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19 अप्रैल 2020

फिर जब उसने उन स्त्रियों की मक्कारी की बात सुनी, तो उन्हें बुला भेजा

31 ﴿ फिर जब उसने उन स्त्रियों की मक्कारी की बात सुनी, तो उन्हें बुला भेजा और उनके (आतिथ्य) के लिए गाव-तकिये लगवाये और प्रत्येक स्त्री को एक छुरी दे दी[1]। उसने (यूसुफ़ से) कहाः इनके समक्ष “निकल आ”। फिर जब उन स्त्रियों ने उसे देखा, तो चकित (दंग) होकर अपने हाथ काट बैठीं तथा पुकार उठीं: अल्लाह पवित्र है! ये मनुष्य नहीं ये तो कोई सम्मानित फ़रिश्ता है।
1. ताकि अतिथि स्त्रियाँ उस से फलों को काट कर खायें जो उन के लिये रखे गये थे।
32 ﴿ उसने कहाः यही वह है, जिसके बारे में तुमने मेरी निंदा की है। वास्तव में, मैंने ही उसे रिझाया था। मगर वह बच निकला और यदि, वह मेरी बात न मानेगा, तो अवश्य बंदी बना दिया जायेगा और अपमानितों में हो जायेगा।
33 ﴿ यूसुफ़ ने प्रार्थना कीः हे मेरे पालनहार! मुझे क़ैद उससे अधिक प्रिय है, जिसकी ओर ये औरतें मुझे बुला रही हैं और यदि तूने मुझसे इनके छल को दूर नहीं किया, तो मैं इनकी ओर झुक पड़ूँगा और अज्ञानों में से हो जाऊँगा।
34 ﴿ तो उसके पालनहार ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उससे उनके छल को दूर कर दिया। वास्तव में, वह बड़ा सुनने-जानने वाला है।
35 ﴿ फिर उन लोगों[1] ने उचित समझा, इसके पश्चात् कि निशानियाँ देख[2] लीं कि उस (यूसुफ़) को एक अवधि तक के लिए बंदी बना दें।
1. अर्थात अज़ीज़ (मिस्र देश का शासक) और उस के साथियों ने। 2. अर्थात् यूसुफ़ के निर्दोष होने की निशानियाँ।
36 ﴿ और उसके साथ क़ैद में दो युवकों ने प्रवेश किया। उनमें से एक ने कहाः मैंने स्वप्न देखा है कि शराब निचोड़ रहा हूँ और दूसरे ने कहाः मैंने स्वप्न देखा है कि अपने सिर के ऊपर रोटी उठाये हुए हूँ, जिसमें से पक्षी खा रहे हैं। हमें इसका अर्थ (स्वप्नफल) बता दो। हम देख रहे हैं कि तुम सदाचारियों में से हो।
37 ﴿ यूसुफ़ ने कहाः तुम्हारे पास तुम्हारा वह भोजन नहीं आयेगा, जो तुम दोनों को दिया जाता है, परन्तु मैं तुम दोनों को उसका अर्थ (फल) बता दूँगा; ये उन बातों में से है, जो मेरे पालनहार ने मुझे सिखायी हैं। मैंने उस जाति का धर्म तज दिया है, जो अल्लाह पर ईमान नहीं रखती और वही परलोक को नकारने वाले हैं।
38 ﴿ और अपने पूर्वजों; इब्राहीम, इस्ह़ाक़ और याक़ूब के धर्म का अनुसरण किया है। हमारे लिए वैध नहीं कि किसी चीज़ को अल्लाह का साझी बनायें। ये अल्लाह की दया है, हमपर और लोगों पर। परन्तु अधिक्तर लोग कृतज्ञ नहीं होते[1]
1. अर्थात तौह़ीद और नबियों के धर्म को नहीं मानते जो अल्लाह का उपकार है।
39 ﴿ हे मेरे क़ैद के दोनों साथियो! क्या विभिन्न पूज्य उत्तम हैं या एक प्रभुत्वशाली अल्लाह??
40 ﴿ तुम अल्लाह के सिवा जिसकी इबादत (वंदना) करते हो, वे केवल नाम हैं, जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादा ने रख लिए हैं। अल्लाह ने उनका कोई प्रमाण नहीं उतारा है। शासन तो केवल अल्लाह का है। उसने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत (वंदना) न करो। यही सीधा धर्म है। परन्तु अधिक्तर लोग नहीं जानते हैं।

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