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21 अक्टूबर 2026

दिल्ली में पुलिसकर्मी द्वारा हमला एवं मारपीट, दिल्ली पुलिस द्वारा FIR दर्ज नहीं करने पर जयपुर में Zero FIR दर्ज कराने का विधिक अधिकार

 

दिल्ली में पुलिसकर्मी द्वारा हमला एवं मारपीट, दिल्ली पुलिस द्वारा FIR दर्ज नहीं करने पर जयपुर में Zero FIR दर्ज कराने का विधिक अधिकार
क्यों है, दिल्ली में पुलिसकर्मी द्वारा फरियादिया के साथ मारपीट किए जाने तथा दिल्ली के क्षेत्राधिकार वाले थाने में शिकायत देने के बावजूद FIR दर्ज नहीं किए जाने पर, जयपुर के किसी पुलिस थाने में Zero FIR दर्ज कराने का विधिक आधार उपलब्ध है, यदि शिकायत से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो केवल इस आधार पर FIR दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता कि घटना दिल्ली में हुई है और जयपुर पुलिस का क्षेत्राधिकार नहीं है, इसका प्रमुख आधार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173(1) है, इसके अतिरिक्त, उच्चतम न्यायालय के बाध्यकारी निर्णय भी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर FIR दर्ज करने के दायित्व को स्पष्ट करते हैं, संबंधित विधिक प्रावधान, न्यायिक दृष्टान्त और उपलब्ध उपचार का विवरण दिया जा रहा है, Zero FIR का वैधानिक प्रावधान देखे तो— BNSS की धारा 173(1)
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 173(1) में संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने का प्रावधान है, जो इसका महत्त्वपूर्ण अंश है:“Every information relating to the commission of a cognizable offence, irrespective of the area where the offence is committed…”
अर्थात, संज्ञेय अपराध किए जाने से संबंधित सूचना पुलिस थाने के क्षेत्राधिकार की परवाह किए बिना दी जा सकती है,
आधिकारिक कानून: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के प्रावधान का वर्तमान मामले में उपयोग अगर घटना दिल्ली में भी हुई, ओर कथित आरोपी दिल्ली पुलिस के कर्मचारी है,
फरियादिया ने दिल्ली के संबंधित पुलिस थाने में शिकायत दी, पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की, फरियादिया जयपुर आ गई या जयपुर में मौजूद है,
ऐसी स्थिति में फरियादिया जयपुर के पुलिस थाने में घटना की सूचना देकर Zero FIR दर्ज करने का अनुरोध कर सकती है,
यदि सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो जयपुर पुलिस केवल दिल्ली का क्षेत्राधिकार होने का आधार लेकर FIR दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती, Zero FIR का उद्देश्य प्रारंभिक स्तर पर क्षेत्राधिकार की बाधा के कारण आपराधिक शिकायत दर्ज होने में होने वाली देरी को रोकना है, सामान्यतः FIR दर्ज होने के बाद उसे आगे की जांच के लिए संबंधित क्षेत्राधिकार वाले पुलिस थाने को भेजा जा सकता है, दिल्ली पुलिसकर्मी द्वारा मारपीट के मामले में कौन-से अपराध बन सकते हैं?
आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की संबंधित धाराएँ लागू हो सकती हैं, कथित कृत्य दिल्ली पुलिस मारपिटाई हमला मामले में,
संभावित विधिक प्रावधान
जानबूझकर मारपीट करके चोट पहुँचाना, धारा 115(2), तथ्यों के अनुसार, गंभीर चोट पहुँचाना
धारा 117, यदि गंभीर चोट की वैधानिक शर्तें पूरी हों, आपराधिक बल का प्रयोग
धारा 131, परिस्थितियों के अनुसार, गलत तरीके से रोकना
