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22 अक्टूबर 2026

अशफाक़-बिस्मिल: आज़ादी की लड़ाई में एकता की मिसाल

 अशफाक़-बिस्मिल: आज़ादी की लड़ाई में एकता की मिसाल
कोटा आज विज्ञान नगर स्थित एक निजी शिक्षण संस्थान वाई, जी, एन इंस्टीट्यूट में अमर शहीद अशफाकउल्लाह खान का जन्म दिन मनाया गया। इस अवसर पर बोलते हुए उम्मीद एक सेवा संस्था के अध्यक्ष डॉ. रियाज़ खान ने बताया कि, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल संघर्ष और बलिदान की गाथा नहीं है, बल्कि यह उस भारत की तस्वीर भी पेश करता है जिसमें धर्म और मजहब से ऊपर उठकर देश की आज़ादी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। शहीद अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ और राम प्रसाद बिस्मिल की दोस्ती इसी भावना का एक ऐतिहासिक उदाहरण है।
22 अक्टूबर 1900 को शाहजहाँपुर में जन्मे अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ युवावस्था में ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ गए। वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बने। इसी संगठन के माध्यम से उनकी निकटता राम प्रसाद बिस्मिल से हुई। दोनों की विचारधारा और धार्मिक पृष्ठभूमि अलग थी, लेकिन देश की स्वतंत्रता का लक्ष्य दोनों को एक सूत्र में बांधता था।
इस अवसर पर बोलते हुए ए एम पी कोटा प्रभारी सिराज अहमद अंसारी ने कहा कि, 9 अगस्त 1925 का काकोरी ट्रेन एक्शन भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की महत्वपूर्ण घटना बना। इस कार्रवाई के बाद अंग्रेजी सरकार ने क्रांतिकारियों पर शिकंजा कस दिया। अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ को गिरफ्तार किया गया और काकोरी षड्यंत्र मामले में उन्हें मृत्युदंड सुनाया गया।
19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद जेल में अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ को फाँसी दे दी गई। उसी दिन राम प्रसाद बिस्मिल और रोशन सिंह को भी फाँसी दी गई। तीनों ने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर किए।
अशफाक़ और बिस्मिल की मित्रता आज भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन की ताकत केवल हथियार या संगठन नहीं थे, बल्कि साझा राष्ट्रीय उद्देश्य भी था। वाई जी एन इंस्टीट्यूट के निदेशक अरशद अंसारी ने कहा कि, एक मुसलमान क्रांतिकारी अशफाक़ और एक हिंदू क्रांतिकारी बिस्मिल का साथ उस दौर में एक ऐसा संदेश था जिसे अंग्रेजी शासन की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के संदर्भ में भी देखा जाता है।
अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ शायर भी थे। उनकी रचनाओं में वतन से मोहब्बत और बलिदान की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। उनका जीवन इस बात की याद दिलाता है कि आज़ादी केवल किसी एक समुदाय की उपलब्धि नहीं थी; इसके लिए भारत के अलग-अलग धर्मों और वर्गों के लोगों ने साथ मिलकर संघर्ष किया था।
कार्यक्रम का संचालन नूर अहमद पठान ने किया। उन्होंने कहा कि, आज जब हम स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को याद करते हैं, तो अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ और राम प्रसाद बिस्मिल की दोस्ती केवल अतीत का एक अध्याय नहीं रह जाती। यह उस साझा भारतीय विरासत की याद दिलाती है जिसमें देश पहले था और बाकी पहचानें उसके बाद।
अशफाक़ उल्लाह ख़ाँ का बलिदान इसलिए अमर है कि उन्होंने अपने जीवन से यह साबित किया कि वतन की मोहब्बत किसी मजहब की मोहताज नहीं होती।
सादर प्रकाशनार्थ
दैनिक....
सद्भावी
नूर अहमद पठान
मो. 9571310137

फिर क्या जब (तुम पर) आ चुकेगा तब उस पर इमान लाओगे (आहा) क्या अब (इमान लाए) हालाकि तुम तो इसकी जल्दी मचाया करते थे

