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13 अक्टूबर 2026

(ऐ रसूल जिहाद में न जाने का) न तो कमज़ोरों पर कुछ गुनाह है न बीमारों पर और न उन लोगों पर जो कुछ नहीं पाते कि ख़र्च करें बशर्ते कि ये लोग ख़़ुदा और उसके रसूल की ख़ैर ख़्वाही करें नेकी करने वालों पर (इल्ज़ाम की) कोई सबील नहीं और ख़़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है

 

(ऐ रसूल जिहाद में न जाने का) न तो कमज़ोरों पर कुछ गुनाह है न बीमारों पर और न उन लोगों पर जो कुछ नहीं पाते कि ख़र्च करें बशर्ते कि ये लोग ख़़ुदा और उसके रसूल की ख़ैर ख़्वाही करें नेकी करने वालों पर (इल्ज़ाम की) कोई सबील नहीं और ख़़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है (91)
और न उन्हीं लोगों पर कोई इल्ज़ाम है जो तुम्हारे पास आए कि तुम उनके लिए सवारी बाहम पहुँचा दो और तुमने कहा कि मेरे पास (तो कोई सवारी) मौजूद नहीं कि तुमको उस पर सवार करूँ तो वह लोग (मजबूरन) फिर गए और हसरत (व अफसोस) उसे उस ग़म में कि उन को ख़र्च मयस्सर न आया (92)
उनकी आँखों से आँसू जारी थे (इल्ज़ाम की) सबील तो सिर्फ उन्हीं लोगों पर है जिन्होंने बावजूद मालदार होने के तुमसे (जिहाद में) न जाने की इजाज़त चाही और उनके पीछे रह जाने वाले (औरतों,बच्चों) के साथ रहना पसन्द आया और ख़़ुदा ने उनके दिलों पर (गोया) मोहर कर दी है तो ये लोग कुछ नहीं जानते (93)
जब तुम उनके पास (जिहाद से लौट कर) वापस आओगे तो ये (मुनाफिक़ीन) तुमसे (तरह तरह) की माअज़रत करेंगे (ऐ रसूल) तुम कह दो कि बातें न बनाओ हम हरगि़ज़ तुम्हारी बात न मानेंगे (क्योंकि) हमे तो ख़़ुदा ने तुम्हारे हालात से आगाह कर दिया है अनक़ीरब ख़़ुदा और उसका रसूल तुम्हारी कारस्तानी को मुलाहज़ा फरमाएगें फिर तुम ज़ाहिर व बातिन के जानने वालों (ख़ुदा) की हुज़ूरी में लौटा दिए जाओगे तो जो कुछ तुम (दुनिया में) करते थे (ज़र्रा ज़र्रा) बता देगा (94)
जब तुम उनके पास (जिहाद से) वापस आओगे तो तुम्हारे सामने ख़ुदा की क़समें खाएगें ताकि तुम उनसे दरगुज़र करो तो तुम उनकी तरफ से मुँह फेर लो बेशक ये लोग नापाक हैं और उनका ठिकाना जहन्नुम है (ये) सज़ा है उसकी जो ये (दुनिया में) किया करते थे (95)
तुम्हारे सामने ये लोग क़समें खाते हैं ताकि तुम उनसे राज़ी हो (भी) जाओ तो ख़ुदा बदकार लोगों से हरगिज़ कभी राज़ी नहीं होगा (96)
(ये) अरब के गॅवार देहाती कुफ्र व निफाक़ में बड़े सख़्त हैं और इसी क़ाबिल हैं कि जो किताब ख़ुदा ने अपने रसूल पर नाजि़ल फरमाई है उसके एहक़ाम न जानें और ख़ुदा तो बड़ा दाना हकीम है (97)
और कुछ गॅवार देहाती (ऐसे भी हैं कि जो कुछ ख़ुदा की) राह में खर्च करते हैं उसे तावान (जुर्माना) समझते हैं और तुम्हारे हक़ में (ज़माने की) गर्दिशों के मुन्तजि़र (इन्तेज़ार में) हैं उन्हीं पर (ज़माने की) बुरी गर्दिश पड़े और ख़ुदा तो सब कुछ सुनता जानता है (98)
और कुछ देहाती तो ऐसे भी हैं जो ख़ुदा और आखि़रत पर ईमान रखते हैं और जो कुछ खर्च करते है उसे ख़ुदा

की (बारगाह में) नज़दीकी और रसूल की दुआओं का ज़रिया समझते हैं आगाह रहो वाक़ई ये (ख़ैरात) ज़रूर उनके तक़र्रुब (क़रीब होने का) का बाइस है ख़ुदा उन्हें बहुत जल्द अपनी रहमत में दाखि़ल करेगा बेशक ख़ुदा बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है (99)
और मुहाजिरीन व अन्सार में से (ईमान की तरफ) सबक़त (पहल) करने वाले और वह लोग जिन्होंने नेक नीयती से (कुबूले ईमान में उनका साथ दिया ख़ुदा उनसे राज़ी और वह ख़़ुदा से ख़ुश और उनके वास्ते ख़़ुदा ने (वह हरे भरे) बाग़ जिन के नीचे नहरें जारी हैं तैयार कर रखे हैं वह हमेशा अब्दआलाबाद (हमेशा) तक उनमें रहेगें यही तो बड़ी कामयाबी हैं (100)

12 अक्टूबर 2026

कोटा जिला कलेक्ट्रेट परिसर के ऐतिहासिक बरगद के नीचे साहित्यिक सौहार्द की अनूठी तस्वीर,

