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15 फ़रवरी 2018

क़ुरान का सन्देश

ऐ लोगों अपने पालने वाले से डरो जिसने तुम सबको (सिर्फ) एक शख़्स से पैदा किया और (वह इस तरह कि पहले) उनकी बाकी मिट्टी से उनकी बीवी (हव्वा) को पैदा किया और (सिर्फ़) उन्हीं दो (मियाँ बीवी) से बहुत से मर्द और औरतें दुनिया में फैला दिये और उस ख़ुदा से डरो जिसके वसीले से आपस में एक दूसरे से सवाल करते हो और क़तए रहम से भी डरो बेशक ख़ुदा तुम्हारी देखभाल करने वाला है (1)
और यतीमों को उनके माल दे दो और बुरी चीज़ (माले हराम) को भली चीज़ (माले हलाल) के बदले में न लो और उनके माल अपने मालों में मिलाकर न चख जाओ क्योंकि ये बहुत बड़ा गुनाह है (2)
और अगर तुमको अन्देशा हो कि (निकाह करके) तुम यतीम लड़कियों (की रखरखाव) में इन्साफ न कर सकोगे तो और औरतों में अपनी मजज़ी के मवाफि़क दो दो और तीन तीन और चार चार निकाह करो (फिर अगर तुम्हे इसका) अन्देशा हो कि (मुततइद) बीवियों में (भी) इन्साफ न कर सकोगे तो एक ही पर इक्तेफ़ा करो या जो (लौडी) तुम्हारी ज़र ख़रीद हो (उसी पर क़नाअत करो) ये तदबीर बेइन्साफ़ी न करने की बहुत क़रीने क़यास है (3)
और औरतों को उनके महर ख़ुशी ख़ुशी दे डालो फिर अगर वह ख़ुशी ख़ुशी तुम्हें कुछ छोड़ दे तो शौक़ से खाओ पियो (4)
और अपने वह माल जिनपर ख़ुदा ने तुम्हारी गुज़र क़रार दी है उन बेवकूफ़ों (ना समझ यतीम) को न दे बैठो हाँ उसमें से उन्हें खिलाओ और उनको पहनाओ (तो मज़ाएक़ा नहीं) और उनसे (शौक़ से) अच्छी तरह बात करो (5)
और यतीमों को कारोबार में लगाए रहो यहाँ तक के ब्याहने के क़ाबिल हों फिर उस वक़्त तुम उन्हे (एक महीने का ख़र्च) उनके हाथ से कराके अगर होशियार पाओ तो उनका माल उनके हवाले कर दो और (ख़बरदार) ऐसा न करना कि इस ख़ौफ़ से कि कहीं ये बड़े हो जाएंगे फ़ुज़ूल ख़र्ची करके झटपट उनका माल चट कर जाओ और जो (जो वली या सरपरस्त) दौलतमन्द हो तो वह (माले यतीम अपने ख़र्च में लाने से) बचता रहे और (हाँ) जो मोहताज हो वह अलबत्ता (वाजिबी) दस्तूर के मुताबिक़ खा सकता है पस जब उनके माल उनके हवाले करने लगो तो लोगों को उनका गवाह बना लो और (यॅू तो) हिसाब लेने को ख़ुदा काफ़ी ही है (6)
माँ बाप और क़राबतदारों के तरके में कुछ हिस्सा ख़ास मर्दों का है और उसी तरह माँ बाप और क़राबतदारो के तरके में कुछ हिस्सा ख़ास औरतों का भी है ख़्वाह तरका कम हो या ज़्यादा (हर शख़्स का) हिस्सा (हमारी तरफ़ से) मुक़र्रर किया हुआ है (7)
और जब (तरका की) तक़सीम के वक़्त (वह) क़राबतदार (जिनका कोई हिस्सा नहीं) और यतीम बच्चे और मोहताज लोग आ जाएं तो उन्हे भी कुछ उसमें से दे दो और उसे अच्छी तरह (उनवाने शाइस्ता से) बात करो (8)
और उन लोगों को डरना (और ख़्याल करना चाहिये) कि अगर वह लोग ख़ुद अपने बाद (नन्हे नन्हे) नातवाँ बच्चे छोड़ जाते तो उन पर (किस क़दर) तरस आता बस उनको (ग़रीब बच्चों पर सख़्ती करने में) ख़ुदा से डरना चाहिये और उनसे सीधी तरह बात करना चाहिए (9)
जो लोग यतीमों के माल नाहक़ चट कर जाया करते हैं वह अपने पेट में बस अंगारे भरते हैं और अनक़रीब जहन्नुम वासिल होंगे (10)

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