नियम लागू हो , ज्ञापन में ऐडवोकेट अख्तर खान अकेला ने पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा संविधान बनते ही , आरक्षण परिपत्र 1952 के जरिये बाबा अम्बेडकर द्वारा निर्मित संविद्धान में आर्टिकल 14 में धर्म ,, लिंग जाति अन्याधारपरभेदभाव नहीं करने और सभी लागु करने की जो पाबंदी लगाई थी उसे तोड़ दी गई और उसमे सिर्फ हिन्दुओं के लिए लागू करना लिखकर संविधान का पणित नेहरू ने मज़ाक़ उड़ाया था ,, उस असंवैधानिक सर्कुलर को संशोधित कर देश के हर नागरिक के लिए समान रूप से लागू करने का नियम बने , किसी भी धर्म से जुड़ा सहमति से जुड़ा तलाक़ का मामला हो, उसका निस्तारण तुरंत किया जाकर उंन्हे डिक्री मिले , रजिस्ट्रेशन मिले ,, रजिस्ट्रेशन को ही तलाक़ की डिक्री का दर्जा हो , और रजिस्ट्रेशन संयुक्त प्रार्थना पत्र पेश करने की तिथि से समयबद्ध एक हफ्ते में करने की पाबंदी हो , जबकि लिव रिलेशन शिप कोसमज के लिए अभिशाप , गदगी फैलाने वाला बताते हुए इसे तुरंत रोककर दंडात्मक बनाने का सुझाव है,,,,,
एडवोकेट अख्तर खान अकेला द्वारा भेजा गया ज्ञापन इस प्रकार है ,,,
माननीय मुख्यमंत्री महोदय,
राजस्थान सरकार,
जयपुर
ज़रिये ,, माननीय जिला कलेक्टर महोदय कोटा
विषय: प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) एवं संबंधित विधिक सुधारों के संबंध में सुझाव।
महोदय,
मैं भारत के संविधान में निहित न्याय, समानता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व के आदर्शों तथा अनुच्छेद 14, 15, 16, 21, 25, 38, 39 एवं 44 की भावना को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित सुझाव प्रस्तुत करता हूँ—
1 ,,,यदि समान नागरिक संहिता लागू की जाती है तो वह धर्म, जाति, पंथ एवं समुदाय से परे भारत के प्रत्येक नागरिक पर समान रूप से लागू हो, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) एवं अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) की भावना सुदृढ़ हो। भारत सरकार द्वारा देश के अलग अलग अधिसूचित कर्मकारों को 1952 में अधिसूचना जारी कर आरक्षण में शामिल किया था, लेकिन समान नागरिक संहिता, संविधान आर्टिकल 14 की धज्जियां उड़ाते हुए उसे धर्म आधारित केवल हिंदुओं के लिये शब्द जोड़कर संविधान की खिल्ली उड़ाई, उस पाबन्दी को हटवाकर पूरे देश के सवधर्म नागरिक को समान रूप से इस आरक्षण का लाभ लागू कर समान नागरिक संहिता लागू की जाए,
2. विवाह पंजीकरण सभी नागरिकों के लिए अनिवार्य हो।विवाह की न्यूनतम आयु एवं आवश्यक शर्तें सभी पर समान हों।बहुविवाह, विवाह विच्छेद एवं पुनर्विवाह के नियम स्पष्ट एवं समान हों। हिन्दू, मुस्लिम तलाक़ आपसी रज़ामन्दी से हो तो तलाक रजिस्ट्रेशन तुरन्त प्रस्तुत दिनांक को ही करवाया जाए, हिन्दू मैरिज एक्ट 13 बी के सहमति से तुरन्त तलाक़ का प्रावधान मुस्लिम समाज के लिये भी मुस्लिम महिला तलाक़ अधिनियम 1921 में संशोधन कर समान त्वरित समझौता तलाक़ नियम लागू किया जाए,
