आपका-अख्तर खान "अकेला"
तुम अपने किरदार को इतना बुलंद करो कि दूसरे मज़हब के लोग देख कर कहें कि अगर उम्मत ऐसी होती है,तो नबी कैसे होंगे? गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे.
07 नवंबर 2026
मोर्चरी में अंधकार, फ़िर मोबाइल की रोशनी में हुआ 18 वर्षीय अर्जुन का नेत्रदान
जिन पर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से निशा न बनाए हुए थे और वह बस्ती (उन) ज़ालिमों (कुफ़्फ़ारे मक्का) से कुछ दूर नहीं
वह फरिश्ते बोले ऐ लूत हम तुम्हारे परवरतिदगार के भेजे हुए (फरिश्ते हैं तुम घबराओ नहीं) ये लोग तुम तक हरगिज़ (नहीं पहुँच सकते तो तुम कुछ रात रहे अपने लड़कों बालों समैत निकल भागो और तुममें से कोई इधर मुड़ कर भी न देखे मगर तुम्हारी बीबी कि उस पर भी यक़ीनन वह अज़ाब नाजि़ल होने वाला है जो उन लोगों पर नाजि़ल होगा और उन (के अज़ाब का) वादा बस सुबह है क्या सुबह क़रीब नहीं (81)
फिर जब हमारा (अज़ाब का) हुक्म आ पहुँचा तो हमने (बस्ती की ज़मीन के तबके) उलट कर उसके ऊपर के हिस्से को नीचे का बना दिया और उस पर हमने खरन्जेदार पत्थर ताबड़ तोड़ बरसाए (82)
जिन पर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से निशा न बनाए हुए थे और वह बस्ती (उन) ज़ालिमों (कुफ़्फ़ारे मक्का) से कुछ दूर नहीं (83)
और हमने मदयन वालों के पास उनके भाई शोएब को पैग़म्बर बना कर भेजा उन्होंने (अपनी क़ौम से) कहा ऐ मेरी क़ौम ख़ुदा की इबादत करो उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं और नाप और तौल में कोई कमी न किया करो मै तो तुम को आसूदगी (ख़ुशहाली) में देख रहा हूँ (फिर घटाने की क्या ज़रुरत है) और मै तो तुम पर उस दिन के अज़ाब से डराता हूँ जो (सबको) घेर लेगा (84)
और ऐ मेरी क़ौम पैमाने और तराज़ू़ इन्साफ़ के साथ पूरे पूरे रखा करो और लेागों को उनकी चीज़े कम न दिया करो और रुए ज़मीन में फसाद न फैलाते फिरो (85)
अगर तुम सच्चे मोमिन हो तो ख़ुदा का बकि़या तुम्हारे वास्ते कही अच्छा है और मैं तो कुछ तुम्हारा निगेहबान नहीं (86)
वह लोग कहने लगे ऐ शोएब क्या तुम्हारी नमाज़ (जिसे तुम पढ़ा करते हो) तुम्हें ये सिखाती है कि जिन (बुतों) की परसतिष हमारे बाप दादा करते आए उन्हें हम छोड़ बैठें या हम अपने मालों में जो कुछ चाहे कर बैठें तुम ही तो बस एक बुर्दबार और समझदार (रह गए) हो (87)
शोएब ने कहा ऐ मेरी क़ौम अगर मै अपने परवरदिगार की तरफ से रौशन दलील पर हूँ और उसने मुझे (हलाल) रोज़ी खाने को दी है (तो मै भी तुम्हारी तरह हराम खाने लगूँ) और मै तो ये नहीं चाहता कि जिस काम से तुम को रोकूँ तुम्हारे बर खि़लाफ (बदले) आप उसको करने लगूं मैं तो जहाँ तक मुझे बन पड़े इसलाह (भलाई) के सिवा (कुछ और) चाहता ही नहीं और मेरी ताईद तो ख़ुदा के सिवा और किसी से हो ही नहीं सकती इस पर मैने भरोसा कर लिया है और उसी की तरफ रुज़ू करता हूँ (88)
और ऐ मेरी क़ौमे मेरी जि़द कही तुम से ऐसा जुर्म न करा दे जैसी मुसीबत क़ौम नूह या हूद या सालेह पर नाजि़ल हुयी थी वैसी ही मुसीबत तुम पर भी आ पड़े और लूत की क़ौम (का ज़माना) तो (कुछ ऐसा) तुमसे दूर नहीं (उन्हीं के इबरत हासिल करो (89)
