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25 जनवरी 2020

जब हमने उनके ऊपर पर्वत को इस प्रकार छा दिया

171 ﴿ और जब हमने उनके ऊपर पर्वत को इस प्रकार छा दिया, जैसे वह कोई छतरी हो और उन्हें विश्वास हो गया कि वह उनपर गिर पड़ेगा, (तथा ये आदेश दिया कि) जो (पुस्तक) हमने तुम्हें प्रदान की है, उसे दृढ़ता से थाम लो तथा उसमें जो कुछ है, उसे याद रखो, ताकि तुम आज्ञाकारी हो जाओ।
172 ﴿ तथा (वह समय याद करो) जब आपके पालनहार ने आदम के पुत्रों की पीठों से उनकी संतति को निकाला और उन्हें स्वयं उनपर साक्षी (गवाह) बनाते हुए कहाः क्या मैं तुम्हारा पालनहार नहीं हूँ? सबने कहाः क्यों नहीं? हम (इसके) साक्षी[1] हैं; ताकि प्रलय के दिन ये न कहो कि हम तो इससे असूचित थे।
1. यह उस समय की बात है जब आदम अलैहिस्सलाम की उत्पत्ति के पश्चात् उन की सभी संतान को जो प्रलय तक होगी, उन की आत्माओं से अल्लाह ने अपने पालनहार होने की गवाही ली थी। (इब्ने कसीर)
173 ﴿ अथवा ये कहो कि हमसे पूर्व हमारे पूर्वजों ने शिर्क (मिश्रण) किया और हम उनके पश्चात् उनकी संतान थे। तो क्या तू गुमराहों के कर्म के कारण हमारा विनाश[1] करेगा?
1. आयत का भावार्थ यह है कि अल्लाह के अस्तित्व तथा एकेश्वर्वाद की आस्था सभी मानव का स्वभाविक धर्म है। कोई यह नहीं कह सकता कि मैं अपने पूर्वजों की गुमराही से गुमराह हो गया। यह स्वभाविक आन्तरिक आवाज़ है जो कभी दब नहीं सकती।
174 ﴿ और इसी प्रकार, हम आयतों को खोल-खोल कर बयान करते हैं, ताकि लोग (सत्य की ओर) लौट जायेँ।
175 ﴿ और उन्हें उसकी दशा पढ़कर सुनायें, जिसे हमने अपनी आयतों (का ज्ञान) दिया, तो वह उस (के खोल से) निकल गया। फिर शैतान उसके पीछे लग गया और वह कुपथों में हो गया।
176 ﴿ और यदि हम चाहते, तो उन (आयतों) के द्वारा उसका पद ऊँचा कर देते, परन्तु वह माया-मोह में पड़ गया और अपनी मनमानी करने लगा। तो उसकी दशा उस कुत्ते के समान हो गयी, जिसे हाँको, तब भी जीभ निकाले हाँपता रहे और छोड़ दो, तब भी जीभ निकाले हाँपता है। यही उपमा है, उन लोगों की, जो हमारी आयतों को झुठलाते हैं। तो आप ये कथायें उन्हें सुना दें, संभवतः वे सोच-विचार करें।
177 ﴿ उनकी उपमा कितनी बुरी है, जिन लोगों ने हमारी आयतों को झुठला दिया! और वे अपने ही ऊपर अत्याचार[1] कर रहे थे।
1. भाष्यकारों ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के युग और प्राचीन युग के कई ऐसे व्यक्तियों का नाम लिया है, जिन का यह उदाहरण हो सकता है। परन्तु आयत का भावार्थ बस इतना है कि प्रत्येक व्यक्ति जिस में यह अवगुण पाये जाते हों, उस की दशा यही होती है, जिस की जीभ से माया-मोह के कारण राल टपकती रहती है, और उस की लोभाग्नि कभी नहीं बुझती।
178 ﴿ जिसे अल्लाह सुपथ कर दे, वही सीधी राह पा सकता है और जिसे कुपथ कर दे,[1] तो वही लोग असफल हैं।
1. क़ुर्आन ने बार-बार इस तथ्य को दुहराया है कि मार्गदर्शन के लिये सोच-विचार की आवश्यक्ता है। और जो लोग अल्लाह की दी हुई विचार शक्ति से काम नहीं लेते, वही सीधी राह नहीं पाते। यही अल्लाह के सुपथ और कुपथ करने का अर्थ है।
179 ﴿ और बहुत-से जिन्न और मानव को हमने नरक के लिए पैदा किया है। उनके पास दिल हैं, जिनसे सोच-विचार नहीं करते, उनकी आँखें हैं, जिनसे[1] नहीं देखते और कान हैं, जिनसे नहीं सुनते। वे पशुओं के समान हैं; बल्कि उनसे भी अधिक कुपथ हैं, यही लोग अचेतना में पड़े हुए हैं।
1. आयत का भावार्थ यह है कि सत्य को प्राप्त करने के दो ही साधन हैः ध्यान और ज्ञान। ध्यान यह है कि अल्लाह की दी हुयी विचार शक्ति से काम लिया जाये। और ज्ञान यह है कि इस विश्व की व्यवस्था को देखा जाये और नबियों द्वारा प्रस्तुत किये हुये सत्य को सुना जाये, और जो इन दोनों से वंचित हो वह अंधा बहरा है।
180 ﴿ और अल्लाह ही के शुभ नाम हैं, अतः उसे उन्हीं के द्वारा पुकारो और उन्हें छोड़ दो, जो उसके नामों में परिवर्तन[1] करते हैं, उन्हें शीघ्र ही उनके कुकर्मों का कुफल दे दिया जायेगा।
1. अर्थात उस के गौणिक नामों से अपनी मूर्तियों को पुकारते हैं। जैसे अज़ीज़ से “उज़्ज़ा” और इलाह से “लात” इत्यादि।

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