आपका-अख्तर खान "अकेला"
तुम अपने किरदार को इतना बुलंद करो कि दूसरे मज़हब के लोग देख कर कहें कि अगर उम्मत ऐसी होती है,तो नबी कैसे होंगे? गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे.
02 जुलाई 2026
अखिल राजस्थान सेवारत चिकित्सक संघ ने नए अधीक्षक डॉ. राकेश सिंह का किया भव्य स्वागत
रामस्वरूप मीणा के नेतृत्व में गठित टीम ने यह सफलता हासिल की। मुखबिर की सूचना पर बिछाया जाल
बेषक जिन लोगों नें कुफ्र एख़्तेयार किया और कुफ्र ही की हालत में मर गए उन्ही पर ख़ुदा की और फरिश्तो की और तमाम लोगों की लानत है हमेशा इसी फटकार में रहेंगे
बेषक जिन लोगों नें कुफ्र एख़्तेयार किया और कुफ्र ही की हालत में मर गए
उन्ही पर ख़ुदा की और फरिश्तो की और तमाम लोगों की लानत है हमेशा इसी फटकार
में रहेंगे (161)
न तो उनके अज़ाब ही में तख़्फ़ीफ़ {कमी} की जाएगी (162)
और न उनको अज़ाब से मोहलत दी जाएगी और तुम्हारा माबूद तो वही यकता
ख़ुदा है उस के सिवा कोई माबूद नहीं जो बड़ा मेहरबान रहम वाला है (163)
बेशक आसमान व ज़मीन की पैदाइश और रात दिन के रद्दो बदल कश्तियों
(जहाज़ों) में जो लोगों के नफे़ की चीज़े (माले तिजारत वगै़रह दरिया) में
ले कर चलते हैं और पानी में जो ख़ुदा ने आसमान से बरसाया फिर उस से ज़मीन
को मुर्दा (बेकार) होने के बाद जिला दिया (शादाब कर दिया) और उस में हर
कि़स्म के जानवर फैला दिये और हवाओं के चलाने में और अब्र में जो आसमान व
ज़मीन के दरमियान ख़ुदा के हुक्म से घिरा रहता है (इन सब बातों में) अक़्ल
वालों के लिए बड़ी बड़ी निशनियाँ हैं (164)
और बाज़ लोग ऐसे भी हैं जो ख़़ुदा के सिवा औरों को भी ख़ुदा का मिसल व
शरीक बनाते हैं (और) जैसी मोहब्बत ख़ुदा से रखनी चाहिए वैसी ही उन से रखते
हैं और जो लोग ईमानदार हैं वह उन से कहीं बढ़ कर ख़ुदा की उलफ़त रखते हैं
और काश ज़ालिमों को (इस वक़्त) वह बात सूझती जो अज़ाब देखने के बाद सूझेगी
कि यक़ीनन हर तरह की क़ूवत ख़ुदा ही को है और ये कि बेशक ख़ुदा बड़ा सख़्त
अज़ाब वाला है (165)
(वह क्या सख़्त वक़्त होगा) जब पेशवा लोग अपने पैरवो से अपना पीछा
छुड़ाएगे और अपनी आखों से (चश्में ख़ुद) अज़ाब को देखेगें और उनके बाहमी
ताल्लुक़ात टूट जाएँगे (166)
और पैरव कहने लगेंगे कि अगर हमें कहीं फिर (दुनिया में) पलटना मिले तो
हम भी उन से इसी तरह अलग हो जायेंगे जिस तरह एैन वक़्त पर ये लोग हम से अलग
हो गए यूँ ही ख़ुदा उन के आमाल को दिखाएगा जो उन्हें (सर तापा पास ही) पास
दिखाई देंगें और फिर भला कब वह दोज़ख़ से निकल सकतें हैं (167)
ऐ लोगों जो कुछ ज़मीन में हैं उस में से हलाल व पाकीज़ा चीज़ (शौक़ से)
खाओ और शैतान के क़दम ब क़दम न चलो वह तो तुम्हारा ज़ाहिर ब ज़ाहिर दुश्मन
है (168)
वह तो तुम्हें बुराई और बदकारी ही का हुक्म करेगा और ये चाहेगा कि तुम बे जाने बूझे ख़ुदा पर बोहतान बाँधों (169)