 

कोटा जिला कलेक्ट्रेट परिसर के ऐतिहासिक बरगद के नीचे साहित्यिक सौहार्द की अनूठी तस्वीर,
वरिष्ठ लेखक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने वरिष्ठ अधिवक्ता, पत्रकार एवं लेखक अख्तर खान अकेला को भेंट की ‘राजस्थान रचनाकार परिचय कोष’ पुस्तक
राजस्थान के 552 साहित्यकारों एवं लेखकों का परिचय समेटे है महत्वपूर्ण पुस्तक, साहित्य और ज्ञान के आदान-प्रदान का बना यादगार अवसर
कोटा। साहित्य, पत्रकारिता और बौद्धिक संवाद की दुनिया में पुस्तकों का आदान-प्रदान केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि ज्ञान, विचार और रचनात्मकता के सम्मान का प्रतीक है। इसी भावना को साकार करती एक सुंदर तस्वीर कोटा जिला कलेक्ट्रेट परिसर में उस समय सामने आई, जब राजस्थान के वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने अपनी प्रकाशित पुस्तक ‘राजस्थान रचनाकार परिचय कोष’ वरिष्ठ अधिवक्ता, पत्रकार एवं लेखक अख्तर खान अकेला को भेंट की। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार के.डी. अब्बासी भी उपस्थित रहे।
कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित ऐतिहासिक एवं विशाल बरगद के पेड़ के नीचे संपन्न हुआ यह पुस्तक भेंट कार्यक्रम साहित्य के प्रति सम्मान, लेखकीय आत्मीयता और ज्ञान-साझेदारी का प्रतीक बन गया। बरगद का विशाल वृक्ष अपनी जड़ों और शाखाओं के विस्तार के साथ जिस प्रकार निरंतरता, संरक्षण और परंपरा का संदेश देता है, उसी प्रकार साहित्य भी पीढ़ियों के अनुभवों, विचारों और ज्ञान को एक-दूसरे तक पहुंचाने का माध्यम बनता है।
552 साहित्यकारों और लेखकों का परिचय समेटे है पुस्तक
डॉ. प्रभात कुमार सिंघल द्वारा रचित एवं प्रकाशित ‘राजस्थान रचनाकार परिचय कोष’ एक महत्वपूर्ण संदर्भपरक साहित्यिक कृति है। इस पुस्तक में राजस्थान के 552 साहित्यकारों एवं लेखकों के बारे में परिचयात्मक एवं ज्ञानवर्धक जानकारी संकलित की गई है।
राजस्थान की साहित्यिक परंपरा विविध भाषाओं, बोलियों, सांस्कृतिक धाराओं और सामाजिक अनुभवों से समृद्ध रही है। यहां हिंदी के साथ-साथ राजस्थानी तथा अन्य भाषाओं में भी साहित्य सृजन की व्यापक परंपरा विद्यमान है। ऐसे में विभिन्न रचनाकारों के परिचय को एक स्थान पर संकलित करना साहित्य के अध्येताओं, शोधार्थियों, पत्रकारों, विद्यार्थियों और साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए उपयोगी प्रयास है।
किसी भी प्रदेश की साहित्यिक पहचान केवल उसकी प्रसिद्ध पुस्तकों या चुनिंदा प्रतिष्ठित लेखकों तक सीमित नहीं होती, बल्कि उन तमाम रचनाकारों के योगदान से निर्मित होती है, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से समाज, संस्कृति, इतिहास, मानवीय संवेदनाओं और समकालीन परिस्थितियों को अभिव्यक्ति दी है। इस दृष्टि से 552 रचनाकारों का परिचय समेटने वाला यह संकलन राजस्थान की साहित्यिक प्रतिभाओं को जानने और उनके योगदान को समझने का अवसर प्रदान करता है।
डॉ. प्रभात कुमार सिंघल का साहित्यिक योगदान
डॉ. प्रभात कुमार सिंघल लेखन एवं साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े वरिष्ठ लेखक हैं। उनकी पुस्तक ‘राजस्थान रचनाकार परिचय कोष’ रचनाकारों के परिचय को संकलित करने तथा साहित्यिक व्यक्तित्वों की जानकारी को पाठकों तक पहुंचाने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण है।
साहित्यिक परिचय संबंधी पुस्तकों का विशेष महत्व इसलिए भी है कि समय के साथ अनेक रचनाकारों का कार्य व्यापक पाठक वर्ग तक नहीं पहुंच पाता। व्यवस्थित परिचयात्मक संकलन उनके साहित्यिक व्यक्तित्व और रचनात्मक योगदान को समझने का आधार उपलब्ध करा सकते हैं। इस प्रकार की पुस्तकें साहित्यिक संदर्भ सामग्री के रूप में भी उपयोगी होती हैं।
डॉ. सिंघल द्वारा अपनी पुस्तक वरिष्ठ अधिवक्ता, पत्रकार एवं लेखक अख्तर खान अकेला को भेंट करना साहित्यिक संवाद और लेखकीय संबंधों की आत्मीयता को दर्शाता है।
अख्तर खान अकेला ने ग्रहण की पुस्तक
पुस्तक प्राप्त करने वाले अख्तर खान अकेला विधि व्यवसाय, पत्रकारिता और लेखन से जुड़े हैं। उनका सार्वजनिक एवं बौद्धिक सरोकार कानूनी विषयों, सामाजिक प्रश्नों, जनहित और समसामयिक मुद्दों से संबंधित रहा है।
विधि, पत्रकारिता और साहित्य का आपस में गहरा संबंध है। कानून समाज के अधिकारों और दायित्वों की व्याख्या करता है, पत्रकारिता सामाजिक घटनाओं और जनसमस्याओं को सामने लाती है, जबकि साहित्य मानवीय अनुभवों, संवेदनाओं और विचारों को अभिव्यक्ति देता है। इन तीनों क्षेत्रों से जुड़े व्यक्तियों के बीच पुस्तकों और विचारों का आदान-प्रदान समाज में ज्ञान के प्रसार को प्रोत्साहित करता है।
इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार के.डी. अब्बासी की उपस्थिति ने इस आत्मीय मुलाकात को पत्रकारिता और साहित्य के साझा संवाद का स्वरूप प्रदान किया।
कलेक्ट्रेट का बरगद बना साहित्यिक मुलाकात का साक्षी
इस मुलाकात की एक विशेष बात इसका स्थान भी रहा। कोटा जिला कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित विशाल बरगद के पेड़ के नीचे पुस्तक भेंट करते हुए तीनों बुद्धिजीवियों की तस्वीर ज्ञान, अनुभव और साहित्यिक आत्मीयता का संदेश देती है।
बरगद भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में लंबे समय से छाया, आश्रय, स्थायित्व और सामुदायिक मेल-जोल का प्रतीक माना जाता रहा है। ऐसे वृक्षों के नीचे होने वाली मुलाकातें अक्सर स्मृतियों और अनुभवों से जुड़ जाती हैं। यहां भी पुस्तक के माध्यम से राजस्थान की साहित्यिक प्रतिभाओं को जानने और उनके योगदान पर चर्चा की संभावना के साथ एक यादगार क्षण सामने आया।
यह दृश्य इस बात की भी याद दिलाता है कि साहित्यिक गतिविधियों के लिए भव्य सभागार या बड़े आयोजन ही आवश्यक नहीं होते। कभी-कभी किसी पुस्तक का आत्मीयतापूर्वक भेंट किया जाना भी ज्ञान और विचारों के सम्मान का महत्वपूर्ण अवसर बन जाता है।
साहित्यिक विरासत के संरक्षण की दिशा में उपयोगी पहल
राजस्थान की साहित्यिक विरासत अत्यंत व्यापक है। यहां के रचनाकारों ने सामाजिक परिवर्तन, लोकजीवन, इतिहास, संस्कृति, मानवीय संबंधों और राष्ट्रीय चेतना जैसे विषयों पर विभिन्न विधाओं में लेखन किया है। इस विरासत को संरक्षित करने के लिए रचनाकारों के परिचय, प्रकाशित कृतियों और साहित्यिक योगदान का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण आवश्यक है।
‘राजस्थान रचनाकार परिचय कोष’ जैसी पुस्तकें पाठकों को प्रदेश के साहित्यिक परिदृश्य से परिचित कराने में सहायक हो सकती हैं। इनके माध्यम से नए पाठकों को लेखकों के बारे में जानने, शोधार्थियों को प्रारंभिक संदर्भ प्राप्त करने और साहित्य में रुचि रखने वालों को विविध रचनात्मक व्यक्तित्वों से परिचित होने का अवसर मिलता है।
इस प्रकार डॉ. प्रभात कुमार सिंघल द्वारा अख्तर खान अकेला को पुस्तक भेंट करने का यह अवसर केवल दो व्यक्तियों के बीच पुस्तक के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं, बल्कि साहित्यिक विरासत के प्रति सम्मान और ज्ञान-साझेदारी की भावना का परिचायक है।
संदेश स्पष्ट है—पुस्तकें केवल पढ़ने की वस्तु नहीं, बल्कि समाज की स्मृतियों, विचारों और रचनात्मक उपलब्धियों को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम हैं। राजस्थान के 552 साहित्यकारों एवं लेखकों का परिचय समेटे ‘राजस्थान रचनाकार परिचय कोष’ इसी दिशा में एक उपयोगी साहित्यिक संदर्भ के रूप में सामने आती है।


