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28 अगस्त 2015

गुजरात के पटेल कौन हैं, उनका अतीत क्या है, उनका वर्तमान क्रुद्ध क्यों है: कल्पेश याग्निक

गुजरात के पटेल कौन हैं, उनका अतीत क्या है, उनका वर्तमान क्रुद्ध क्यों है: कल्पेश याग्निक
‘हीरा, नुकीले औजारों की चुभन के बिना तराशा नहीं जा सकता। वैसे ही मनुष्य स्पर्धा से बचकर निखर नहीं सकता।’
-पुरानी कहावत
तीन हिस्सों में बांटकर देखा जा सकता है गुजरात के पटेल-पराक्रम को।
पहला : वह देश का एक ऐसा जाति समूह है जो किसी भी अन्य जाति की तुलना में कहींं अधिक शक्तिशाली पहचान बनाने में सफल रहा है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तर पर।
दूसरा : वह देश की एकमात्र जाति है जिसने खेती करते-करते, शहरों में पनप रहे उद्योग-कारोबार में हिस्सेदारी प्राप्त की। कठोर परिश्रम किया। बड़ी सफलता हासिल की।
तीसरा : वह एकमात्र ऐसा समुदाय है जो राजनीतिक रूप से बहुत ही प्रभावशाली, आर्थिक तौर पर बहुत ही सम्पन्न-समृद्ध और सामाजिक रूप से चारों दिशाओं में फैले-फले और बहुत ही काम के व्यक्तियों-हस्तियों से जुड़ा हुआ है।

और पटेलों के क्रोध को भी तीन आंदोलनों में देखा जा सकता है।
पहला, 1981 का, जिसमें उन्होंने अनुसूचित जाति को आरक्षण देने का, बढ़ाने का विरोध किया। दूसरा, 1985 का हिंसक प्रदर्शन जो उन्होंने पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने के विरुद्ध किया। तीसरा, 25 अगस्त 2015 का अचानक भड़का आंदोलन। और आश्चर्यजनक रूप से यह उन्होंने स्वयं को पिछड़ा वर्ग में शामिल कर, आरक्षण देने की मांग को लेकर किया! यानी जो पटेल आरक्षण के घनघोर विरोधी थे, वे आज अपने लिए आरक्षण मांगते हुए सड़कों पर उग्र अभियान चला रहे हैं।

क्यों हुआ ऐसा?
कोई तात्कालिक कारण बताना पूर्ण सत्य नहीं होगा। किन्तु सारा देश जिस बात पर बहुत ही आश्चर्यचकित है, वह है पटेलों की समृद्धि और तिस पर एेसी मांग! तो कोई न कोई कारण तो होगा ही। बार-बार बताया तो यही जा रहा है कि स्वयं मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल, वित्त मंत्री सौरभ पटेल सहित आठ मंत्री, 44 विधायक पटेल समुदाय से हैं। देश में सत्ता में इतनी बड़ी भागीदारी किसी एक जाति की शायद ही हो। फिर भी वे ऐसा संभवत: इसलिए कर रहे होंगे कि ताकतवर पटेलों की संख्या है तो बहुत बड़ी - किन्तु कमज़ोर पटेलों की संख्या उनकी तुलना में कहीं अधिक है। वे त्रस्त हो रहे हैं। ये वो पटेल-पाटीदार हैं, जो नाम के ही पाटीदार बचे हैं। पाटीदार यानी भूमि के पट्‌टे के मालिक।

पटेल तीन वर्गों में बांट कर देखे जा सकते हैं :
पहले, जो शहरों में बस गए, पढ़-लिखकर आगे बढ़े और विदेशों तक फैल गए। हालांकि पढ़ाई में उनसे कहीं ऊंची शिक्षा गुजराती ब्राह्मणों ‌व अन्य सवर्णों ने ली है। किन्तु पटेलों के पास तीक्ष्ण बुद्धि है जो अपने आप भारी पैसा कमा कर दे रही है। अमेरिका में होटल, बल्कि मोटल कारोबार पटेलों के ही तो अाधिपत्य में हैं। दूसरे, जो गांवों में ही रह गए। किन्तु लम्बी-चौड़ी ज़मीन के मालिक हैं। तीसरे, जो अब बड़ी संख्या में हैं - गांव में बसे, ज़मीन नहीं रही, खेती जो करते थे, उससे वैसी आमदनी नहीं बची। कुछ हीरा कारोबारियों के पास काम करने चले गए। इनके बच्चों को अच्छे, ऊंचे स्कूलों में पढ़ने को नहीं मिला, इसलिए वो बड़े प्लेसमेंट या पैकेज वाले प्रोफेशनल कॉलेज का तो प्रश्न ही कहां? जैसे खेती में लाभ कम से कमतर हो गया, वैसे ही हीरा उद्योग में भी ध्यान से देखें तो कई प्रतिष्ठान बंद हो गए/जा रहे हैं। पॉलिशिंग-कटिंग के काम कम हो गए। ढेर सारी नौकरियां चली गईं।