और जब उन से कहा जाता है कि जो हुक्म ख़ुदा की तरफ से नाजि़ल हुआ है उस
को मानो तो कहते हैं कि नहीं बल्कि हम तो उसी तरीक़े पर चलेंगे जिस पर
हमने अपने बाप दादाओं को पाया अगरचे उन के बाप दादा कुछ भी न समझते हों और न
राहे रास्त ही पर चलते रहे हों (170)
01 जुलाई 2026
तीन पीढ़ियों से कायम है विधि साधना की परंपरा: न्यायिक दृष्टांतों के दम पर मुकदमों की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता नरेंद्र गुप्ता वरिष्ठ एडवोकेट अख्तर खान अकेला की कलम से
बस तुम हमारी याद रखो तो मै भी तुम्हारा जि़क्र (खै़र) किया करुगाँ और मेरा शुक्रिया अदा करते रहो और नाशुक्री न करो
और तीसरा फायदा ये है ताकि तुम हिदायत पाओ मुसलमानों ये एहसान भी वैसा ही
है जैसे हम ने तुम में तुमही में का एक रसूल भेजा जो तुमको हमारी आयतें पढ़
कर सुनाए और तुम्हारे नफ़्स को पाकीज़ा करे और तुम्हें किताब क़ुरान और
अक़्ल की बातें सिखाए और तुम को वह बातें बतांए जिन की तुम्हें पहले से खबर
भी न थी (151)
बस तुम हमारी याद रखो तो मै भी तुम्हारा जि़क्र (खै़र) किया करुगाँ और मेरा शुक्रिया अदा करते रहो और नाशुक्री न करो (152)
ऐ ईमानदारों मुसीबत के वक़्त सब्र और नमाज़ के ज़रिए से ख़ुदा की मदद माँगों बेशक ख़ुदा सब्र करने वालों ही का साथी है (153)
और जो लोग ख़ुदा की राह में मारे गए उन्हें कभी मुर्दा न कहना बल्कि वह
लोग जि़न्दा हैं मगर तुम उनकी जि़न्दगी की हक़ीकत का कुछ भी शऊर नहीं रखते
(154)
और हम तुम्हें कुछ खौफ़ और भूख से और मालों और जानों और फलों की कमी से
ज़रुर आज़माएगें और (ऐ रसूल) ऐसे सब्र करने वालों को खुशख़बरी दे दो (155)
कि जब उन पर कोई मुसीबत आ पड़ी तो वह (बेसाख़्ता) बोल उठे हम तो ख़ुदा ही के हैं और हम उसी की तरफ लौट कर जाने वाले हैं (156)
उन्हीं लोगों पर उनके परवरदिगार की तरफ से इनायतें हैं और रहमत और यही लोग हिदायत याफ़्ता है (157)
बेशक (कोहे) सफ़ा और (कोह) मरवा ख़ुदा की निशानियों में से हैं बस जो
शख़्स ख़ानए काबा का हज या उमरा करे उस पर उन दोनो के (दरमियान) तवाफ़ (आमद
ओ रफ्त) करने में कुछ गुनाह नहीं (बल्कि सवाब है) और जो शख़्स खुश खुश नेक
काम करे तो फिर ख़ुदा भी क़द्रदान (और) वाकि़फ़कार है (158)
बेशक जो लोग हमारी इन रौशन दलीलों और हिदायतों को जिन्हें हमने नाजि़ल
किया उसके बाद छिपाते हैं जबकि हम किताब तौरैत में लोगों के सामने साफ़
साफ़ बयान कर चुके हैं तो यही लोग हैं जिन पर ख़ुदा भी लानत करता है और
लानत करने वाले भी लानत करते हैं (159)
मगर जिन लोगों ने (हक़ छिपाने से) तौबा की और अपनी ख़राबी की इसलाह कर
ली और जो किताबे ख़ुदा में है साफ़ साफ़ बयान कर दिया बस उन की तौबा मै
क़ुबूल करता हूँ और मै तो बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला मेहरबान हूँ (160)