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16 मार्च 2026

क़लम की निष्पक्षता, तीखापन अगर आत्मा से हो तो प्रसाद पर्यन्त ओहदेदारी भी उसे प्रभावित नहीं कर सकती, सच अकेला होता है, नारायण बारहठ का निष्पक्ष लेखन मनोविज्ञान यही था

 

क़लम की निष्पक्षता, तीखापन अगर आत्मा से हो तो प्रसाद पर्यन्त ओहदेदारी भी उसे प्रभावित नहीं कर सकती,
सच अकेला होता है, नारायण बारहठ का निष्पक्ष लेखन मनोविज्ञान यही था
कोटा 16 मार्च, कोटा रेलवे स्टेशन खेरडी फाटक मार्ग पर एक विवाह समारोह में मौजूद एक शख़्सियत ने मुझ से सवाल किया, आप अकेला क्यों लिखते हो, में कुछ कहता इसके पहले ही, वरिष्ठतम पत्रकार भाई नारायण बारहट ने सवाल दाग़ा, सच के साथ क्या कोई खड़ा होता है, उनके इस सवाल पर मुझ से अकेला तखल्लुस के बारे सवाल करने वाले मेरी लेखनी को निष्पक्ष कहकर मेरी तारीफें करने लगे, लेकिन में अंदर से विचलित हो गया, मेरी दाढ़ी में उस वक़्त तिनका कोंध गया, में उस वक़्त निष्पक्ष नहीं कोंग्रेस का पक्षपाती था, में कोंग्रेस संगठन में ओहदेदार था, बस मेने कोंग्रेस संगठन की एकतरफा व्यवस्था त्यागी ओर निष्पक्ष लेखन फिर शुरू किया उसमें कोंग्रेस के खिलाफ भी लेखन रहा, नारायन बारहट का सबक सच अकेला होता मुझे भा गया, ओर यक़ीनन नारायण बारहट की लेखनी बंदिशों में नहीं थी, प्रसाद पर्यन्त ओहदेदारी के बाद भी उनकी स्वतन्त्र लेखनी, बेबाक भाषण बाज़ी उन्हें सबसे अलग सबसे जुदा करने के लियें काफी है,
कोटा की अदालत के गलियारों में एक वकील साहब के दफ्तर के मुन्तज़िम वर्कर से जननायक, कोमरेडगिरी, फिर नवभारत, नवभारत से बी बी सी लन्दन तक पहुंचना कोटा जर्नलिज़्म ही नहीं राजस्थान ओर देशभर के जर्नलिज़्म के लिये गौरव की बात है, तीखी क़लम, तीखी पत्रकारिता, पत्रकारिता की पक्षपाती व्यवसायिक नीति, राजनीतिक प्रेस अटैची, चमचागिरी, गुलामी की खुलकर पत्रकारिता कार्यक्रमों में आलोचना करना, ऐसी व्यवस्था के विरुद्ध खुली बगावत यक़ीनन पत्रकारिता के हक के लिये बढ़े संघर्ष की शुरुआत थी, पत्रकार संगठन पक्षपाती, क़लम पक्षपाती अगर होती नजर आती तो वोह बोलते ज़रूर थे, लिखते भी थे, यूँ तो पत्रकारिता क्षेत्र में पत्रकार की स्वच्छ छवि सरकारें, सियासी पार्टियां उनके नेता जिससे चिढ़ते हों वहीं निष्पक्ष ओर तीखी पत्रकारिता डिग्री कही जाती रही, वर्ना संगठन के विज्ञप्तिबाज़, सरकार में बैठे मंत्रियों, मुख्य मंत्री के प्रेस अटेची, स्पोकसपर्सन, सियासी लोगों के इर्द गिर्द जी हुज़ूर तो हर दिल अज़ीज़ , लोकप्रिय हो ही जाते है, फिर अगर पत्रकारिता से जुड़ी शख्सियत खबर नवीसी के साथ सियासी पार्टी का विधायक , सांसद वगेरा हो तो उसकी पत्रकारिता लानत हो जाती