 फिर क्या जब (तुम पर) आ चुकेगा तब उस पर इमान लाओगे (आहा) क्या अब (इमान लाए) हालाकि तुम तो इसकी जल्दी मचाया करते थे (51)
फिर (क़यामत के दिन) ज़ालिम लोगों से कहा जाएगा कि (अब हमेशा के अज़ाब के मजे़ चखो (दुनिया में) जैसी तुम्हारी करतूतें तुम्हें (आखि़रत में) वैसा ही बदला दिया जाएगा (52)
(ऐ रसूल) तुम से लोग पूछतें हैं कि क्या (जो कुछ तुम कहते हो) वह सब ठीक है तुम कह दो (हाँ) अपने परवरदिगार की कसम ठीक है और तुम (ख़ुदा को) हरा नहीं सकते (53)
और (दुनिया में) जिस जिसने (हमारी नाफरमानी कर के) ज़ुल्म किया है (क़यामत के दिन) अगर तमाम ख़ज़ाने जो जमीन में हैं उसे मिल जाएँ तो अपने गुनाह के बदले ज़रुर फिदया दे निकले और जब वह लोग अज़ाब को देखेगें तो इज़हारे निदामत करेगें (शर्मिंदा होंगें) और उनमें बाहम इन्साफ़ के साथ हुक्म दिया जाएगा और उन पर ज़र्रा (बराबर ज़ुल्म न किया जाएगा (54)
आगाह रहो कि जो कुछ आसमानों में और ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) ख़ुदा ही का है आग़ाह राहे कि ख़ुदा का वायदा यक़ीनी ठीक है मगर उनमें के अक्सर नहीं जानते हैं (55)
वही जि़न्दा करता है और वही मारता है और तुम सब के सब उसी की तरफ लौटाए जाओगें (56)
लोगों तुम्हारे पास तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से नसीहत (किताबे ख़़ुदा आ चुकी और जो (मरज़ शिर्क वगै़रह) दिल में हैं उनकी दवा और ईमान वालों के लिए हिदायत और रहमत (57)
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि (ये क़़ुरान) ख़़ुदा के फज़ल व करम और उसकी रहमत से तुमको मिला है (ही) तो उन लोगों को इस पर खुश होना चाहिए (58)
और जो कुछ वह जमा कर रहे हैं उससे कहीं बेहतर है (ऐ रसूल) तुम कह दो कि तुम्हारा क्या ख़्याल है कि ख़ुदा ने तुम पर रोज़ी नाजि़ल की तो अब उसमें से बाज़ को हराम बाज़ को हलाल बनाने लगे (ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या ख़ुदा ने तुम्हें इजाज़त दी है या तुम ख़ुदा पर बोहतान बाँधते हो (59)
और जो लोग ख़ुदा पर झूठ मूठ बोहतान बाधा करते हैं रोजे़ क़यामत का क्या ख़्याल करते हैं उसमें शक नहीं कि ख़़ुदा तो लोगों पर बड़ा फज़ल व (करम) है मगर उनमें से बहुतेरे शुक्र गुज़ार नहीं हैं (60)

21 अक्टूबर 2026

दिल्ली में पुलिसकर्मी द्वारा हमला एवं मारपीट, दिल्ली पुलिस द्वारा FIR दर्ज नहीं करने पर जयपुर में Zero FIR दर्ज कराने का विधिक अधिकार

 

