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11 मई 2017

ट्रिपल तलाक़ पर ,,सरकार और मीडिया की साज़िश टांय टांय फिस्स होने जा रही है

ट्रिपल तलाक़ पर ,,सरकार और मीडिया की साज़िश टांय टांय फिस्स होने जा रही है ,,,माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने ,,,ट्रिपल तलाक़ धर्म का हिस्सा होने पर हस्तक्षेप नहीं करने के संकेत दिए है ,,,जबकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनवाई की लक्ष्मण रेखा गाइड लाइन से स्पष्ट लग रहा है ,,के ,,उत्तरप्रदेश की शमीम आरा वाला मामला ,,जो सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच ,ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे को ,,क़ुरआन शरीफ की सुर ऐ अननीसा ,,में दिए गए फरमान के हिसाब से पहले ही मर्यादाओं में बांध चुकी है ,,सुर्प्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को ,,,मुस्लिम तलाक़ का चेप्टर ,,हटाकर ,,संबंधित आदेश के तहत विधि के छात्रों को ,,पाठ्यक्रम में ट्रिपल तलाक़ प्रक्रिया को शामिल कर पढ़ाने के आदेश दिए थे ,, लेकिन केंद्र सरकार ने माननीय सुप्रीमकोर्ट के इन आदेशों का उलंग्घन कर ,,सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना का अपराध किया है ,,,अगर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत ,,भारत की विधि पाठ्यक्रम में मुस्लिम तलाक़ का चेप्टर जो भ्रामक तरीके से ,बदनाम करने के लिए लिखा गया है ,,उसे हटाकर ,सुर ऐ अननीसा ,में दिए गए दिशा निर्देशों के अनुरूप जारी सुप्रीम कोर्ट के 2001 में प्रतिपादित सिद्धांत के अनुरूप होता ,,तो विधि के छात्रों ,,वकीलों ,,पक्षकारो ,,,और आम जनता को भ्रमित करने का प्रयास नहीं होता ,,लेकिन ऐसा नहीं होने से महंगाई ,,भुखमरी ,,बेरोज़गारी समस्या ,,पाक हमलो में जवानो की शहादत ,,सरकार की नाकामी छुपाने के लिए ,,सरकार और मीडिया का गठजोड़ इसे मुद्दा नहीं बनाता ,,अब जो गलत है वोह गलत है ,,फिर भी कोई गलत करता है तो उसके लिए क़ानून है ,,लेकिन ट्रिपल तलाक़ लक्ष्मण रेखा के दायरे में है ,, सभी जानते है ,,,जैसे किसी की हत्या करना अपराध है ,,फिर भी कोई हत्या कर दे तो ,,क़ानूनी कायर्वाही ही इलाज है ,,ऐसे ही ट्रिपल तलाक़ ,इस्लामी क़ानून में अचानक ,,एकसाथ नहीं होने पर भी अगर कोई देता है ,,तो पीड़ित पक्षकार को सो फीसदी अदालत से इन्साफ मिलता है ,,सरकार को ,,विधि विभाग को ऐसी महिलाओं को मुफ्त क़ानूनी व्वयस्था ,,ऐसी महिलाओं के लिए विशेष अदालते ,,दिन प्रतिदिन सुनवाई की व्यस्था के लिए अदालतें खोलने की ईमानदार कोशिश करना चाहिए ,,,क्योंकि अदालतों में हिन्दू हो या फिर मुस्लिम पति से तिरस्कृत महिलाओं को सालों इंसाफ नहीं मिलता ,,मुक़दमा पेश करते ही तारीख तीन महीने की जाती है ,,ऐसे में घरेलु हिंसा क़ानून के तहत भी अधिकारी ,,अदालते ,,मुफ्त सुविधाएं नहीं है ,,तलाक़ शुदा महिलाओं को क़ानून के तहत एक हफ्ते में इंसाफ दिलाने का क़ानून संसद ने बनाया है ,लेकिन एक हफ्ते तो दूर की बात ,,पहली तारीख ही अदालतों में दो से तीन महीने की जाती ,है ,अगर सरकार या बिकाऊ मीडिया महिलाओं को इंसाफ दिलाना चाहता है तो वोह ,,पीड़ित महिलाओं के लिए मुक़दमों के अनुपात के आधार पर दिन प्रतिदिन सुनवाई की विशेष अदालते सरकार से खुलवाए ,,घरेलु हिंसा क़ानून के तहत ,,प्रोटेक्शन ऑफिसर ,,सेवा प्रदाता ,,मुफ्त विधिक सहायता ,,घर घर सर्वेक्षण के नियमों का पालन करने के लिए अधिकारी नियुक्त करवाए ,,लेकिन सरकार के इशारों पर तवायफ की तरह मुजरा करने वाले इस मीडिया के कुछ अच्छे लोगो को छोड़कर ,,भांड मिडिया के पास जनता को विवादों में फंसाकर मुद्दे भटकाने का काम है ,,मिडिया महिलाओं का सही हमदर्द नहीं है वोह तो बस इस मुद्दे ाको टकसाल समझ रहा है ,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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