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16 अप्रैल 2020

दिमाग में जिसके जो पल रहा होता है ,उसकी जुबान उसकी क़लम से भी वही निकलता है

दिमाग में जिसके जो पल रहा होता है ,उसकी जुबान उसकी क़लम से भी वही निकलता है ,यह स्वीकृत तथ्य है ,,आप देखिये ,,कोरोना वाइरस से बचने की एडवाइज़री ,में एक अलफ़ाज़ ,किसी ने पैदा किया ,सोशल डिस्टेंसिंग ,,इसका हिंदी अर्थ ,,समाजों में दूरी ,कोरोना वाइरस कभी भी समाजों में दुरी बढ़ाकर काबू में करने वाला वाइरस नहीं है ,लेकिन जो भी इस एहतियात को लिखना चाहता था ,उस आविष्कारक के दिमाग में ,सिर्फ समाजों को बांटने का प्राथमिक विचार रहा होगा ,और इसीलिए सोशल डिस्टेंसिंग शब्द की एहतियात का अविष्कार हुआ ,जिसका अर्थ हम समझ लेते है ,के एक दूसरे व्यक्ति को एक दूसरे से ,छः फिट दूरी पर रहकर एहतियात बरतना है ,,इसका एडवाइज़री को अगर कोई भी निष्पक्ष , निर्विवाद किसी भी विचारधारा से प्रभावहीन व्यक्ति लिखता ,तो वोह ,,फिज़िकल डिस्टेंसिंग ,शब्द का इस्तेमाल करता ,, क्योंकि व्यक्ति को एक दूसरे से दूर रखने की एडवाइज़ है न की ,समाजो को एक दूसरे से दूर करने की एडवाइज़ तो भाई ,समझे न , सोशल डिस्टेंसिंग के अविष्कार और फिज़िकल डिस्टेंसिंग की हक़ीक़त का फ़र्क़ ,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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