धारा 126, यदि उसके आवश्यक तत्व मौजूद हों
धमकी देना
धारा 351, यदि आपराधिक धमकी के तत्व मौजूद हों
लोक सेवक द्वारा कानून के विपरीत कार्य
संबंधित अपराध के आवश्यक तत्व सिद्ध होने पर लागू प्रावधान
महत्त्वपूर्ण सावधानी: पुलिसकर्मी द्वारा की गई प्रत्येक मारपीट अपने आप किसी एक निश्चित धारा में नहीं आती, चोट की प्रकृति, घटना की परिस्थितियों, पुलिसकर्मी के कृत्य, प्रयुक्त बल तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सही धाराएँ निर्धारित होंगी,
यदि पुलिसकर्मी ने अपनी आधिकारिक हैसियत का दुरुपयोग किया हो, तो उसके विरुद्ध लागू आपराधिक प्रावधानों के साथ-साथ विभागीय कार्रवाई की माँग भी की जा सकती है।
उच्चतम न्यायालय के महत्त्वपूर्ण न्यायिक दृष्टान्त(A) Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh
न्यायालय: उच्चतम न्यायालय
निर्णय: संविधान पीठ, 2013
प्रकाशित संदर्भ: (2014) 2 SCC 1यह FIR दर्ज करने के संबंध में सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णयों में से एक है, निर्णय का सिद्धान्त,उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस को दी गई सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो FIR दर्ज करना सामान्यतः अनिवार्य है, पुलिस को ऐसे मामले में FIR दर्ज करने से बचने के लिए मनमाने ढंग से प्रारंभिक जाँच का सहारा लेने की अनुमति नहीं है, निर्णय में सीमित श्रेणियों में प्रारंभिक जाँच के संबंध में भी दिशा-निर्देश दिए गए थे,
वर्तमान मामले में उपयोग
यदि फरियादिया की शिकायत से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो दिल्ली पुलिस द्वारा केवल शिकायत लेकर FIR दर्ज नहीं करना न्यायिक चुनौती का विषय हो सकता है, इसी प्रकार, जयपुर पुलिस भी केवल क्षेत्राधिकार दिल्ली में होने के आधार पर Zero FIR दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती, हालाँकि, इस निर्णय को यह मानकर लागू नहीं किया जाना चाहिए कि हर प्रकार की शिकायत में बिना किसी अपवाद के FIR दर्ज करना ही होगा, वर्तमान में BNSS की धारा 173 के प्रावधान भी लागू होंगे (B) Satvinder Kaur v. State (Government of NCT of Delhi)
न्यायालय: उच्चतम न्यायालय
निर्णय: 1999 संदर्भ: (1999) 8 SCC 728 यह निर्णय क्षेत्राधिकार और आपराधिक जाँच से संबंधित महत्त्वपूर्ण दृष्टान्त है, निर्णय का सिद्धान्त
उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार से संबंधित प्रश्न मात्र के आधार पर जाँच के प्रारंभिक चरण में आपराधिक कार्यवाही को बाधित नहीं किया जाना चाहिए,
क्षेत्राधिकार के प्रश्न की जाँच उचित प्रक्रिया के अनुसार की जा सकती है, वर्तमान मामले में उपयोग, दिल्ली में हुई घटना की सूचना जयपुर पुलिस को दिए जाने पर क्षेत्राधिकार का प्रश्न अपने आप में Zero FIR दर्ज करने से इनकार करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
इस सिद्धान्त को वर्तमान BNSS की धारा 173(1) के साथ पढ़ना चाहिए, (C) State of Haryana v. Bhajan Lal
न्यायालय: उच्चतम न्यायालय
निर्णय: 1992 संदर्भ: 1992 Supp (1) SCC 335
यह आपराधिक कार्यवाही और FIR से संबंधित प्रमुख निर्णय है,
निर्णय का महत्त्व