और अपने परवरदिगार से अपनी मग़फिरत की दुआ माँगों फिर उसी की बारगाह में तौबा करो बेशक मेरा परवरदिगार बड़ा मोहब्बत वाला मेहरबान है (90)
06 नवंबर 2026
happy dipawly
| Dear fellow citizen, | ||
| Warm greetings on the auspicious occasion of Diwali! | ||
| This festival celebrates the eternal victory of light over darkness, goodness over evil and hope over despair. |
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| Diwali is also an occasion to cherish our rich traditions and strengthen the bonds of togetherness. | ||
| May Diwali illuminate every home with happiness, harmony and prosperity. |
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| May this festive season inspire us to spread kindness, embrace positivity and work towards a brighter future. |
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| Let us move forward with renewed energy and determination to build a prosperous and Viksit Bharat. | ||
| Once again, wishing you a Happy Diwali! |
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| Yours, Narendra Modi |
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धनतेरस की पूर्व संध्या पर संपन्न हुआ नेत्रदान
धनतेरस की पूर्व संध्या पर संपन्न हुआ नेत्रदान
शोक की घड़ी में बेटे-बेटियों ने निभाया मानवता का धर्म, मां का नेत्रदान करवाकर दिया प्रेरणादायी संदेश
रामगंजमंडी। ग्राम रीछड़िया, तहसील रामगंजमंडी निवासी श्री बृजमोहन मेहता की धर्मपत्नी श्रीमती बद्री बाई का कोटा के एक निजी अस्पताल में हृदयाघात से आकस्मिक निधन हो गया। परिवार के लिए यह अत्यंत दुःखद घड़ी थी, लेकिन इस कठिन समय में भी परिवार ने मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों को सर्वोपरि रखते हुए माताजी का नेत्रदान करवाने का पुनीत निर्णय लिया।
बृजमोहन मेहता का परिवार प्रारंभ से ही सामाजिक, धार्मिक एवं सेवा कार्यों में अग्रणी रहा है। ज्येष्ठ पुत्र मुकेश कुमार मेहता सामाजिक कार्यकर्ता होने के साथ मां गायत्री के उपासक भी हैं। माताजी के निधन की सूचना मिलते ही उनके मित्र एवं शाइन इंडिया फाउंडेशन के ज्योति मित्र पंकज काला तथा वीरेंद्र कुमार जैन ने मुकेश मेहता से संपर्क कर माताजी के नेत्रदान का आग्रह किया।
मुकेश मेहता ने तत्काल अपने छोटे भाइयों बलराम, शैलेन्द्र एवं जीतेश, बहनों रेखा एवं ज्योति मीना तथा पिता श्री बृजमोहन मेहता से चर्चा कर सहमति प्राप्त की। परिवार के सभी सदस्यों ने धर्म, सेवा और मानवता के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हुए सहर्ष नेत्रदान के लिए सहमति प्रदान की।
परिवार की सहमति मिलते ही आरोग्य भारती के जिला अध्यक्ष वीरेंद्र जैन की सूचना पर शाइन इंडिया फाउंडेशन की टीम के कुलवंत गौड़ ने परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में नेत्रदान की प्रक्रिया संपन्न करवाई।