प्रथम नवरात्रि पर विद्या देवी का निधन,बेटी ने कराया नेत्रदान

 प्रथम नवरात्रि पर विद्या देवी का निधन,बेटी ने कराया नेत्रदान


रविवार को,शाइन इंडिया फाउंडेशन के डॉ कुलवंत गौड़ की मुँह बोली विज्ञान नगर निवासी ताई विद्या देवी अग्रवाल का हृदय घात से आकस्मिक निधन हुआ । डॉ गौड़ जो कि विज्ञान नगर में उनके पड़ोस में रहते थे, उनके बचपन का ज्यादातर समय विद्या के घर ही बीता था ।

जैसे ही विद्या का निधन हुआ बेटी अंशु अग्रवाल और दामाद नरेश मित्तल ने तुरंत ही,इस दुख भरी सूचना को डॉ गौड़ को दिया और उन्हें याद दिलाया कि माता जी ने कई बार अपने नेत्रदान की इच्छा जाहिर की थी ।

सूचना मिलते ही डॉ गौड़,घर पहुंचे और उन्होंने स्वयं निवास स्थान पर पहुंचकर,नम आंखों से ताई जी के नेत्रदान की प्रक्रिया को संपन्न किया । बेटी अंशु को इस बात की खुशी थी की, उनकी अंतिम इच्छा को समय रहते पूरा किया गया ।

ज्ञात हो कि,काफी समय पहले विद्यादेवी के पिता एस एन मंगल (आर्किटेक्ट इन्जीयर)  का भी , मरणोपरांत परिवार के सहयोग से नेत्रदान सम्पन्न हुआ था।

