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14 जून 2017

क़ुरआन का सन्देश

ऐ ईमानवालों ख़ुदा और उसके रसूल (मोहम्मद (स०)) पर और उसकी किताब पर जो उसने अपने रसूल (मोहम्मद) पर नाजि़ल की है और उस किताब पर जो उसने पहले नाजि़ल की ईमान लाओ और (ये भी याद रहे कि) जो शख़्स ख़ुदा और उसके फ़रिश्तों और उसकी किताबों और उसके रसूलों और रोज़े आखि़रत का मुन्किर हुआ तो वह राहे रास्त से भटक के दूर जा पड़ा (136)  
बेशक जो लोग ईमान लाए उसके बाद फि़र काफि़र हो गए फिर ईमान लाए और फिर उसके बाद काफि़र हो गये और कुफ़्र में बढ़ते चले गए तो ख़ुदा उनकी मग़फि़रत करेगा और न उन्हें राहे रास्त की हिदायत ही करेगा (137)
(ऐ रसूल) मुनाफि़क़ों को ख़ुशख़बरी दे दो कि उनके लिए ज़रूर दर्दनाक अज़ाब है (138)
जो लोग मोमिनों को छोड़कर काफि़रों को अपना सरपरस्त बनाते हैं क्या उनके पास इज़्ज़त (व आबरू) की तलाश करते हैं इज़्ज़त सारी बस ख़ुदा ही के लिए ख़ास है (139)
(मुसलमानों) हालाँकि ख़ुदा तुम पर अपनी किताब कु़रान में ये हुक्म नाजि़ल कर चुका है कि जब तुम सुन लो कि ख़ुदा की आयतों से ईन्कार किया जाता है और उससे मसख़रापन किया जाता है तो तुम उन (कुफ़्फ़ार) के साथ मत बैठो यहाँ तक कि वह किसी दूसरी बात में ग़ौर करने लगें वरना तुम भी उस वक़्त उनके बराबर हो जाओगे उसमें तो शक ही नहीं कि ख़ुदा तमाम मुनाफि़क़ों और काफि़रों को (एक न एक दिन) जहन्नुम में जमा ही करेगा (140)
(वो मुनाफ़ेकीन) जो तुम्हारे मुन्तजि़र है (कि देखिए फ़तेह होती है या शिकस्त) तो अगर ख़ुदा की तरफ़ से तुम्हें फ़तेह हुयी तो कहने लगे कि क्या हम तुम्हारे साथ न थे और अगर (फ़तेह का) हिस्सा काफि़रों को मिला तो (काफि़रों के तरफ़दार बनकर) कहते हैं क्या हम तुमपर ग़ालिब न आ गए थे (मगर क़सदन तुमको छोड़ दिया) और तुमको मोमिनीन (के हाथों) से हमने बचाया नहीं था (मुनाफि़क़ों) क़यामत के दिन तो ख़ुदा तुम्हारे दरमियान फै़सला करेगा और ख़ुदा ने काफि़रों को मोमिनीन पर वर {ऊँचा} रहने की हरगिज़ कोई राह नहीं क़रार दी है (141)
बेशक मुनाफि़क़ीन (अपने ख़्याल में) ख़ुदा को फरेब देते हैं हालाँकि ख़ुदा ख़ुद उन्हें धोखा देता है और ये लोग जब नमाज़ पढ़ने खड़े होते हैं तो (बे दिल से) अलकसाए हुए खड़े होते हैं और सिर्फ लोगों को दिखाते हैं और दिल से तो ख़ुदा को कुछ यू ही सा याद करते हैं (142)
इस कुफ़्र व इमान के बीच अधड़ में पड़े झूल रहे हैं न उन (मुसलमानों) की तरफ़ न उन काफि़रों की तरफ़ और (ऐ रसूल) जिसे ख़ुदा गुमराही में छोड़ दे उसकी (हिदायत की) तुम हरगिज़ सबील नहीं कर सकते (143)
ऐ ईमान वालों मोमिनीन को छोड़कर काफि़रों को (अपना) सरपरस्त न बनाओ क्या ये तुम चाहते हो कि ख़ुदा का सरीही इल्ज़ाम अपने सर क़ायम कर लो (144)
इसमें तो शक ही नहीं कि मुनाफि़क जहन्नुम के सबसे नीचे तबके़ में होंगे और (ऐ रसूल) तुम वहाँ किसी को उनका हिमायती भी न पाओगे (145)
मगर (हाँ) जिन लोगों ने (निफ़ाक़ से) तौबा कर ली और अपनी हालत दुरूस्त कर ली और ख़ुदा से लगे लिपटे रहे और अपने दीन को महज़ ख़ुदा के वास्ते निरा खरा कर लिया तो ये लोग मोमिनीन के साथ (बेहिश्त में) होंगे और मोमिनीन को ख़ुदा अनक़रीब ही बड़ा (अच्छा) बदला अता फ़रमाएगा (146)
अगर तुमने ख़ुदा का शुक्र किया और उसपर ईमान लाए तो ख़ुदा तुम पर अज़ाब करके क्या करेगा बल्कि ख़ुदा तो (ख़ुद शुक्र करने वालों का) क़दरदा और वाकि़फ़कार है (147)
ख़ुदा (किसी के) हाँक पुकार कर बुरा कहने को पसन्द नहीं करता मगर मज़लूम (ज़ालिम की बुराई बयान कर सकता है) और ख़ुदा तो (सबकी) सुनता है (और हर एक को) जानता है (148)
अगर खुल्लम खुल्ला नेकी करते हो या छुपा कर या किसी की बुराई से दरगुज़र करते हो तो तो ख़ुदा भी बड़ा दरगुज़र करने वाला (और) क़ादिर है (149)
बेशक जो लोग ख़ुदा और उसके रसूलों से इन्कार करते हैं और ख़ुदा और उसके रसूलों में तफ़रक़ा डालना चाहते हैं और कहते हैं कि हम बाज़ (पैग़म्बरों) पर ईमान लाए हैं और बाज़ का इन्कार करते हैं और चाहते हैं कि इस (कुफ़्र व इमान) के दरमियान एक दूसरी राह निकलें (150)

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