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15 अक्टूबर 2026

शाइन इंडिया के सहयोग से बूँदी,बारां में संपन्न हुए नेत्रदान

 शाइन इंडिया के सहयोग से बूँदी,बारां में संपन्न हुए नेत्रदान ।
2. कोटा की टीम ने,बूंदी और बारां में लिए नेत्रदान

गुरुवार सुबह संस्था शाइन इंडिया फाउंडेशन के कापरेन निवासी ज्योति मित्र ललित कुमार टेलर (नेशनल प्रोजेक्ट सेक्रेटरी-भारत विकास परिषद) ने सूचना दी कि, परिषद के पूर्व शाखा सचिव अविनाश दीक्षित की माँ आशा दीक्षित , पत्नी श्री रामजी लाल शर्मा का आकस्मिक निधन हुआ है और परिजनों से संपर्क करने के बाद,सभी ने नेत्रदान के लिए सहमति दे दी है ।

सूचना मिलते ही डॉ कुलवंत गौड़, स्वयं नेत्र संकलन वाहिनी ज्योति रथ लेकर, कापरेन के लिए रवाना हुए और परिवार की सभी सदस्यों के बीच में नेत्रदान की प्रक्रिया संपन्न की, डॉ गौड़ ने बताया कि,यह कापरेन क्षेत्र का 6 नेत्रदान है।

बारां में परम्परा बना नेत्रदान

कापरेन के नेत्रदान के ठीक बाद, बाराँ के ज्योति मित्र हितेश बत्रा डॉ कुलवंत गौड़ को सूचना दी की, 10 महापूर्व अनंत विहार,कोटा रोड, बारां निवासी मोहिनी देवी के नेत्रदान के बाद आज उनके पति दानमल गालव का भी देहांत हुआ है । बेटे किशन और अरविंद गालव,अपनी नेत्रदान माता जी के समान ही अपने पिता का नेत्रदान करवाना चाहते हैं ।

सूचना आते ही, डॉ गौड़ पुनः नेत्रदान के लिए कोटा से ज्योति रथ लेकर रवाना हुए। तय समय पर परिजनों के बीच डॉ गौड़ ने दिवंगत दानमल जी के नेत्र संकलित किये । नेत्रदान के इस पुनीत कार्य मे,बारां शहर संयोजक हितेश खंडेलवाल का भी सहयोग रहा

नवरात्रि वर्ष में दो होती है एक आश्विन मास की शुक्ला प्रतिपदा से आरंभ होकर नवमी तक रहती है ।

 

