तमाम आलम ए इस्लाम को पुर खुलुस *जुमा *तुल *विदा * की
दिली मुबारकबाद 

ख़िदमत, अमन और अख़्लाक़ की राेशन मिसाल हैं-शहर काज़ी जनाब ज़ुबेर अहमद साहब
राजस्थान के ऐतिहासिक शहर कोटा की सरज़मीं लंबे अरसे से इल्म, अदब और दीनदारी की अमानत को संजोए हुए है। इसी शहर में बरसों तक शहर काज़ी के ओहदे पर फ़ाइज़ रहे मरहूम अनवार अहमद साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी ख़िदमत-ए-ख़ल्क़, इस्लाह-ए-मुआशरा और अमन-ओ-अमान की तालीम के लिए वक़्फ़ कर दी। उनका दरबार किसी इमारत का नाम नहीं था, बल्कि वह रहमत, हमदर्दी और इंसानियत का मरकज़ था। उनकी शख्सियत में सादगी की चमक, तवाज़ो (विनम्रता) की ख़ुशबू और ख़ुलूस (निष्कपटता) की गर्माहट साफ़ महसूस होती थी। जो भी उनके पास अपनी परेशानी लेकर आता, मायूसी की बजाय उम्मीद और तसल्ली लेकर लौटता। फ़ज्र की नमाज़ के बाद ज़कात की तक़सीम उनका मामूल था। वे ख़ामोशी से ग़रीबों और मुस्तहिक़ीन की ख़बरगीरी करते, उनकी इज़्ज़त-ए-नफ़्स का ख़ास ख़याल रखते और इस अंदाज़ से मदद करते कि लेने वाले का सर शर्म से झुके नहीं, बल्कि दुआओं से उठे।
कितने ही घराने जो टूटने की कगार पर थे, उनकी दानिशमंदी (बुद्धिमत्ता) और हिकमत (सूझबूझ) से दोबारा जुड़ गए। उन्होंने लोगों को अमन, सब्र और ईमान की राह दिखाई। वे अक्सर फ़रमाया करते थे कि “मुआशरे की असल ताक़त इत्तेहाद और भाईचारा है।”
आज उसी रौशन रवायत को जनाब शहर काज़ी जनाब ज़ुबेर अहमद साहब पूरी शिद्दत और ज़िम्मेदारी के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। कम वक़्त में ही उन्होंने अपने हुस्न-ए-अख़्लाक़, मिलनसारी, साफ़गोई और दरियादिली से अहल-ए-कोटा के दिलों में मुक़ाम बना लिया है। उनकी मजलिस में हर तबक़े के लोग बैठते हैं-कोई कारोबारी मसला लेकर आता है, कोई ख़ानदानी इख़्तिलाफ़, तो कोई तालीमी या मआशी परेशानी। वे हर एक की बात ग़ौर से सुनते, मुनासिब मशविरा देते और जहां तक मुमकिन हो, अमली मदद भी फ़रमाते हैं।
हर जुमे के दिन उनका दरबार रौनक़-ए-आम से भरा रहता है। मुहताज, यतीम, बेसहारा और मजबूर लोग उम्मीद की नज़र से आते हैं और दुआओं की दौलत लेकर जाते हैं। यह सिलसिला सिर्फ़ रस्म नहीं, बल्कि एक पाक रवायत की ताजगी है, जो इंसानियत के जज़्बे से सरशार है। शहर काज़ी जनाब ज़ुबेर अहमद साहब तालीम और अख़्लाक़ी बुनियाद को मज़बूत करने पर भी ख़ास तवज्जो देते हैं। वे अकसर मदरसों, स्कूलों और अदबी महफ़िलों में जाकर नौजवानों को इल्म के साथ किरदार की अहमियत समझाते हैं। उनका मानना है कि सिर्फ़ डिग्री हासिल कर लेना काफ़ी नहीं, बल्कि अदब, तहज़ीब, सब्र और एहतराम जैसे उसूलों को ज़िंदगी में उतारना असली कामयाबी है। वे वालिदैन को भी नसीहत करते हैं कि औलाद की तरबियत में दीन और दुनियावी तालीम के दरमियान तवाज़ुन क़ायम रखें। समाज में बढ़ती बेचैनी, इख़्तिलाफ़ात और ग़लतफ़हमियों को दूर करने के लिए वे मुक़ालमे (संवाद) और मशविरा (परामर्श) की रवायत को ज़िंदा रखने पर ज़ोर देते हैं। इस तरह उनकी कोशिश रहती है कि कोटा का मुआशरा सिर्फ़ मज़हबी तौर पर नहीं, बल्कि अख़्लाक़ी और तालीमी एतबार से भी तरक़्क़ी की राह पर गामज़न रहे।
