ब्रह्मचर्य पर मुनि योगसागर जी का संदेश
ब्रह्मचर्य केवल संयम नहीं, आत्मा में रमण की साधना : मुनि योगसागर जी
के डी अब्बासी
कोटा, 2 अक्टूबर। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार की प्रवचन श्रृंखला में ब्रह्मचर्याणुव्रत का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि ब्रह्म का अर्थ आत्मा है और आत्मा में लीन होने की दिशा में निरंतर बढ़ना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है।
मुनि श्री ने कहा कि ब्रह्मचर्य केवल बाहरी आचरण नहीं, बल्कि मन, वचन और काय के परिणामों की शुद्धि की साधना है। विषय-वासनाओं, राग-द्वेष और कषायों से सावधान रहकर आत्मस्वरूप में रमण करना ही इसका उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि काया, वचन और अंततः मन का संयम साधक को आत्मानुभूति की ओर ले जाता है।
मुनि श्री ने ब्रह्मचर्य व्रत के अतिचारों से बचने के लिए निरंतर जागरूकता, आचार-शास्त्र के अध्ययन और स्वाध्याय को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि अंतरंग विकारों पर विजय प्राप्त करना ही आत्मकल्याण के मार्ग को प्रशस्त करता है।

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