नवरात्रि पर्व मनुष्य में दैवीय गुणों के विकास का अनुष्ठान है।यही समय ग्रामीण जीवन में कठोर श्रम करने का भाद्रपद अश्विन की धूप में काम करके तपस्या की तरह व्यतीत करने का होता है। इन दिनों ग्रामीणों के द्वारा खेतों में कठोर श्रम करने से मन की मलीनता, द्वेष भाव मानसिक द्वंद पसीने के साथ बह जाते है, तो वही शहरियों के आध्यात्मिक कर्म कांड के मनुष्य को उपवास व्रत अनुष्ठान करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है।
नवरात्रि वर्ष में दो होती है एक आश्विन मास की शुक्ला प्रतिपदा से आरंभ होकर नवमी तक रहती है ।
दूसरी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होकर नवमी तक रहती है ।पहले को शारदीय नवरात्र और दूसरे को बासंती नवरात्र इन नवरात्रि के दिनों में मनुष्य को आध्यात्मिक उपासना और साधना करना अधिक लाभप्रद होता है ।
आध्यात्मिक जीवन में यश संपदा पुत्र आयु की वृद्धि के लिए देवी के पूजन का विशेष महत्व है।
प्राचीन काल के मनुष्य देवता हुआ करते थे ।देवताओं को असुर राक्षस प्रवृत्ति के लोग परेशान किया करते थे। विकट परिस्थितियों में देवता लोग राक्षसों का अंत करने के लिए दैवीय क्रियाकलाप किया करते थे उनमें से एक पुराना आख्यान है महिषासुर मर्दिनी देवी शक्ति ।
अर्थात सामूहिक जनशक्ति को ही देवीय सामुहिक शक्ति माना गया था।
यही शक्ति राक्षसों को समाप्त करने में सक्षम और सिद्ध हुई थी।
इसलिए आज भी नवरात्रों में सामूहिक हनुमान चालीसा सप्तशती पाठ का देवस्थानों पर आयोजन किया जाता है ।
पावस ऋतु में बरसात होने पर जमीन पर वायुमंडल में कई प्रकार के कीट पतंगे कृमी पैदा हो जाते हैं जो मनुष्य व जीव मात्र के लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक भी सिद्ध होते हैं। इन्हीं हानिकारक तत्वों को समूल नष्ट करने के लिए ,यज्ञ हवन आदि की उपचार व्यवस्थाएं इन दिनों विशेष कर होती है जिससे वायुमंडल वातावरण भी शुद्ध होता है।
वर्तमान में मनुष्य देव कर्तव्यों से निम्न स्तर पर आ चुका है वायुमंडल और पृथ्वी पर या यूं कहें पंच तत्वों में अशुद्ध गंदगी बढ़ जाने के कारण स्वच्छता और शुद्धता का वातावरण बनाने के लिए इन आयोजनो का विशेष महत्व हो जाता है।
विद्वानो ,पंडितों ने सामान्य जन जीवन पर इसका प्रभाव स्थाई बना रहे इसलिए अपनी क्रियाकलाप तेज कर दिए जाते हैं।यही नहीं ऐसे कार्यक्रम मनुष्य के जीवन यापन के साधन भी बन गये है।
अखंड भारत भूमि की संस्कृति त्योहार जनजीवन और जीवन यापन के संसाधन सभी को देखते हुए भाद्रपद मास से आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तक जन चेतना जगाने प्रस्फुटित करने में नवरात्रि उपयुक्त व समर्थ समय है।
इन्हीं दिनों गरबा की भी धूम हिंदी भाषी गुजरात पंजाब मध्य प्रदेश महाराष्ट्र हर राज्य में होने लगी है। जनजीवन को धर्ममय और कर्म मय करने का मानवीय मूल्यों की उपासना ,स्वयं के देह की इन्द्रिय को साधना और देवीय तत्वों की आराधना का यही समय होता है।
यही दिन खेती-बाड़ी की फसलों को सवारने तैयार करने के विशेष दिन होते हैं।
इन्ही दिनो फसल काटने के दिन भी होते हैं। खरीफ की फसल खेतों में पक जाती है और रबी की फसल बोने का समय होता है।
इसी समय छात्रों की अर्धवार्षिक परीक्षाएं भी होती है।
तत्पश्चात कार्तिक में दशहरा और राष्ट्रीय पर्व दीपावली आ जाते हैं ।
अन्नदाता को इन दिनों सबसे ज्यादा श्रम साधना करनी पड़ती है सबसे ज्यादा कठोर श्रम इन दोनों अन्नदाता किसान का परिवार ही करता है, शेष परिवार समाज शहरी लोग किसान के अन्न-धन खाद्यान्न गल्ले की इंतजार में रहते हैं ।
ग्रामीण छात्र परीक्षा की तैयारी में जुटे होते हैं और इन्हीं दिनों ग्रामीण लोग दीपावली की तैयारी में अपने आवास मकान की साफ सफाई में अपना समय देते हैं ऐसे काम के समय की भरमार और त्योहारों का आना जनजीवन को क्षण भर की भी फुर्सत नहीं लेने देते।
