देहदान जागरूकता के उत्कृष्ट कार्यों पर शाइन इंडिया फाउंडेशन सम्मानित, झालावाड़ जिला कलेक्टर ने दिया प्रशस्ति-पत्र
नेत्रदान,
अंगदान एवं देहदान जागरूकता के क्षेत्र में पिछले 15 वर्षों से निरंतर
कार्य कर रही संस्था शाइन इंडिया फाउंडेशन को देहदान के क्षेत्र में
उत्कृष्ट सेवाओं के लिए जिला प्रशासन एवं झालावाड़ मेडिकल कॉलेज द्वारा
सम्मानित किया गया।
कलेक्ट्रेट कार्यालय, झालावाड़ में आयोजित
सम्मान समारोह में जिला कलेक्टर अजय सिंह राठौड़ ने संस्था संस्थापक डॉ.
कुलवंत गौड़, भवानीमंडी नगर संयोजक कमलेश गुप्ता दलाल, झालावाड़
ज्योति-मित्र अजय गोयल एवं नितिन कटारिया को को प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर
सम्मानित किया।
संस्था के संस्थापक डॉ. कुलवंत गौड़ ने बताया कि
संस्था के सहयोग से झालावाड़ मेडिकल कॉलेज के भावी चिकित्सकों के अध्ययन
हेतु अब तक कोटा एवं बारां जिलों से 6 देहदान झालावाड़ मेडिकल कॉलेज को
प्राप्त हो चुके हैं।
संस्था के सदस्यों ने देहदान करने वाले सभी
परिवारों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जीवन के अंतिम क्षणों में
देहदान का निर्णय लेना अपने आप में अत्यंत साहस और संवेदनशीलता का परिचायक
है। ऐसे परिवार, जो अपने शहर से दूर अन्य मेडिकल कॉलेज तक पार्थिव देह
पहुंचाने का निर्णय लेते हैं, वास्तव में मानव सेवा की सर्वोच्च भावना का
परिचय देते हैं।
डॉ. कुलवंत गौड़ ने बताया कि संस्था के माध्यम से
अब तक 50 से अधिक देहदान सफलतापूर्वक संपन्न हो चुके हैं। इनमें से अधिकांश
देहदान कोटा से बाहर विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में कराए गए हैं, ताकि
संबंधित क्षेत्रों में भी देहदान के प्रति जागरूकता बढ़े तथा मेडिकल
कॉलेजों में अध्ययन हेतु मानव देह की कमी को दूर करने में सहयोग मिल सके।
आपका-अख्तर खान "अकेला"
तुम अपने किरदार को इतना बुलंद करो कि दूसरे मज़हब के लोग देख कर कहें कि अगर उम्मत ऐसी होती है,तो नबी कैसे होंगे? गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे.
08 जुलाई 2026
देहदान जागरूकता के उत्कृष्ट कार्यों पर शाइन इंडिया फाउंडेशन सम्मानित, झालावाड़ जिला कलेक्टर ने दिया प्रशस्ति-पत्र
तो तुम अपनी खेती में जिस तरह चाहो आओ और अपनी आइन्दा की भलाई के वास्ते (आमाल साके) पेशगी भेजो और ख़ुदा से डरते रहो और ये भी समझ रखो कि एक दिन तुमको उसके सामने जाना है और ऐ रसूल इमानदारों को नजात की ख़ुश ख़बरी दे दो
और (मुसलमानों) तुम मुशरिक औरतों से जब तक ईमान न लाएँ निकाह न करो क्योंकि
मुशरिकीन औरत तुम्हें अपने हुस्नो जमाल में कैसी ही अच्छी क्यों न मालूम
हो मगर फिर भी बंदा ए मोमिन उस से ज़रुर अच्छा है और मुशरिकीन जब तक ईमान न
लाएँ अपनी औरतें उन के निकाह में न दो और मुशरिक तुम्हे कैसा ही अच्छा
क्यो न मालूम हो मगर फिर भी ईमानदार औरत उस से ज़रुर अच्छी है और मुशरिकीन
जब तक ईमान न लाएँ अपनी औरतें उन के निकाह में न दो और मुशरिक तुम्हें क्या
ही अच्छा क्यों न मालूम हो मगर फिर भी बन्दा मोमिन उनसे ज़रुर अच्छा है ये
(मुशरिक मर्द या औरत) लोगों को दोज़ख़ की तरफ बुलाते हैं और ख़ुदा अपनी
इनायत से बहिश्त और बखि़्शश की तरफ बुलाता है और अपने एहकाम लोगों से साफ
साफ बयान करता है ताकि ये लोग चेते (221)
