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04 सितंबर 2015

जो मुझे समुद्र में फेंक दे, वहां से पहाड़ पर बैठा दे, फिर उड़ने को छोड़ दे; वही मेरा शिक्षक

जो मुझे समुद्र में फेंक दे, वहां से पहाड़ पर बैठा दे, फिर उड़ने को छोड़ दे; वही मेरा शिक्षक
एक साल की सोच हो तो - बीज बोइए।
दस साल की सोच हो तो - पेड़ उगाइए।
सौ साल की सोच हो तो - शिक्षक बन जाइए।
-प्राचीन कहावत, जिस पर चीन ने दावा जता रखा है

मैं, शास्त्री।
मां पहचान नहीं पाईं। हिचक। दरवाजे पर खड़ी रहीं। उनके चेहरे पर प्रश्न बना रहा। प्रवीण है? मैं शास्त्री। उसे पढ़ाता हूं। स्कूल में।

जी... जी। आइए। वो अंदर है। बैठिए। चाय लेंगे? ‘जी, नहीं। प्रवीण को भेज दीजिए। बस्ता लेकर।’ और शास्त्रीजी स्वयं से बैठक कक्ष के साथ वाले कमरे में चले गए। मेज़ पर किताबें थीं। घबराता-दौड़ता बच्चा आया। प्रणाम...। ‘शुरू करते हैं, बैठो। कल का पाठ सीखेंगे।’
कोई कुछ समझ ही नहीं पा रहा था। किन्तु शास्त्रीजी बस टूट पड़े।

मां चाय लाईं। उन्होंने आंखों से ही मना कर दिया। एक घण्टा। दो घण्टे। पिताजी आने वाले होंगे। भीतर से शास्त्रीजी की कड़क आवाज़, कड़कड़ा रही थी। मां, देखने के बहाने पानी लेकर गई तो पाया बेटा उत्तर नहीं दे पा रहा था। कान मरोड़ दिया। फिर टूट पड़े। पिता आए। मां ने सब बताया। आश्चर्यचकित हो, भीतर गए। ‘मैं, शास्त्री।’ फिर टूट पड़े।

रात दो बजे भूखा-प्यासा बच्चा बाहर आया। ‘अगले हफ्ते अाऊंगा... या क्यों? आना ही क्यों पड़े? दरवाजे पर पिता खड़े थे। ‘नमस्ते।’ मैं, शास्त्री। सीख चुका है। अच्छा बच्चा है।’
दूसरे दिन शास्त्रीजी स्कूल नहीं आए। तीन बच्चों को पाठ समझ में नहीं आया था। प्रवीण। नावेद (होता नवेद है पर बोलते नावेद थे) और जसबीर। तीनों विफल रहे थे जब पूछा गया था। नावेद भी आज नहीं आया।
‘मैं, शास्त्री…।’ सुबह नावेद के घर यही कहते पाए गए। एेसे थे वैष्णव स्कूल के शास्त्रीजी।
जब तक हर बच्चा, हर पाठ सीख-समझ नहीं लेता - शिक्षक का काम पूरा नहीं होता।
***
शर्माजी की आवाज़ शूल की तरह चुभती थी। इतनी नुकीली थी। किन्तु उससे कहीं अधिक उनकी वो बंद मुट्‌ठी थी - जिसे हथौड़े की तरह वे ऊपर-नीचे करते चले जाते। उंगलिया हवा में जैसे कील की तरह गड़ाते। जब गरजते हुए कहते :

जीवन गणित है। गणित ही जीवन है। गणित के बिना कुछ नहीं होता। एक गांव था। उसमें दो भाई रहते थे। ‘एक’ गांव। ‘दो’ भाई। ये गणित है।