है, पम्पलेटगिरी तक सीमित रह जाती है, कोई अगर सरकारी सिस्ट्म का चहेता बनकर , सरकार के प्रसाद पर्यन्त पद पर लाभान्वित होकर सीधे मज़े लेना स्वीकार कर ले तो फिर उसकी इमेज पत्रकारिता की हरगिज़ नहीं रहती , सिर्फ सरकारी तनख़य्ये की बनकर रह जाती है, लेकिन तीखी क़लम अगर, क़लम के चलते मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के शासन में पत्रकारिता विश्विद्यालय स्थापित कर उसके वाइस चांसलर नियुक्त हो जाएं और फिर भी क़लम उनकी तीखी रहे, फिर मुख्य मंत्री अशोक गहलोत के तीसरे कार्यकाल में इसी तीखी क़लम के लिये मुख्यमंत्री कार्यालय का एक अधिकारी इन्हें सूचना आयुक्त बनाने की बात कहे , तब में खुद सूचना आयुक्त पद आवेदक ओर विधिक दावेदार था, तब में इस तीखी क़लम शख्सियत से सीधी बात कहते हैं अग्रिम बधाई दूं, तब यह तीखी क्लममुझ से, खुद को सूचना आयुक्त बनाने की सूचना को गलत बताते हुए कहें कि यह असम्भव है, वोह कहें मेने तो सूचना आयुक्त के लिये आवेदन ही नहीं किया , ओर वैसे भी में हरगिज़ हरगिज़ नहीं बनूँगा, इस में बर्दरली उनसे मैरी खुद की सिफारिश करने का निवेदन करूं, जवाब में वोह मुस्कुरा कर कहें , मेरी कहां चलती, ओर फिर जब अशोक गहलोत सूचना आयुक्त की नियुक्ति लिस्ट निकालें तो उसमें सबसे पहला नाम बिना आवेदक हुए , तीखी क़लम का ही प्रमुखता से हो तो फिर तो इस तीखी क़लम , तीखे क़लमकार की क़ाबलियत की कोई तो खास बात नज़र आती है, निष्पक्ष पत्रकारिता की गारंटी , देखिए एक सोच जो सरकारी सुविधा प्राप्त ओहदेदारों को क़तई निष्पक्ष पत्रकार, तीखी निष्पक्ष कलम नहीं मानती, ओर सच भी है क्योंकि सुविधाभोगी सरकारी महरबानी की ओहदेदारी से लाभान्वित कोई भी शख्सियत हो निष्पक्ष जर्नलिस्ट हो मुमकिन ही नहीं, लेकिन कोटा की अदालत के गलियारों से निकल कर बी बी सी की खुली अन्तर्राष्ट्रीय रिपोर्टिंग के बाद अशोक गहलोत वाइस चांसलर बनाएं, फिर सूचना आयुक्त बनाएं , ओहदे लेने के बाद भी, कोई पक्षपात नहीं, वही तीखापन , वही निष्पक्ष बेबाक लेखन , फिर ओहदे से उतरने पर सोशल मीडिया पर निष्पक्ष लेखनी के साथ सक्रियता , उस विचार को झूँठा साबित करती है, के सरकार के सुविधा भोगी, वैतनिक ओहदेदारी को स्वीकारने से निष्पक्षता मर जाती है, क़लम का तीखा पन कम हो जाता है, ओर यह सब कोटा की अदालत के गलियारों से, बी बी सी लन्दन, फिर पत्रकारिता विश्वविद्यालय, फिर सूचना आयुक्त की ओहदेदारी के बाद , वही क़लम तीखी नहीं होती, निष्पक्ष नहीं होती, बेबस , लाचार, होकर ओहदा देने वाले के इशारे पर थिरकने वाली हो जाती है, बिल्कुल गलत साबित हो जाती है, , अख़्तर खान अकेला कोटा राजस्थान 9829086339

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