3. तलाक की प्रक्रिया न्यायसंगत, पारदर्शी एवं दोनों पक्षों के समान अधिकारों पर आधारित हो।महिला एवं पुरुष दोनों को समान कानूनी संरक्षण मिले। बिना महर, स्त्रीधन चुकता किये तलाक़ दंडात्मक हो प्रतिबंधित हो, नाता प्रथा के नाम पर महिलाओं की खरीद फरोख्त पर पूर्ण रोक लगे, दंडात्मक प्रावधान भी हों,
4. उत्तराधिकार एवं संपत्ति पुत्र एवं पुत्री को समान उत्तराधिकार अधिकार प्राप्त हों।पति-पत्नी एवं माता-पिता के अधिकार समान रूप से संरक्षित हों। मुस्लिम महिलाओं को सम्पत्ति के अधिकार है दूसरे समाजों में भी दिया जाए, वृद्धाश्रम में पुत्रों के होते हुए किसी पेरेंट्स को रखने पर पुत्रों, पुत्र वधुओं के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही का प्रावधान हो,
5. जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण जन्म एवं मृत्यु का पंजीकरण सभी नागरिकों के लिए समान नियमों के अनुसार अनिवार्य हो।
6. गोद लेना एवं अभिभावकत्व सभी नागरिकों को समान कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत दत्तक ग्रहण एवं अभिभावक बनने का अधिकार मिले।
7. आरक्षण संबंधी सुझाव,,भारत का संविधान अनुच्छेद 15(4), 15(5), 16(4), 16(4A), 16(6) आदि के माध्यम से विभिन्न प्रकार के आरक्षण का प्रावधान करता है।मेरा सुझाव है कि—आरक्षण व्यवस्था की समय-समय पर निष्पक्ष समीक्षा की जाए।सामाजिक न्याय एवं समान अवसर के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाई जाए।आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों सहित सभी संवैधानिक प्रावधानों का समान रूप से पालन सुनिश्चित किया जाए।योग्यता (Merit) एवं सामाजिक न्याय—दोनों संवैधानिक उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाए रखने हेतु विशेषज्ञ समिति गठित की जाए।
8. अधिसूचना की भाषा यदि किसी सरकारी अधिसूचना में ऐसा शब्द प्रयोग हो जिससे किसी एक धार्मिक समुदाय तक उसका दायरा सीमित प्रतीत होता हो, तो उसकी भाषा संविधान के धर्मनिरपेक्ष एवं समान नागरिकता के सिद्धांतों के अनुरूप स्पष्ट एवं सर्वसमावेशी बनाई जाए, ताकि सभी नागरिकों के लिए समानता का संदेश जाए।
9. मौलिक अधिकारों का संरक्षण समान नागरिक संहिता बनाते समय संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 26 के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 14 एवं 21 के अंतर्गत समानता एवं गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का समुचित संतुलन रखा जाए।