सैनिक चारों ओर फैल गए। दुश्मन राज्य ने घेराबन्दी कर रखी थी। एक गुप्तचर चक्कर लगा कर आया। ‘चारों’, ‘घेरा’,‘एक’ और ‘चक्कर’ सब गणित है। फिर शर्माजी, जो तैल-ताप से दमकते थे मुख्य सभागार के मंच से दहाड़ते। कहते गणित ही है जिसमें सब कुछ भीतर ही है। सभी सवालों के जवाब अंदर छुपे हैं।

‘वहीं है।’ वहीं पर इतना इतना जोर देते कि बच्चों काे लगता हमारे दिमाग में ही है। वे बाेलते जाते : माना कि मूलधन सौ है। क्यों मानूं? क्योंकि केवल मानने से काम नहीं बनता। मानते मात्र इसलिए हैं कि एक बार मान कर देख लेते हैं - उत्तर आया है या नहीं। मानने का अर्थ है आरंभिक विश्वास। पूर्ण विश्वास, सही उत्तर पर ही। जीवन में भी यही है। कोई कहता है मान लीजिए। तो हम उतना ही विश्वास करते हैं जितना कि शुरुआती। इसी तरह फॉर्मूले हाेते हैं। जीवन में भी हम फॉर्मूले ही तो ढूंढते-लागू करते रहते हैं। ‘वहीं हैं, सारे उत्तर।’

बस ढूंढने के लिए ‘माना कि मूलधन सौ है।’ तो जीवन की हर समस्या का हल भी ‘वहीं हैं’, और जानने के लिए मानना आवश्यक है। आपका घर, आपकी लंबाई, सड़क की चौड़ाई, देश की जनसंख्या, सारे समीकरण - सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक - सब गणित है।