इस निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने उन परिस्थितियों पर विचार किया जिनमें आपराधिक कार्यवाही में न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है, यह निर्णय FIR दर्ज करने के दायित्व से संबंधित विधिक सिद्धान्तों के व्यापक संदर्भ में उपयोगी है, लेकिन इसे Zero FIR पर सीधे और अकेले निर्णायक निर्णय के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा,
वर्तमान मामले में प्राथमिक आधार BNSS की धारा 173(1), तथा FIR दर्ज करने के दायित्व के संबंध में Lalita Kumari का निर्णय होगा, Zero FIR दर्ज नहीं करने पर क्या उपचार उपलब्ध हैं?
यदि जयपुर पुलिस भी Zero FIR दर्ज करने से इनकार करती है, तो फरियादिया निम्नलिखित उपाय अपना सकती है, (1) BNSS की धारा 173(4) — वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को शिकायत, यदि थाना प्रभारी संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने से इनकार करता है, तो फरियादिया शिकायत का सार लिखित रूप में संबंधित पुलिस अधीक्षक को डाक से भेज सकती है, इस मामले में शिकायत की प्रतियाँ निम्न अधिकारियों को भेजना व्यावहारिक हो सकता है:
पुलिस अधीक्षक, संबंधित जिला जयपुर, पुलिस आयुक्त, जयपुर, यदि घटना और संबंधित थाना आयुक्तालय के अधीन हों, पुलिस आयुक्त, दिल्ली, संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, दिल्ली पुलिस।
BNSS की धारा 173(4) के अनुसार, शिकायत से संज्ञेय अपराध का खुलासा होने पर संबंधित पुलिस अधीक्षक स्वयं जाँच कर सकता है अथवा अधीनस्थ पुलिस अधिकारी से जाँच कराने का निर्देश दे सकता है, आधिकारिक प्रावधान: BNSS, धारा 173 — India Code⁠, व्यावहारिक सलाह: शिकायत रजिस्टर्ड डाक या स्पीड पोस्ट से भेजें और डाक रसीद, शिकायत की प्रति तथा प्राप्ति संबंधी साक्ष्य सुरक्षित रखें, BNSS की धारा 175(3) — मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन
यदि पुलिस के समक्ष शिकायत करने के बावजूद उचित कार्रवाई नहीं होती, तो फरियादिया सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष जाँच का आदेश देने के लिए आवेदन कर सकती है,
BNSS की धारा 175(3) के अंतर्गत मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच का आदेश देने की प्रक्रिया लागू होती है। इसके लिए धारा 173(4) के अंतर्गत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को आवेदन करने सहित धारा में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है, घटना दिल्ली में हुई होने के कारण यह देखना होगा कि संबंधित मजिस्ट्रेट के पास मामले के संबंध में आवश्यक क्षेत्रीय और वैधानिक अधिकारिता है या नहीं, जयपुर में केवल शिकायतकर्ता की उपस्थिति के आधार पर जयपुर के मजिस्ट्रेट को दिल्ली में हुए प्रत्येक अपराध की जाँच का आदेश देने का अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता, पुलिसकर्मी के विरुद्ध शिकायत में कौन-से साक्ष्य सुरक्षित रखने चाहिए?
इस प्रकार के मामले में निम्नलिखित साक्ष्य महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं:
घटना की तारीख, समय और दिल्ली में घटनास्थल का पूरा पता, संबंधित पुलिसकर्मी का नाम, पद, बैज नंबर अथवा पहचान संबंधी विवरण, यदि उपलब्ध हो, चोटों की तस्वीरें और सरकारी अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट, CCTV फुटेज, मोबाइल वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग, यदि उपलब्ध हो।
प्रत्यक्षदर्शियों के नाम और संपर्क विवरण, दिल्ली के थाने में दी गई शिकायत की प्रति,