दिल्ली में पुलिसकर्मी द्वारा हमला एवं मारपीट, दिल्ली पुलिस द्वारा FIR दर्ज नहीं करने पर जयपुर में Zero FIR दर्ज कराने का विधिक अधिकार
क्यों है, दिल्ली में पुलिसकर्मी द्वारा फरियादिया के साथ मारपीट किए जाने तथा दिल्ली के क्षेत्राधिकार वाले थाने में शिकायत देने के बावजूद FIR दर्ज नहीं किए जाने पर, जयपुर के किसी पुलिस थाने में Zero FIR दर्ज कराने का विधिक आधार उपलब्ध है, यदि शिकायत से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो केवल इस आधार पर FIR दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता कि घटना दिल्ली में हुई है और जयपुर पुलिस का क्षेत्राधिकार नहीं है, इसका प्रमुख आधार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173(1) है, इसके अतिरिक्त, उच्चतम न्यायालय के बाध्यकारी निर्णय भी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर FIR दर्ज करने के दायित्व को स्पष्ट करते हैं, संबंधित विधिक प्रावधान, न्यायिक दृष्टान्त और उपलब्ध उपचार का विवरण दिया जा रहा है, Zero FIR का वैधानिक प्रावधान देखे तो— BNSS की धारा 173(1)
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 173(1) में संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने का प्रावधान है, जो इसका महत्त्वपूर्ण अंश है:“Every information relating to the commission of a cognizable offence, irrespective of the area where the offence is committed…”
अर्थात, संज्ञेय अपराध किए जाने से संबंधित सूचना पुलिस थाने के क्षेत्राधिकार की परवाह किए बिना दी जा सकती है,
आधिकारिक कानून: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के प्रावधान का वर्तमान मामले में उपयोग अगर घटना दिल्ली में भी हुई, ओर कथित आरोपी दिल्ली पुलिस के कर्मचारी है,
फरियादिया ने दिल्ली के संबंधित पुलिस थाने में शिकायत दी, पुलिस ने FIR दर्ज नहीं की, फरियादिया जयपुर आ गई या जयपुर में मौजूद है,
ऐसी स्थिति में फरियादिया जयपुर के पुलिस थाने में घटना की सूचना देकर Zero FIR दर्ज करने का अनुरोध कर सकती है,
यदि सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो जयपुर पुलिस केवल दिल्ली का क्षेत्राधिकार होने का आधार लेकर FIR दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती, Zero FIR का उद्देश्य प्रारंभिक स्तर पर क्षेत्राधिकार की बाधा के कारण आपराधिक शिकायत दर्ज होने में होने वाली देरी को रोकना है, सामान्यतः FIR दर्ज होने के बाद उसे आगे की जांच के लिए संबंधित क्षेत्राधिकार वाले पुलिस थाने को भेजा जा सकता है, दिल्ली पुलिसकर्मी द्वारा मारपीट के मामले में कौन-से अपराध बन सकते हैं?
आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की संबंधित धाराएँ लागू हो सकती हैं, कथित कृत्य दिल्ली पुलिस मारपिटाई हमला मामले में,
संभावित विधिक प्रावधान
जानबूझकर मारपीट करके चोट पहुँचाना, धारा 115(2), तथ्यों के अनुसार, गंभीर चोट पहुँचाना
धारा 117, यदि गंभीर चोट की वैधानिक शर्तें पूरी हों, आपराधिक बल का प्रयोग
धारा 131, परिस्थितियों के अनुसार, गलत तरीके से रोकना
धारा 126, यदि उसके आवश्यक तत्व मौजूद हों
धमकी देना
धारा 351, यदि आपराधिक धमकी के तत्व मौजूद हों
लोक सेवक द्वारा कानून के विपरीत कार्य