10, बहु विवाह प्रथा को रोक लगाकर सभी धर्मों में दंडात्मक बनाया जाए, अय्याशी के लिये जो रिलेशन शिप लिविंग की छूट को मान्यता दी है उसे खत्म कर दंडात्मक किया जाए, दहेज़ क़ानून सख्त किया जाए, समान नागरिक क़ानून में भी दंडात्मक प्रावधान हों,
11, कोई भी धर्म सड़क पर धार्मिक गतिविधि , जुलूस, वगेरा के कार्यक्रम नहीं रखे इसके उलनग्घन को दंडात्मक बनाया जाए, धार्मिक स्थल कोई भी हो, धार्मिक स्थल की एक ईंट भी कोई भी धर्म बिना सरकार की विधिक अनुमति के ना रखे, दंडात्मक प्रावधान हों, डी जे, माइक की आवाज़ सभी धार्मिक कार्यक्रममें 80 डेसीबल से अधिक होने पर तुरन्त डी के, माइक जब्ती कर दंडात्मक प्रावधान किए जाएं,
12, सभी नागरिकों को डॉक्टर, इंजीनियर सहित अन्य एडमिशन में मेरिट के आधार पर ही प्रवेश मिले किसी को दस नम्बर पर ओर किसी को 500 नम्बर पर भी एडमिशन ना मिले इसे समान किया जाए, इसी तरह कोई भी नोकरी हो एक समान मेरिट प्रतिभा के आधार पर ही नोकरी मिले, किसी को ज़ीरो नम्बर नोकरी मिल रही है तो किसी को 500 नम्बर लाने पर भी नहीं मिल रही इस भेदभाव को खत्म कर समान नागरिक क़ानून में शामिल किया जाए,
13. व्यापक जन-सुनवाई विधेयक तैयार करने से पूर्व विधि विशेषज्ञों, उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ताओं, महिला संगठनों, अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों, अनुसूचित जाति/जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, सामाजिक संगठनों एवं आम नागरिकों से व्यापक परामर्श किया जाए।
14, ई डब्ल्यू एस, ओ बी जी प्रमाणपत्र बनाने में धर्म गुरु, समाज , पंचायत अध्यक्ष के प्रमाणीकरण के आधार पर ही बनाने के निर्देश हों, मुस्लिम में दस्तावेजी प्रक्रिया में जाति भिश्ती, जुलाहा, पठान वगेरा की जगह सिर्फ मुस्लिम लिखा जाता, हिन्दू समाज में भी यही दिक़्क़तें है, जिसे समाज के प्रमाणीकरण पर लागू के प्रावधान हों,
15, संविधान में मान्यता प्राप्त सभी भाषाओं को स्कूली, कॉलेज शिक्षा में बराबर का समान अधिकार देते हुए, हर भाषा इच्छानुसार होने पर पढ़ाया जाना अनिवार्य किया जाए, इसके लिए अध्यापक, लेक्चरर्स की पर्याप्त नियुक्ति अनिवार्य की जाए,
अतः निवेदन है कि उपर्युक्त सुझावों पर विचार करते हुए ऐसा कानून बनाया जाए जो संविधान की मूल भावना—न्याय, समानता, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता एवं बंधुत्व—के अनुरूप हो तथा सभी नागरिकों के अधिकारों की समान रूप से रक्षा करे।
भवदीय
अख्तर खान अकेला एडवोकेट
महासचिव, ह्यूमन रिलीफ सोसायटी, 2 थ 15 , मैन रोड, बृजवासी मिष्ठान के पास, विज्ञाननगर कोटा राजस्थान 324005
मोबाइल 9829086339
akhtar khan akela
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मृत्यु के बाद कीमती मकान-जेवर की तरह नेत्रदान,भी वसीयत में लिखें : सुषमा सोन