शिकायत प्राप्त होने की रसीद, डायरी नंबर, ऑनलाइन शिकायत संख्या या डाक का प्रमाण, FIR दर्ज नहीं किए जाने संबंधी उपलब्ध पत्राचार,
घटना के बाद हुए उपचार और खर्च के दस्तावेज, CCTV फुटेज मिटने की आशंका होने पर उसे सुरक्षित रखने के लिए संबंधित अधिकारी को तत्काल लिखित अनुरोध करना उपयोगी होगा, क्या दिल्ली में FIR दर्ज नहीं होने पर जयपुर पुलिस के विरुद्ध भी कार्रवाई हो सकती है? इस प्रश्न में दो अलग-अलग परिस्थितियों का अंतर समझना आवश्यक है, पहली स्थिति: दिल्ली पुलिस ने दिल्ली में हुई घटना की शिकायत लेकर FIR दर्ज नहीं की, इस स्थिति में दिल्ली पुलिस के विरुद्ध सक्षम वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत, विभागीय कार्रवाई की माँग तथा परिस्थितियों के अनुसार अन्य कानूनी उपचार अपनाए जा सकते हैं, दूसरी स्थिति: फरियादिया जयपुर के पुलिस थाने में Zero FIR दर्ज कराने जाती है और जयपुर पुलिस भी केवल क्षेत्राधिकार का आधार लेकर इनकार करती है, यदि सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो ऐसा इनकार BNSS की धारा 173(1) के विपरीत हो सकता है। ऐसी स्थिति में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को शिकायत दी जा सकती है और लागू कानून के अनुसार आगे का उपचार अपनाया जा सकता है,
हालाँकि, किसी पुलिसकर्मी की व्यक्तिगत आपराधिक या विभागीय जिम्मेदारी का निर्धारण उसके वास्तविक आचरण, लागू कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा, ऐसे में विधिक स्थिति निम्न प्रकार से समझी जा सकती है: दिल्ली में पुलिसकर्मी द्वारा कथित मारपीट की शिकायत दिल्ली के संबंधित थाने में दिए जाने के बावजूद FIR दर्ज नहीं होना कानूनी चुनौती का विषय हो सकता है।
BNSS की धारा 173(1) के अनुसार संज्ञेय अपराध की सूचना क्षेत्राधिकार की परवाह किए बिना दी जा सकती है,
यदि फरियादिया जयपुर में Zero FIR दर्ज कराने जाती है, तो जयपुर पुलिस केवल इस आधार पर इनकार नहीं कर सकती कि घटना दिल्ली में हुई है, FIR दर्ज होने के बाद मामले को आगे की जाँच के लिए संबंधित क्षेत्राधिकार वाले थाने को भेजा जा सकता है, FIR दर्ज करने से इनकार होने पर BNSS की धारा 173(4) के अंतर्गत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से संपर्क किया जा सकता है, इसके बाद धारा 175(3) के अंतर्गत सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन का विकल्प भी उपलब्ध हो सकता है।
FIR दर्ज करने के दायित्व के संबंध में Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh प्रमुख न्यायिक दृष्टान्त है, आधिकारिक विधिक स्रोत: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — India Code⁠, आपके मामले के लिए अगला महत्त्वपूर्ण कदम
यदि आप इस प्रकरण में फरियादिया की ओर से कानूनी कार्रवाई करना चाहते हैं, तो तीन तथ्य स्पष्ट कर दें:
दिल्ली में घटना किस तारीख को और किस स्थान पर हुई थी? क्या मारपीट करने वाला पुलिसकर्मी वर्दी में था और क्या उसकी पहचान ज्ञात है?
दिल्ली के थाने में दी गई शिकायत लिखित थी? क्या उसकी प्राप्ति रसीद या शिकायत नंबर उपलब्ध है?
इन तथ्यों के आधार पर मजिस्ट्रेट या हाईकोर्ट में कार्यवाही के साथ कर्तव्य निर्वहन नहीं करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कर्तव्यविहीनता का मुकदमा दर्ज हो सकता है, अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान 9829086339

