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26 सितंबर 2020

हम वो आखरी पीढ़ी हैं*, जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है

 

● *हम वो आखरी पीढ़ी हैं*, जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है।
● *हम वो आखरी लोग हैं*, जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल खेले हैं।
● *हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होंने डिबरी, लालटेन या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और नावेल पढ़े हैं।
● *हम आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं, जवाब का हफ्तों या महीनों इंतजार किया है।
● *हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुज़ारा है।
● *हम वो आखरी लोग हैं*, जो अक्सर अपने छोटे छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे।
● *हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होंने स्याही वाली दवात से कदम, होल्डर या पेन से कॉपी, किताबें, कपड़े और हाथ काले, नीले किये है।
● *हम वो आखरी लोग हैं*, जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है।
● *हम वो आखरी लोग हैं*, जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, छिप जाता या घर आ जाया करते थे।
● *हम वो आखरी लोग हैं*, जिन्होंने अपने स्कूल के सफ़ेद केनवास पीटी शूज़ पर, खड़िया का पेस्ट लगा कर चमकाया हैं।
● *हम वो आखरी लोग हैं*, जिन्होंने गोदरेज साबुन की गोल डिबिया से साबुन लगाकर शेव बनाई है। जिन्होंने सिर्फ गुड़ की चाय पी है। काफी समय तक सुबह, नमक-सरसो का तेल, काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर से उंगली से मंजन किया है।
● *हम ही वो आखिरी लोग हैं*, जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो और बिनाका जैसे प्रोग्राम सुने हैं।
● *हम ही वो आखिर लोग हैं*, जो सब शाम होते ही छत पर पानी का छिड़काव किया करते थे। उसके बाद गद्दे चादरें या खटिया बिछा कर सोते थे। एक स्टैंड वाला, टेबव पंखा सब को घूम घूम कर हवा दिया करता था। सुबह सूरज निकलने के बाद भी ढीठ बने सोते रहते थे।
अब डब्बों जैसे कमरों में कूलर, एसी के सामने रात होती है, दिन गुज़रते हैं।
● *हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होने वो खूबसूरत रिश्ते और उनकी मिठास बांटने वाले लोग देखे हैं, जो लगातार कम होते चले गए। अब तो लोग जितना पढ़ लिख रहे हैं, उतना ही खुदगर्ज़ी, बेमुरव्वती, अनिश्चितता, अकेलेपन, व निराशा में खोते जा रहे हैं।
*हम ही वो खुशनसीब लोग हैं, जिन्होंने रिश्तों की मिठास महसूस की है...!!*
*हम एक मात्र वह पीढी है* *जिसने अपने माँ-बाप की बात भी मानी और बच्चों की भी मान रहे है.*
ये *जिंदगी की यादें*एक आदर्श स्मरणीय पलों को दर्शाती है अतः हमनें,हमारे साथ जी रही,पीढ़ी को,हकीकत से,*रू-बरु*कराने के उद्देश्य से,स्मरणों को एकत्रित करनें का प्रायास किया हैं,शायद आप को पसंद आ जाये?*

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