संबंधित अपराध के आवश्यक तत्व सिद्ध होने पर लागू प्रावधान
महत्त्वपूर्ण सावधानी: पुलिसकर्मी द्वारा की गई प्रत्येक मारपीट अपने आप किसी एक निश्चित धारा में नहीं आती, चोट की प्रकृति, घटना की परिस्थितियों, पुलिसकर्मी के कृत्य, प्रयुक्त बल तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सही धाराएँ निर्धारित होंगी,
यदि पुलिसकर्मी ने अपनी आधिकारिक हैसियत का दुरुपयोग किया हो, तो उसके विरुद्ध लागू आपराधिक प्रावधानों के साथ-साथ विभागीय कार्रवाई की माँग भी की जा सकती है।
उच्चतम न्यायालय के महत्त्वपूर्ण न्यायिक दृष्टान्त(A) Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh
न्यायालय: उच्चतम न्यायालय
निर्णय: संविधान पीठ, 2013
प्रकाशित संदर्भ: (2014) 2 SCC 1यह FIR दर्ज करने के संबंध में सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णयों में से एक है, निर्णय का सिद्धान्त,उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस को दी गई सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो FIR दर्ज करना सामान्यतः अनिवार्य है, पुलिस को ऐसे मामले में FIR दर्ज करने से बचने के लिए मनमाने ढंग से प्रारंभिक जाँच का सहारा लेने की अनुमति नहीं है, निर्णय में सीमित श्रेणियों में प्रारंभिक जाँच के संबंध में भी दिशा-निर्देश दिए गए थे,
वर्तमान मामले में उपयोग
यदि फरियादिया की शिकायत से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो दिल्ली पुलिस द्वारा केवल शिकायत लेकर FIR दर्ज नहीं करना न्यायिक चुनौती का विषय हो सकता है, इसी प्रकार, जयपुर पुलिस भी केवल क्षेत्राधिकार दिल्ली में होने के आधार पर Zero FIR दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती, हालाँकि, इस निर्णय को यह मानकर लागू नहीं किया जाना चाहिए कि हर प्रकार की शिकायत में बिना किसी अपवाद के FIR दर्ज करना ही होगा, वर्तमान में BNSS की धारा 173 के प्रावधान भी लागू होंगे (B) Satvinder Kaur v. State (Government of NCT of Delhi)
न्यायालय: उच्चतम न्यायालय
निर्णय: 1999 संदर्भ: (1999) 8 SCC 728 यह निर्णय क्षेत्राधिकार और आपराधिक जाँच से संबंधित महत्त्वपूर्ण दृष्टान्त है, निर्णय का सिद्धान्त
उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार से संबंधित प्रश्न मात्र के आधार पर जाँच के प्रारंभिक चरण में आपराधिक कार्यवाही को बाधित नहीं किया जाना चाहिए,
क्षेत्राधिकार के प्रश्न की जाँच उचित प्रक्रिया के अनुसार की जा सकती है, वर्तमान मामले में उपयोग, दिल्ली में हुई घटना की सूचना जयपुर पुलिस को दिए जाने पर क्षेत्राधिकार का प्रश्न अपने आप में Zero FIR दर्ज करने से इनकार करने का पर्याप्त आधार नहीं है।
इस सिद्धान्त को वर्तमान BNSS की धारा 173(1) के साथ पढ़ना चाहिए, (C) State of Haryana v. Bhajan Lal
न्यायालय: उच्चतम न्यायालय
निर्णय: 1992 संदर्भ: 1992 Supp (1) SCC 335
यह आपराधिक कार्यवाही और FIR से संबंधित प्रमुख निर्णय है,
निर्णय का महत्त्व
इस निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने उन परिस्थितियों पर विचार किया जिनमें आपराधिक कार्यवाही में न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है, यह निर्णय FIR दर्ज करने के दायित्व से संबंधित विधिक सिद्धान्तों के व्यापक संदर्भ में उपयोगी है, लेकिन इसे Zero FIR पर सीधे और अकेले निर्णायक निर्णय के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा,