अगर वह कुछ समझें जो कुछ वह किया करते थे उसके बदले उन्हें चाहिए कि वह बहुत कम हॅसें और बहुत रोएँ

 

(जंगे तबूक़ में) रसूले ख़़ुदा के पीछे रह जाने वाले अपनी जगह बैठ रहने (और जिहाद में न जाने) से ख़ुश हुए और अपने माल और आपनी जानों से ख़ुदा की राह में जिहाद करना उनको मकरू मालूम हुआ और कहने लगे (इस) गर्मी में (घर से) न निकलो (ऐ रसूल) तुम कह दो कि जहन्नुम की आग (जिसमें तुम चलोगे उससे कहीं ज़्यादा गर्म है (81)
अगर वह कुछ समझें जो कुछ वह किया करते थे उसके बदले उन्हें चाहिए कि वह बहुत कम हॅसें और बहुत रोएँ (82)
तो (ऐ रसूल) अगर ख़ुदा तुम इन मुनाफेक़ीन के किसी गिरोह की तरफ (जिहाद से सहीसालिम) वापस लाए फिर तुमसे (जिहाद के वास्ते) निकलने की इजाज़त माँगें तो तुम साफ़ कह दो कि तुम मेरे साथ (जिहाद के वास्ते) हरगिज़ न निकलने पाओगे और न हरगिज़ दुश्मन से मेरे साथ लड़ने पाओगे जब तुमने पहली मरतबा (घर में) बैठे रहना पसन्द किया तो (अब भी) पीछे रह जाने वालों के साथ (घर में) बैठे रहो (83)
और (ऐ रसूल) उन मुनाफिक़ीन में से जो मर जाए तो कभी ना किसी पर नमाजे़ जनाज़ा पढ़ना और न उसकी क़ब्र पर (जाकर) खडे़ होना इन लोगों ने यक़ीनन ख़़ुदा और उसके रसूल के साथ कुफ्ऱ किया और बदकारी की हालत में मर (भी) गए (84)
और उनके माल और उनकी औलाद (की कसरत) तुम्हें ताज्जुब (हैरत) मने डाले (क्योकि) ख़ुदा तो बस ये चाहता है कि दुनिया में भी उनके माल और औलाद की बदौलत उनको अज़ाब में मुब्तिला करे और उनकी जान निकालने लगे तो उस वक़्त भी ये काफि़र (के काफि़र ही) रहें (85)
और जब कोई सूरा इस बारे में नाजि़ल हुआ कि ख़़ुदा को मानों और उसके रसूल के साथ जिहाद करो तो जो उनमें से दौलत वाले हैं वह तुमसे इजाज़त मांगते हैं और कहते हैं कि हमें (यहीं छोड़ दीजिए) कि हम भी (घर बैठने वालो के साथ (बैठे) रहें (86)
ये इस बात से ख़ुश हैं कि पीछे रह जाने वालों (औरतों, बच्चों, बीमारो के साथ बैठे) रहें और (गोया) उनके दिल

पर मोहर कर दी गई तो ये कुछ नहीं समझतें (87)
मगर रसूल और जो लोग उनके साथ ईमान लाए हैं उन लोगों ने अपने अपने माल और अपनी अपनी जानों से जिहाद किया- यही वह लोग हैं जिनके लिए (हर तरह की) भलाइयाँ हैं और यही लोग कामयाब होने वाले हैं (88)
ख़़ुदा ने उनके वास्ते (बेहष्त) के वह (हरे भरे) बाग़ तैयार कर रखे हैं जिनके (दरख़्तों के) नीचे नहरे जारी हैं (और ये) इसमें हमेशा रहेंगें यही तो बड़ी कामयाबी हैं (89)
और (तुम्हारे पास) कुछ हीला करने वाले गवार देहाती (भी) आ मौजदू हुए ताकि उनको भी (पीछे रह जाने की) इजाज़त दी जाए और जिन लोगों ने ख़़ुदा और उसके रसूल से झूठ कहा था वह (घर में) बैठ रहे (आए तक नहीं) उनमें से जिन लोंगों ने कुफ्ऱ एख़्तेयार किया अनक़रीब ही उन पर दर्दनाक अज़ाब आ पहुँचेगा (90)

11 अक्टूबर 2026

नवरात्रि का अध्यात्म, इतिहास और कोटा की परम्परा ऐतिहासिक तथ्य है, नवरात्रि

 