जब तक हर बच्चा, पढ़ाई को जीवन से सीधे-सीधे नहीं जोड़ लेता - शिक्षक का काम पूरा नहीं होता।
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मां, पहली शिक्षक होती है। पिता भी होते पहले हैं पर दूसरे क्रम पर आते हैं। किन्तु माता-पिता के प्रति हमारे कर्तव्य क्या हैं - यह बताने वाला शिक्षक, घर के बाहर, पहला शिक्षक होता है।
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मैं कौन हूं?
यह संसार के हर व्यक्ति का पहला प्रश्न होता है। चाहे वह इसे ऐसा कह पाए या नहीं।
अंत तक अनुत्तरित रहने से, यहीं अंतिम प्रश्न भी हो जाता है।
जो पता लगा सके कि आप कौन हैं - वह आपका पहला शिक्षक।
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जीवन के सबसे बड़े शिक्षक निम्न छह हैं :
क्या, कहां, कब, कैसे, कौन और क्यों।
किन्तु ये छह हमारे शिक्षक हैं -
यह बताने-समझाने-लागू करने-परिणाम दिखा कर सिद्ध करने वाला सिद्ध विद्वान ही हमारा दूसरा शिक्षक है।
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‘उत्साह’ संसार में सर्वाधिक बलशाली है। जिसमें उत्साह है, उसे किसी और विधा, विद्या, विषय, विशेषता की आवश्यकता ही नहीं।
जीवन का यह महत्वपूर्ण, तथ्यपूर्ण, तर्कपूर्ण और अर्थपूर्ण भेद बताने वाला हमारा तीसरा शिक्षक है।
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इसके प्रकार समझाने, इसके कारण गिनाने और उत्साह को ऊर्जा में क्रमबद्ध परिवर्तित करने वाला हमारा तीसरा शिक्षक, प्रकारांतर से हमारा पहला शिक्षक हो जाता है। क्योंकि उत्साह से ही माता-पिता का सच्चा कर्तव्य निभाया जा सकता है।
उत्साह से ही ‘मैं कौन हूं’ जाना जा सकता है।
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संसार की, जीवन की सबसे विकट समस्या है - हर बात का ‘कठिन होना।’
जन्म कठिन।
जन्म लेते ही बीमारी का डर। बीमारियों का उपचार कठिन।
फिर पालन-पोषण कठिन। पलना-बढ़ना-पढ़ना-गढ़ना-चढ़ना। सब कुछ कठिन।
जो कठिन को सरल बना दे।
वह सर्वोच्च शिक्षक।
***
ईसा मसीह का एक शिष्य था : टॉमा। नाम उसका थॉमस था - किन्तु बाइबल की कहानियों में टाॅमा नाम से ही उच्चारित है। जो यीशू कहते, टॉमा नहीं मानता। वह कहता - हे, ईश्वर, कृपया सिद्ध कीजिए कि जो आप कह रहे हैं - वही वास्तविक जीवन में भी सही है। सारे शिष्य क्रुद्ध होते। किन्तु ईसा उन्हें अगले ही क्षण कहीं गांव में ले जाते - और एक-दो दिन रहकर उदाहरणों से सिद्ध करते। टॉमा, तब जाकर मानता। वर्ष के अंत में जब सर्वश्रेष्ठ की घोषणा होने वाली थी - तो टॉमा का नाम लेकर उन्होंने सबको चौंका दिया।
‘इसके कारण अब मैं अपनी हर बात, कहने से पहले सोचता हूं। कि सिद्ध कैसे होगी। उदाहरण क्या होंगे। प्रश्न क्या-कैसे होंगे?’
आज ‘डाउटिंग टॉमा’ जो मुहावरा है, उसके मूल में वही टॉमा है।
***
आजीवन शिक्षा ग्रहण करने वाला ही शिक्षक होता है।
दूसरों को शिक्षित करते-करते स्वयं शिक्षित होते रहने वाला शिक्षक होता है।
‘टॉप्सी टर्वी वर्ल्ड’ में कहा गया है न कि क्या हो जाता यदि तितली, मधुमक्खी से प्रेम करने उसके निकट पहंुच जाती, चर्च समुद्र में बनाए जाते; पुरुष, स्त्री हो जाते, एक का तीन गुना नौ हो जाता?! कोई डेढ़-दो सौ वर्ष पहले लिखी इस बच्चों की कविता में कवि अल्बर्ट मिडलेन - जो कि मूलत: एक शिक्षक थे -ने दो गहरे अर्थ समझाए हैं- पहला : कि जीवन आनंद में जीना चाहिए। क्योंकि, दूसरा: प्रकृति या ईश्वर जो भी नाम दें - ने सबकुछ नियमानुसार रच रखा है।
जैसा ‘हितोपदेश’ की भूमिका में अनुवादक पंडित कहते हैं :
पक्षियों का नियत समय पर जागना,
कठोर परिश्रम कर नीड़ बनाना
कोकिल का मधुर संगीत
कौए का चैतन्य, खरगोश का चातुर्य
शिक्षा ही तो है।
***
अंधकार, अंधेरे, अंधेर से मुक्ति दे, ऐसा होता है शिक्षक।
अहंकार, अहं, असत्य से मुक्त कर दे, ऐसा होता है शिक्षक।
कर्म को ही धर्म के रूप में स्थापित कर दे, ऐसा है हमारा शिक्षक।
शिक्षक का ऋण उतार सकें, असंभव है। किन्तु उतारना ही होगा।

मस्तिष्क की हर नस में उस शिक्षा को रचा-बसा कर, जीवन में लागू कर हम उऋण हो सकते हैं। शिक्षक, शिष्य की श्रेष्ठता से ही अभीभूत होते हैं।

शिक्षक हमें जीवन में समुद्र-रूपी गहराइयों में फेंक कर परीक्षा लेते हैं। फिर वहां से खींच कर धरती पर लाते हैं। पहाड़ पर बैठा देते हैं। तब, तपा कर, दौड़ने बल्कि उड़ने के लिए तैयार कर, स्वतंत्र कर देते हैं। नमन्।
कल्पेश याग्निक
- (लेखक दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर हैं।)

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