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06 जुलाई 2015

गाय के सींग के ऊपर धरती टिकी है, गौ वंश रक्षा के योग्य


संत शिरोमणि जैनाचार्य विद्यासागर जी महाराज ने कहा कि भारतीय मुद्रा में अब गाय का चित्र अंकित होना चाहिए। चूंकि गाय से ही धन उत्पन्न हो रहा है। दुनिया में धरती पर जो कुछ भी है वह गौ धन है। उक्त उद्गार बीनाबारहा में विराजमान आचार्यश्री ने आज रविवारीय धर्मसभा में कहे। आचार्यश्री ने एक पुस्तक रोमांस आॅफ द काऊ का उल्लेख करते हुये कहा कि उसमें लिखा है कि गाय के सींग के ऊपर धरती टिकी है। गौ धन का मूल महत्व और स्वरूप जानने का प्रयास करना होगा। गाय पर शोध एक दो नहीं पूरा जीवन भी लगा दिया जाये तो शोध नहीं हो सकेगा। गाय पर शोध नहीं बोध होता है। जो मूक होकर भी सब कुछ कह देती है। गाय ही एक ऐसा जानवर है। जिस परिवार में रहता है उस परिवार में गाय के जन्म और मृत्यु पर एक दिन का शोक माना जाता है। संसार जगत में अपनों से तो नजर लग जाती है। मगर गाय से कभी किसी को नजर भी नहीं लग सकती है। बिजली में करंट का निरोधक भी गोबर और लकड़ी है जो ग्रामीण परिवेश में आज भी उपलब्ध रहता है। पहले के जमाने में ग्रामीण क्षेत्रों में न तो कभी किसी को ठंड लगती थी और न हीं कभी किसी को गर्मी लगती थी। वर्तमान में आधुनिकता की दौड़ में शामिल लोगों को ठंड में कंबल की जरूरत पड़ती है। जिसका संधि विच्छेद करते हुये आचार्यश्री ने कहा कि कम बल वालांे को ही कंबल की जरूरत पड़ती है। उन्होंने कहा कि गाय एक ऐसा जानवर है जो दूसरो के लिए देता है। अपने बछड़े के अलावा अन्य जानवर के बच्चे को भी दूध पिला देती है। यहां तक कि एक चित्र में तो सांप के बच्चे तक को गाय का दूध पीते देखा है। अर्थात् अमृत के रूप में गाय सबको जीवन देती है। गौ वंश हमेश रक्षा के योग्य है। गाय बैल को प्राचीन माना गया हैं। आचार्यश्री ने कहा कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का चिंह भी विषभ है। गर्भस्थ शिशु की रक्षा के लिए मां दिन रात एक कर देती है। जिसका नाम ही लोक कल्याण माना गया है। अपना कुछ नहीं सब जीव एक है। प्रत्येक जीव में प्रकाश ही आत्म तत्व है। तिरने का उपाय तीर्थ है। जिसका नाम नहीं वह आत्मा है। आचार्यश्री ने कहा कि इतिहास कहीं न कहीं से शुरू होता है जबकि धर्म किसी एक स्थान से शुरू नहीं होता है, बल्कि रहता है। किसी के माध्यम से शुरू होता है तो वह प्रेम, करूणा और वात्सल्य है। जब आत्मा में करूणा जागृत होती है तो आंखों में पानी आ जाता है। विज्ञान भी कहता है कि मनुष्य के शरीर में 80 प्रतिशत जल है जो कि मात्र आंखों के माध्यम से ही बाहर आता है। मनुष्य का जीवन पशुओं के पालन में भी है। हम मेहरवानी नहीं बल्कि उन पर पल रहे है। भारत को कृषि प्रधान देश माना गया है लेकिन अब बीज ही विदेशी उपयोग होने लगा है। यह बीज को समाप्त करने की प्रक्रिया है। कृषि को सर्वप्रथम रखा गया हैं धरती के भीतर सब कुछ है। धरती कुछ न उगले तो काहे का सोना।

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