नवरात्रि का अध्यात्म, इतिहास और कोटा की परम्परा ऐतिहासिक तथ्य है, नवरात्रि , शक्ति की साधना, आस्था का इतिहास और बदलते समय में हमारी परम्पराएँ आध्यात्मिक चेतना से सामाजिक सरोकार तक हमें बहुत कुछ सीख देती हैं, कोटा की ऐतिहासिक विरासत का एक तथ्यात्मक अध्ययन, अगर हम देखें तो, नवरात्रि केवल पर्व नहीं, आत्मशक्ति के जागरण का अवसर है, भारतीय संस्कृति में नवरात्रि का स्थान केवल एक धार्मिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, साधना, अनुशासन, नारी सम्मान और बुराइयों पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में भी है, नौ रातों तक चलने वाली यह साधना मनुष्य को अपनी आंतरिक शक्तियों को पहचानने, अपने विकारों पर नियंत्रण रखने और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संदेश देती है,
नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है—नौ रातें, भारतीय धार्मिक परम्परा में वर्ष के दौरान चैत्र और आश्विन नवरात्रि विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं, चैत्र नवरात्रि वसंत ऋतु में आती है, जबकि शारदीय नवरात्रि वर्षा ऋतु के बाद आश्विन मास में मनाई जाती है, देवी दुर्गा की आराधना से जुड़ा यह पर्व शक्ति, साहस, करुणा और धर्म की रक्षा का संदेश देता है, इसका आध्यात्मिक अर्थ केवल मंदिर में दीप जलाने या व्रत रखने तक सीमित नहीं है, वास्तविक साधना यह भी है कि मनुष्य अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, लोभ, अन्याय और भेदभाव पर विजय प्राप्त करे, नवरात्रि की सार्थकता तभी है, जब देवी की पूजा के साथ महिलाओं का सम्मान, बेटियों की सुरक्षा, कमजोरों की सहायता और समाज में न्याय एवं सद्भाव की स्थापना को भी जीवन का उद्देश्य बनाया जाए, धार्मिक और शास्त्रीय दृष्टि से नवरात्रि का महत्त्व अगर हम देखें तो
देवी-आराधना की परम्परा भारतीय धार्मिक साहित्य में प्राचीन काल से मिलती है, देवी को सृष्टि की शक्ति, संरक्षण और परिवर्तन के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है,
मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत देवी माहात्म्य, जिसे दुर्गा सप्तशती या चंडी पाठ भी कहा जाता है, देवी-उपासना का एक प्रमुख ग्रंथ है, इसमें महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ तथा अन्य असुरों के विरुद्ध देवी के संघर्ष का वर्णन मिलता है , इन कथाओं का धार्मिक संदेश यह है कि जब अहंकार, अत्याचार और अन्याय अपनी सीमा पार करते हैं, तब उनके प्रतिरोध के लिए शक्ति का जागरण आवश्यक हो जाता है ,
देवी माहात्म्य के अनुसार, देवी को केवल एक युद्ध करने वाली शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि संसार का पालन करने वाली, संकटों से रक्षा करने वाली और भक्तों को अभय देने वाली शक्ति के रूप में भी चित्रित किया गया है, यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझनी चाहिए, धार्मिक आख्यान आस्था और आध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं; उनके प्रत्येक प्रसंग को आधुनिक इतिहास की घटना मानने के लिए स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण आवश्यक होंगे, श्रीमद्भगवद्गीता का आध्यात्मिक संदेश के तहत
श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 16 में दैवी और आसुरी गुणों का वर्णन है, अभय, सत्य, आत्मसंयम, दया और अहिंसा जैसे गुणों को दैवी सम्पदा में गिना गया है,
गीता का यह संदेश नवरात्रि की साधना के लिए भी प्रासंगिक है, धार्मिकता का मूल्य केवल बाहरी अनुष्ठान से नहीं, बल्कि मनुष्य के आचरण से भी आँका जाना चाहिए, यदि कोई व्यक्ति देवी की पूजा करता है, लेकिन महिलाओं का अपमान करता है, कमजोरों के अधिकारों का हनन करता है या अन्याय का साथ देता है, तो उसे अपनी धार्मिक साधना के वास्तविक उद्देश्य पर विचार करना चाहिए, नौ देवियाँ और नौ दिनों की साधना
नवरात्रि में परम्परागत रूप से माँ शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है, भक्त इन नौ स्वरूपों में शक्ति के विभिन्न गुणों का दर्शन करते हैं, शैलपुत्री — स्थिरता और दृढ़ संकल्प, ब्रह्मचारिणी , तपस्या, धैर्य और अनुशासन,
चंद्रघंटा — साहस और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की शक्ति।
कूष्मांडा — सृजन और जीवन की ऊर्जा, स्कंदमाता — मातृत्व, स्नेह और संरक्षण।
कात्यायनी — पराक्रम और संकल्प, कालरात्रि — भय पर विजय और संकटों का सामना,