वो जो हर वर्ष हम खबर पढ़ते हैं कि हीरा कारोबारी ने अपने सभी सवा सौ या कि ग्यारह सौ कर्मचारियों को बोनस में कार और न जाने क्या-क्या दिया- वो होती एकदम सच्ची है। मालिक भी पटेल ही होते हैं, धनी बने कर्मचारी भी अधिकांश पटेल होते हैं। किन्तु ऐसी खबर एक या दो ही तो होती है। चूंकि पटेलों को ‘शो ऑफ’ करना पसंद होता है, वे अच्छी समृद्ध ज़िंदगी चाहते हैं, जीते भी हैं। दिखता भी है- इसलिए देश में आश्चर्य है। वरना कहां ऊंची नौकरियां हैं? कहां अवसर हैं? किन्तु यह भी पूर्ण सत्य नहीं है।

देश में पटेलों से सहस्त्रों गुना अधिक ऐसे दारुण दु:ख में जीवन जी रहे अनेक जाति-समूह के निरीह नागरिक हैं- जिनके बारे में अभी और पहले सोचा जाना आवश्यक है। अनिवार्य है। अपरिहार्य है। किन्तु नहीं सोचा जा रहा।

क्योंकि वे राजनीतिक रूप से जागरूक और जानकार नहीं हैं। जैसे कि पटेल हैं।
पटेलों के प्रारम्भ, प्रादुर्भाव, प्रभाव और प्रतिक्रियाओं को तीन तरह के दौर में विभाजित करके समझा जा सकता है।
पहला, 1967 का दौर। जब पहली बार भाईलाल पटेल के नेतृत्व में ‘पक्ष’ की स्थापना की गई। गज़ब की राजनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए। पटेल से ‘प’ और क्षत्रिय से ‘क्ष’ लेकर बना पक्ष। 60 सीटें जीते थे। ख्यात गुजराती इतिहासकार अच्युत भाई याग्निक (*मुझसे दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं) ने गहन व्याख्या की है कि सरदार पटेल के कारण पटेलों की ताकत तो गुजरात में आरंभ से थी ही। 1960 में मुंबई राज्य के हिस्से से हटकर स्वतंत्र राज्य बनते ही पटेल सत्ता के अभिन्न अंग बन गए। बने रहे। और अब तो छह करोड़ गुजरातियों में सवा करोड़ पटेल होने के कारण और भी ताकतवर हैं।

दूसरा 1981 का दौर। जब कांग्रेस के मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी ने पटेलों को पीछे छोड़ते हुए ‘खाम’ की राजनीति शुरू की। केएचएएम यानी क्षत्रिय, ‘हरिजन’, आदिवासी, मुस्लिम। पहली बार पटेल सत्ता से बाहर किए गए। कोई पटेल मंत्री नहीं बनाया गया। कांग्रेस नेता झीनाभाई दर्जी के फॉर्मूले पर हुए प्रयोगों को सोलंकी सरकार लागू करती गई। 80 जातियों को पिछड़ी-ओबीसी घोषित कर दिया गया।
नौजवान पटेलों ने क्रुद्ध विरोध किया। किन्तु राजनीति को जातिगत बांटने वाला पहला प्रयोग ‘पक्ष’ था तो दूसरा उससे कहीं बड़ा और डरावना ‘खाम’, जो लोगों को जोड़ने की जगह तोड़ने का काम कर रहा था।
हालांकि, ये 1985 के चुनाव में कांग्रेस को सर्वोच्च सफलता दे गया। रिकॉर्ड 149 सीटें जीतीं। किन्तु फिर हुए उग्र आरक्षण-विरोधी आंदोलन ने गुजरात को हिंसा की आग में झोंक दिया। 100 से अधिक जानें गईं। चिमनभाई पटेल की जनता पार्टी के आंदोलनकारी शंकरभाई पटेल ने आरक्षण के विरुद्ध आक्रामक आंदोलन किया। जो फिर देशभर में फैल गया। किन्तु आगजनी, असुरक्षा, आतंकित आम आदमी और आरक्षण अभियान का अपयश और अनंत अपमान आज भी अतीत से उठकर आकार लेता रहता है। इसी के कारण आज सब डर रहे हैं।
इसके बाद सोलंकी को जाना पड़ा। कांग्रेस बाहर हो गई। चिमनभाई पटेल’ 90 में मुख्यमंत्री बने।’ 95 में केशुभाई पटेल। पटेल समुदाय भाजपा के साथ हो ही चुका था। कांग्रेस से लम्बी नाराज़गी हो गई। और फिर पटेलों ने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा।

