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04 फ़रवरी 2026

क्या उन लोगों ने इतना भी ग़ौर नहीं किया कि हमने उनसे पहले कितनी उम्मतों को हलाक कर डाला और वह लोग उनके पास हरगिज़ पलट कर नहीं आ सकते

 क्या उन लोगों ने इतना भी ग़ौर नहीं किया कि हमने उनसे पहले कितनी उम्मतों को हलाक कर डाला और वह लोग उनके पास हरगिज़ पलट कर नहीं आ सकते (31)
(हाँ) अलबत्ता सब के सब इकट्ठा हो कर हमारी बारगाह में हाजि़र किए जाएँगे (32)
और उनके (समझने) के लिए मेरी कु़दरत की एक निशानी मुर्दा (परती) ज़मीन है कि हमने उसको (पानी से) जि़न्दा कर दिया और हम ही ने उससे दाना निकाला तो उसे ये लोग खाया करते हैं (33)
और हम ही ने ज़मीन में छुहारों और अँगूरों के बाग़ लगाए और हमही ने उसमें पानी के चशमें जारी किए (34)
ताकि लोग उनके फल खाएँ और कुछ उनके हाथों ने उसे नहीं बनाया (बल्कि खु़दा ने) तो क्या ये लोग (इस पर भी) शुक्र नहीं करते (35)
वह (हर ऐब से) पाक साफ है जिसने ज़मीन से उगने वाली चीज़ों और खु़द उन लोगों के और उन चीज़ों के जिनकी उन्हें ख़बर नहीं सबके जोड़े पैदा किए (36)
और मेरी क़ुदरत की एक निशानी रात है जिससे हम दिन को खींच कर निकाल लेते (जाएल कर देते) हैं तो उस वक़्त ये लोग अँधेरे में रह जाते हैं (37)
और (एक निशानी) आफताब है जो अपने एक ठिकाने पर चल रहा है ये (सबसे) ग़ालिब वाकि़फ (खु़दा) का (वाधा हुआ) अन्दाज़ा है (38)
और हमने चाँद के लिए मंजि़लें मुक़र्रर कर दीं हैं यहाँ तक कि हिर फिर के (आखि़र माह में) खजूर की पुरानी टहनी का सा (पतला टेढ़ा) हो जाता है (39)
न तो आफताब ही से ये बन पड़ता है कि वह माहताब को जा ले और न रात ही दिन से आगे बढ़ सकती है (चाँद, सूरज, सितारे) हर एक अपने-अपने आसमान (मदार) में चक्कर लगा रहें हैं (40)

03 फ़रवरी 2026

शुक्रिया आसिफ भाई, बहुमुखी प्रतिभा के धनी: एडवोकेट अख्तर खान अकेला ​शिक्षा और पत्रकारिता का संगम