वर्तमान मामले में प्राथमिक आधार BNSS की धारा 173(1), तथा FIR दर्ज करने के दायित्व के संबंध में Lalita Kumari का निर्णय होगा, Zero FIR दर्ज नहीं करने पर क्या उपचार उपलब्ध हैं?
यदि जयपुर पुलिस भी Zero FIR दर्ज करने से इनकार करती है, तो फरियादिया निम्नलिखित उपाय अपना सकती है, (1) BNSS की धारा 173(4) — वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को शिकायत, यदि थाना प्रभारी संज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज करने से इनकार करता है, तो फरियादिया शिकायत का सार लिखित रूप में संबंधित पुलिस अधीक्षक को डाक से भेज सकती है, इस मामले में शिकायत की प्रतियाँ निम्न अधिकारियों को भेजना व्यावहारिक हो सकता है:
पुलिस अधीक्षक, संबंधित जिला जयपुर, पुलिस आयुक्त, जयपुर, यदि घटना और संबंधित थाना आयुक्तालय के अधीन हों, पुलिस आयुक्त, दिल्ली, संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, दिल्ली पुलिस।
BNSS की धारा 173(4) के अनुसार, शिकायत से संज्ञेय अपराध का खुलासा होने पर संबंधित पुलिस अधीक्षक स्वयं जाँच कर सकता है अथवा अधीनस्थ पुलिस अधिकारी से जाँच कराने का निर्देश दे सकता है, आधिकारिक प्रावधान: BNSS, धारा 173 — India Code⁠, व्यावहारिक सलाह: शिकायत रजिस्टर्ड डाक या स्पीड पोस्ट से भेजें और डाक रसीद, शिकायत की प्रति तथा प्राप्ति संबंधी साक्ष्य सुरक्षित रखें, BNSS की धारा 175(3) — मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन
यदि पुलिस के समक्ष शिकायत करने के बावजूद उचित कार्रवाई नहीं होती, तो फरियादिया सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष जाँच का आदेश देने के लिए आवेदन कर सकती है,
BNSS की धारा 175(3) के अंतर्गत मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच का आदेश देने की प्रक्रिया लागू होती है। इसके लिए धारा 173(4) के अंतर्गत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को आवेदन करने सहित धारा में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है, घटना दिल्ली में हुई होने के कारण यह देखना होगा कि संबंधित मजिस्ट्रेट के पास मामले के संबंध में आवश्यक क्षेत्रीय और वैधानिक अधिकारिता है या नहीं, जयपुर में केवल शिकायतकर्ता की उपस्थिति के आधार पर जयपुर के मजिस्ट्रेट को दिल्ली में हुए प्रत्येक अपराध की जाँच का आदेश देने का अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता, पुलिसकर्मी के विरुद्ध शिकायत में कौन-से साक्ष्य सुरक्षित रखने चाहिए?
इस प्रकार के मामले में निम्नलिखित साक्ष्य महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं:
घटना की तारीख, समय और दिल्ली में घटनास्थल का पूरा पता, संबंधित पुलिसकर्मी का नाम, पद, बैज नंबर अथवा पहचान संबंधी विवरण, यदि उपलब्ध हो, चोटों की तस्वीरें और सरकारी अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट, CCTV फुटेज, मोबाइल वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग, यदि उपलब्ध हो।
प्रत्यक्षदर्शियों के नाम और संपर्क विवरण, दिल्ली के थाने में दी गई शिकायत की प्रति,
शिकायत प्राप्त होने की रसीद, डायरी नंबर, ऑनलाइन शिकायत संख्या या डाक का प्रमाण, FIR दर्ज नहीं किए जाने संबंधी उपलब्ध पत्राचार,