शाइन इंडिया फाउंडेशन के शहर संयोजक संजय विजावत ने बताया कि संस्था द्वारा पिछले 15 वर्षों से किए जा रहे निरंतर प्रयासों का सकारात्मक परिणाम सामने आ रहा है। अब नेत्रदान के प्रति जागरूकता केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग आगे आकर इस पुनीत कार्य में भागीदारी निभा रहे हैं।
परिवार ने दुःख की घड़ी को मानव सेवा के संकल्प में बदलकर समाज को एक प्रेरणादायी संदेश दिया है। श्रीमती बद्री बाई का नेत्रदान उन लोगों के जीवन में नई रोशनी की उम्मीद बनेगा, जो दृष्टि पाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
नेत्रदान महादान है। शरीर नश्वर है, लेकिन हमारा यह छोटा सा संकल्प किसी के जीवन में उजाला भर सकता है।
और इबराहीम की बीबी (सायरा) खड़ी हुयी थी वह (ये ख़बर सुनकर) हॅस पड़ी तो हमने (उन्हें फरिशतों के ज़रिए से) इसहाक़ के पैदा होने की खुशख़बरी दी और इसहाक़ के बाद याक़ूब की
और इबराहीम की बीबी (सायरा) खड़ी हुयी थी वह (ये ख़बर सुनकर) हॅस पड़ी तो हमने (उन्हें फरिशतों के ज़रिए से) इसहाक़ के पैदा होने की खुशख़बरी दी और इसहाक़ के बाद याक़ूब की (71)
वह कहने लगी ऐ है क्या अब मै बच्चा जनने बैठॅूगी मैं तो बुढि़या हूँ और ये मेरे मियाँ भी बूढे़ है ये तो एक बड़ी ताज्जुब खेज़ बात है (72)
वह फरिश्ते बोले (हाए) तुम ख़ुदा की कुदरत से तअज्जुब करती हो ऐ एहले बैत (नबूवत) तुम पर ख़़ुदा की रहमत और उसकी बरकते (नाजि़ल हो) इसमें शक नहीं कि वह क़ाबिल हम्द (वासना) बुज़ुर्ग हैं (73)
फिर जब इबराहीम (के दिल) से ख़ौफ जाता रहा और उनके पास (औलाद की) खुशख़बरी भी आ चुकी तो हम से क़ौमे लूत के बारे में झगड़ने लगे (74)
बेशक इबराहीम बुर्दबार नरम दिल (हर बात में ख़ुदा की तरफ) रुजू (ध्यान) करने वाले थे (75)
(हमने कहा) ऐ इबराहीम इस बात में हट मत करो (इस बार में) जो हुक्म तुम्हारे परवरदिगार का था वह क़तअन आ चुका और इसमें शक नहीं कि उन पर ऐसा अज़ाब आने वाले वाला है (76)
जो किसी तरह टल नहीं सकता और जब हमारे भेजे हुए फ़रिश्ते (लड़को की सूरत में) लूत के पास आए तो उनके ख़्याल से रजीदा हुए और उनके आने से तंग दिल हो गए और कहने लगे कि ये (आज का दिन) सख़्त मुसीबत का दिन है (77)
और उनकी क़ौम (लड़को की आवाज़ सुनकर बुरे इरादे से) उनके पास दौड़ती हुयी आई और ये लोग उसके क़ब्ल भी बुरे काम किया करते थे लूत ने (जब उनको) आते देखा तो कहा ऐ मेरी क़ौम ये हमारी क़ौम की बेटियाँ (मौजूद हैं) उनसे निकाह कर लो ये तुम्हारी वास्ते जायज़ और ज़्यादा साफ सुथरी हैं तो खु़दा से डरो और मुझे मेरे मेहमान के बारे में रुसवा न करो क्या तुम में से कोई भी समझदार आदमी नहीं है (78)
उन (कम्बख़्तो) न जवाब दिया तुम को खूब मालूम है कि तुम्हारी क़ौम की लड़कियों की हमें कुछ हाजत (जरूरत) नही है और जो बात हम चाहते है वह तो तुम ख़ूब जानते हो (79)
लूत ने कहा काश मुझमें तुम्हारे मुक़ाबले की कूवत होती या मै किसी मज़बूत कि़ले मे पनाह ले सकता (80)