 शुक्रिया आसिफ भाई, बहुमुखी प्रतिभा के धनी: एडवोकेट अख्तर खान अकेला
​शिक्षा और पत्रकारिता का
संगम
​एडवोकेट अख्तर खान अकेला ने अपनी वकालत की पढ़ाई के दौरान ही समाज को नई दिशा देने का संकल्प ले लिया था। इसी उद्देश्य के साथ उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा। उनके इस सफर की शुरुआत 'दैनिक धरती करे पुकार' समाचार पत्र से हुई, जहाँ उन्होंने अपनी लेखनी से जनहित के मुद्दों को उठाना शुरू किया।
​पत्रकारिता के क्षेत्र में लंबा अनुभव
​पत्रकारिता जगत में एडवोकेट अख्तर खान अकेला का एक लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है। उन्होंने 'दैनिक जननायक' समाचार पत्र में बरसों तक वरिष्ठ स्तर पर कार्य किया। अपनी निष्पक्ष पत्रकारिता के कारण वे मीडिया जगत में एक विश्वसनीय नाम बने। वर्तमान में, वे विगत कई वर्षों से 'दैनिक कोटा ब्यूरो' समाचार पत्र से निरंतर जुड़े हुए हैं।
​कोटा प्रेस क्लब में सक्रिय भूमिका
​पत्रकारों के हितों की रक्षा और पत्रकारिता के स्तर को बनाए रखने के लिए एडवोकेट अख्तर खान अकेला हमेशा सक्रिय रहे हैं। इसी प्रतिबद्धता के चलते उन्होंने 'कोटा प्रेस क्लब' की कार्यकारिणी में रहकर अपनी महत्वपूर्ण सेवाएं दी हैं। वे आज भी पत्रकारिता के माध्यम से समाज की आवाज़ बुलंद कर रहे हैं।
​मानवाधिकार और समाज सेवा के प्रहरी
​कानूनी ज्ञान और पत्रकारिता के अनुभव का उपयोग एडवोकेट अख्तर खान अकेला ने हमेशा पीड़ितों की मदद के लिए किया। 'ह्यूमन समिति' के माध्यम से वर्षों तक उन्होंने मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए कार्य किया और परेशान लोगों की शिकायतों का निवारण कर उन्हें राहत दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाई।
​धार्मिक और सामाजिक संगठनों में नेतृत्व
​एडवोकेट अख्तर खान अकेला ने समाज के विभिन्न प्रतिष्ठित पदों पर रहकर अपनी जिम्मेदारी निभाई है। वे 'कोटा वक्फ कमेटी' के उपाध्यक्ष के पद पर आसीन रह चुके हैं। इसके अलावा, वे कई सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर समाज सुधार और जन कल्याण के कार्यों में लगातार सक्रिय रहते हैं।
​जनता के प्रति अटूट समर्पण
​आज के दौर में एडवोकेट
अख्तर खान अकेला की पहचान एक ऐसे व्यक्ति के रूप में है जो पद और प्रतिष्ठा से ऊपर उठकर आमजन की सेवा में विश्वास रखते हैं। चाहे कोई पत्रकार हो, राजनेता हो या समाज का कोई भी आम नागरिक, वे हर किसी की मदद के लिए हमेशा तत्पर खड़े रहते हैं। ✍️आसिफ खान दैनिक कोटा ब्यूरो ✍️ 9829950550,,8005607979

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थैलेसीमिया मरीज बेहाल: एमबीएस में दवा आई, पर 10 दिन की देकर लौटाया

 

थैलेसीमिया मरीज बेहाल: एमबीएस में दवा आई, पर 10 दिन की देकर लौटाया
कल दिए ज्ञापन का असर, लेकिन व्यवस्था नाकाफी; बच्चों को महीने में 3 बार लाइन में लगना पड़ रहा
कोटा | 3 फरवरी
एमबीएस अस्पताल में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों और मरीजों की परेशानियां अभी भी खत्म नहीं हुई हैं। सोमवार को सामाजिक कार्यकर्ताओं निवर्तमान पार्षद सलीना शेरी के द्वारा अधीक्षक को दिए गए ज्ञापन के बाद अस्पताल में आयरन-चेलेशन की जरूरी दवाइयाँ (Deferasirox व Desferal) तो पहुंच गईं, लेकिन सप्लाई कम होने के कारण मरीजों को एक माह की जगह सिर्फ 10 दिन की दवा देकर लौटा दिया गया।
मंगलवार को दीपक अटरू क्षेत्र से दवा लेने पहुंचा, उसे भी सिर्फ 10 दिन की दवा दी गई। इसी तरह प्रदीप राठौर और साहिल को भी 10 दिन की दवा देकर वापस कर दिया गया। इससे परिजनों की चिंता और बढ़ गई है, क्योंकि गंभीर बीमारी में नियमित और पूरी खुराक न मिलना बच्चों की सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
तीन बार लाइन में लगने की मजबूरी
परिजनों का कहना है कि पहले एक माह की दवा मिलने से बच्चों को महीने में एक बार ही अस्पताल आना पड़ता था। अब 10-10 दिन की दवा मिलने से बच्चों को महीने में तीन बार लाइन में लगना पड़ेगा।
दवा लेने की प्रक्रिया भी काफी जटिल है—
पहले दवा काउंटर पर लंबी लाइन लगाकर पर्चा बनवाना पड़ता है,
फिर उप अधीक्षक के पास सील-साइन करवाने जाना होता है।
इस पूरी प्रक्रिया में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे थक जाते हैं और कई बार उनकी तबीयत भी बिगड़ जाती है।
निवर्तमान पार्षद सलीना शेरी ने उठाई मांग कि थैलेसीमिया बच्चों के लिए यह व्यवस्था अमानवीय है। उन्होंने मांग की है कि मरीजों को एक माह की दवा एक साथ दी जाए,थैलेसीमिया मरीजों के लिए अलग काउंटर बनाया जाए,वहीं पर पर्चा, सील-साइन और दवा देने की पूरी प्रक्रिया पूरी की जाए, ताकि बच्चों को बार-बार लाइन में न लगना पड़े।कल के ज्ञापन के बाद दवाइयाँ तो आईं, पर समस्या जस की तस परिजनों का कहना है कि कल दिए गए ज्ञापन के बाद दवाइयाँ आना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन सप्लाई कम होने से राहत अधूरी है। अगर नियमित और पर्याप्त मात्रा में दवाइयाँ नहीं मिलीं तो थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की जान पर खतरा बना रहेगा।
सामाजिक कार्यकर्ता निवर्तमान पार्षद सलीना शेरी ने प्रशासन से मांग की है कि थैलेसीमिया मरीजों के लिए दवाइयों की स्थायी व्यवस्था की जाए, ताकि उन्हें बार-बार परेशान न होना पड़े और इलाज में कोई रुकावट न आए।

