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06 अक्तूबर 2011

दंभ का दहन कर दिल से मांगिए माफी

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अभी पयरूषण पर्व गुजरा है, दशहरा आ गया है। मौका है दंभ का दहन कर एकदम दिल से माफी मांग भूल-चूक, लेनी-देनी साफ करने का। तो मैं क्षमा मांगना चाहता हूं। लेकिन एक समस्या है। मैं एक अदना-सा आदमी हूं, इस नाते मूल रूप से किसी का दिल दुखाने की औकात ही नहीं रखता। तो क्षमा किस कारण मांगूं? कारण चाहिए माफी मांगने का। कारण होगा, तभी मैं पूरी भावना के साथ माफी मांग पाऊंगा। अब याद ही नहीं आ रहा कि कभी किसी का दिल दुखाया हो, किसी को हड़काया हो, किसी से बदसलूकी की हो, किसी को चमकाने की जुर्रत की हो, किसी को जरा-सा भी ज्ञान दिया हो।
कैसी कमतरी है ये? आखिर हम इतने गए-गुजरे हैं क्या? जरा-सी ख्वाहिश भी पूरी नहीं कर पा रहे हैं अपनी। माफी मांगने का भी हक नहीं मिल पा रहा। हाय! घोर निराशा का क्षण। आदमी के पास अपनी उल्लेखनीय बदतमीजी का कोई किस्सा नहीं है।

निजी आघात के इन विकट क्षणों में मैं फिर अपनी जिंदगी के अतीत में झांकने की कोशिश करता हूं। लेकिन टूटने-फूटने, व्यथित होने, हारने, हड़कने, अपमानित होने की सारी घटनाएं खुद के साथ ही पाता हूं। अपमान के तो इतने घूंट पीए हैं कि स्टॉक करें तो ठीक-ठाक सी टंकी खासी मात्रा में भर जाए। हाय! कैसा अधम-सा जीवन जीया है हमने! निराशा में डूबते हुए मैं अपना फ्लैशबैक बंद कर रहा हूं साहब। कुछ नहीं मिला वहां। अदने से आदमी हाय! तेरी फोकट कहानी टाइप कुछ भी खास नहीं है वहां। हां, दिल दुखाने की नकली कहानी गढ़ने की भी कूव्वत नहीं है मुझमें, आजकल के घाघ लोग झट-से पकड़ लेंगे।
हताशा-निराशा का इतना भयंकर कॉकटेल!

‘लगता है बेकार गए हम’ किस्म के शीर्षक मेरे दिमाग में अचानक घुमड़ने लगे हैं। मेरा छोटापन अब बौनेपन की ओर बढ़ रहा है। इतनी घोर बेइज्जती। प्रभु! कैसे दिन दिखा रहा है! इस अदने आदमी के जीवन में दुष्टता की कोई गतिविधि नहीं लिखी तूने? अवसरों की समानता भी प्रदान नहीं की?

कई बार तो हमारे मोबाइल पर एक दिन में ही इतनी क्षमायाचनाएं आ जाती हैं कि लगता है माफी मांगने का पूरा राष्ट्रीय बैकलॉग ही क्लियर हो रहा है। सबके पास कारण हैं। अनजाने और अज्ञात लोग तक मौका नहीं छोड़ रहे हैं। कई एसएमएम तो ऐसे भी मिले, जिनमें भेजने वाले का नाम तक नहीं था। कई माफी मांगने वाले तो इतनी जल्दबाजी में थे कि मूल आदमी का नाम हटाए बिना ही अग्रेषित कर गए। पूरी दुनिया के पास दूसरों का दिल दुखाने के पर्याप्त किस्से हैं। मौके निकाले हैं लोगों ने इस क्षेत्र में। पर्याप्त मात्रा में श्रम किया है। अपनी कमजोरी के चलते सिर्फ हम ही चूक गए। दूसरों को ठेस पहुंचाने के हर मौके पर बिचकते रहे।

क्या अदना जीवन जीया है हमने!

कहीं अपनी राय नहीं रख पाए। कहीं विरोध का झंडा तक नहीं उठा पाए। कहीं गलत होता रहा तो टोक नहीं पाए। सौहार्द बनाए रखा। सहमत होते रहे। अशक्त सहमति किसी को आईना दिखा सकती है भला? बिना आईना दिखाए तो क्या ठेस पहुंचेगी? माफी मांगने के क्या कारण पैदा होंगे? अदने आदमी! तेरी भलमनसाहत तो सिगरेट के टोटे की तरह मसले जाने के ही लायक है।
हाय-हाय! हमारी जरा-सी आकांक्षा भी पूरी नहीं होगी?

होगी, जरूर होगी। ईश्वर बड़ा दयालु है। एक बार सबको मौका जरूर देता है। हो सकता है इस लेख को पढ़कर कइयों के मन को ठेस लगे। मैं एडवांस में उनसे तहेदिल से माफी चाहता हूं। मन से मैल निकालिए और मुझे तत्काल क्षमा कर दीजिए।

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