नेत्रदान के लिए कोटा से बारां पहुंची शाइन इंडिया

 नेत्रदान के लिए कोटा से बारां पहुंची शाइन इंडिया

कॉर्निया की अंधता का दुख भोग रहे मरीजों के लिए, नेत्रदान ही एक माध्यम है । सफल कॉर्निया प्रत्यारोपण के माध्यम से, दृष्टि बाधित व्यक्तियों के जीवन से अंधकार को हमेशा के लिए दूर किया जा सकता है ।

इसी क्रम में आज, सत्संग रोड बारां निवासी सुरेश चंद्र जैन के आकस्मिक निधन की सूचना भारत विकास परिषद के सदस्य रमाकांत गुप्ता और कमलेश जैन के माध्यम से कोटा में शाइन इंडिया फाउंडेशन, व बीबीजे चैप्टर के डॉ कुलवंत गौड़ को मिली । रमाकांत ने बताया कि, पारिवार के सदस्यों ने स्व प्रेरणा से स्व०पिताजी के नेत्रदान का निर्णय लिया है ।

चिकित्सकीय जानकारी लेने के उपरांत,कोटा से डॉ गौड़ नेत्र संकलन वाहिनी ज्योति रथ लेकर, तुरंत कोटा से रवाना हुए और शवयात्रा निकलने से ठीक पूर्व निवास स्थान पर पहुंचकर नेत्रदान की प्रक्रिया परिवार के सभी सदस्यों के बीच में संपन्न की। 

और (ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार फसादियों को खूब जानता है और अगर वह तुम्हे झुठलाए तो तुम कह दो कि हमारे लिए हमारी कार गुजारी है और तुम्हारे लिए तुम्हारी कारस्तानी जो कुछ मै करता हूँ उसके तुम जि़म्मेदार नहीं और जो कुछ तुम करते हो उससे मै बरी हूँ

 और (ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार फसादियों को खूब जानता है और अगर वह तुम्हे झुठलाए तो तुम कह दो कि हमारे लिए हमारी कार गुजारी है और तुम्हारे लिए तुम्हारी कारस्तानी जो कुछ मै करता हूँ उसके तुम जि़म्मेदार नहीं और जो कुछ तुम करते हो उससे मै बरी हूँ (41)
और उनमें से बाज़ ऐसे हैं कि तुम्हारी ज़बानों की तरफ कान लगाए रहते हैं तो (क्या) वह तुम्हारी सुन लेगें हरगिज़ नहीं अगरचे वह कुछ समझ भी न सकते हो (42)
तुम कही बहरों को कुछ सुना सकते हो और बाज़ उनमें से ऐसे हैं जो तुम्हारी तरफ (टकटकी बाँधे) देखते हैं तो (क्या वह इमान लाएँगें हरगिज़ नहीं) अगरचे उन्हें कुछ न सूझता हो तो तुम अन्धे को राहे रास्त दिखा दोगे (43)
ख़ुदा तो हरगिज़ लोगों पर कुछ भी ज़ुल्म नहीं करता मगर लोग खुद अपने ऊपर (अपनी करतूत से) जुल्म किया करते है (44)
और जिस दिन ख़़ुदा इन लोगों को (अपनी बारगाह में) जमा करेगा तो गोया ये लोग (समझेगें कि दुनिया में) बस घड़ी दिन भर ठहरे और आपस में एक दूसरे को पहचानेंगे जिन लोगों ने ख़ुदा की बारगाह में हाजि़र होने को झुठलाया वह ज़रुर घाटे में हैं और हिदायत याफता न थे (45)
ऐ रसूल हम जिस जिस (अज़ाब) का उनसे वायदा कर चुके हैं उनमें से बाज़ ख़्वाहा तुम्हें दिखा दें या तुमको (पहले ही दुनिया से) उठा ले फिर (आखि़र) तो उन सबको हमारी तरफ लौटना ही है फिर जो कुछ ये लोग कर रहे हैं ख़ुदा तो उस पर गवाह ही है (46)
और हर उम्मत का ख़ास (एक) एक रसूल हुआ है फिर जब उनका रसूल (हमारी बारगाह में) आएगा तो उनके दरम्यिान इन्साफ़ के साथ फैसला कर दिया जाएगा और उन पर ज़र्रा बराबर ज़़ुल्म न किया जाएगा (47)
ये लोग कहा करते हैं कि अगर तुम सच्चे हो तो (आखि़र) ये (अज़ाब का वायदा) कब पूरा होगा (48)
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मै खुद अपने वास्ते नुकसान पर क़ादिर हूँ न नफा पर मगर जो ख़ुदा चाहे हर उम्मत (के रहने) का (उसके इल्म में) एक वक़्त मुक़र्रर है-जब उन का वक़्त आ जाता है तो न एक घड़ी पीछे हट सकती हैं और न आगे बढ़ सकते हैं (49)
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या तुम समझते हो कि अगर उसका अज़ाब तुम पर रात को या दिन को आ जाए तो (तुम क्या करोगे) फिर गुनाहगार लोग आखि़र काहे की जल्दी मचा रहे हैं (50)

