हट्टे कट्टे, चुस्त दुरुस्त, नोजवान, जो सिर्फ आदतन भिखारी हैं, पेशेवर भिखारी हैं, क्या उन पर ज़कात वाजिब है, अख्तर, ,सवाल बहुत महत्वपूर्ण और सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील है। क़ुरआन व हदीस की रोशनी में इसका जवाब इस प्रकार है:

ज़कात किन लोगों पर खर्च की जा सकती है?
सबसे मूल आयत:

क़ुरआन – सूरह अत-तौबा (9:60)
"इन्नमस्सदक़ातु लिल्फुक़राइ वल मसाकीनी…"
(ज़कात तो केवल फक़ीरों, मिस्कीनों, ज़कात वसूल करने वालों, दिल जोड़ने वालों, ग़ुलामों को आज़ाद कराने, कर्ज़दारों, अल्लाह की राह और मुसाफ़िर के लिए है…)

यहाँ "फ़क़ीर" और "मिस्कीन" वास्तविक ज़रूरतमंद लोग हैं।

जो तंदुरुस्त होते हुए भी भीख माँगते हैं

क़ुरआन – सूरह अल-बक़रह (2:273)
"ख़ैरात उन गरीबों के लिए है जो अल्लाह की राह में रुक गए… नादान लोग उन्हें उनके आत्मसम्मान की वजह से अमीर समझते हैं… वे लोगों से लिपटकर नहीं माँगते।"

इस आयत से स्पष्ट है कि असली हक़दार वे हैं जो मजबूर हैं, न कि जो पेशेवर तरीके से मांगते हैं।

हदीस की रोशनी

सहीह बुख़ारी
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया:
"ऊपरी हाथ (देने वाला) नीचे हाथ (लेने वाले) से बेहतर है।"

सहीह मुस्लिम
हदीस में है:
"जो व्यक्ति लोगों से माल मांगता है, जबकि उसे ज़रूरत नहीं, वह क़यामत के दिन अपने चेहरे पर मांस का टुकड़ा भी नहीं पाएगा।"

सुनन अबू दाऊद
"मांगना केवल तीन व्यक्तियों के लिए जायज़ है:
बहुत अधिक कर्ज़दार
किसी आपदा से माल नष्ट हो गया हो
इतना निर्धन कि गुज़ारा संभव न हो"

निष्कर्ष (फ़िक़्ही हुक्म)

हट्टे-कट्टे, काम करने में सक्षम, लेकिन पेशेवर रूप से भीख मांगने वाले व्यक्ति पर ज़कात वाजिब नहीं है।

यदि वह व्यक्ति वास्तव में काम करने में सक्षम है और उसके पास कमाने के साधन मौजूद हैं, तो उसे ज़कात देना उचित नहीं।

हाँ, यदि बाहरी रूप से तंदुरुस्त दिखता हो लेकिन वास्तव में बेरोज़गारी, बीमारी, कर्ज़ या मजबूरी में हो, तो उसकी वास्तविक स्थिति की जाँच आवश्यक है।

सामाजिक दृष्टिकोण
इस्लाम मेहनत को सम्मान देता है।
हदीस में है कि एक व्यक्ति रस्सी लेकर लकड़ी काटकर बेचे, यह उससे बेहतर है कि वह लोगों से माँगे।

अंतिम बात

पेशेवर भिखारी → ज़कात के हक़दार नहीं

वास्तविक मजबूर, बेरोज़गार, कर्ज़दार → हक़दार हो सकते हैं
यदि चाहें तो मैं चारों इमामों (हनाफ़ी, शाफ़ई, मालिकी, हम्बली) का मत भी विस्तार से,,, अब चारों प्रसिद्ध फ़िक़्ही मज़ाहिब (इमामों) की राय संक्षेप में प्रस्तुत है कि हट्टे-कट्टे, कमाने में सक्षम लेकिन पेशेवर भिखारी को ज़कात दी जा सकती है या नहीं:

इमाम अबू हनीफ़ा (हनाफ़ी मत)
इमाम अबू हनीफ़ा

हनफ़ी फ़िक़्ह के अनुसार जो व्यक्ति कमाने की क्षमता रखता हो, उस पर काम करना ज़रूरी है।

यदि वह काम छोड़कर आदतन भीख माँगता है तो उसे ज़कात देना मकरूह/नाजायज़ माना गया है।

