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25 मार्च 2026

देश भर में कांग्रेस की फ़ज़ीहत और लगातार हार के पीछे अगर रिसर्च रिपोर्ट्स को तलाशें , तो कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग का निकम्मा पन , अल्पसंख्यकों से संगठन की दूरी, पूरी तरह से ज़िम्मेदार है ,

 

देश भर में कांग्रेस की फ़ज़ीहत और लगातार हार के पीछे अगर रिसर्च रिपोर्ट्स को तलाशें , तो कांग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग का निकम्मा पन , अल्पसंख्यकों से संगठन की दूरी, पूरी तरह से ज़िम्मेदार है , देश जानता है ,के उत्तर प्रदेश , केरल , दक्षिणी भारत , महाराष्ट्र , मध्य्प्रदेश , दिल्ली, पंजाब, आसाम , उड़ीसा , गुजरात , पश्चिमी बंगाल सहित , कई ऐसे राज्य हैं , जहाँ अल्पसंख्यक वोटर्स को कांग्रेस का अल्पसंख्यक विभाग पूरी तरह से फिसड्डी ही नहीं बल्कि कांग्रेस से अल्पसंख्यकों की दूरी और अधिक बढ़ाने वाला साबित हुआ है , ओर यहां कोंग्रेस के हीरो से ज़ीरो बनने की स्थिति भी यही है,, राजस्थान में कमोबेश वही हालात प्रारम्भिक स्थिति में शुरू हो गए हैं , अलग अलग ज़िलों में , विधानसभा , लोकसभा चुनाव के वक़्त , इसका असर भी नज़र आता है , कई जगह पर सिर्फ अल्पसंख्यकों की क्रॉस वोटिंग, निर्दलीय उम्मीदवारी, वोटिंग प्रतिशत में कमी की वजह से ही , कांग्रेस भाजपा से जीती हुई बाज़ी हार रही है , वजह साफ़ है , कांग्रेस का मूल संगठन और अल्पसंख्यक वोटर्स को कांग्रेस संगठन से जोड़ने के लिए बनाया गया है , लेकिन कांग्रेस का अल्पसंख्यक विभाग राजस्थान में पूरी तरह से फिसड्डी साबित होता जा रहा है , राजस्थान के अल्पसंख्यक कोंग्रेस सियासी इतिहास पर अगर नज़र डालें तो, कई साल पहले जब अल्पसंख्यक विभाग नहीं , अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ हुआ करता था , तब राजस्थान अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक अब्दुल सत्तार एडवोकेट की क़यादत में अल्पसंख्यक खुद को सुरक्षित महसूस करते थे , उस वक़्त लोग देखते थे , के कांग्रेस में संगठन या फिर सरकारी स्तर पर अल्पसंख्यकों की उपेक्षा करने पर स्वर्गीय अब्दुल सत्तार एडवोकेट मंत्रियों , अधिकारीयों , और संगठन के नेताओं की आँखों में आँखे डालकर अल्पसंख्यकों की समस्याओं के समाधान की बात करने की ताक़त रखते थे , यह बात अलग है के उनकी इस दिलेरी की वजह से उनकी क़ाबलियत के बावजूद भी , उन्हें निजी तोर पर सियासी ओहदेदारी में उपेक्षित रखकर नुकसान दिया जाता रहा था , इसके बाद एक निज़ाम कुरैशी जो खेल विकास प्राधिकरण के चेयरमेन भी राह चुके , उन्हें जब कोंग्रेस अल्पसंख्यक विभाग बन गया था तब , उनकी नियुक्ति के बाद अल्पसंख्यक विभाग का थोड़ा दबदबा शुरू हुआ था , पूरे राजस्थान में अल्पसंख्यक विभाग की संभागीय स्तर पर विकेन्द्रीकरण की नियमावली के तहत , संभागीय अध्यक्ष , जिला अध्यक्ष , जिला कार्यकारिणी थी , ब्लोक अध्यक्ष थे, हर दो तीन माह में संभागीय सम्मेलन , जिला सम्मेलन और प्रदेश स्तरीय बैठकें आयोजित होती थी , अल्पसंख्यकों की समस्या उनके समाधान पर चर्चा होती थी , कोंग्रेस के नीति निर्धारक नेताओं से बैठक कर अल्पसंख्यकों के सियासी प्रतिनिधित्व , समस्याओं उनके समाधान पर चर्चा होती थी, जो लिखित में , मांगपत्र होते थे, मंत्रियों को नेताओं को , संगठन से जुड़े ज़िम्मेदार नेताओं को , अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व देने ,, निकाय , पंचायत , विधानसभा में टिकिट देने के लिए सर्वेक्षण रिपोर्ट देकर , साफ तोर पर चेतावनी दी जाती थी के , अगर रिपोर्ट के विपरीत कुछ हुआ तो , कांग्रेस को करारी हार हो सकती है , इन दो कार्यकाल में राजस्थान और जिला स्तरीय नियुक्तियों में खुली छूट थी, प्रदेश चेयरमेन, सम्भागीय चेयरमेन आज़ादी के साथ नियुक्ति पत्र जारी करने में सक्षम थे , स्वतन्त्र थे, एक अच्छे कार्यकर्ता को नियुक्त करने के लिये उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष की गुलामाना स्वीकृति की बंदिशे नहीं थी ,उन्हें पूरी अपने क्षेत्र में काम करने नियुक्तियां करने की खुली आज़ादी थी, जबकि राष्ट्रीय अध्यक्ष भी अल्पसंख्यकों की उपेक्ष की शिकायतों का संज्ञान लेकर, प्रदेश अध्यक्षों, मुख्यमंत्री या फिर वरिष्ठ नेताओं से खुलकर बात करते थे, राजस्थान में इन दो के अलावा , अलबत्ता आबिद कागज़ी के कार्यकाल में कोरोना में घर घर दवा, चिकित्सा, खाने के पैकिट अभियान चला, ईद के अवसर पर क़ोमी एकता कार्यक्रम हुए, लेकिन सचिन पायलट की बगावत के बाद सभी विभाग भंग हो जाने से स्थिति असमंजस रही, इनके अलावा, अल्पसंख्यक विभाग से जुड़े लोग, सिर्फ रस्म अदायगी से बाहर नहीं निकले ,, अजमेर चादर पोशी के अलावा, कभी भी एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिला के ऐसे नेतृत्व ने , अल्पसंख्यकों के हक़ के लिए कोई संघर्ष किया हो , कोई आवाज़ उठाई हो ,विपक्ष में रहे तो अपनी मांगों के समर्थन में कोई आंदोलन किया हो ,,सरकार में रहे तो अल्पसंख्यकों को उचित प्रतिनिधित्व दिलवाया हो , मदरसा पैराटीचर्स की नियुक्तियां हुई हो , जो नियुक्त है उन्हें प्रबोधक बनाया हो , उर्दू , वक़्फ़ सम्पत्तियों , अल्पसंख्यक वित्त विकास निगम की ऋण योजनाए , रोज़गार के अवसर , आरक्षण ,, पक्षपात पूर्ण नीतियों के खिलाफ कोई भी आवाज़ उठाई हो ,बस मुझे राज्य सभा में ले लो , मुझे यह दे दो , मुझे वोह दे दो , इससे बाहर अल्पसंख्यक का नेतृत्व नहीं निकला है , एक पूर्व अध्यक्ष जी की तो दिलेरी देखिए उन्होंने तो पदों की बोली लगाई, कोटा के पत्रकार जी तक इसके गवाह हैं , कुछ के रुपये तक लोटवाना पड़े, यही वजह रही है के अल्पसंख्यक विभाग कांग्रेस के लिए एक फायदे की जगह नुकसान का विभाग साबित होने लगा है , मूल संगठन में इनको , प्रॉपर सम्मान नहीं मिलता , टिकिट की दावेदारी के वक़्त या किसी अन्य मुख्य नीति निर्धारण बैठकों में , इन्हे अहमियत नहीं मिलती , अल्पसंख्यक विभाग अपने अपने ज़िले की समस्याओं के बारे में कोई आंदोलन नहीं कर पाते , संगठन में अल्पसंसख्यकों की समस्याएं समाधान पर कोई चर्चा नहीं होती , सिर्फ ज़िंदाबाद , मुर्दाबाद , भीड़ इसका निदान नहीं , ज़िले वार , क्षेत्रवार , पूरे राज्य की समस्याओं पर चिंतन होना ज़रूरी