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26 सितंबर 2015

आज हिन्दुस्तान में ट्वीटर, फेसबुक और व्हाट्सअप अपने पाखंड के प्रचन्ड क्रांतिकारी दौर से गुजर रहा है..

आज हिन्दुस्तान में ट्वीटर, फेसबुक और व्हाट्सअप अपने पाखंड के प्रचन्ड क्रांतिकारी दौर से गुजर रहा है...
हर नौसिखिया क्रांति करना चाहता है जैसे.......
कोई बेडरूम में लेटे लेटे गौहत्या करने वालों को सबक सिखाने कि बातें कर रहा है। रोजाना मांस भक्षण करने वाला किसी धर्म विशेष के द्वारा मांस खाने पर शाकाहार की दुहाई दे रहा है।
कोई सोफे पर बैठे बैठे महंगाई, भ्रस्टाचार को जड से उखाड फेंकने के रास्ते बता रहा है ये अलग बात है कि जिस मोबाईल के माध्यम से वो ये क्रांति की बात कर रहा है वो भ्रष्टाचार के पैसों से ही खरीदा गया है या खुद आवश्यक वस्तुओं का स्टॉक किए बैठा है जिससे मंहगाई में मुनाफा कमा सके।
हफ्ते में एक दिन नहाने वाले और चार दिन तक बिस्तर ना झाड़ने वाले, पान और गुटके की पीक को पिचकारी बना कर दीवार पर फेंकने वाले, खुले में दीवारों पर पेशाब करने वाले लोग स्वच्छता अभियान का समर्थन और राजनीतिक हल्ला कर रहे हैं।
आरक्षण का लाभ लेकर पिताजी सरकार के बड़े नौकरशाह हैं, अरबों की नामी बेनामी संपत्तियों के मालिक हैं लेकिन भाईसाहब, आज भी छात्रवृति उठा रहे हैं और आरक्षण लेने के लिए आतुर हैं ये लोग किसी वास्तविक पीड़ित और वंचित का हक मारकर अपने आपको पिछड़ा बताते हुए आरक्षण के समर्थन में ज्ञान पेल रहे हैं। वहीँ दूसरी और आज भी जातिवाद और जातिवाद के नाम पर अत्याचार करने वाले, आरक्षण का विरोध में अलख जगा रहे हैं।
जिनके माँ बाप वृद्धाश्रम में रह रहे हैं या बेटे बेटियों के समृद्ध होने पर भी अभाव में जीवन बसर कर रहे हैं वो लोग माँ बाप की सेवा कैसे करनी चाहिये इस विषय पर ज्ञान की गंगा प्रवाहित कर रहे हैं।
जिन्होंने आज तक बचपन में कंचे तक नहीं जीते, जो अपने बिस्तर से उठ कर पानी भी नहीँ पीते और माँ को आदेश देते हैं कि माँ पानी लाना, ऐसे लोग बता रहे हैं कि भारत रत्न किसे मिलना चाहिये।
जिसने गाँधी, विवेकानंद, नेहरू, भगतसिंह, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल, चंद्रशेखर आजाद सहित किसी महान नेता को ना पढ़ा ना समझा, ना इन कथित राष्ट्रवादियों को ये पता कि ये नेता लोग आजादी के आंदोलन में दस दस साल जेलों में रहे हैं या जान दे दी है, उन पर आलोचनात्मक टिप्पणी कर रहे हैं या कट कॉपी पेस्ट कर अपने आपको राष्ट्रवादी कहलवाने वाले और दूसरों को देशद्रोही कहने वाले बहुतायत में सोशल मीडिया पर दीमक की तरह इन महान नेताओं का चरित्र हनन करने में लगे पड़े हैं।
जिन्हें गली क्रिकेट में इसी शर्त पर खिलाया जाता था कि बॉल कोई भी मारे पर अगर नाली में गयी तो निकालना तुझे ही पड़ेगा वो सचिन तेंदुलकर और कोहली को समझाते पाये जायेंगे की उन्हें कैसे खेलना है।