20 अक्टूबर 2026

नारा हूँ ना , महिला हूँ ना, कर सकती हूँ , लड़ सकती हूँ , इस नारे को बुलंद करते हुए , देश भर में अपराध घटनाओ की सिटी कहे जाने वाले ,,कोटा शहर पुलिस अधीक्षक तेजस्वी गौतम , उनकी टीम ने ,, मुंबई में टाइगर श्रॉफ के हमलावरों को चुटकियों में पकड़ लिया ,, इस बहादुरी , समझदारी , बेस्ट पुलिसिंग के लिए निश्चित तोर पर वोह ,, उनकी टीम मुबारकबाद की हक़दार है , बधाई की पात्र है

नारा हूँ ना , महिला हूँ ना, कर सकती हूँ , लड़ सकती हूँ , इस नारे को बुलंद करते हुए , देश भर में अपराध घटनाओ की सिटी कहे जाने वाले ,,कोटा शहर पुलिस अधीक्षक तेजस्वी गौतम , उनकी टीम ने ,, मुंबई में टाइगर श्रॉफ के हमलावरों को चुटकियों में पकड़ लिया ,, इस बहादुरी , समझदारी , बेस्ट पुलिसिंग के लिए निश्चित तोर पर वोह ,, उनकी टीम मुबारकबाद की हक़दार है , बधाई की पात्र है ,, तेजस्वी गौतम पुलिस अधीक्षक के साथ साथ , ब्रेवो वूमेन ,,बहुमुखी प्रतिभा की धनी भी हैं , लेकिन कोटा की सियासत ने उन्हें कोटा में उलझा कर रख दिया , और वोह चाहकर भी बहुत कुछ प्रयासों के बावजूद भी क़ानून व्यवस्थाओं , ,ब्लाइंड मर्डर , सहित डकैती , लूट , अन्य गंभीर घटनाओं की परतें खोलने में उलझकर रह गयीं , चुनावों में भी उनकी स्थिति दबाव में रही , ,खेर फिर भी तेजस्वी गौतम ने बंधे हुए हाथों के बावजूद भी , कोटा के लिए बहुत कुछ करने का प्रयास किया ,, लेकिन यह टाइगर के हमलावरों की गिरफ्तारी निश्चित तोर पर , बढ़ी कार्यवाही है , क्योंकि यह गेंग जब ट्रेन में आई, तो बीच में कई स्टेशन पढ़ते है , चाहते तो उन्हें रास्ते में ही रोका जा सकता था , जो दूसरे लोग , रेलवे पुलिस नहीं कर सकी ,, खेर इस कामयाबी के लिए कोटा की पुलिसिंग का नाम रोशन हुआ है ,, तेजस्वी गौतम आई पी एस एक जाना माना नाम , स्मैक तस्करों के खिलाफ , नशीले पदार्थों के आदतन अपराधियों के खिलाफ ,, इनकी पुलिसिंग के क़िस्से सभी जानते है , लेकिन कोटा में ज़मीन जायदाद , रुपयों के लेनदेन , ठगी , साइबर ठगी , चाकूबाजी , गोलीबारी , फिर चुनाव जैसे मामलों के अलावा सियासी दबाव में ही वोह उलझ गईं , तेजस्वी गौतम डरी भी नहीं, दबी भी नहीं , लेकिन नौकरी तो नौकरी है , कोशिशों के बावजूद भी , नशामुक्ति और नशे के व्यापरियों के खिलाफ बढ़ा वृहद अभियान नहीं चला पाईं ,, महिला सुरक्षा , आत्म स्वावलम्बी , की कार्य योजनाएं भी नहीं चली , नशे के खिलाफ मोटिवेशनल नाटक ,, प्रहसन के ज़रीये कार्य्रकम नहीं हो सके , लेकिन फिर भी जो कुछ भी किया बेहतर किया ,, अब तो वोह , पदोन्नत होकड, डी आई जी हो गई है , केडर आते ही उनकी ससम्मान विदाई भी हो जायेगी , लेकिन कोटा में , कोटा के लोगों को अपराधों से बचाने के लिए नोजवानों को जानलेवा नशे से बचाने के लिए , स्मैक के आदतन लोगों द्वारा परिवार के परिवार तबाह करने , और मोहल्लों , गलियों