रमज़ान-रहमतों और बरकतों का महीना
रमज़ानुल मुबारक के आते ही शहर काज़ी साहब की तक़रीरें और भी पुरअसर हो जाती हैं। वे याद दिलाते हैं कि रमज़ान महज़ भूख और प्यास का नाम नहीं, बल्कि तज़किया-ए-नफ़्स (आत्मशुद्धि) और मुहासिबा-ए-ज़ात (आत्ममंथन) का महीना है। यह वह मुबारक महीना है जिसमें बंदा अपनी ख़्वाहिशात पर क़ाबू पाना सीखता है। इस्लाम की बुनियाद 5 अरकान पर क़ायम है-कलमा, नमाज़, ज़कात, रोज़ा और हज। रोज़ा उनमें से एक अहम इबादत है, जो बंदे को सब्र, तक़वा और शुकर की दौलत अता करता है। इसी माह-ए-मुक़द्दस में क़ुरआन-ए-पाक नाज़िल हुआ, जो पूरी इंसानियत के लिए हिदायत और नूर का सरचश्मा है। शहर काज़ी ज़ुबेर अहमद साहब फ़रमाते हैं कि रमज़ान में हर नेक अमल का सवाब सत्तर गुना तक बढ़ा दिया जाता है। यह महीना रहमत, मग़फ़िरत और निज़ात का पैग़ाम लेकर आता है। हदीसों में बयान हुआ है कि इस महीने जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और दोज़ख़ के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं।
रोज़ा-जिस्म ही नहीं, रूह की भी इबादत
वे तशरीह करते हैं कि रोज़ा सिर्फ़ पेट का नहीं, बल्कि पूरे जिस्म और रूह का होना चाहिए। हाथ ज़ुल्म से रुकें, ज़ुबान ग़ीबत और झूठ से महफ़ूज़ रहे, आंखें बदनज़री से बचें, कान बुराई सुनने से परहेज़ करें और क़दम ग़लत राह की तरफ़ न बढ़ें-तभी रोज़े की हक़ीक़त मुकम्मल होती है। रोज़ा इंसान को भूख और प्यास का एहसास कराता है, ताकि वह ग़रीबों और मजबूरों के दर्द को समझ सके। यही एहसास इंसान के दिल में रहम, सख़ावत और हमदर्दी के जज़्बात को ज़िंदा करता है।
ज़कात और फ़ित्रा — इबादत के साथ इंसानियत
शहर काज़ी साहब इस बात पर ख़ास ज़ोर देते हैं कि साहिब-ए-निसाब लोग अपनी ज़कात और फ़ित्रा वक़्त पर अदा करें। अगर रमज़ान की इब्तिदा में ही मुस्तहिक़ीन तक मदद पहुंच जाए तो वे भी सुकून से रोज़ा रख सकें और ईद की ख़ुशियों में शरीक हो सकें। यह सिर्फ़ माली इमदाद नहीं, बल्कि इंसानियत की तकमील है।
नौजवान नस्ल और सामाजिक हमआहंगी
कोटा में रमज़ान अब सिर्फ़ इबादतों तक महदूद नहीं रहा, बल्कि यह नौजवान नस्ल की बिदारी और मुस्बत सरगर्मियों का प्रतीक बन चुका है। नौजवान बढ़-चढ़कर राहत के कामों में हिस्सा लेते हैं, इफ़्तार का इंतज़ाम करते हैं और ग़रीबों तक राशन पहुंचाते हैं। शहर काज़ी साहब उन्हें दीन और दुनिया के दरमियान तवाज़ुन (संतुलन) क़ायम रखने की नसीहत करते हैं। उनका पैग़ाम साफ़ है-मोहब्बत, भाईचारा और सामाजिक हमआहंगी ही किसी भी मुआशरे की असली पहचान है। वे अपने मरहूम पेशरव अनवार अहमद साहब की रवायत को मशअल-ए-राह मानते हुए उसी जज़्बे से सेवा का सफ़र जारी रखे हुए हैं।
आख़िर में उनकी दुआ होती है कि अल्लाह तआला हम सबको रमज़ान की हक़ीक़ी रूह समझने, अपने गुनाहों से तौबा करने और इंसानियत की ख़िदमत में आगे बढ़ने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। बेशक, जब क़ियादत (नेतृत्व) में ख़ुलूस, अमानतदारी और हमदर्दी हो तो शहर अमन और बरकत का गहवारा बन जाता है।

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