 मृत्यु के बाद कीमती मकान-जेवर की तरह नेत्रदान,भी वसीयत में लिखें : सुषमा सोन

कोटा। सामाजिक संस्था शाइन इंडिया फाउंडेशन द्वारा संचालित नेत्रदान जनजागरूकता अभियान के अंतर्गत सुभाष विहार निवासी, सुषमा सोन ने अपने जन्मदिवस के अवसर पर नेत्रदान का संकल्प लेते पत्र भरा।

इस अवसर पर उन्होंने समाज के नाम एक महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि "जिस प्रकार हम अपनी मृत्यु के बाद अपने कीमती मकान, जमीन-जायदाद और जेवर आदि के संबंध में वसीयत लिखकर जाते हैं, उसी प्रकार हमें यह भी अपनी वसीयत में स्पष्ट रूप से लिखना चाहिए कि,हमारी मृत्यु के पश्चात हमारे नेत्र अवश्य दान किए जाएं। इससे हमारे परिवार को भी हमारी अंतिम इच्छा का सम्मान करने में सुविधा होगी और किसी नेत्रहीन व्यक्ति के जीवन में फिर से उजाला आ सकेगा।"

सुषमा के पति कृष्ण कुमार सोन,ने पत्नी के नेत्रदान संकल्प की सराहना करते हुए कहा कि,नेत्रदान ऐसा महादान है,जो मृत्यु के बाद भी दो व्यक्तियों को नई रौशनी प्रदान कर सकता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी वसीयत में नेत्रदान की इच्छा का उल्लेख करे तथा अपने परिजनों को भी इसकी जानकारी दे, तो नेत्रदान की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है और हजारों दृष्टिबाधित लोगों को नया जीवन मिल सकता है।

शाइन इंडिया फाउंडेशन के पदाधिकारियों ने सुषमा सोन को जन्मदिवस की शुभकामनाएं देते हुए उनके इस प्रेरणादायी निर्णय की सराहना की तथा इसे समाज के लिए अनुकरणीय पहल बताया। संस्था ने सभी नागरिकों से अपील की कि वे अपने जन्मदिवस, विवाह वर्षगांठ अथवा अन्य विशेष अवसरों पर नेत्रदान का संकल्प लेकर समाज में मानवता का संदेश फैलाएं।

(ऐ रसूल) बनी इसराइल से पूछो कि हम ने उन को कैसी कैसी रौशन निशानियाँ दी और जब किसी शख्स के पास ख़ुदा की नेअमत (किताब) आ चुकी उस के बाद भी उस को बदल डाले तो बेषक़ ख़ुदा सख़्त अज़ाब वाला है

