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06 जुलाई 2015

जूते दो, पानी लो


बिल क्या होता है। आम तौर पर हम किसी वस्तु या सेवा खरीदते हैं। बदले में भुगतान करते हैं। दुकानदार हमें एक पर्ची देता है। उस पर वस्तु या सेवा का मूल्य लिखा होता है। उसे हम अदा करते हैं। ट्रांजेक्शन। एक्सचेंज। बिल कभी एक पक्षीय नहीं होता। लेनदेन होने पर ही बिल जनरेट होता है। बिल लेनदेन का सबूत होता है। वक्त जरूरत काम आता है। लोग सहेज कर रखते हैं। आपको कई घरों में बरसों पुराने नल, बिजली और टेलीफोन के बिल मिल जाएंगे। बाकायदा फाइल किए हुए। कुछ लोग इसे बाबूगिरी मानते हैं। कुछ रिटायर लोगों का काम। आज ई कामर्स का युग है। फोन या इंटरनेट पर आर्डर। नेट या मोबाइल पर बिल। फिर ई बैंकिंग से भुगतान। पेपरलेस ट्रांजेक्शन। फाइलों का झंझट खत्म। कम्प्यूटर पर ई फाइलिंग। देखते ही देखते क्रांतिकारी बदलाव।
बात मोबाइल पर बिल की। जलदाय विभाग अपने उपभोक्ताओं को पानी के बिल मोबाइल पर भेजने की तैयारी कर रहा है। फिलहाल यह काम ठेके पर दिया हुआ है। काफी महत्वपूर्ण विभाग है। लोगों को पीने लायक स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी। जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग। जितनी अहम जिम्मेदारी उससे कई गुना घटिया परफोर्मेंस। गांव हो या शहर। सभी जगह पानी का संकट। पानी की गुणवत्ता का कोई भरोसा नहीं। कचरा और मिट्टी तो आम बात। कब किस मोहल्ले में गटर का पानी नलों से होता हुआ मटकों में पहुंच जाए, कोई ठिकाना नहीं। इस समस्या से शायद ही राज्य का कोई शहर अछूता हो। लोग बरसों से भुगत रहे हैं। पीलिया फैलने के बाद अफसर लाइन चैक करते हैं। पूरा सिस्टम भगवान भरोसे। दशकों पहले डाली गई लाइनें सड़-गल गई। कहीं सीवर लाइन से मिल गई। हजारों लोगों ने मर्जी से कनेक्शन कर लिए। किस शहर में कितने अवैध कनेक्शन हैं, शायद ही किसी अभियंता को पता हो। पानी नहीं आता, कम दबाव से आता है जैसी शिकायतों की कोई सुनवाई नहीं। बस एक ही जवाब। पानी की चोरी हो रही है। अवैध कनेक्शन के कारण प्रेशर डाउन है। अभियंता अखबारों में बयान देकर बताते हैं कि अवैध कनेक्शनों के कारण वैध उपभोक्ताओं को पानी नहीं मिल रहा। हालत यह कि बिल चुकाने वाले उपभोक्ता पानी का इंतजार करते रहते हैं, वहीं कुछ लोग चोरी के पानी से टैंकर भरकर बेचते रहते हैं। अभियंताओं और पानी चोरों का गिरोह माफिया में बदल चुका है। जोधपुर जैसे शहर में कम से कम एक हजार ट्रेक्टर सुबह से रात तक पानी के भरे टैंकर लेकर दौड़ते रहते हैं। मुंह मांगें दाम देने पर भी इंतजार करना पड़ता है। ट्यूबवेल के पानी का टैंकर तीन सौ और नल के पानी का पांच सौ में। गांवों में और भी महंगा। खुले आम बिक रहा है। विभाग का कंट्रोल रूम कागजी। अभियंताओं को अर्जी दो, फोन करो, मटके फोड़ लो। कोई फर्क नहीं पड़ता। कलक्टर को फुर्सत नहीं। मंत्री? कभी कांग्रेस पर आरोप। कभी ऐसी योजनाओं का ब्योरा जो पता नहीं कब शुरू होंगी।
कुल मिलाकर राज्य में जलदाय विभाग की हालत अराजक। कुछ उपभोक्ता अभियंता की मजम्मत कर दें तो पानी तत्काल आ जाता है। जूते दो, पानी लो। किस बात का बिल? कहीं भी गड्ढा खोदो, कनेक्शन कर लो। समस्याग्रस्त इलाकों में जाने की कोई अभियंता जहमत नहीं उठाता। अवैध कनेक्शन काटने की हिम्मत नहीं।
बिल के साथ पानी भी मोबाइल पर ही भेज दो। पानी नहीं तो किस बात का बिल? कोई रीडिंग नहीं। कोई हिसाब नहीं। है कोई देखने-सुनने वाला? अंधेर नगरी चौपट राजा! शायद ऐसी ही हालत के लिए है ये कहावत।
yssoni@gmail.com

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