#असम के #मुख्यमंत्री के विरुद्ध #सुप्रीम कोर्ट में #जमीअत उलमा-ए-हिंद ने याचिका दायर की*

 

#असम के #मुख्यमंत्री के विरुद्ध #सुप्रीम कोर्ट में #जमीअत उलमा-ए-हिंद ने याचिका दायर की*
*याचिकाकर्ता जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के नफरती बयानों के खिलाफ कठोर नियामक दिशा-निर्देश की मांग की*
नई दिल्ली, 2 फरवरी, 2026: जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने अपने अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के माध्यम से आज सुप्रीम कोर्ट में एक विस्तृत याचिका दायर करते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिसवा सरमा के हालिया सार्वजनिक बयान को गंभीर घृणा आधारित, सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ और संवैधानिक मूल्यों का खुला उल्लंघन बताया है।
याचिका में असम के मुख्यमंत्री के 27 जनवरी, 2026 को दिए गए उस भाषण का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, जिसमें उन्होंने यह दावा किया कि “चार से पांच लाख ‘मियां’ वोटर्स को मतदाता सूची से बाहर कर दिया जाएगा” और यह भी कहा कि वह और उनकी पार्टी “सीधे मियां लोगों के खिलाफ” हैं। याचिका के अनुसार, ‘मियां’ शब्द असम में मुसलमानों के लिए अपमानजनक और बेइज्जती करने वाले तरीके से प्रयोग किया जाता है।
याचिका में आगे कहा गया है कि असम के मुख्यमंत्री का उपरोक्त भाषण, इस संदर्भ में कि वह एक ऊंचे संवैधानिक पद आसीन हैं, किसी भी तरह से केवल अभिव्यक्ति के दायरे में नहीं आता, बल्कि इसका एकमात्र और प्रमुख उद्देश्य एक समुदाय के विरुद्ध नफरत, दुश्मनी और दुर्भावना को बढ़ावा देना है। ऐसे बयानों से सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचा है और एक विशेष समुदाय को सामूहिक रूप से निशाना बनाया है, जो अपने पद की गरिमा के साथ गद्दारी है।
जमीअत उलमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी अपील की है कि वह संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के भाषणों के लिए एक कठोर नियामक दिशा-निर्देश तय करे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी व्यक्ति संवैधानिक पद की आड़ में सांप्रदायिक नफरत फैलाने, उकसाने या किसी समुदाय को बदनाम करने का अधिकार न रखता हो। ऐसी संहिता इस सिद्धांत को मजबूत करेगी कि कोई भी व्यक्ति संविधान और कानून से ऊपर नहीं है और यही अवधारणा कानून के शासन का आधार है।
याचिका में कहा गया है कि इस तरह के बयान भारत के संविधान में प्रदत्त समानता, भाईचारे, धर्मनिरपेक्षता और इंसानी गरिमा की गारंटी को कमजोर करते हैं और अभिव्यक्ति की आजादी के संरक्षण में नहीं आ सकते। जमीअत ने इस ओर भी ध्यान दिलाया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नफरती बयानों के विरुद्ध स्वतः संज्ञान लेने से संबंधित स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद, ऐसे बयानों का जारी रहना चिंताजनक है।
ज्ञात रहे कि यह याचिका जमीअत उलमा-ए-हिंद की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही विचाराधीन हेट स्पीच और पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अपमान के खिलाफ रिट पिटीशन नंबर 1265/2021 में संलग्न की गई है। इस मामले में चार साल की सुनवाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए, फैसला सुनाने से पहले जमीअत उलमा-ए-हिंद के सीनियर वकील एमआर शमशाद और एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड फर्रुख रशीद से कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सुझाव मांगे हैं कि उनके अनुसार में देश में हेट स्पीच को रोकने के लिए कौन से प्रभावी और उपयोगी कदम आवश्यक हैं। इसलिए, यह याचिका इस मायने में अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इस समय सुप्रीम कोर्ट देश में बढ़ती हेट स्पीच, संवैधानिक पदों का गलत इस्तेमाल और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के भेदभावपूर्ण रवैये जैसे गंभीर मुद्दों के संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
प्रिय संपादकगण
इस प्रेस विज्ञप्ति को प्रकाशित करने की कृपा करें
भवदीय
नियाज़ अहमद फ़ारूक़ी
सचिव, जमीअत उलमा-ए-हिंद

