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26 अक्तूबर 2015

खुशनुमा यादों के साथ

हम इस पार
तुम उस पार
फिर भी हम ,,तुम
हवाओ के ज़रिये
मिल लेते थे
तुम और हम
नदी की लहरो के ज़रिये
एक दूसरे की तड़प
सुन लिया करते थे
तुम उस पार
में इस पार था
फिर भी तुम और हम
ज़िंदगी को
खुशनुमा यादों के साथ
बुन लिया करते थे
आज तुम तुम हो
में में हूँ
उस पार उस पार
इस पार इस पार है
ऐसा क्यों
सोचना ज़रूर ,,
समझना ज़रूर
समझे मेरे मगरूर ,अख्तर

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