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12 जुलाई 2018

काश (हम भी) मुसलमान होते

अलिफ़ लाम रा ये किताब (ख़ुदा) और वाजेए व रौशन क़ुरान की (चन्द) आयते हैं (1)
(एक दिन वह भी आने वाला है कि) जो लोग काफि़र हो बैठे हैं अक्सर दिल से चाहेंगें (2)
काश (हम भी) मुसलमान होते (ऐ रसूल) उन्हें उनकी हालत पर रहने दो कि खा पी लें और (दुनिया के चन्द रोज़) चैन कर लें और उनकी तमन्नाएँ उन्हें खेल तमाशे में लगाए रहीं (3)
अनक़रीब ही (इसका नतीजा) उन्हें मालूम हो जाएगा और हमने कभी कोई बस्ती तबाह नहीं की मगर ये कि उसकी तबाही के लिए (पहले ही से) समझी बूझी मियाद मुक़र्रर लिखी हुयी थी (4)
कोई उम्मत अपने वक़्त से न आगे बढ़ सकती है न पीछे हट सकती है (5)
(ऐ रसूल कुफ़्फ़ारे मक्का तुमसे) कहते हैं कि ऐ शख़्स (जिसको ये भरम है) कि उस पर ‘वही’ व किताब नाजि़ल हुई है तो (अच्छा ख़ासा) सिड़ी है (6)
अगर तू अपने दावे में सच्चा है तो फरिष्तों को हमारे सामने क्यों नहीं ला खड़ा करता (7)
(हालाँकि) हम फरिश्तों को खुल्लम खुल्ला (जिस अज़ाब के साथ) फैसले ही के लिए भेजा करते हैं और (अगर फरिश्ते नाजि़ल हो जाए तो) फिर उनको (जान बचाने की) मोहलत भी न मिले (8)
बेशक हम ही ने क़ुरान नाजि़ल किया और हम ही तो उसके निगेहबान भी हैं (9)
(ऐ रसूल) हमने तो तुमसे पहले भी अगली उम्मतों में (और भी बहुत से) रसूल भेजे (10)

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