में छूट पुट चोरी अपराध बचाने के लिए ,,,,,जो लोग हार्डकोर क्रिमिनल है , जो गवाहों को होस्टाइल करवाकर , ज़मानत ले लेते हैं , या फिर बरी हो जाते है , उन्हें सज़ा दिलवाने के लिए , अपंने नियंत्रण में विधिक पैरोकारों के साथ मिलकर उन्हें अंतिम समय तक हर हाल में सज़ा दिलवाने की जो उनकी कार्ययोजना थी , उसे वोह चाहकर भी पूरा नहीं कर पा रही हैं , क्योंकि सियासी दबाव तो है ही , होता भी है , लेकिन वोह इसे मैनेज कर लेती है , ,बस , कभी वी वी आई पी ड्यूटी , कभी मीटिंगे , कभी मेले , कभी ठेले , कभी बढ़ी दुर्घटनाएं , कभी बढ़ी घटनाएं ,, चुनाव वगेरा इन्हीं की क़ानून व्यवस्था ड्यूटियों में वोह , उनकी पुलिस टीम उलझ कर रह गई , और कोटा को नशा मुक्त करने, , आत्महत्या मुक्त करने ,, अपराध मुक्त करने , स्मैकचियों की आपराधिक घटनाओं से कोटा को मुक्त करने का उनका सपना , पूरी कोशिशों के बावजूद भी आधा अधूरा रहा , हालात यह हुए के पुलिस जवान नशे की तस्करी में पकड़े गए, शराब के नशे में महिला डॉक्टर से अभद्रता करते पकड़े गए, लेकिन हार्डकोर अपराधियों , आर्थिक अपराधियों , गवाह मांडोली ,, गवाह खरीद फरोख्त , के ज़रिये , मजिस्ट्रेट के समक्ष बयानों के बाद भी गवाह मुकर कर , होस्टाइल होकर, घटना से इंकार कर अपराधियों को बरी करवा रहे हैं , ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान देकर मुकरने वालों के खिलाफ भी वोह क़ानूनी कार्यवाही कर होस्टाइल होने वाले गवाहों में खौफ पैदा करना चाहती थी ,, होस्टाइल गवाह के बावजूद भी बेहतर अनुसंधान ,, बेहतर अनुसंधान के बाद , कोर्ट में बेहतर तरीके से पैरवी ,,बेहतर न्यायिक दृष्टांतों के साथ बहस करवाकर वोह हार्डकोर अपराधियों को सज़ा दिलवाना चाहती थीं, जिसके लिए उन्होंने कोशिशें भी कीं, लेकिन उनके ओहदे में बुलंदी , प्रमोशन तो हुआ , हार्डकोर अपराधियों को हर हाल में सज़ा दिलवाकर उन्हें सबक़ दिलाने , नशामुक्त कोटा , अपराध मुक्त कोटा का सपना, वोह पूरा करने की हर सम्भव कोशिशों के बावजूद भी सियासी दखल अंदाज़ी कहो , या अन्य कार्यों में व्यस्तता कहो , लेकिन बहुत कुछ करने के बावजूद भी बहुत कुछ नहीं कर पायीं ,, कोटा की जनता अभी भी उनसे अपेक्षा करती है , उनकी पदोन्नति के लिए दुआएं करती है , लेकिन कहते हैं ना लड़की हूँ, कर सकती हूँ , तो वोह डी आई जी पद पर जाने के पहले ,, एक बार फिर लेडी सिंघम बनकर अगर अपने सपनों को साकार करने की क्रियान्विति के प्रयासों के तहत , नशामुक्त कोटा ,, अपराध मुक्त कोटा, सियासी दखलंदाज़ी मुक्त ,कोटा ,, हार्डकोर अपराधियों को हर हाल में अदालत तक बेहतर पैरवी करवाकर सज़ा दिलवाने का जो उनका अभियान है, करें तो सही , कोटा की जनता उनके इन कार्यों में मददगार बनने के लिए पलक पावणे बिछा कर खडी है ,,, अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान 9829086339 

