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29 मार्च 2017

माहे-रजब का चाँद नज़र आ गया है

माहे-रजब का चाँद नज़र आ गया है . रजब का मुबारक महीना आप सबको मुबारक हो .इस महीने की हुरमत अल्लाह के इस हुक्म से साबित है
" उन हुरमत वाले महीनों में ज़ुल्म न करो ". ( अल-कुरान)
याने अल्लाह ने जो चार महीने हुरमत वाले अता किये उनमे रजब,ज़िकादा,ज़िल हिज्जा और मुहर्रम हैं .अगरचे दुसरे महीनों में भी हमारे लिए ज़ुल्म ममनू है लेकिन इन महीनों का खास उल्लेख इसलिए किया गया ताकि ताकि इनकी अजमत व हुरमत ज़ाहिर हो जाये .जैसा कि आयत -मुबरिका है -" अपनी नमाज की हिफाज़त करो,ख़ास तौर पर " दरमियानी " नमाज़ की "./// चुनांचे सारी नमाज़ों की हिफाज़त करनी फ़र्ज़ है मगर दरमियानी याने " अस्र " की नमाज़ का हुक्म अलग फ़रमाया ताकि हमें उसका ख़ास होना मालूम हो जाये . उसी तरह इन हुरमत वाले महीनों का भी बयान किया गया है ताकि इनकी अज़मत खास तौर पर ज़ाहिर हो जाये जिनमे रजब का महिना हमारे सामने आ कर खडा है ///
अल्लाह तआला इस महीने में बन्दों को ऐसी अज्मतें और सवाब अता फरमाता है जो न आँखों ने कभी देखी , ना कानों ने कभी सुनी , न किसी शख्स के दिल में उसका तसव्वुर आया .अल्लाह के रसूल हजरत मोहम्मद मुस्तफा ( सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ) ने इरशाद फ़रमाया -
" रजब अल्लाह का महीना है , शाबान मेरा महीना है और रमजान मेरी उम्मत का महीना है .जन्नत में एक महल है . उसमे सिर्फ वही दाखिल हो सकेगा ,जिसने माहे रजब में रोज़े रखे .///
यह भी इरशाद फ़रमाया -
"जिसने रजब का पहला रोजा रखा ,उसका यह रोजा महीने भर के रोजों के बराबर होगा और जिसने सात दिन रोज़े रखे उस पर जहन्नुम के सातों दरवाज़े बंद कर दिए जायेंगे .साल में जिन 4 रातों में इबादत करने का हुक्म है , उनमे रजब की पहली रात भी शामिल है . "
रजब के महीने के रोर्जों की बहुत बड़ी फ़ज़ीलत है . रजब के रोज़े जहन्नुम से आज़ादी और गुनाहों से तौबा के लिए हैं . जिसने 27 वीं रजब का रोजा रखा, उसको 60 महीनों के रोजों का सवाब अता किया जाता है ..लिहाजा इसका का एहतमाम किया जाना चाहिए . हजरत ज़ुन्नुन मिसरी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते हैं --" रजब खेती बोने का महीना है ..... शाबान उस खेती को सैराब करने का महीना है ...और रमजान खेती काटने का महीना है .हर शख्स वही काटेगा जो उसने बोया है और उसी का बदला पायेगा जो उसने आमाल किये हैं
माहे -रजब के रोज़े रखने की बात आई तो आप सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम के सामने एक ज़ईफ़ सख्स खड़े हुए और कहा कि या रसूलल्लाह ( सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ) ! मैं बुढ़ापे की वजह से पूरे महीने के रोज़े रखने से आजिज़ और कासिर हूँ , मैं क्या करूँ ? आप सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने इरशाद फ़रमाया ---" तुम पहली तारीख , दरमियानी तारीख और आखरी तारीख का रोज़ा रख लो , तुम को [पूरे महीने के रोज़ों का सवाब मिलेगा क्योकि इस माह में हर नेकी का सवाब दस गुना है ."
.आप सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने मज़ीद इरशाद फ़रमाया --" माहे-रजब के पहले जुमा की रात से गाफिल मत होना क्योकि यह ऐसी रात है जिसे फ़रिश्ते " लैलातुर रगाइब " याने मक़ासिद की रात कहते हैं .इसं रात में अल्लाह तआला मलाइका को अपने दीदार से नवाज़ता है और फरमाता है कि मुझसे मांगो, जो चाहो . फ़रिश्ते अर्ज़ करते हैं कि ऐ रब ! हमारी अर्ज़ यह है कि तू रजब के रोजेदारों को बख्श दे .तब अल्लाह तआला फरमाता है --" मैंने उनको बख्श दिया " ///
हजरत अब्दुल्लाह इब्ने जुबैर से मरवी है, फ़रमाया ,"खूब सुन लो ! तुम माहे रजब की इज्ज़त करोगे ..अल्लाह तआला तुम्हे हज़ार दर्ज़ा बुज़ुर्गी अता फरमाएगा ."
अल्लाह तआला हमें इस माहे-मुबारक में खुसुसी तौर पर रोज़े रखने , इबादत करने और इस माहे मुक़द्दस की इज्ज़त करने की तौफिक अता फरमाए

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