महागौरी — पवित्रता और शांति, सिद्धिदात्री — साधना की पूर्णता और आध्यात्मिक उपलब्धि, इन गुणों को केवल पूजा के मंत्रों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, ये जीवन में अपनाए जाने वाले नैतिक आदर्श भी हैं, नवरात्रि हमें सिखाती है कि शक्ति का उद्देश्य दूसरों पर प्रभुत्व जमाना नहीं, बल्कि स्वयं को अनुशासित करना और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की क्षमता विकसित करना है ,घटस्थापना, व्रत, दुर्गा सप्तशती और कन्या पूजन की परम्परा, नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना या कलश स्थापना की जाती है, विभिन्न क्षेत्रों में पूजा-पद्धति में अंतर हो सकता है, लेकिन सामान्यतः कलश को शुभता, जीवन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, अनेक परिवारों में अखंड ज्योति जलाई जाती है, दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है, फलाहार रखा जाता है और प्रतिदिन आरती की जाती है, अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन की परम्परा भी प्रचलित है, इसमें छोटी बालिकाओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान देकर भोजन कराया जाता है और उपहार दिए जाते हैं, इस परम्परा का सामाजिक अर्थ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, यदि हम छोटी बालिकाओं को देवी मानकर पूजते हैं, तो उनके बड़े होने पर उनकी स्वतंत्रता, शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य और समान अधिकारों का सम्मान करना भी हमारा कर्तव्य है, कन्या पूजन का वास्तविक संदेश तभी पूरा होगा, जब समाज में बेटियों को बोझ न समझा जाए, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को स्वीकार न किया जाए और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए परिवार, समाज तथा प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाएँ,
कोटा की नवरात्रि धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत महत्वपूर्ण है,
राजस्थान का हाड़ौती क्षेत्र अपनी विशिष्ट धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परम्पराओं के लिए जाना जाता है, कोटा में देवी-आराधना, मंदिरों की परम्परा और दशहरा उत्सव का इतिहास शहर की सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है, कोटा की नवरात्रि परम्परा को समझने के लिए आशापुरा माता मंदिर, दाढ़ देवी मंदिर और रियासतकालीन दशहरा समारोह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं, इन परम्पराओं के अध्ययन में यह अंतर करना आवश्यक है कि किसी मंदिर की स्थापना का इतिहास क्या है, वहाँ पूजा की परम्परा कब से चली आ रही है और कोटा के दशहरा मेले का ऐतिहासिक विकास कब हुआ, ये तीनों बातें आपस में संबंधित होने के बावजूद एक ही ऐतिहासिक घटना नहीं हैं, कोटा दशहरा मेले का इतिहास, भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के उत्सव पोर्टल पर उपलब्ध विवरण के अनुसार, कोटा के दशहरा मेले का इतिहास वर्ष 1723 ईस्वी से जोड़ा जाता है, इस विवरण में बताया गया है कि महाराव दुर्जनशाल सिंह हाड़ा के शासनकाल में दशहरा समारोह की परम्परा आरम्भ हुई,
प्रारम्भिक आयोजन में विभिन्न मंदिरों में धार्मिक कार्यक्रम और राजकीय समारोह प्रमुख थे, राजसी शोभायात्राओं तथा ठिकानेदारों के दरबार से जुड़ी परम्पराओं का भी उल्लेख मिलता है ,बाद में कोटा के शासकों ने इस उत्सव का विस्तार किया, विशेष रूप से महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय के शासनकाल में दशहरा आयोजन को अधिक भव्य और आकर्षक स्वरूप मिलने का उल्लेख सरकारी पर्यटन विवरण में किया गया है, समय के साथ यह उत्सव धार्मिक समारोह से आगे बढ़कर विशाल मेले, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, लोककलाओं, व्यापारिक गतिविधियों और जनसहभागिता का प्रमुख अवसर बन गया, किशोरपुरा कोटा का आशापुरा माता मंदिर आस्था और दशहरा परम्परा का प्रमुख केन्द्र है, कोटा के दशहरा मैदान के निकट स्थित आशापुरा माता मंदिर शहर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है,
इस मंदिर के इतिहास के सम्बन्ध में प्रकाशित विवरणों में बताया गया है कि इसका निर्माण 1264 ईस्वी में बूंदी के राजकुमार जैतसिंह से जोड़ा जाता है, मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण महाराव उम्मेद सिंह द्वारा 1911 में करवाए जाने का भी उल्लेख मिलता है, ये तिथियाँ प्रकाशित ऐतिहासिक विवरणों पर आधारित हैं, इनके निर्णायक सत्यापन के लिए मंदिर के अभिलेख, शिलालेख अथवा संबंधित राजकीय दस्तावेजों का अध्ययन उपयोगी होगा,
स्थानीय धार्मिक परम्परा में आशापुरा माता मंदिर का विशेष स्थान है, दशहरा मेले के शुभारम्भ से पहले यहाँ पूजा-अर्चना किए जाने और पूर्व राजपरिवार की ओर से पारम्परिक रीति-रिवाजों का निर्वाह किए जाने का उल्लेख प्रकाशित विवरणों में मिलता है,
इस परम्परा का महत्त्व केवल धार्मिक नहीं है, यह कोटा की ऐतिहासिक स्मृति और वर्तमान सांस्कृतिक जीवन के बीच निरन्तरता का भी प्रतीक है,
नवरात्रि में मंदिरों में होने वाली पूजा हमें याद दिलाती है कि धार्मिक विरासत केवल इमारतों में नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं, अनुष्ठानों और सामुदायिक सहभागिता में भी जीवित रहती है, दाढ़ देवी मंदिर , कोटा राजपरिवार की धार्मिक परम्परा का ऐतिहासिक तथ्य है, कोटा के निकट स्थित दाढ़ देवी माता मंदिर भी क्षेत्र की प्रमुख धार्मिक आस्था का केन्द्र है, इसे कोटा के पूर्व राजपरिवार की कुलदेवी की परम्परा से जोड़ा जाता है,