घटना के बाद हुए उपचार और खर्च के दस्तावेज, CCTV फुटेज मिटने की आशंका होने पर उसे सुरक्षित रखने के लिए संबंधित अधिकारी को तत्काल लिखित अनुरोध करना उपयोगी होगा, क्या दिल्ली में FIR दर्ज नहीं होने पर जयपुर पुलिस के विरुद्ध भी कार्रवाई हो सकती है? इस प्रश्न में दो अलग-अलग परिस्थितियों का अंतर समझना आवश्यक है, पहली स्थिति: दिल्ली पुलिस ने दिल्ली में हुई घटना की शिकायत लेकर FIR दर्ज नहीं की, इस स्थिति में दिल्ली पुलिस के विरुद्ध सक्षम वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत, विभागीय कार्रवाई की माँग तथा परिस्थितियों के अनुसार अन्य कानूनी उपचार अपनाए जा सकते हैं, दूसरी स्थिति: फरियादिया जयपुर के पुलिस थाने में Zero FIR दर्ज कराने जाती है और जयपुर पुलिस भी केवल क्षेत्राधिकार का आधार लेकर इनकार करती है, यदि सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो ऐसा इनकार BNSS की धारा 173(1) के विपरीत हो सकता है। ऐसी स्थिति में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को शिकायत दी जा सकती है और लागू कानून के अनुसार आगे का उपचार अपनाया जा सकता है,
हालाँकि, किसी पुलिसकर्मी की व्यक्तिगत आपराधिक या विभागीय जिम्मेदारी का निर्धारण उसके वास्तविक आचरण, लागू कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगा, ऐसे में विधिक स्थिति निम्न प्रकार से समझी जा सकती है: दिल्ली में पुलिसकर्मी द्वारा कथित मारपीट की शिकायत दिल्ली के संबंधित थाने में दिए जाने के बावजूद FIR दर्ज नहीं होना कानूनी चुनौती का विषय हो सकता है।
BNSS की धारा 173(1) के अनुसार संज्ञेय अपराध की सूचना क्षेत्राधिकार की परवाह किए बिना दी जा सकती है,
यदि फरियादिया जयपुर में Zero FIR दर्ज कराने जाती है, तो जयपुर पुलिस केवल इस आधार पर इनकार नहीं कर सकती कि घटना दिल्ली में हुई है, FIR दर्ज होने के बाद मामले को आगे की जाँच के लिए संबंधित क्षेत्राधिकार वाले थाने को भेजा जा सकता है, FIR दर्ज करने से इनकार होने पर BNSS की धारा 173(4) के अंतर्गत वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से संपर्क किया जा सकता है, इसके बाद धारा 175(3) के अंतर्गत सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन का विकल्प भी उपलब्ध हो सकता है।
FIR दर्ज करने के दायित्व के संबंध में Lalita Kumari v. Government of Uttar Pradesh प्रमुख न्यायिक दृष्टान्त है, आधिकारिक विधिक स्रोत: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 — India Code⁠, आपके मामले के लिए अगला महत्त्वपूर्ण कदम
यदि आप इस प्रकरण में फरियादिया की ओर से कानूनी कार्रवाई करना चाहते हैं, तो तीन तथ्य स्पष्ट कर दें:
दिल्ली में घटना किस तारीख को और किस स्थान पर हुई थी? क्या मारपीट करने वाला पुलिसकर्मी वर्दी में था और क्या उसकी पहचान ज्ञात है?
दिल्ली के थाने में दी गई शिकायत लिखित थी? क्या उसकी प्राप्ति रसीद या शिकायत नंबर उपलब्ध है?
इन तथ्यों के आधार पर मजिस्ट्रेट या हाईकोर्ट में कार्यवाही के साथ कर्तव्य निर्वहन नहीं करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कर्तव्यविहीनता का मुकदमा दर्ज हो सकता है, अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान 9829086339