है ,, पिछले दिनों जयपुर के पास के ज़िले में हालात बिगड़े थे , अल्पसंख्यक विभाग की टीम गठित हुई थी , वोह तो वहां गई ही नहीं, फिर खुद प्रदेश कांग्रेस कमेटी की टीम गठित हुई , क्या हुआ , क्या रिपोर्ट आई किसी को आज तक पता नहीं ,, कोटा में वक़्फ़ सम्पत्ति बरकत उद्यान मस्जिद में मरम्मत कार्य तो छोडो , रमज़ानुल मुबारक के शब् ऐ क़द्र मौके पर ,, तबरेज़ पठान , सोनू अब्बासी और अन्य की कोशिशों के बावजूद भी वहां कोई समाधान नहीं निकला , ऐसे में कोटा के जम्बो जेट दिग्गज अल्पसंख्यक विभाग ने कोई आवाज़ ही नहीं उठाई ,,, यहां तक के रोज़े इफ्तार के कार्यक्रम तक नहीं हो पाए ,, जबकि अल्पसंख्यक विभाग की तरफ से हर बार प्रदेश , ज़िला स्तरीय कार्यक्रम होते रहे हैं, सभी जानते हैं हर ज़िले , हर कस्बे , राजस्थान की कई जगह पर अल्पसंख्यकों की समस्याएं तो बहुत है , लेकिन इन समस्याओं के समाधान के लिए विभाग की कोई पहल , कोई सर्वेक्षण नहीं है , अगर हर ज़िले के अल्पसंख्यक विभाग से जुड़े पदाधिकारी स्थानीय मुख्य कांग्रेस संगठन के नेतृत्व , पूर्व विधायक या विधायकों के ना नुकुर करने के बाद भी , उनसे उनकी समस्याओं के समाधान की आवाज़ उठाने के लिए जवाब तलब करे , तो ही ऐसा लगेगा , के अल्पसंख्यकों की आवाज़ के लिए कांग्रेस गम्भीर है कांग्रेस का अल्पसंख्यक विभाग गंभीर है ,, और अगर अल्पसंख्यकों में पोलिटिकल साक्षरता ,, समझ आ गई और वोह कांग्रेस और अल्पसंख्यक विभाग की बन्दर बाँट उपेक्षित व्यवस्था को समझ गए, तो फिर राजस्थान को भी बिहार , उत्तर प्रदेश , आसाम , उड़ीसा बनाने से कोई रोक नहीं सकेगा , हम कोटा में एक बार इस बगावत का खीमियाज़ा एक दिग्गज के चुनाव हार जाने का परिणाम देख चुके है , तो फिर क्या कांग्रेस के मूल संगठन को , कांग्रेस के सो में से सो फीसदी वोटर्स के दुःख दर्द , और उनके लिए पृथक से अल्पसंख्यक विभाग बनने के बाद भी उनकी उपेक्षा , उनकी समस्याओं पर खामोशी , टालमटोल , उनके प्रतिनिधित्व की उपेक्षा का दौर चलता ही रहा तो फिर , सो में से सो फीसदी वोट डालने वाला वर्ग अगर बिखर गया तो ,, इस संगठन का अल्लाह ही मालिक है , इसलिए कहता हूँ , अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा , कस्बे , ज़िले , और पुरे राजस्थान में अल्पसंख्यक विभाग को सक्रिय करें , अल्पसंख्यक समस्याओं के लिए संघर्षरत लोगों को जोड़े , उनके पुराने होमवर्क को समझें , और संगठन में नए लोगों को जगह दिलवाएं , मुख्य कांग्रेस में भी अलपसख्यक समाज से जुड़े लोगों को प्रतिनिधत्व दिलवाएं , उनके लिए आवाज़ उठायें उन्हें दूसरे समाज के वोट कट जाएंगे इस डर से उपेक्षित कर अछूत जैसा व्यवहार ना करें , और हो सके तो राजस्थान के अल्पसंख्यकों का विभाजन कांग्रेस से अलग होने से रोकने के लिए राजस्थान से राज्य सभा में किसी एक्टिव , हर दिल अज़ीज़ चेहरे को राज्य सभा में निर्वाचित करवाएं , वर्ना फिर मत कहना के पहले तो सावचेत ही नहीं किया , पहले तो बताया ही नहीं , अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान 9829086339

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