मुझे जानबूझकर चुप कराया जा रहा है', राहुल गांधी ने लोकसभा स्पीकर को लिखी चिट्ठी

 

मुझे जानबूझकर चुप कराया जा रहा है', राहुल गांधी ने लोकसभा स्पीकर को लिखी चिट्ठी
लोकसभा में बोलने का मौका न मिलने पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है. उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे पर उन्हें जानबूझकर बोलने से रोका गया, जो लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है।
अपने पत्र में राहुल गांधी ने कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी गई. उन्होंने बताया कि सोमवार को जब वह भारत-चीन सीमा पर 2020 में हुए टकराव का जिक्र करते हुए एक मैगजीन का हवाला दे रहे थे, तब स्पीकर ने उनसे उस दस्तावेज को प्रमाणित करने को कहा।
राहुल गांधी के मुताबिक, संसदीय परंपरा के अनुसार किसी भी सदस्य को सदन में किसी दस्तावेज का उल्लेख करने से पहले उसे प्रमाणित करना होता है और उसकी जिम्मेदारी लेनी होती है, जो उन्होंने पूरी तरह निभाई।
राहुल गांधी ने लिखा कि परंपरा के अनुसार दस्तावेज प्रमाणित होने के बाद सदस्य को उसे उद्धृत करने की अनुमति दी जाती है और इसके बाद सरकार का दायित्व होता है कि वह उस पर जवाब दे. इस प्रक्रिया में स्पीकर की भूमिका वहीं समाप्त हो जाती है. इसके बावजूद उन्हें मंगलवार को बोलने से रोका गया, जो गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने आरोप लगाया कि लोकसभा में उन्हें बोलने से रोकना इस बात का संकेत है कि नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनकी आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है, खासकर तब जब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो. राहुल गांधी ने यह भी दोहराया कि राष्ट्रीय सुरक्षा राष्ट्रपति के अभिभाषण का अहम हिस्सा थी और इस पर संसद में चर्चा होना जरूरी है।
स्पीकर को उनके संवैधानिक दायित्व की याद दिलाते हुए राहुल गांधी ने लिखा कि सदन के निष्पक्ष संरक्षक के रूप में स्पीकर की जिम्मेदारी है कि वह सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के सदस्यों के अधिकारों की रक्षा करें. उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष और हर सांसद का बोलने का अधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है।
राहुल गांधी ने इसे संसदीय इतिहास की अभूतपूर्व घटना बताते हुए कहा कि पहली बार सरकार के कहने पर स्पीकर को नेता प्रतिपक्ष को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बोलने से रोकना पड़ा. उन्होंने इसे लोकतंत्र पर एक धब्बा बताते हुए अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया।
इससे पहले दिन में राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख एमएम नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण से जुड़े एक लेख की प्रति सदन में प्रमाणित की थी, लेकिन इसके बावजूद गतिरोध खत्म नहीं हुआ और सदन की कार्यवाही कुछ समय के लिए स्थगित करनी पड़ी. बाद में, जब राहुल गांधी अपनी बात पर अड़े रहे, तो पीठासीन अधिकारी ने अन्य वक्ताओं को बुलाया. विपक्ष के तीन सांसदों ने नेता प्रतिपक्ष के समर्थन में बोलने से इनकार कर दिया, जिसके बाद एनडीए के टीडीपी सांसद हरिश बलयोगी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपनी बात रखी...

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