(ऐ रसूल) तुम से लोग हैज़ के बारे में पूछते हैं तुम उनसे कह दो कि ये
गन्दगी और घिन की बीमारी है तो (अय्यामे हैज़) में तुम औरतों से अलग रहो और
जब तक वह पाक न हो जाएँ उनके पास न जाओ बस जब वह पाक हो जाएँ तो जिधर से
तुम्हें ख़ुदा ने हुक्म दिया है उन के पास जाओ बेशक ख़ुदा तौबा करने वालो
और सुथरे लोगों को पसन्द करता है तुम्हारी बीवियाँ (गोया) तुम्हारी खेती
हैं (222)
तो तुम अपनी खेती में जिस तरह चाहो आओ और अपनी आइन्दा की भलाई के
वास्ते (आमाल साके) पेशगी भेजो और ख़ुदा से डरते रहो और ये भी समझ रखो कि
एक दिन तुमको उसके सामने जाना है और ऐ रसूल इमानदारों को नजात की ख़ुश
ख़बरी दे दो (223)
और (मुसलमानों) तुम अपनी क़समों (के हीले) से ख़ुदा (के नाम) को लोगों
के साथ सुलूक करने और ख़ुदा से डरने और लोगों के दरमियान सुलह करवा देने का
मानेअ न ठहराओं और ख़ुदा सबकी सुनता और सब को जानता है (224)
तुम्हारी लग़ो {बेकार} क़समों पर जो बेइख़्तेयार ज़बान से निकल जाए
ख़ुदा तुम से गिरफ़्तार नहीं करने का मगर उन कसमों पर ज़रुर तुम्हारी
गिरफ़्त करेगा जो तुमने क़सदन {जान कर} दिल से खायीं हो और ख़ुदा बख्शने
वाला बुर्दबार है (225)
जो लोग अपनी बीवियों के पास जाने से क़सम खायें उन के लिए चार महीने की
मोहलत है बस अगर (वह अपनी क़सम से उस मुद्दत में बाज़ आए) और उनकी तरफ
तवज्जो करें तो बेशक ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है (226)
और अगर तलाक़ ही की ठान ले तो (भी) बेशक ख़ुदा सबकी सुनता और सब कुछ जानता है (227)
और जिन औरतों को तलाक़ दी गयी है वह अपने आपको तलाक़ के बाद तीन हैज़
के ख़त्म हो जाने तक निकाह सानी से रोके और अगर वह औरतें ख़ुदा और रोजे़
आखि़रत पर इमान लायीं हैं तो उनके लिए जाएज़ नहीं है कि जो कुछ भी ख़ुदा ने
उनके रहम (पेट) में पैदा किया है उसको छिपाएँ और अगर उन के शौहर मेल जोल
करना चाहें तो वह (मुद्दत मज़कूरा) में उन के वापस बुला लेने के ज़्यादा
हक़दार हैं और शयरीयत के मुवाफिक़ औरतों का (मर्दों पर) वही सब कुछ हक़ है
जो मर्दों का औरतों पर है हाँ अलबत्ता मर्दों को (फ़जीलत में) औरतों पर
फौकि़यत ज़रुर है और ख़ुदा ज़बरदस्त हिक़मत वाला है (228)
तलाक़ (रजअई जिसके बाद रुजू) हो सकती है दो ही मरतबा है उसके बाद या तो
शयरीयत के मवाफिक़ रोक ही लेना चाहिए या हुस्न सुलूक से (तीसरी दफ़ा)
बिल्कुल रूख़सत और तुम को ये जायज़ नहीं कि जो कुछ तुम उन्हें दे चुके हो
उस में से फिर कुछ वापस लो मगर जब दोनों को इसका ख़ौफ़ हो कि ख़ुदा ने जो
हदें मुक़र्रर कर दी हैं उस को दोनो मिया बीवी क़ायम न रख सकेंगे फिर अगर
तुम्हे (ऐ मुसलमानो) ये ख़ौफ़ हो कि यह दोनो खुदा की मुकर्रर की हुयी हदो
पर क़ायम न रहेंगे तो अगर औरत मर्द को कुछ देकर अपना पीछा छुड़ाए (खुला
कराए) तो इसमें उन दोनों पर कुछ गुनाह नहीं है ये ख़ुदा की मुक़र्रर की
हुयी हदें हैं बस उन से आगे न बढ़ो और जो ख़ुदा की मुक़र्रर की हुयी हदों
से आगे बढ़ते हैं वह ही लोग तो ज़ालिम हैं (229)
फिर अगर तीसरी बार भी औरत को तलाक़ (बाइन) दे तो उसके बाद जब तक दूसरे
मर्द से निकाह न कर ले उस के लिए हलाल नही हाँ अगर दूसरा शौहर निकाह के बाद
उसको तलाक़ दे दे तब अलबत्ता उन मिया बीबी पर बाहम मेल कर लेने में कुछ
गुनाह नहीं है अगर उन दोनों को यह ग़ुमान हो कि ख़ुदा की हदों को क़ायम रख
