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02 जनवरी 2016

मेरे लिखे अल्फ़ाज़ों को

मुझे पता है
छुप छुप कर
पढ़ते हो तुम
मेरे लिखे
अल्फ़ाज़ों को
मुझे पता है
इन अल्फ़ाज़ों में
खुद को पाकर
तुम इतराते हो
तुम इठलाते हो
तुम खुश हो जाते हो
लेकिन तुम्हे पता नहीं
अपना खून टपका कर
इन अल्फ़ाज़ों में
तुम्हे में पिरोता हूँ
तुम्हारी यादे
तुम्हारे खयालात
तुम्हारे साथ बीते हुए
वोह खुशनुमा लम्हे
बस में यूँ ही
खुद को जलाकर
इन अल्फ़ाज़ों को
माला में पिरोता हूँ ,,,अख्तर

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