फिर वही ख़ुदा तो तुम्हारा सच्चा रब है फिर हक़ बात के बाद गुमराही के सिवा और क्या है फिर तुम कहाँ फिरे चले जा रहे हो

 ऐ रसूल तुम उने ज़रा पूछो तो कि तुम्हें आसमान व ज़मीन से कौन रोज़ी देता है या (तुम्हारे) कान और (तुम्हारी) आँखों का कौन मालिक है और कौन शख़्स मुर्दे से जि़न्दा को निकालता है और जि़न्दा से मुर्दे को निकालता है और हर अम्र (काम) का बन्दोबस्त कौन करता है तो फौरन बोल उठेंगे कि ख़ुदा (ऐ रसूल) तुम कहो तो क्या तुम इस पर भी (उससे) नहीं डरते हो (31)
फिर वही ख़ुदा तो तुम्हारा सच्चा रब है फिर हक़ बात के बाद गुमराही के सिवा और क्या है फिर तुम कहाँ फिरे चले जा रहे हो (32)

ये तुम्हारे परवरदिगार की बात बदचलन लोगों पर साबित होकर रही कि ये लोग हरगिज़ इमान न लाएँगें (33)
(ऐ रसूल) उनसे पूछो तो कि तुम ने जिन लोगों को (ख़ुदा का) शररीक बनाया है कोई भी ऐसा है जो मख़लूकात को पहली बार पैदा करे फिर उन को (मरने के बाद) दोबारा जि़न्दा करे (तो क्या जवाब देगें) तुम्ही कहो कि ख़ुदा ही पहले भी पैदा करता है फिर वही दोबारा जि़न्दा करता है तो किधर तुम उल्टे जा रहे हो (34)
(ऐ रसूल उनसे) कहो तो कि तुम्हारे (बनाए हुए) शरीकों में से कोई ऐसा भी है जो तुम्हें (दीन) हक़ की राह दिखा सके तुम ही कह दो कि (ख़ुदा) दीन की राह दिखाता है तो जो तुम्हे दीने हक़ की राह दिखाता है क्या वह ज़्यादा हक़दार है कि उसके हुक्म की पैरवी की जाए या वह शख़्स जो (दूसरे) की हिदायत तो दर किनार खुद ही जब तक दूसरा उसको राह न दिखाए राह नही देख पाता तो तुम लोगों को क्या हो गया है (35)
तुम कैसे हुक्म लगाते हो और उनमें के अक्सर तो बस अपने गुमान पर चलते हैं (हालाकि) गुमान यक़ीन के मुक़ाबले में हरगिज़ कुछ भी काम नहीं आ सकता बेषक वह लोग जो कुछ (भी) कर रहे हैं खुदा उसे खूब जानता है (36)
और ये कुरान ऐसा नहीं कि खुदा के सिवा कोई और अपनी तरफ से झूठ मूठ बना डाले बल्कि (ये तो) जो (किताबें) पहले की उसके सामने मौजूद हैं उसकी तसदीक़ और (उन) किताबों की तफ़सील है उसमें कुछ भी शक नहीं कि ये सारे जहाँन के परवरदिगार की तरफ से है (37)
क्या ये लोग कहते हैं कि इसको रसूल ने खुद झूठ मूठ बना लिया है (ऐ रसूल) तुम कहो कि (अच्छा) तो तुम अगर (अपने दावे में) सच्चे हो तो (भला) एक ही सूरा उसके बराबर का बना लाओ और ख़ुदा के सिवा जिसको तुम्हें (मदद के वास्ते) बुलाते बन पड़े बुला लो (38)
(ये लोग लाते तो क्या) बल्कि (उलटे) जिसके जानने पर उनका हाथ न पहुँचा हो लगे उसको झुठलाने हालाकि अभी तक उनके जे़हन में उसके मायने नहीं आए इसी तरह उन लोगों ने भी झुठलाया था जो उनसे पहले थे-तब ज़रा ग़ौर तो करो कि (उन) ज़ालिमों का क्या (बुरा) अन्जाम हुआ (39)
और उनमें से बाज़ तो ऐसे है कि इस कु़रान पर आइन्दा ईमान लाएगें और बाज़ ऐसे हैं जो ईमान लाएगें ही नहीं (40)

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