भारतीय कृषक जीवन विशेष कर यह दिखलाता है कि खेती पशुपालन सब्जी उगाना जैसे मेहनती काम खेतिहर मजदूर किसान का परिवार करता है और शहर के व्यापारी शहरी व्यवस्था के अनुसार इन खेती वालो की फसल पर अपने कारोबार के लिए आश्रित होते हैं तथा धंधे के इंतजार में रहता है।
मंडी में फसल आती है तब ही आडतिये दलाल, हमाल,ठेले वालो का व्यवसाय शुरू होता है।
व्यवस्था की यह बड़ी विडंबना है इस देश में कि खाद बीज उर्वरक को लेने के लिए किसान बैंक लोन, के.सी.सी. हर बिंदु पर हर प्लेटफार्म पर कृषक के साथ ठगी रिश्वतखोरी छल होता है। समाज वर्तमान में भी किसान खेतिहर लघु किसान किसान का परिवार उनके बच्चे की शिक्षा सुविधा की व्यवस्था में भारी अंतर देखा जाता है।
शहरी लोगों के बच्चों के तुलना में देखा जाए तो ऐसी सुविधा ग्रामीण बच्चों को उपलब्ध मिलती ही नहीं।
न खेल के मैदान, ना कोई मोटिवेशन के लिए कोचिंग व्यवस्था, इन सबसे ग्रामीण बच्चों को अभाव और समझौते पर अपनी पढ़ाई करनी होती हैं। यह विचारणीय यक्ष प्रश्न है समाज के प्रबुद्ध वर्ग और प्रशासन के मध्य।
शहरी और ग्रामीण बच्चों के बीच में अभी भी असमानता देखने को मिलती है मसलन बिजली पानी की समस्याएं आज भी पीछा नहीं छोड़ रही ।
शहर में बिजली पर्याप्त समय पर मिलती है ग्रामीण क्षेत्र में इसका समय पर नहीं आना शैक्षणिक व्यवस्था में व्यावधान करता है।
ऐसी स्थिति में भी ग्रामीण जीवन श्रमिक कृषक भरपूर मेहनत करते हैं और करीब की फल को तैयार करते हैं घर आवास साफ सफाई स्वच्छता रखते हैं ।पशुधन को संवारते हैं नहलाते हैं।
दूध दही क्खन घी शहर को पहुंचाते हैं। इस ग्रामीण जीवन की यही आराधना साधना, उपासना से कम नहीं आंकी जानी चाहिए। यह श्रम साथी कठोर श्रम आश्विन मास की नवरात्र की उपासना से काम नहीं माना जाना चाहिए
रहा था
क्या यह असामानता कभी खत्म होगी! फिर भी ग्रामीण
जीवन धन्य है । किसी भी प्रकार से अपने श्रम और व्यवस्था में अपने कार्य में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं होने देता। अपनी व्यवस्था अनुसार दूध सब्जी और अन्य सामान शहर को प्रतिदिन पहुंचता हैं।
कहां गया "मन के हारे हार मन के जीते जीत"
"कठौती में गंगा तो मन चंगा "
मनुष्य का सीधा संबंध मन से है। मन यदि विकृत है तो मनुष्य का जीवन कठिनाइयों से भरा होता है मन यदि अनुकूल सधा हुआ है, संस्कृत निष्ठ है, तो मनुष्य का जीवन सर्वश्रेष्ठ, संस्कृति से परिपूर्ण है।
यही जज्बा नवरात्री के दिनों की साधना उपासना और देवीय गुणों की आराधना प्राणी मात्र तथा मनुष्य जाति की विकास और संस्कृति की उन्नति को दिखाता हैं।
हां जो भाई बहन समर्थ नहीं हैं,श्रम पसीने के कठोर श्रम के कार्यों से जिन्हें समय ही नहीं मिलता वह इस संस्कृति संस्कार संसार में अमृत पान करने के बजाय पिस रहे हैं।
इनको देखने वाला,सुनने वाला,समय पर मदद सहयोग करने वाला कोई नहीं सिवाय ईश्वर, व अपने ईमान के।
कभी बिजली गुल, कभी पानी नहीं,कभी समय पर श्रम नहीं,वेतन तक समय पर नहीं,कभी तारीख पर तारीख, यह दिखाने के लिए पर्याप्त है।
होना यह चाहिए कि श्रमजीवी समाज, ग्रामीण तो वैसे ही कर्मयोगी हैं,इनको सब सुविधाए होना चाहिए जो शहरियों को मिल रही है। पहुंच वालो को मिल रही है।
समान कार्य का समान वेतन सिर्फ कागज़ में है,नियमों,कानून में है, धरातल फील्ड में नहीं है।
समय पर सुविधाए ऐसे लोगो को नहीं मिल रही है जो दैनिक श्रमिक हैं,हम्माल, ठेले वाला,रेहड़ी वाला,सब्जी वाला,संविदा पर ड्यूटी वाला है। अभीतक इनका शौषण अधिकारियों की लापरवाही से हो रहा है, जब कि देश के असली हीरो यही हैं।
स्वस्ति..
रसीला रचनाकार
मोहन वर्मा झालावाड़
अप्रकाशित स्वरचित