 (ऐ रसूल) बनी इसराइल से पूछो कि हम ने उन को कैसी कैसी रौशन निशानियाँ दी और जब किसी शख्स के पास ख़ुदा की नेअमत (किताब) आ चुकी उस के बाद भी उस को बदल डाले तो बेषक़ ख़ुदा सख़्त अज़ाब वाला है (211)
जिन लोगों ने कुफ्र इख़्तेयार किया उन के लिये दुनिया की ज़रा सी जि़न्दगी ख़ूब अच्छी दिखायी गयी है और इमानदारों से मसखरापन करते हैं हालाकि क़यामत के दिन परहेज़गारों का दरजा उनसे (कहीं) बढ़ चढ़ के होगा और ख़ुदा जिस को चाहता है बे हिसाब रोज़ी अता फरमाता है (212)
(पहले) सब लोग एक ही दीन रखते थे (फिर आपस में झगड़ने लगे तब) ख़ुदा ने नजात से ख़ुशख़बरी देने वाले और अज़ाब से डराने वाले पैग़म्बरों को भेजा और इन पैग़म्बरों के साथ बरहक़ किताब भी नाजि़ल की ताकि जिन बातों में लोग झगड़ते थे किताबे ख़़ुदा (उसका) फ़ैसला कर दे और फिर अफ़सोस तो ये है कि इस हुक्म से इख़्तेलाफ किया भी तो उन्हीं लोगों ने जिन को किताब दी गयी थी और वह भी जब उन के पास ख़ुदा के साफ एहकाम आ चुके उसके बाद और वह भी आपस की शरारत से तब ख़ुदा ने अपनी मेहरबानी से (ख़ालिस) ईमानदारों को वह राहे हक़ दिखा दी जिस में उन लोगों ने इख़्तेलाफ डाल रखा था और ख़़ुदा जिस को चाहे राहे रास्त की हिदायत करता है (213)
क्या तुम ये ख़्याल करते हो कि बेह्श्ते में पहुँच ही जाओगे हालाकि अभी तक तुम्हे अगले ज़माने वालों की सी हालत नहीं पेश आयी कि उन्हें तरह तरह की तक़लीफों (फाक़ा कशी मोहताजी) और बीमारी ने घेर लिया था और ज़लज़ले में इस क़दर झिंझोडे़ गए कि आखि़र (आजि़ज़ हो के) पैग़म्बर और ईमान वाले जो उन के साथ थे कहने लगे देखिए ख़ुदा की मदद कब (होती) है देखो (घबराओ नहीं) ख़़ुदा की मदद यक़ीनन बहुत क़रीब है (214)
(ऐ रसूल) तुमसे लोग पूछते हैं कि हम ख़ुदा की राह में क्या खर्च करें (तो तुम उन्हें) जवाब दो कि तुम अपनी नेक कमाई से जो कुछ खर्च करो तो (वह तुम्हारे माँ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजो और परदेसियों का हक़ है और तुम कोई नेक सा काम करो ख़़ुदा उसको ज़रुर जानता है (215)
(मुसलमानों) तुम पर जिहाद फर्ज़ किया गया अगरचे तुम पर शाक़ ज़रुर है और अजब नहीं कि तुम किसी चीज़ (जिहाद) को नापसन्द करो हालाकि वह तुम्हारे हक़ में बेहतर हो और अजब नहीं कि तुम किसी चीज़ को पसन्द करो हालाॅकि वह तुम्हारे हक़ में बुरी हो और ख़ुदा (तो) जानता ही है मगर तुम नही जानते हो (216)
(ऐ रसूल) तुमसे लोग हुरमत वाले महीनों की निस्बत पूछते हैं कि (आया) जिहाद उनमें जायज़ है तो तुम उन्हें जवाब दो कि इन महीनों में जेहाद बड़ा गुनाह है और ये भी याद रहे कि ख़़ुदा की राह से रोकना और ख़ुदा से इन्कार और मस्जिदुल हराम (काबा) से रोकना और जो उस के एहल है उनका मस्जिद से निकाल बाहर करना (ये सब) ख़ुदा के नज़दीक इस से भी बढ़कर गुनाह है और फि़तना परदाज़ी कुश्ती ख़़ून से भी बढ़ कर है और ये कुफ़्फ़ार हमेशा तुम से लड़ते ही चले जाएँगें यहाँ तक कि अगर उन का बस चले तो तुम को तुम्हारे दीन से फिरा दे और तुम में जो शख्स अपने दीन से फिरा और कुफ्ऱ की हालत में मर गया तो ऐसों ही का किया कराया सब कुछ दुनिया और आखे़रत (दोनों) में अकारत है और यही लोग जहन्नुमी हैं (और) वह उसी में हमेशा रहेंगें (217)
बेशक जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और ख़ुदा की राह में हिजरत की और जिहाद किया यही लोग रहमते ख़ुदा के उम्मीदवार हैं और ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है (218)
(ऐ रसूल) तुमसे लोग शराब और जुए के बारे में पूछते हैं तो तुम उन से कह दो कि इन दोनो में बड़ा गुनाह है और कुछ फायदे भी हैं और उन के फायदे से उन का गुनाह बढ़ के है और तुम से लोग पूछते हैं कि ख़ुदा की राह में क्या ख़र्च करे तुम उनसे कह दो कि जो तुम्हारे ज़रुरत से बचे यूँ ख़ुदा अपने एहकाम तुम से साफ़ साफ़ बयान करता है (219)
ताकि तुम दुनिया और आखि़रत (के मामलात) में ग़ौर करो और तुम से लोग यतीमों के बारे में पूछते हैं तुम (उन से) कह दो कि उनकी (इसलाह दुरुस्ती) बेहतर है और अगर तुम उन से मिलजुल कर रहो तो (कुछ हर्ज) नहीं आखि़र वह तुम्हारें भाई ही तो हैं और ख़ुदा फ़सादी को ख़ैर ख़्वाह से (अलग ख़ूब) जानता है और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम को मुसीबत में डाल देता बेशक ख़ुदा ज़बरदस्त हिक़मत वाला है (220)

06 जुलाई 2026

और बाज़ बन्दे ऐसे हैं कि जो दुआ करते हैं कि ऐ मेरे पालने वाले मुझे दुनिया में नेअमत दे और आखि़रत में सवाब दे और दोज़ख़ की आग से बचा (201) यही वह लोग हैं जिनके लिए अपनी कमाई का हिस्सा चैन है

