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02 दिसंबर 2011

राहुल के इशारे पर दिया सरकार ने धोखाः अन्ना

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रालेगण सिद्धी. गांधीवादी अन्ना हजारे ने एक बार फिर कहा है कि प्रधानमंत्री और सरकार उनसे किए गए वादों से मुकर गए हैं। अन्ना ने यह भी आरोप लगाया कि संसद की स्थायी समिति कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के इशारों पर काम कर रही है। अन्ना हजारे ने यह भी कहा कि लोकपाल पूरी तरह से स्वतंत्र संस्था होनी चाहिए। यह सीबीआई की तरह सरकार के नियंत्रण में नहीं होना चाहिए।
अन्ना हजारे ने यह भी कहा कि यदि अनशन से उनका कुछ बुरा हुआ तो कांग्रेस पार्टी पर हमेशा के लिए काला धब्बा लग जाएगा। अन्ना ने एक बार फिर से दोहराया कि मजबूत लोकपाल न आने की स्थिति में वो चुनाव वाले पांच राज्यों का दौरा करके कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करेंगे।
अन्ना ने कहा कि समिति ने पहले तय किया था कि निचले स्तर के कर्मचारी भी लोकपाल के दायरे में आएंगे लेकिन अब राहुल गांधी के इशारे पर इस फैसले को वापस ले लिया गया है। अन्ना हजारे ने एक बार फिर सरकार को चेतावनी दी कि यदि मजबूत लोकपाल नहीं आया तो 27 दिसंबर से एक बड़ा आंदोलन होगा। अन्ना ने कहा कि उनके पास आठ दिन अनशन करने की इजाजत है जिसके बाद उन्हें प्रशासन बैठने नहीं देगा लेकिन वो रुकेंगे नहीं। चुनाव वाले पांच राज्यों में दौरा शुरु करे देंगे और जनता को बताएंगे कि सरकार उनके साथ धोखा कर रही है।

अन्ना हजारे की चेतावनी को एक बार फिर से दरकिनार करते हुए केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा कि अन्ना अनशन करना चाहते हैं तो अनशन करें। उन्हें अन्ना की नहीं देश की चिंता है।
अन्ना हजारे से जब पूछा गया कि क्या उनके पास इस बात का कोई प्रमाण है कि राहुल गांधी के इशारों पर ही संसद की स्थायी समिति काम कर रही है अन्ना ने कहा कि उन्हें ऐसा लगता है कि जो भी हो रहा है वो अन्ना के कहने पर हो रहा है। अन्ना हजारे ने यह भी आरोप लगाया कि ग्रुप सी और ग्रुप डी के अधिकारियों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखकर नेता खुद को बचा रहे हैं।

अन्ना ने कहा कि बिना नेताओं के सहयोग के कोई भी अधिकारी भ्रष्टाचार नहीं कर सकता। भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने के लिए ही नेता जनलोकपाल को नहीं आने दे रहे हैं। हालांकि अन्ना हजारे ने यह भी स्पष्ट कहा कि उन्हें लोकपाल के संवैधानिक संस्था बनाए जाने पर कोई ऐतराज नहीं है लेकिन यह पूरी तरह स्वतंत्र और सरकार के नियंत्रण से बाहर होना चाहिए।


14-15 दिसंबर को बनेगी टीम अन्‍ना की रणनीति
लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने पर अन्ना हजारे को कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि उन्होंने कहा कि उसके कामकाज में सरकार का दखल नहीं होना चाहिए। लेकिन टीम अन्ना का मानना है कि लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने की बात मामले को लटकाने के लिए की जा रही है। किरण बेदी ने इसे महज पेंच बताया था। लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने के लिए संसद में दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होगी और यह मुश्किल काम होगा। गौरतलब है कि कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने लोकसभा में बहस के दौरान लोकपाल को संवैधानिक दर्जा देने की पेशकश की थी।

लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिए जाने को लेकर अन्‍ना और उनकी टीम की अलग-अलग राय के बीच आंदोलन की रूपरेखा तय करने के लिए दिसंबर मध्‍य में टीम अन्‍ना की बैठक होगी। संभव है, दिल्‍ली में होने वाली इस बैठक में अन्‍ना हजारे भी शामिल हों। बैठक 14-15 दिसंबर को होगी। इसमें तय किया जाएगा कि टीम अन्‍ना जिस रूप में लोकपाल बिल चाहती है, उसे हासिल करने के लिए क्‍या किया जाए।