नेत्रदान के लिए कोटा से बारां पहुंची शाइन इंडिया

 नेत्रदान के लिए कोटा से बारां पहुंची शाइन इंडिया

कॉर्निया की अंधता का दुख भोग रहे मरीजों के लिए, नेत्रदान ही एक माध्यम है । सफल कॉर्निया प्रत्यारोपण के माध्यम से, दृष्टि बाधित व्यक्तियों के जीवन से अंधकार को हमेशा के लिए दूर किया जा सकता है ।

इसी क्रम में आज, सत्संग रोड बारां निवासी सुरेश चंद्र जैन के आकस्मिक निधन की सूचना भारत विकास परिषद के सदस्य रमाकांत गुप्ता और कमलेश जैन के माध्यम से कोटा में शाइन इंडिया फाउंडेशन, व बीबीजे चैप्टर के डॉ कुलवंत गौड़ को मिली । रमाकांत ने बताया कि, पारिवार के सदस्यों ने स्व प्रेरणा से स्व०पिताजी के नेत्रदान का निर्णय लिया है ।

चिकित्सकीय जानकारी लेने के उपरांत,कोटा से डॉ गौड़ नेत्र संकलन वाहिनी ज्योति रथ लेकर, तुरंत कोटा से रवाना हुए और शवयात्रा निकलने से ठीक पूर्व निवास स्थान पर पहुंचकर नेत्रदान की प्रक्रिया परिवार के सभी सदस्यों के बीच में संपन्न की। 

और (ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार फसादियों को खूब जानता है और अगर वह तुम्हे झुठलाए तो तुम कह दो कि हमारे लिए हमारी कार गुजारी है और तुम्हारे लिए तुम्हारी कारस्तानी जो कुछ मै करता हूँ उसके तुम जि़म्मेदार नहीं और जो कुछ तुम करते हो उससे मै बरी हूँ

 और (ऐ रसूल) तुम्हारा परवरदिगार फसादियों को खूब जानता है और अगर वह तुम्हे झुठलाए तो तुम कह दो कि हमारे लिए हमारी कार गुजारी है और तुम्हारे लिए तुम्हारी कारस्तानी जो कुछ मै करता हूँ उसके तुम जि़म्मेदार नहीं और जो कुछ तुम करते हो उससे मै बरी हूँ (41)
और उनमें से बाज़ ऐसे हैं कि तुम्हारी ज़बानों की तरफ कान लगाए रहते हैं तो (क्या) वह तुम्हारी सुन लेगें हरगिज़ नहीं अगरचे वह कुछ समझ भी न सकते हो (42)
तुम कही बहरों को कुछ सुना सकते हो और बाज़ उनमें से ऐसे हैं जो तुम्हारी तरफ (टकटकी बाँधे) देखते हैं तो (क्या वह इमान लाएँगें हरगिज़ नहीं) अगरचे उन्हें कुछ न सूझता हो तो तुम अन्धे को राहे रास्त दिखा दोगे (43)
ख़ुदा तो हरगिज़ लोगों पर कुछ भी ज़ुल्म नहीं करता मगर लोग खुद अपने ऊपर (अपनी करतूत से) जुल्म किया करते है (44)
और जिस दिन ख़़ुदा इन लोगों को (अपनी बारगाह में) जमा करेगा तो गोया ये लोग (समझेगें कि दुनिया में) बस घड़ी दिन भर ठहरे और आपस में एक दूसरे को पहचानेंगे जिन लोगों ने ख़ुदा की बारगाह में हाजि़र होने को झुठलाया वह ज़रुर घाटे में हैं और हिदायत याफता न थे (45)
ऐ रसूल हम जिस जिस (अज़ाब) का उनसे वायदा कर चुके हैं उनमें से बाज़ ख़्वाहा तुम्हें दिखा दें या तुमको (पहले ही दुनिया से) उठा ले फिर (आखि़र) तो उन सबको हमारी तरफ लौटना ही है फिर जो कुछ ये लोग कर रहे हैं ख़ुदा तो उस पर गवाह ही है (46)
और हर उम्मत का ख़ास (एक) एक रसूल हुआ है फिर जब उनका रसूल (हमारी बारगाह में) आएगा तो उनके दरम्यिान इन्साफ़ के साथ फैसला कर दिया जाएगा और उन पर ज़र्रा बराबर ज़़ुल्म न किया जाएगा (47)
ये लोग कहा करते हैं कि अगर तुम सच्चे हो तो (आखि़र) ये (अज़ाब का वायदा) कब पूरा होगा (48)
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मै खुद अपने वास्ते नुकसान पर क़ादिर हूँ न नफा पर मगर जो ख़ुदा चाहे हर उम्मत (के रहने) का (उसके इल्म में) एक वक़्त मुक़र्रर है-जब उन का वक़्त आ जाता है तो न एक घड़ी पीछे हट सकती हैं और न आगे बढ़ सकते हैं (49)
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या तुम समझते हो कि अगर उसका अज़ाब तुम पर रात को या दिन को आ जाए तो (तुम क्या करोगे) फिर गुनाहगार लोग आखि़र काहे की जल्दी मचा रहे हैं (50)

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