राजस्थान पर्यटन विभाग के विवरण में दाढ़ देवी मंदिर और चैत्र नवरात्रि के दौरान आयोजित होने वाले नौ दिवसीय मेले का उल्लेख मिलता है,
नवरात्रि के समय मंदिरों में दर्शन, पूजा, धार्मिक आयोजन और मेलों में सहभागिता केवल शहरी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती, कोटा के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के श्रद्धालु भी इन धार्मिक अवसरों से जुड़े रहते हैं,
दाढ़ देवी मंदिर की परम्परा इस बात का उदाहरण है कि हाड़ौती में देवी-आराधना का स्वरूप मंदिर, ग्रामीण समाज, राजपरिवार की ऐतिहासिक स्मृति और आम जनमानस के बीच फैला हुआ है,व
हालाँकि, मंदिर की स्थापना की निश्चित तिथि, प्राचीन पूजा-पद्धति और राजकीय अनुष्ठानों के विस्तृत विवरण के लिए अतिरिक्त ऐतिहासिक शोध आवश्यक है, कोटा की नवरात्रि और दशहरा , पुरानी परम्पराओं से आधुनिक आयोजनों तक रियासतकालीन कोटा में दशहरा उत्सव धार्मिक अनुष्ठानों, राजकीय समारोहों और सामुदायिक भागीदारी से जुड़ा हुआ था, समय के साथ इसमें अनेक परिवर्तन हुए,
आज कोटा दशहरा मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोकसंस्कृति, मनोरंजन, पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी महत्त्वपूर्ण हिस्सा है,
वर्तमान आयोजनों में रामलीला, रावण दहन, लोकनृत्य, भजन संध्या, कवि सम्मेलन, , संगीत कार्यक्रम और व्यापारिक गतिविधियाँ शामिल होती हैं,
इन परिवर्तनों को केवल परम्परा के क्षरण के रूप में देखना उचित नहीं होगा, सांस्कृतिक उत्सवों का बदलना सामाजिक जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया भी है, आधुनिक आयोजनों से कलाकारों, दुकानदारों, छोटे व्यापारियों और स्थानीय व्यवसायों को अवसर मिलता है, साथ ही, नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित होने का मंच मिलता है,
लेकिन इसके साथ एक प्रश्न भी जुड़ा हुआ है—क्या हम अपने प्राचीन धार्मिक अनुष्ठानों, लोकगीतों, पारम्परिक कला और मंदिरों के इतिहास को उतनी ही गंभीरता से सुरक्षित रख रहे हैं, जितनी भव्यता से सार्वजनिक उत्सव आयोजित करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर केवल अनुमान से नहीं दिया जा सकता, इसके लिए पुराने अभिलेखों, समाचारपत्रों, स्थानीय कलाकारों की स्मृतियों और वर्तमान आयोजनों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है, कोटा की एक विशिष्ट परम्परा नांता के जेठी पहलवानों की रही है, यहां का दशहराकोटा की सांस्कृतिक विरासत में नांता क्षेत्र के जेठी पहलवानों की दशहरा परम्परा भी उल्लेखनीय है, विवरण के अनुसार, जेठी समुदाय के पहलवान रावण के मिट्टी के पुतले को जलाने के बजाय उसे पैरों से कुचलकर विजय का प्रतीकात्मक प्रदर्शन करते हैं,
इस परम्परा में लिंबाजा माता की पूजा, ढोल-नगाड़े, अखाड़े की परम्परा और सामुदायिक सहभागिता का उल्लेख किया गया है। समाचार में इस अनुष्ठान को लगभग 200 वर्ष पुरानी परम्परा बताया गया है, इस विवरण से यह स्पष्ट होता है कि कोटा में दशहरा और देवी-आराधना का सांस्कृतिक स्वरूप केवल एक बड़े मेले तक सीमित नहीं है, विभिन्न समुदायों की अपनी विशिष्ट परम्पराएँ भी इस विरासत को समृद्ध बनाती हैं, इस परम्परा की सटीक ऐतिहासिक शुरुआत और उसके क्रमिक विकास की पुष्टि के लिए जेठी अखाड़े के पुराने दस्तावेजों तथा मौखिक इतिहास का संकलन उपयोगी हो जाता है, नवरात्रि पूजा में वर्तमान बदलाव प्रासंगिक है, आस्था, तकनीक और सामाजिक जीवन, समय के साथ कोटा में नवरात्रि मनाने के तौर-तरीकों में भी परिवर्तन दिखाई देता है, घर-घर में घटस्थापना, दुर्गा सप्तशती का पाठ, व्रत, आरती और कन्या पूजन जैसी परम्पराएँ जारी हैं, दूसरी ओर, सार्वजनिक पंडालों, सामूहिक भजन संध्याओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और डिजिटल माध्यमों से धार्मिक सामग्री साझा करने का चलन भी बढ़ा है, आज श्रद्धालु ऑनलाइन आरती देखते हैं, धार्मिक प्रवचन सुनते हैं और दूर रहते हुए भी परिवार के साथ पूजा से जुड़े रहते हैं,
इन बदलावों के सकारात्मक पक्ष हैं, धार्मिक जानकारी तक पहुँच आसान हुई है और अधिक लोग सामूहिक आयोजनों में भाग ले सकते हैं, लेकिन उत्सव की सफलता को केवल भीड़, सजावट, ध्वनि-विस्तारक यंत्रों या खर्च से नहीं आँकना चाहिए,
नवरात्रि का वास्तविक मूल्य श्रद्धा, संयम, सेवा, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय व्यवहार में दिखाई देना चाहिए,