(ये लोग) तौबा करने वाले इबादत गुज़ार (ख़़ुदा की) हम्दो सना (तारीफ़) करने वाले (उस की राह में) सफर करने वाले रूकूउ करने वाले सजदा करने वाले नेक काम का हुक्म करने वाले और बुरे काम से रोकने वाले और ख़ुदा की (मुक़र्रर की हुयी) हदो को निगाह रखने वाले हैं और (ऐ रसूल) उन मोमिनीन को (बेहिष्त की) ख़ुषख़बरी दे दो

 इसमें तो शक ही नहीं कि ख़ुदा ने मोमिनीन से उनकी जानें और उनके माल इस बात पर ख़रीद लिए हैं कि (उनकी क़ीमत) उनके लिए बेहष्त है (इसी वजह से) ये लोग ख़़ुदा की राह में लड़ते हैं तो (कुफ़्फ़ार को) मारते हैं और ख़ुद (भी) मारे जाते हैं (ये) पक्का वायदा है (जिसका पूरा करना) ख़़ुदा पर लाजि़म है और ऐसा पक्का है कि तौरैत और इन्जील और क़ुरान (सब) में (लिखा हुआ है) और अपने एहद का पूरा करने वाला ख़़ुदा से बढ़कर कौन है तुम तो अपनी ख़रीद फरोख़्त से जो तुमने ख़़ुदा से की है खुषियाँ मनाओ यही तो बड़ी कामयाबी है (111)
(ये लोग) तौबा करने वाले इबादत गुज़ार (ख़़ुदा की) हम्दो सना (तारीफ़) करने वाले (उस की राह में) सफर करने वाले रूकूउ करने वाले सजदा करने वाले नेक काम का हुक्म करने वाले और बुरे काम से रोकने वाले और ख़ुदा की (मुक़र्रर की हुयी) हदो को निगाह रखने वाले हैं और (ऐ रसूल) उन मोमिनीन को (बेहिष्त की) ख़ुषख़बरी दे दो (112)
नबी और मोमिनीन पर जब ज़ाहिर हो चुका कि मुशरेकीन जहन्नुमी है तो उसके बाद मुनासिब नहीं कि उनके लिए मग़फिरत की दुआए माँगें अगरचे वह मुशरेकीन उनके क़राबतदार हो (क्यों न) हो (113)
और इबराहीम का अपने बाप के लिए मग़फिरत की दुआ माँगना सिर्फ इस वायदे की वजह से था जो उन्होंने अपने बाप से कर लिया था फिर जब उनको मालूम हो गया कि वह यक़ीनी ख़़ुदा का दुश्मन है तो उससे बेज़ार हो गए, बेशक इबराहीम यक़ीनन बड़े दर्दमन्द बुर्दबार (सहन करने वाले) थे (114)
ख़़ुदा की ये शान नहीं कि किसी क़ौम को जब उनकी हिदायत कर चुका हो उसके बाद बेशक ख़़ुदा उन्हें गुमराह कर दे हता (यहां तक) कि वह उन्हीं चीज़ों को बता दे जिससे वह परहेज़ करें बेशक ख़ुदा हर चीज़ से (वाकि़फ है) (115)
इसमें तो शक ही नहीं कि सारे आसमान व ज़मीन की हुकूमत ख़़ुदा ही के लिए ख़ास है वही (जिसे चाहे) जिलाता है और (जिसे चाहे) मारता है और तुम लोगों का ख़़ुदा के सिवा न कोई सरपरस्त है न मददगार (116)
अलबत्ता ख़़ुदा ने नबी और उन मुहाजिरीन अन्सार पर बड़ा फज़ल किया जिन्होंने तंगदस्ती के वक़्त रसूल का साथ दिया और वह भी उसके बाद कि क़रीब था कि उनमे से कुछ लोगों के दिल जगमगा जाएँ फिर ख़ुदा ने उन पर (भी) फज़ल किया इसमें शक नहीं कि वह उन लोगों पर पड़ा तरस खाने वाला मेहरबान है (117)
और उन यमीमों पर (भी फज़ल किया) जो (जिहाद से पीछे रह गए थे और उन पर सख़्ती की गई) यहाँ तक कि ज़मीन बावजूद उस वसअत (फैलाव) के उन पर तंग हो गई और उनकी जानें (तक) उन पर तंग हो गई और उन लोगों ने समझ लिया कि ख़़ुदा के सिवा और कहीं पनाह की जगह नहीं फिर ख़़ुदा ने उनको तौबा की तौफीक दी ताकि वह (ख़़ुदा की तरफ) रूजू करें बेशक ख़़ुदा ही बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान है (118)
ऐ ईमानदारों ख़़ुदा से डरो और सच्चों के साथ हो जाओ (119)
मदीने के रहने वालों और उनके गिर्दोनवा (आस पास) देहातियों को ये जायज़ न था कि रसूल ख़़ुदा का साथ छोड़ दें और न ये (जायज़ था) कि रसूल की जान से बेपरवा होकर अपनी जानों के बचाने की फ्रिक करें ये हुक्म उसी सब्ब से था कि उन (जिहाद करने वालों) को ख़़ुदा की रूह में जो तकलीफ़ प्यास की या मेहनत या भूख की षिद्दत की पहुँचती है या ऐसी राह चलते हैं जो कुफ़्फ़ार के ग़ैज़ (ग़ज़ब का बाइस हो या किसी दुष्मन से कुछ ये लोग हासिल करते हैं तो बस उसके ऐवज़ में (उनके नामए अमल में) एक नेक काम लिख दिया जाएगा बेशक ख़ुदा नेकी करने वालों का अज्र (व सवाब) बरबाद नहीं करता है (120)