सकेंगें और ये ख़ुदा की (मुक़र्रर की हुयी) हदें हैं जो समझदार लोगों के
वास्ते साफ़ साफ़ बयान करता है (230)
07 जुलाई 2026
कहने को तो समान नागरिक संहिता है ,, लेकिन मुस्लिम सहित सभी धर्मों के विशेषज्ञ प्रतिनिधि उसमे सदस्य तक नहीं
मृत्यु के बाद कीमती मकान-जेवर की तरह नेत्रदान,भी वसीयत में लिखें : सुषमा सोन
मृत्यु के बाद कीमती मकान-जेवर की तरह नेत्रदान,भी वसीयत में लिखें : सुषमा सोन
कोटा।
सामाजिक संस्था शाइन इंडिया फाउंडेशन द्वारा संचालित नेत्रदान जनजागरूकता
अभियान के अंतर्गत सुभाष विहार निवासी, सुषमा सोन ने अपने जन्मदिवस के अवसर
पर नेत्रदान का संकल्प लेते पत्र भरा।
इस अवसर पर उन्होंने समाज के
नाम एक महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि "जिस प्रकार हम अपनी मृत्यु के
बाद अपने कीमती मकान, जमीन-जायदाद और जेवर आदि के संबंध में वसीयत लिखकर
जाते हैं, उसी प्रकार हमें यह भी अपनी वसीयत में स्पष्ट रूप से लिखना चाहिए
कि,हमारी मृत्यु के पश्चात हमारे नेत्र अवश्य दान किए जाएं। इससे हमारे
परिवार को भी हमारी अंतिम इच्छा का सम्मान करने में सुविधा होगी और किसी
नेत्रहीन व्यक्ति के जीवन में फिर से उजाला आ सकेगा।"
सुषमा के पति
कृष्ण कुमार सोन,ने पत्नी के नेत्रदान संकल्प की सराहना करते हुए कहा
कि,नेत्रदान ऐसा महादान है,जो मृत्यु के बाद भी दो व्यक्तियों को नई रौशनी
प्रदान कर सकता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी वसीयत में नेत्रदान की इच्छा
का उल्लेख करे तथा अपने परिजनों को भी इसकी जानकारी दे, तो नेत्रदान की
संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है और हजारों दृष्टिबाधित लोगों को
नया जीवन मिल सकता है।
शाइन इंडिया फाउंडेशन के पदाधिकारियों ने
सुषमा सोन को जन्मदिवस की शुभकामनाएं देते हुए उनके इस प्रेरणादायी निर्णय
की सराहना की तथा इसे समाज के लिए अनुकरणीय पहल बताया। संस्था ने सभी
नागरिकों से अपील की कि वे अपने जन्मदिवस, विवाह वर्षगांठ अथवा अन्य विशेष
अवसरों पर नेत्रदान का संकल्प लेकर समाज में मानवता का संदेश फैलाएं।
(ऐ रसूल) बनी इसराइल से पूछो कि हम ने उन को कैसी कैसी रौशन निशानियाँ दी और जब किसी शख्स के पास ख़ुदा की नेअमत (किताब) आ चुकी उस के बाद भी उस को बदल डाले तो बेषक़ ख़ुदा सख़्त अज़ाब वाला है
(ऐ रसूल) बनी इसराइल से पूछो कि हम ने उन को कैसी कैसी रौशन निशानियाँ दी
और जब किसी शख्स के पास ख़ुदा की नेअमत (किताब) आ चुकी उस के बाद भी उस को
बदल डाले तो बेषक़ ख़ुदा सख़्त अज़ाब वाला है (211)
जिन लोगों ने कुफ्र इख़्तेयार किया उन के लिये दुनिया की ज़रा सी
जि़न्दगी ख़ूब अच्छी दिखायी गयी है और इमानदारों से मसखरापन करते हैं
हालाकि क़यामत के दिन परहेज़गारों का दरजा उनसे (कहीं) बढ़ चढ़ के होगा और
ख़ुदा जिस को चाहता है बे हिसाब रोज़ी अता फरमाता है (212)
(पहले) सब लोग एक ही दीन रखते थे (फिर आपस में झगड़ने लगे तब) ख़ुदा ने
नजात से ख़ुशख़बरी देने वाले और अज़ाब से डराने वाले पैग़म्बरों को भेजा
और इन पैग़म्बरों के साथ बरहक़ किताब भी नाजि़ल की ताकि जिन बातों में लोग
झगड़ते थे किताबे ख़़ुदा (उसका) फ़ैसला कर दे और फिर अफ़सोस तो ये है कि इस
हुक्म से इख़्तेलाफ किया भी तो उन्हीं लोगों ने जिन को किताब दी गयी थी और