तीसरा, 2001 में नरेन्द्र मोदी का आना। और फिर पूरी राजनीति, जाति से हटकर, सम्प्रदाय पर चली गई। पहली बार गुजरात में ऐसा हुआ। गोधरा से गांधीनगर तक घृणा-ही-घृणा। यही हेडलाइन थी, मेरी चुनावी रिपोर्ट की। बाकी चर्चा, इतिहास है। सब जानते हैं। सच जानते हैं।

25 अगस्त 2015 का आंदोलन 22 वर्षीय युवा हार्दिक पटेल के नाम है। इसे तीन प्रश्नों में पूछा जा सकता है :
पहला, हार्दिक पटेल न तो टिकैत जैसे नैसर्गिक नेता हैं, जिन्हें स्वयं की ही कोई सुध-बुध नहीं थी- फिर भी सूरत में 5-6 लाख और अहमदाबाद में तो कोई 15 लाख तो कोई 19 लाख तक के आंकड़े लिख रहा है जनसमुदाय के- कैसे इकट्‌ठे हुए? हार्दिक अरविंद केजरीवाल को पसंद करते हैं। समर्थन भी है। किन्तु लाख जिम्मेदारियां लेकर उनसे बचने की विचित्र प्रवृत्ति के बावजूद केजरीवाल की एक आंदोलनकारी पृष्ठभूमि तो रही है। विस्मयकारी भूमिका रही है। चमत्कारी उत्थान हुआ है। हार्दिक एकदम अलग हैं। करिश्माई नहीं हैं। किन्तु करिश्माई अपार भीड़ जुटा ली। न वे अन्ना हजारे जैसे कोई गांधीवादी हैं कि भरोसा कर लाखों आ जाएं। न बालासाहब ठाकरे- कि आवाज़ और अंदाज दोनों ही इतने दमदार कि जुटना ही है। फिर कैसे हार्दिक इतने बड़े नेता बने? उत्तर पता नहीं है।
दूसरा, बिना किसी बहुत बड़े व कुशल बाहरी समर्थन के इतने बड़े आंदोलन, रैली को इतनी सुनियोजित ढंग से कैसे चला पाए? या कि कोई गुप्त सहयोगी है? चूंकि करोड़ों खर्च भी तो हो रहे होंगे इसमें?

तीसरा, इतना बड़ा जनसमुदाय एक भरोसा लेकर जुटा। जबकि आरक्षण तो मिलना ही नहीं है, ऐसा सरकार का स्पष्ट कथन है। फिर, आगे क्या? और, मिलना चाहिए भी क्यों?
संघर्ष की कसौटी पर अब तीन नाम कसे जाएंगे :
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जिनके शांत गुजरात में ऐसी स्थिति पैदा हो गई। मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल, जिन्होंने पहली ही परीक्षा में कमज़ोर प्रशासक की अपनी छवि साक्षात कर दी। तीसरा, छह करोड़ गुजरातियों के गौरव को अक्षुण्ण रखने वाले मेहनतकश, सफल कारोबारी बुद्धि वाले, पारिवारिक मूल्यों वाले गुजराती नागरिक। उन्हें ठगा जा रहा है। आग लगा कर। और आग बुझाने वाले भी अागे रहकर आग लगने दे रहे हैं। वो अलग।

गुजरात हो या कि पूरा देश, आरक्षण पर अब नए सिरे से, एकदम नया, क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहिए। आरक्षण की राजनीति व हिंसा बंद हो, असंभव है। किन्तु करनी ही होगी। क्योंकि संघर्ष सभी को करना अनिवार्य है। गुजरात के लिए तो मोदी स्वयं ज्वलंत उदाहरण हैं। एक साल पहले किसी को पता तक न था कि वे किस वर्ग से हैं। चुनाव में पहली बार उन्होंने पिछड़ा कार्ड खेला था।

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