14 अक्टूबर 2026

राजस्थान से गुजरात तक पहुँचा अंगदान जागरूकता का कारवाँ, शाइन इंडिया फाउंडेशन ने बढ़ाए कदम

राजस्थान से गुजरात तक पहुँचा अंगदान जागरूकता का कारवाँ, शाइन इंडिया फाउंडेशन ने बढ़ाए कदम
2. गुजरात के विश्वविद्यालयों में अंगदान का विशेष सत्र आयोजित,कोटा के डॉ कुलवंत गौड़ मुख्य वक्ता


कोटा

अंगदान किसी जरूरतमंद व्यक्ति को नया जीवन देने का माध्यम ही नहीं, बल्कि मानवता, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का सर्वोच्च उदाहरण भी है। इसी संदेश को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से शाइन इंडिया फाउंडेशन ने अपने राष्ट्रीय अंगदान जागरूकता अभियान का विस्तार राजस्थान से गुजरात तक किया है। इस अभियान के अंतर्गत गुजरात के वडोदरा और वापी में दो दिवसीय विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें  शिक्षण संस्थाओं के विद्यार्थियों, प्राध्यापकों एवं शिक्षाविदों को अंगदान और नेत्रदान के महत्व की विस्तृत जानकारी दी गई।

इन कार्यक्रमों में शाइन इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक एवं प्रमुख वक्ता डॉ. कुलवंत गौड़ (कोटा) ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए अंगदान को जीवन बचाने वाला महादान बताया। उन्होंने समझाया कि मृत्यु के बाद भी व्यक्ति अपने अंगों के माध्यम से कई जरूरतमंद लोगों के जीवन में नई उम्मीद जगा सकता है। विद्यार्थियों को अंगदान की प्रक्रिया, इसकी उपयोगिता, चिकित्सकीय पहलुओं तथा समाज में प्रचलित भ्रांतियों के बारे में तथ्यात्मक जानकारी दी गई और उनके सवालों के जवाब देकर शंकाओं का समाधान किया गया।

देश में हजारों नहीं, लाखों लोगों को है अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता

डॉ. गौड़ ने बताया कि भारत में अंगदान की आवश्यकता और उपलब्ध अंगों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। राजस्थान सरकार के स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (SOTTO) के अनुसार, देश में प्रतिवर्ष अनुमानित रूप से लगभग 2.50 लाख लोगों को किडनी, 80 हजार लोगों को लिवर और 50 हजार लोगों को हृदय प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है।  वहीं, भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, 3 मार्च 2026 तक देश में प्रमुख अंगों के प्रत्यारोपण के लिए पंजीकृत प्रतीक्षा सूची में 89,839 मरीज शामिल थे।