 और बाज़ बन्दे ऐसे हैं कि जो दुआ करते हैं कि ऐ मेरे पालने वाले मुझे दुनिया में नेअमत दे और आखि़रत में सवाब दे और दोज़ख़ की आग से बचा (201)
यही वह लोग हैं जिनके लिए अपनी कमाई का हिस्सा चैन है (202)
और ख़ुदा बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है और इन गिनती के चन्द दिनों तक (तो) ख़ुदा का जि़क्र करो फिर जो शख्स जल्दी कर बैठै और (मिना) से और दो ही दिन में चल ख़ड़ा हो तो उस पर भी गुनाह नहीं है और जो (तीसरे दिन तक) ठहरा रहे उस पर भी कुछ गुनाह नही लेकिन यह रियायत उसके वास्ते है जो परहेज़गार हो, और खु़दा से डरते रहो और यक़ीन जानो कि एक दिन तुम सब के सब उसकी तरफ क़ब्रों से उठाए जाओगे (203)
ऐ रसूल बाज़ लोग मुनाफिक़ीन से ऐसे भी हैं जिनकी चिकनी चुपड़ी बातें (इस ज़रा सी) दुनयावी जि़न्दगी में तुम्हें बहुत भाती है और वह अपनी दिली मोहब्बत पर ख़ुदा को गवाह मुक़र्रर करते हैं हालाकि वह तुम्हारे दुश्मनों में सबसे ज़्यादा झगड़ालू हैं (204)
और जहाँ तुम्हारी मोहब्बत से मुँह फेरा तो इधर उधर दौड़ धूप करने लगा ताकि मुल्क में फ़साद फैलाए और ज़राअत {खेती बाड़ी} और मवेषी का सत्यानास करे और ख़ुदा फसाद को अच्छा नहीं समझता (205)
और जब कहा जाता है कि ख़ुदा से डरो तो उसे ग़ुरुर गुनाह पर उभारता है बस ऐसे कम्बख़्त के लिए जहन्नुम ही काफ़ी है और बहुत ही बुरा ठिकाना है (206)
और लोगों में से ख़ुदा के बन्दे कुछ ऐसे हैं जो ख़़ुदा की (ख़ुशनूदी) हासिल करने की ग़रज़ से अपनी जान तक बेच डालते हैं और ख़ुदा ऐसे बन्दों पर बड़ा ही शफ़्क़्क़त वाला है (207)
ईमान वालों तुम सबके सब एक बार इस्लाम में (पूरी तरह ) दाखि़ल हो जाओ और शैतान के क़दम ब क़दम न चलो वह तुम्हारा यक़ीनी ज़ाहिर ब ज़ाहिर दुश्मन है (208)
फिर जब तुम्हारे पास रौशन दलीले आ चुकी उसके बाद भी डगमगा गए तो अच्छी तरह समझ लो कि ख़ुदा (हर तरह) ग़ालिब और तदबीर वाला है (209)
क्या वह लोग इसी के मुन्तजि़र हैं कि सफेद बादल के साय बानो की आड़ में अज़ाबे ख़ुदा और अज़ाब के फ़रिश्ते उन पर ही आ जाए और सब झगड़े चुक ही जाते हालाकि आखि़र कुल उमुर ख़़ुदा ही की तरफ रुजू किए जाएँगे (210)

05 जुलाई 2026

और ख़ुदा की राह में ख़र्च करो और अपने हाथ जान हलाकत मे न डालो और नेकी करो बेशक ख़ुदा नेकी करने वालों को दोस्त रखता है

