साहित्य : ग़ज़ल................3
* शमा फिरोज *
मदमस्त हो के लिक्खीं रंगीनियाँ ग़ज़ल में
उल्फ़त की मैंने लिक्खी हैं मस्तियाँ ग़ज़ल में
होते न जो मुहब्बत में कामयाब यारो
उनके लिए भी लिक्खीं कुछ फब्तियाँ ग़ज़ल में
यह शायरी नहीं है आसान खेल यारो
तहज़ीब और अदब की हैं सख़्तियाँ ग़ज़ल में
जो प्यार को हैं करते रुसवा ज़माने भर में
उनकी उड़ाई मैंने हैं धज्जियाँ ग़ज़ल में
कर दी बयाँ है मैंने जो दास्ताँ है मेरी
जो इश्क़ में मिलीं थीं नाकामियाँ ग़ज़ल में
धोखे मिले जो मुझको थे नाम पर वफ़ा के
मुझको मिलीं वो लिक्खीं रुसवाईयाँ ग़ज़ल में
कैसे गुज़ारी मैंने यह ज़िंदगी है अपनी
सब कुछ लिखीं हैं अपनी मजबूरियाँ ग़ज़ल में
टूटे हुए दिलों का मैंने ज़ियाँ लिखा है
लिख डालीं मयकदों कीं मदहोशियाँ ग़ज़ल में
महफ़िल की रौनक़ै हैं दीवानी मस्तियाँ भी
परवाने और "शम्मा" कीं शोखियाँ ग़ज़ल में
कोटा ( राज०)

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