दो दिवसीय अभियान के अंतर्गत वडोदरा स्थित धर्मसिंह देसाई यूनिवर्सिटी की टेक्नोलॉजी एवं फार्मेसी फैकल्टी में विद्यार्थियों के लिए अलग-अलग विशेष सत्र आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों के आयोजन में विश्वविद्यालय की प्रोफेसर श्वेता गौड़ का महत्वपूर्ण सहयोग रहा।

सत्रों के दौरान विद्यार्थियों को बताया गया कि अंगदान और नेत्रदान केवल चिकित्सकीय विषय नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और मानवीय मूल्यों से जुड़ा अभियान है। युवा पीढ़ी इस संदेश को अपने परिवारों, मित्रों और समाज तक पहुँचाकर व्यापक परिवर्तन की वाहक बन सकती है।

इसी क्रम में वापी के केबीएस कॉलेज तथा रज्जू श्रॉफ रॉफेल यूनिवर्सिटी के मैनेजमेंट स्टडीज इंस्टीट्यूट में भी विशेष जागरूकता सत्र आयोजित किए गए।

इन कार्यक्रमों को सफल बनाने में शाइन इंडिया फाउंडेशन की गुजरात स्टेट कोऑर्डिनेटर अनीता नरूका तथा ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर जिगिशा यादव का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। स्थानीय स्तर पर समन्वय, शिक्षण संस्थानों से संपर्क तथा कार्यक्रमों के आयोजन में उनके प्रयासों ने अभियान को गुजरात में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


कार्यशालाओं के उत्कृष्ट आयोजन एवं अंगदान जागरूकता के क्षेत्र में योगदान के लिए डॉ. कुलवंत गौड़ को धर्मसिंह देसाई यूनिवर्सिटी की ओर से डीन डॉ. तेजल सोनी एवं डीन डॉ. विपुल शाह, केबीएस कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. पूनम चौहान तथा रज्जू श्रॉफ रॉफेल यूनिवर्सिटी के मैनेजमेंट की ओर से डॉ. गौड़ को सम्मान प्रदान किया गया।

कार्यशाला के आयोजन में रोटरी क्लब रिवर फ्रंट, वापी का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा। क्लब अध्यक्ष अर्पण ताचक एवं क्लब सर्विस डायरेक्टर मनीष भावसार ने शाइन इंडिया फाउंडेशन के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए ऐसे कार्यक्रम समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शाइन इंडिया फाउंडेशन की सचिव डॉ. संगीता गौड़ ने बताया कि संस्था लंबे समय से अंगदान एवं नेत्रदान जागरूकता के क्षेत्र में निरंतर कार्य कर रही है। अब इस अभियान को राजस्थान से आगे बढ़ाते हुए गुजरात सहित अन्य राज्यों के प्रमुख शहरों तक पहुँचाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। 

और (मुसलमानों) तुम्हारे एतराफ़ (आस पास) के गॅवार देहातियों में से बाज़ मुनाफिक़ (भी) हैं और ख़ुद मदीने के रहने वालों मे से भी (बाज़ मुनाफिक़ हैं) जो निफ़ाक पर अड़ गए हैं (ऐ रसूल) तुम उन को नहीं जानते (मगर) हम उनको (ख़ूब) जानते हैं अनक़रीब हम (दुनिया में) उनकी दोहरी सज़ा करेगें फिर ये लोग (क़यामत में) एक बड़े अज़ाब की तरफ लौटाए जाएगें