 और तुम उन (मुशरिकों) को जहाँ पाओ मार ही डालो और उन लोगों ने जहाँ (मक्का) से तुम्हें शहर बदर किया है तुम भी उन्हें निकाल बाहर करो और फितना परदाज़ी (शिर्क) खूँरेज़ी से भी बढ़ के है और जब तक वह लोग (कुफ़्फ़ार) मस्जि़द हराम (काबा) के पास तुम से न लडे़ तुम भी उन से उस जगह न लड़ों बस अगर वह तुम से लड़े तो बेखटके तुम भी उन को क़त्ल करो काफि़रों की यही सज़ा है (191)
फिर अगर वह लोग बाज़ रहें तो बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है (192)
और उन से लड़े जाओ यहाँ तक कि फ़साद बाक़ी न रहे और सिर्फ़ ख़ुदा ही का दीन रह जाए फिर अगर वह लोग बाज़ रहे तो उन पर ज़्यादती न करो क्यांेकि ज़ालिमों के सिवा किसी पर ज़्यादती (अच्छी) नहीं (193)
हुरमत वाला महीना हुरमत वाले महीने के बराबर है (और कुछ महीने की खुसूसियत नहीं) सब हुरमत वाली चीजे़ एक दूसरे के बराबर हैं बस जो शख्स तुम पर ज़्यादती करे तो जैसी ज़्यादती उसने तुम पर की है वैसी ही ज़्यादती तुम भी उस पर करो और ख़ुदा से डरते रहो और खू़ब समझ लो कि ख़ुदा परहेज़गारों का साथी है (194)
और ख़ुदा की राह में ख़र्च करो और अपने हाथ जान हलाकत मे न डालो और नेकी करो बेशक ख़ुदा नेकी करने वालों को दोस्त रखता है (195)
और सिर्फ़ ख़ुदा ही के वास्ते हज और उमरा को पूरा करो अगर तुम बीमारी वगै़रह की वजह से मजबूर हो जाओ तो फिर जैसी क़ुरबानी मयस्सर आये (कर दो) और जब तक कु़रबानी अपनी जगह पर न पहुँय जाये अपने सर न मुँडवाओ फिर जब तुम में से कोई बीमार हो या उसके सर में कोई तकलीफ हो तो (सर मुँडवाने का बदला) रोजे़ या खै़रात या कु़रबानी है बस जब मुतमइन रहों तो जो शख्स हज तमत्तो का उमरा करे तो उसको जो कु़रबानी मयस्सर आये करनी होगी और जिस से कु़रबानी ना मुमकिन हो तो तीन रोजे़ ज़ामानए हज में (रखने होगें) और सात रोजे़ जब तुम वापस आओ ये पूरी दहाई है ये हुक्म उस शख्स के वास्ते है जिस के लड़के बाले मस्जि़दुल हराम (मक्का) के बाशिन्दे न हो और ख़ुदा से डरो और समझ लो कि ख़ुदा बड़ा सख़्त अज़ाब देने वाला है (196)
हज के महीने तो (अब सब को) मालूम हैं (शव्वाल, ज़ीक़ादा, जिलहज) बस जो शख्स इन महीनों में अपने ऊपर हज लाजि़म करे तो (एहराम से आखि़र हज तक) न औरत के पास जाए न कोई और गुनाह करे और न झगडे़ और नेकी का कोई सा काम भी करों तो ख़ुदा उस को खू़ब जानता है और (रास्ते के लिए) ज़ाद राह मुहिय्या करो और सब मे बेहतर ज़ाद राह परहेज़गारी है और ऐ अक़्लमन्दों मुझ से डरते रहो (197)
इस में कोई इल्ज़ाम नहीं है कि (हज के साथ) तुम अपने परवरदिगार के फज़ल (नफ़ा तिजारत) की ख़्वाहिश करो और फिर जब तुम अरफात से चल खड़े हो तो मशअरुल हराम के पास ख़ुदा का जिक्र करो और उस की याद भी करो तो जिस तरह तुम्हे बताया है अगरचे तुम इसके पहले तो गुमराहो से थे (198)
फिर जहाँ से लोग चल खड़े हों वहीं से तुम भी चल खड़े हो और उससे मग़फिरत की दुआ माँगों बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है (199)
फिर जब तुम अरक़ान हज बजा ला चुको तो तुम इस तरह जि़क्रे ख़ुदा करो जिस तरह तुम अपने बाप दादाओं का जि़क्र करते हो बल्कि उससे बढ़ कर के फिर बाज़ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि ऐ मेरे परवरदिगार हमको जो (देना है) दुनिया ही में दे दे हालाकि (फिर) आखि़रत में उनका कुछ हिस्सा नहीं (200)

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