जिसमें न ठन्डक है और न जहन्नुम की लपक से बचाएगा (31)
उससे इतने बड़े बड़े अँगारे बरसते होंगे जैसे महल (32)
गोया ज़र्द रंग के ऊँट हैं (33)
उस दिन झुठलाने वालों की ख़राबी है (34)
ये वह दिन होगा कि लोग लब तक न हिला सकेंगे (35)
और उनको इजाज़त दी जाएगी कि कुछ उज्र माअज़ेरत कर सकें (36)
उस दिन झुठलाने वालों की तबाही है (37)
यही फैसले का दिन है (जिस में) हमने तुमको और अगलों को इकट्ठा किया है (38)
तो अगर तुम्हें कोई दाँव करना हो तो आओ चल चुको (39)
उस दिन झुठलाने वालों की ख़राबी है (40)
बेशक परहेज़गार लोग (दरख़्तों की) घनी छाँव में होंगे (41)
और चश्मों और आदमियों में जो उन्हें मरग़ूब हो (42)
(दुनिया में) जो अमल करते थे उसके बदले में मज़े से खाओ पियो (43)
मुबारक हम नेकोकारों को ऐसा ही बदला दिया करते हैं (44)
उस दिन झुठलाने वालों की ख़राबी है (45)
(झुठलाने वालों) चन्द दिन चैन से खा पी लो तुम बेशक गुनेहगार हो (46)
उस दिन झुठलाने वालों की मिट्टी ख़राब है (47)
और जब उनसे कहा जाता है कि रूकूउ करों तो रूकूउ नहीं करते (48)
उस दिन झुठलाने वालों की ख़राबी है (49)
अब इसके बाद ये किस बात पर ईमान लाएँगे (50)
तुम अपने किरदार को इतना बुलंद करो कि दूसरे मज़हब के लोग देख कर कहें कि अगर उम्मत ऐसी होती है,तो नबी कैसे होंगे? गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे.
06 जुलाई 2021
उस दिन झुठलाने वालों की ख़राबी है
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
दोस्तों, कुछ गिले-शिकवे और कुछ सुझाव भी देते जाओ. जनाब! मेरा यह ब्लॉग आप सभी भाईयों का अपना ब्लॉग है. इसमें आपका स्वागत है. इसकी गलतियों (दोषों व कमियों) को सुधारने के लिए मेहरबानी करके मुझे सुझाव दें. मैं आपका आभारी रहूँगा. अख्तर खान "अकेला" कोटा(राजस्थान)