देश में महिलाओं की कम जनसंख्या को देखते हुये जिन्होनें नकली ID's बना कर महिला और पुरूष का अनुपात सही कर जनसंख्या को बराबर कर रहे हैं, तथा जिन्होंने खुद के पुत्री ना हो इसके लिए जन्म पूर्व गर्भ की जांच कराई हो ऐसे लोग भ्रूण हत्या पर लेख लिख रहे हैं।
जिन्होंने जीवन भर महिलाओं से छेड़खानी की, फब्तियाँ कसी, प्रेम किया, सम्बन्ध बनाए और अबाॅर्शन करा दिया, ऐसे लोग महिला उत्पीड़न और निर्भया काँड में मोमबत्ती जलाकर कर संवेदनाएँ प्रकट कर अपनी फोटो अपलोड कर, वाह वाही लूट रहे हैं।
जिन्हें यह तक नहीं पता कि हुमायूं - बाबर का कौन था जिन्होंने चंदामामा और नंदन तक ना पढ़ी वो आज भारतीय इतिहास की व्याख्या कर रहे हैं तथा बता रहे हैं कि किसने कितनों का कत्लेआम किया था और क्या क्या सितम ढाए थे।
कुछ महानुभाव कालूराम की लिखी चौपाई को ग़ालिब का शेर बता कर बड़े अदबी बने घूम रहे हैं और साहित्य का बलात्कार कर ऐसा महसुस कर रहे हैं जैसे 'गालिब', कालिदास, 'शेक्सपियर' और जयशंकर प्रसाद' के असली उस्ताद तो ये ही रहे हों।
जो नौजवान एक बालतोड़ हो जाने पर रो रो कर पूरे मोहल्ले में हल्ला मचा देते हैं वह देश के लिये सर कटा लेने की बात करते दिख रहे हैं।
ऐसे व्यक्ति जिनके पीछे कभी गलती से किसी गली में कुत्ता पीछे पड़ गया हो और उस दहशत में ये भाईसाहब आज तक उस गली से गुजरते नहीँ हैं लेकिन सोशल मीडिया पर ये भाईसाहब 56 ईंच का सीना लेकर रोजाना पाकिस्तान को युद्ध के लिए ललकारते हुए और पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने की बात करते है।
कॉपी पेस्ट करने वालों के तो कहने ही क्या, किसी की भी पोस्ट चिपका कर एसे व्यवहार करेंगे जैसे वो साहित्य के पुरोधा या मर्मज्ञ हों और साहित्य की गंगा उन्हीं के मुखारविंद या कलम या ऊंगलियों ही बहती हो।
लेकिन समाज के असली जिम्मेदार और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक हैं ये "टैगिये", इन्हें ऐसा लगता है कि जब तक यह गुड़ मॉर्निंग वाली पोस्ट पर टैग नहीं करेंगे तब तक लोगों को पता ही नही चलेगा कि सुबह हो चुकी है बल्कि ये तो छोड़िए ये ऐसा मान कर चलते हैं सूरज ही इनके गुड़ माॅर्निंग के बाद निकलता है ।
जिनकी वजह से शादियों में गुलाबजामुन वाले स्टॉल पर एक आदमी खड़ा रखना जरूरी है वो आम बजट, बजट लीकेज, मितव्ययिता, डायबीटीज पर टिप्पणी करते हुए पाये जाते हैं!
जिनके घर शीशों के हैं वो दूसरों के घरों पर बेनागाह पत्थरबाजी में लगे हैं।
इस तरह अनगिनत पाखंड विचारों से लबरेज सोशल मीडिया बड़ी रफ्तार से दौड़ रहा है। यह पता करना ही मुमकिन नही हैं कि आज कौन नायक हैं और कौन खलनायक हैं।
एक बात जरूर चरितार्थ हो रही है कि पाखंड का बोलबाला है और सादगी तथा सच्चाई का मुहँ काला है। कभी पढ़ा था कि यथा राजा तथा प्रजा " आज महसूस भी कर रहे हैं और व्यवहार में ये चरितार्थ भी हो रहा है।
धन्य है व्हाट्सअप , फेसबुक और ट्वीटर सहित अन्य सोशल मीडिया अथवा नेटवर्किंग युग के क्रांतिकारी भाईयों - बहिनों धन्य है।
शुक्रिया।
द्वारा --
डाॅ विभूति भूषण शर्मा

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