जब गायों के खुर उनसे स्पर्श होते हैं तो आदिवासी निहाल हो जाते हैं और वहां जयश्री कृष्ण हरिकृष्ण राधे मुरारी का जयघोष गूंज उठता है। इस परंपरा को गाय गोहरी के नाम से जाना जाता है। यह सिलसिला सन् 1858 से चला आ रहा है।
पड़वा के दिन झाबुआ में श्री गोवर्धननाथजी की हवेली के बाहर भव्य आयोजन होता है। इसमें गायों को विशेष रूप से सजाकर वैष्णव संप्रदाय के लोग हवेली की सात परिक्रमा लगाते हैं। इसे गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा के बराबर माना जाता है। इसी दौरान हजारों आदिवासी इकठ्ठा होते हैं और सड़क पर लेट जाते हैं। आदिवासी के शरीर पर गाय का खुर लग जाता है वह समझता है उसे गोमाता का आशीर्वाद मिल गया।
हवेली के निर्माण के साथ शुरू हुई थीं परंपरा- इतिहासविद् डॉ. के.के. त्रिवेदी झाबुआ के अनुसार गाय गोहरी की पंरपरा वर्ष 1858 में गोवर्धननाथजी की हवेली निर्माण के साथ शुरू हुई। इसके सूत्रधार महाराजा गोपालसिंह थे। पहले राजकीय संरक्षण में यह उत्सव मनाया जाता था।
इस दौरान मन्नतधारियों को राजा की ओर से सम्मानस्वरूप साफा बांधने के साथ श्रीफल भेंट किया जाता था। अब यह कार्य गोपाल मंदिर ट्रस्ट कर रहा है। जिले के थांदला, नवापाड़ा रोड, रंभापुर में भी आदिवासी मन्नतें उतारते हैं। जोबट में वर्ष 1973-74 तक यह परंपरा चली, लेकिन गवली समाज के प्रमुख भगवानजी की मृत्यु के बाद ऐसा नहीं हुआ।
राजा भी नंगे पैर पहुंचते थे मंदिर - बीते 24 साल से इस पर्व पर झाबुआ जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार जवाहरलाल राठौड़ बताते हैं गाय गोहरी पर झाबुआ की गोवर्धननाथजी की हवेली में दर्शन के लिए राजा उदयसिंह तक नंगे पांव आते थे। आदिवासी समाज की मान्यता है कि गो-धन है और मातृ शक्ति है। वे मन्नत लेते हैं और मानते हैं कि अगर गोमाता का पैर या खुर उनके शरीर पर लग जाएगा तो उन्हें माता का आर्शीवाद मिलेगा।
पड़वा पर ज्यादा बिकते थे पटाखे- गाय गोहरी के लिए लोग दीपावली से ज्यादा पटाखे खरीदते थे। रेल पटाखा सर्वाधिक खरीदा जाता था। युवा वर्ग एक दूसरे पर रेल पटाखा फेंकते थे। रेल पटाखे की कसियाल (दो बारूद वाले कंडेनसर) निकालकर जलाते और फेंकना शुरू करते। गजकुंडी (धमुका) में पोटाश भरकर एक दूसरे के पैरों के पास फोड़ते थे।
2001 में लगा प्रतिबंध- वर्ष 2001 के पूर्व तक गाय गोहरी पर्व के दौरान युवा वर्ग हिंगोट की तर्ज पर एक-दूसरे पर रॉकेट चलाता था। इसमें कई लोग घायल भी हो जाते थे। 2001 में दो पक्षों में विवाद के बाद फिजा बिगड़ी और कफ्यरू जैसे हालत बन गए। तब से आतिशबाजी पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

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