 और (मुसलमानों) तुम्हारे एतराफ़ (आस पास) के गॅवार देहातियों में से बाज़ मुनाफिक़ (भी) हैं और ख़ुद मदीने के रहने वालों मे से भी (बाज़ मुनाफिक़ हैं) जो निफ़ाक पर अड़ गए हैं (ऐ रसूल) तुम उन को नहीं जानते (मगर) हम उनको (ख़ूब) जानते हैं अनक़रीब हम (दुनिया में) उनकी दोहरी सज़ा करेगें फिर ये लोग (क़यामत में) एक बड़े अज़ाब की तरफ लौटाए जाएगें (101)
और कुछ लोग हैं जिन्होंने अपने गुनाहों का (तो) एकरार किया (मगर) उन लोगों ने भले काम को और कुछ बुरे काम को मिला जुला (कर गोलमाल) कर दिया क़रीब है कि ख़़ुदा उनकी तौबा कु़बूल करे (क्योंकि) ख़़ुदा तो यक़ीनी बड़ा बख़्षने वाला मेहरबान हैं (102)
(ऐ रसूल) तुम उनके माल की ज़कात लो (और) इसकी बदौलत उनको (गुनाहो से) पाक साफ करों और उनके वास्ते दुआए ख़ैर करो क्योंकि तुम्हारी दुआ इन लोगों के हक़ में इत्मेनान (का बाइस है) और ख़़ुदा तो (सब कुछ) सुनता (और) जानता है (103)
क्या इन लोगों ने इतने भी नहीं जाना यक़ीनन ख़़ुदा बन्दों की तौबा क़़ुबूल करता है और वही ख़ैरातें (भी) लेता है और इसमें शक नहीं कि वही तौबा का बड़ा कु़बूल करने वाला मेहरबान है (104)
और (ऐ रसूल) तुम कह दो कि तुम लोग अपने अपने काम किए जाओ अभी तो ख़़ुदा और उसका रसूल और मोमिनीन तुम्हारे कामों को देखेगें और बहुत जल्द (क़यामत में) ज़ाहिर व बातिन के जानने वाले (ख़ुदा) की तरफ लौटाए जाएगें तब वह जो कुछ भी तुम करते थे तुम्हें बता देगा (105)
और कुछ लोग हैं जो हुक्मे ख़़ुदा के उम्मीदवार किए गए हैं (उसको अख़्तेयार है) ख़्वाह उन पर अज़ाब करे या उन पर मेहरबानी करे और ख़़ुदा (तो) बड़ा वाकिफकार हिकमत वाला है (106)
और (वह लोग भी मुनाफिक़ हैं) जिन्होने (मुसलमानों के) नुकसान पहुचाने और कुफ्ऱ करने वाले और मोमिनीन के दरम्यिान तफरक़ा (फूट) डालते और उस शख़्स की घात में बैठने के वास्ते मस्जिद बनाकर खड़ी की है जो ख़ुदा और उसके रसूल से पहले लड़ चुका है (और लुत्फ़ तो ये है कि) ज़रूर क़समें खाएगें कि हमने भलाई के सिवा कुछ और इरादा ही नहीं किया और ख़़ुदा ख़ुद गवाही देता है (107)
ये लोग यक़ीनन झूठे है (ऐ रसूल) तुम इस (मस्जिद) में कभी खड़े भी न होना वह मस्जिद जिसकी बुनियाद अव्वल रोज़ से परहेज़गारी पर रखी गई है वह ज़रूर उसकी ज़्यादा हक़दार है कि तुम उसमें खडे़ होकर (नमाज़ पढ़ो क्योंकि) उसमें वह लोग हैं जो पाक व पाकीज़ा रहने को पसन्द करते हैं और ख़ुदा भी पाक व पाकीज़ा रहने वालों को दोस्त रखता है (108)
क्या जिस शख़्स ने ख़़ुदा के ख़ौफ और ख़ुशनूदी पर अपनी इमारत की बुनियाद डाली हो वह ज़्यादा अच्छा है या वह शख़्स जिसने अपनी इमारत की बुनियाद इस बोदे किनारे के लब पर रखी हो जिसमें दरार पड़ चुकी हो और अगर वह चाहता हो फिर उसे ले दे के जहन्नुम की आग में फट पडे़ और ख़ुदा ज़ालिम लोगों को मंजि़लें मक़सूद तक नहीं पहुचाया करता (109)
(ये इमारत की) बुनियाद जो उन लोगों ने क़ायम की उसके सबब से उनके दिलो में हमेषा धरपकड़ रहेगी यहाँ तक कि उनके दिलों के परख़चे उड़ जाएँ और ख़़ुदा तो बड़ा वाकि़फकार हकीम हैं (110)

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