इस बीच अन्ना ने कहा कि करीब १० साल पहले चुनाव आयोग ने जन प्रतिनिधियों को खारिज करने के अधिकार (राइट टू रिजेक्ट) के बाबत सरकार को लिखा था। फैसला अब तक नहीं हो पाया है। अन्ना ने एक बार फिर प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने की मांग की। उन्होंने कहा कि ५० फीसदी सांसदों ने उनके जन लोकपाल को समर्थन का भरोसा दिलाया था। अन्ना ने 11 दिसंबर को जंतर-मंतर पर एक दिन के विरोध प्रदर्शन में सबको शामिल होने की अपील की।


लोकपाल पर कांग्रेस का यू-टर्न, ग्रुप सी कर्मी बाहर!

इससे पहले एक अप्रत्याशित घटनाक्रम के तहत गुरुवार को आनन-फानन में बुलाई गई स्थायी समिति की बैठक में कांग्रेस के सदस्यों ने ग्रुप सी के कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे से बाहर करने की मांग उठाई। विपक्ष के विरोध के बीच तय हुआ कि सेंट्रल विजिलेंस कमिश्नर (सीवीसी) ही इन कर्मियों के खिलाफ शिकायतों की सुनवाई करेगा। लोकपाल समिति की यह बैठक कांग्रेसी सदस्यों की मांग पर बुलाई गई थी। इसके पहले बुधवार की बैठक में तय किया गया था कि ग्रुप सी कर्मियों को लोकपाल के दायरे में शामिल किया जाएगा।

गुरुवार की इस बैठक में कांग्रेसी सांसदों की मांग थी कि लोकपाल को सीबीआई डायरेक्टर की चयन समिति से भी बाहर कर दिया जाए, जबकि बुधवार को इस बात पर सहमति हो गई थी कि लोकपाल इस तीन सदस्यीय चयन समिति का हिस्सा होगा। समिति में शामिल विपक्षी दल बीजेपी, सीपीएम, आरएसपी और सरकार की सहयोगी समाजवादी पार्टी ने भी कांग्रेसी सदस्यों के इस यू-टर्न की जमकर निंदा करते हुए इस पर डिसेंट नोट (असहमति पत्र) देने का फैसला किया। सूत्रों के मुताबिक, लोकपाल समिति में शामिल कांग्रेस के सांसद शांताराम नाईक और भालचंद्र मुंगेकर(मनोनीत) ने समिति के चेयरमैन अभिषेक मनु सिंघवी को पत्र लिखकर कुछ मुद्दों पर संशय दूर करने के मकसद से लोकपाल समिति की फिर से बैठक बुलाने की मांग की थी। इससे पहले बुधवार की बैठक को ही लोकपाल समिति की अंतिम बैठक करार दिया गया था।

समिति में शामिल कांग्रेस सदस्यों की दलील थी कि छठे वेतन आयोग की रोशनी में ग्रुप सी और डी का आपस में विलय हो चुका है, ऐसे में ग्रुप सी के कर्मियों को लोकपाल के दायरे में शामिल करने से लगभग 60 लाख कर्मचारी लोकपाल के दायरे में होंगे। इस तरह से शासन का एक समानांतर तंत्र खड़ा हो जाएगा। लोकपाल इतनी शिकायतों के निपटारे में बुरी तरह अक्षम भी साबित होगा। सीबीआई डायरेक्टर को लेकर कांग्रेसी सांसदों का तर्क था कि यह जांच एजेंसी दिल्ली पुलिस स्पेशल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट-1946 के दायरे में आती है, ऐसे में सीबीआई डायरेक्टर के चयन में लोकपाल का हस्तक्षेप नहीं हो सकता।

सूत्रों के मुताबिक लोकपाल समिति में संख्या के लिहाज से अव्वल कांग्रेसी सांसदों की मांग पर इन दोनों ही बातों को लोकपाल के अंतिम ड्राफ्ट में शामिल किया जाएगा।

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