हक़दार वही है जो वास्तव में निसाब से कम माल रखता हो और कमाने में असमर्थ हो।

आधार: अल-हिदाया

इमाम मालिक (मालिकी मत)
इमाम मालिक

मालिकी मत के अनुसार भी जो व्यक्ति स्वस्थ और कमाने में सक्षम हो, उसे ज़कात देना उचित नहीं।

अगर वह काम छोड़कर भीख को पेशा बना ले, तो वह “फ़क़ीर” की श्रेणी में नहीं आता।

आधार: अल-मुदव्वना

इमाम शाफ़ई (शाफ़ई मत)
इमाम शाफ़ई

शाफ़ई मत में भी असली मापदंड “ज़रूरत” है।

जो व्यक्ति कमाने की क्षमता रखता है और रोजगार उपलब्ध है, उसे ज़कात देना सही नहीं।

आधार: अल-उम्म

इमाम अहमद बिन हम्बल (हम्बली मत)
इमाम अहमद बिन हम्बल

हम्बली मत के अनुसार भी जो व्यक्ति तंदुरुस्त हो और मेहनत कर सकता हो, उसे ज़कात नहीं दी जानी चाहिए।

यदि वह झूठ बोलकर या पेशेवर रूप से भीख मांगता है, तो यह गुनाह है।

आधार: अल-मुग़नी

चारों मज़ाहिब का संयुक्त निष्कर्ष

ज़कात केवल वास्तविक फक़ीर/मिस्कीन के लिए है (सूरह तौबा 9:60)।

स्वस्थ, कमाने में सक्षम, पेशेवर भिखारी ज़कात के हक़दार नहीं।

यदि कोई दिखने में स्वस्थ है लेकिन हक़ीक़त में मजबूर (रोज़गार नहीं, कर्ज़, आपदा) है, तो उसकी जाँच कर के दिया जा सकता है।
यदि आप चाहें तो मैं इस विषय पर समकालीन भारतीय उलेमा (दारुल उलूम देवबंद, नदवतुल उलेमा आदि) के फ़तवे ,अब समकालीन भारतीय उलेमा और प्रतिष्ठित दारुल इफ्ता के फ़तवों की रोशनी में इस मसले को देखते हैं:

दारुल उलूम देवबंद
दारुल इफ्ता देवबंद के कई फ़तवों में स्पष्ट किया गया है:

जो व्यक्ति कमाने की ताकत रखता हो और काम उपलब्ध हो, उसके लिए भीख माँगना जायज़ नहीं।

ऐसा व्यक्ति “फ़क़ीर” की श्रेणी में नहीं आता।

पेशेवर भिखारी को ज़कात देना सही नहीं, बल्कि वास्तविक जरूरतमंद तलाश करना चाहिए।
देवबंद का सिद्धांत:
“ज़कात का असली हक़दार वही है जो निसाब का मालिक न हो और कमाने से मजबूर हो।”

नदवतुल उलेमा
नदवा के उलेमा के अनुसार:

इस्लाम मेहनत को इबादत का दर्जा देता है।

तंदुरुस्त व्यक्ति का भीख को पेशा बना लेना शरीअत की रूह के खिलाफ है।

ज़कात का पैसा पेशेवर भिखारियों को देने के बजाय शिक्षा, रोज़गार या वास्तविक निर्धनों पर खर्च करना बेहतर है।

जामिया अशरफिया
यहाँ के फ़तवों में भी यही उल्लेख मिलता है:

अगर कोई व्यक्ति हट्टा-कट्टा है और काम कर सकता है, तो उसे ज़कात देना उचित नहीं।

हाँ, यदि वह अस्थायी बेरोज़गारी, कर्ज़ या आपदा से घिरा हो तो उसकी वास्तविक स्थिति देखकर निर्णय लिया जा सकता है।

बरेलवी मत के उलेमा
इमाम अहमद रज़ा खान की फ़तवा पुस्तकों (फ़तावा रज़विया) में भी उल्लेख है:

जो व्यक्ति बिना जरूरत मांगता है वह गुनाहगार है।

ज़कात का माल ऐसे व्यक्ति को देना उचित नहीं जो काम करने में सक्षम हो।

समकालीन उलेमा का संयुक्त मत

पेशेवर, आदतन भिखारी → ज़कात के हक़दार नहीं

तंदुरुस्त लेकिन मजबूर (रोज़गार न मिले, कर्ज़ में डूबा हो) → जांच के बाद दिया जा सकता है

ज़कात का सही उपयोग: गरीब, विधवा, अनाथ, कर्ज़दार, विद्यार्थी, मुसाफ़िर,
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