वह भी जब उन के पास ख़ुदा के साफ एहकाम आ चुके उसके बाद और वह भी आपस की
शरारत से तब ख़ुदा ने अपनी मेहरबानी से (ख़ालिस) ईमानदारों को वह राहे हक़
दिखा दी जिस में उन लोगों ने इख़्तेलाफ डाल रखा था और ख़़ुदा जिस को चाहे
राहे रास्त की हिदायत करता है (213)
क्या तुम ये ख़्याल करते हो कि बेह्श्ते में पहुँच ही जाओगे हालाकि अभी
तक तुम्हे अगले ज़माने वालों की सी हालत नहीं पेश आयी कि उन्हें तरह तरह
की तक़लीफों (फाक़ा कशी मोहताजी) और बीमारी ने घेर लिया था और ज़लज़ले में
इस क़दर झिंझोडे़ गए कि आखि़र (आजि़ज़ हो के) पैग़म्बर और ईमान वाले जो उन
के साथ थे कहने लगे देखिए ख़ुदा की मदद कब (होती) है देखो (घबराओ नहीं)
ख़़ुदा की मदद यक़ीनन बहुत क़रीब है (214)
(ऐ रसूल) तुमसे लोग पूछते हैं कि हम ख़ुदा की राह में क्या खर्च करें
(तो तुम उन्हें) जवाब दो कि तुम अपनी नेक कमाई से जो कुछ खर्च करो तो (वह
तुम्हारे माँ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजो और परदेसियों का हक़
है और तुम कोई नेक सा काम करो ख़़ुदा उसको ज़रुर जानता है (215)
(मुसलमानों) तुम पर जिहाद फर्ज़ किया गया अगरचे तुम पर शाक़ ज़रुर है
और अजब नहीं कि तुम किसी चीज़ (जिहाद) को नापसन्द करो हालाकि वह तुम्हारे
हक़ में बेहतर हो और अजब नहीं कि तुम किसी चीज़ को पसन्द करो हालाॅकि वह
तुम्हारे हक़ में बुरी हो और ख़ुदा (तो) जानता ही है मगर तुम नही जानते हो
(216)
(ऐ रसूल) तुमसे लोग हुरमत वाले महीनों की निस्बत पूछते हैं कि (आया)
जिहाद उनमें जायज़ है तो तुम उन्हें जवाब दो कि इन महीनों में जेहाद बड़ा
गुनाह है और ये भी याद रहे कि ख़़ुदा की राह से रोकना और ख़ुदा से इन्कार
और मस्जिदुल हराम (काबा) से रोकना और जो उस के एहल है उनका मस्जिद से निकाल
बाहर करना (ये सब) ख़ुदा के नज़दीक इस से भी बढ़कर गुनाह है और फि़तना
परदाज़ी कुश्ती ख़़ून से भी बढ़ कर है और ये कुफ़्फ़ार हमेशा तुम से लड़ते
ही चले जाएँगें यहाँ तक कि अगर उन का बस चले तो तुम को तुम्हारे दीन से
फिरा दे और तुम में जो शख्स अपने दीन से फिरा और कुफ्ऱ की हालत में मर गया
तो ऐसों ही का किया कराया सब कुछ दुनिया और आखे़रत (दोनों) में अकारत है
और यही लोग जहन्नुमी हैं (और) वह उसी में हमेशा रहेंगें (217)
बेशक जिन लोगों ने ईमान क़ुबूल किया और ख़ुदा की राह में हिजरत की और
जिहाद किया यही लोग रहमते ख़ुदा के उम्मीदवार हैं और ख़ुदा बड़ा बख्शने
वाला मेहरबान है (218)
(ऐ रसूल) तुमसे लोग शराब और जुए के बारे में पूछते हैं तो तुम उन से कह
दो कि इन दोनो में बड़ा गुनाह है और कुछ फायदे भी हैं और उन के फायदे से
उन का गुनाह बढ़ के है और तुम से लोग पूछते हैं कि ख़ुदा की राह में क्या
ख़र्च करे तुम उनसे कह दो कि जो तुम्हारे ज़रुरत से बचे यूँ ख़ुदा अपने
एहकाम तुम से साफ़ साफ़ बयान करता है (219)
ताकि तुम दुनिया और आखि़रत (के मामलात) में ग़ौर करो और तुम से लोग
यतीमों के बारे में पूछते हैं तुम (उन से) कह दो कि उनकी (इसलाह दुरुस्ती)
बेहतर है और अगर तुम उन से मिलजुल कर रहो तो (कुछ हर्ज) नहीं आखि़र वह
तुम्हारें भाई ही तो हैं और ख़ुदा फ़सादी को ख़ैर ख़्वाह से (अलग ख़ूब)
जानता है और अगर ख़ुदा चाहता तो तुम को मुसीबत में डाल देता बेशक ख़ुदा
ज़बरदस्त हिक़मत वाला है (220)