सार्वजनिक आयोजनों में स्वच्छता, यातायात व्यवस्था, अग्नि सुरक्षा, महिलाओं की सुरक्षा, दिव्यांगों के लिए सुविधाएँ और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं जितनी धार्मिक सजावट, नवरात्रि और नारी सम्मान का विशिष्ट सम्बन्ध पूजा से आगे बढ़कर अधिकारों की रक्षा से है, नवरात्रि में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, भारतीय समाज में माँ, बहन, बेटी और स्त्री के प्रति सम्मान की भावना भी इसी सांस्कृतिक परम्परा से जुड़ी हुई है,
लेकिन केवल धार्मिक प्रतीकों का सम्मान पर्याप्त नहीं है। महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, समान अवसर, स्वतंत्रता और न्याय मिलना भी आवश्यक है,
बेटियों की सुरक्षा के लिए परिवार, विद्यालय, समाज, पुलिस और प्रशासन की अपनी-अपनी जिम्मेदारी है, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, उत्पीड़न और भेदभाव को रोकने के लिए कानून का निष्पक्ष पालन और सामाजिक जागरूकता आवश्यक है,
यदि नवरात्रि के दौरान हम देवी के सामने दीप प्रज्वलित करते हैं, तो हमें अपने घरों और समाज में ऐसा वातावरण बनाने का संकल्प भी लेना चाहिए जहाँ किसी बेटी को भय में जीवन न बिताना पड़े,
यदि हम कन्या पूजन करते हैं, तो बालिकाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता भी करें,
यदि हम शक्ति की आराधना करते हैं, तो अन्याय के सामने मौन रहने के बजाय न्याय का साथ देने का साहस भी विकसित करें,
यही धार्मिक आस्था और सामाजिक उत्तरदायित्व का सार्थक संगम है, धर्म, सद्भाव और मानवता भारत की सांस्कृतिक परम्पराएँ विविधता के बीच सह-अस्तित्व का संदेश भी देती हैं, अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा-पद्धतियाँ, लोकाचार और धार्मिक आयोजन भिन्न हो सकते हैं, लेकिन सत्य, करुणा, न्याय और मानवीय गरिमा जैसे मूल्यों का महत्त्व व्यापक है,
कोटा की ऐतिहासिक पहचान भी केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, हाड़ौती की लोकसंस्कृति, विभिन्न समुदायों की परम्पराएँ, लोककलाएँ, साहित्य और साझा सामाजिक जीवन ने इस शहर को विशिष्ट बनाया है, नवरात्रि के अवसर पर हमें ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करना चाहिए जिसमें श्रद्धालु सम्मानपूर्वक पूजा कर सकें, सार्वजनिक कार्यक्रम सुरक्षित रहें और किसी भी समुदाय के प्रति घृणा या अपमान को प्रोत्साहन न मिले,
धार्मिक आस्था जब मानवता से जुड़ती है, तब वह समाज को जोड़ने वाली शक्ति बनती है,
ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने की जरूरत कोटा में चुनोतिपूर्ण है, कोटा की नवरात्रि और दशहरा परम्परा का प्रमाणिक इतिहास तैयार करने के लिए केवल प्रचलित मान्यताओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है,
इसके लिए आशापुरा माता और दाढ़ देवी मंदिरों के उपलब्ध अभिलेखों एवं शिलालेखों का दस्तावेजीकरण, कोटा रियासत के दशहरा समारोहों से संबंधित राजकीय आदेशों और व्यय अभिलेखों का अध्ययन,
पुराने समाचारपत्रों, तस्वीरों और कार्यक्रम पुस्तिकाओं का संग्रह,
मंदिरों के पुजारियों, स्थानीय इतिहासकारों, कलाकारों और बुजुर्ग नागरिकों से मौखिक इतिहास का संकलन,
नांता के जेठी पहलवानों जैसी विशिष्ट सामुदायिक परम्पराओं का रिकॉर्ड तैयार करना,
पुराने और वर्तमान दशहरा आयोजनों की तुलना करके सांस्कृतिक बदलावों का तथ्यात्मक विवरण तैयार करना,
राजस्थान राज्य अभिलेखागार के विवरण के अनुसार, कोटा के ऐतिहासिक अभिलेख 1675 से 1948 ईस्वी तक की अवधि से संबंधित हैं और इनमें हाड़ौती, अंग्रेजी तथा उर्दू भाषाओं में दस्तावेज उपलब्ध हैं, इन्हें सजोंना ज़रूरी है,
ये अभिलेख कोटा के रियासतकालीन इतिहास, धार्मिक आयोजनों और प्रशासनिक परम्पराओं पर आगे शोध करने के लिए उपयोगी हो सकते हैं। प्रत्येक विषय से संबंधित दस्तावेज की उपलब्धता और सामग्री का सत्यापन अलग से करना होगा, नवरात्रि शक्ति की आराधना का पर्व है, लेकिन इस शक्ति का सबसे सुंदर रूप वह है जो मनुष्य को न्यायप्रिय, संवेदनशील, साहसी और जिम्मेदार बनाए,
कोटा की नवरात्रि परम्परा में देवी मंदिरों की आस्था, रियासतकालीन इतिहास, दशहरा मेले की सांस्कृतिक विरासत और आम नागरिकों की सहभागिता के अनेक आयाम मौजूद हैं, समय के साथ उत्सवों का स्वरूप बदला है, धार्मिक अनुष्ठानों के साथ आधुनिक मंचीय कार्यक्रम, पर्यटन और व्यापारिक गतिविधियाँ जुड़ी हैं, इस परिवर्तन के बीच हमारी जिम्मेदारी है कि हम परम्परा के प्रमाणिक इतिहास को सुरक्षित रखें और उसकी मूल मानवीय भावना को जीवित रखें, नवरात्रि की सच्ची साधना केवल नौ दिनों की पूजा नहीं, बल्कि पूरे वर्ष सत्य, न्याय, करुणा, नारी सम्मान और सामाजिक सद्भाव के मूल्यों पर चलने का संकल्प है,
आइए, इस नवरात्रि हम केवल दीप जलाने का ही नहीं, बल्कि अज्ञान, अन्याय, भेदभाव और हिंसा के अंधकार को मिटाने का संकल्प लें, यही नवरात्रि का आध्यात्मिक संदेश है, यही हमारी सांस्कृतिक विरासत की आत्मा है और यही एक बेहतर समाज के निर्माण का मार्ग है।
— एडवोकेट अख्तर खान अकेला

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