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22 अगस्त 2011

वरना मुश्किल होगा जनता को संभालना



india news


नई दिल्ली। अन्ना के आंदोलन पर सरकार की चुप्पी माहौल बिगाड़ सकती है। सोमवार को केंद्रीय खुफिया एजेंसी (आईबी) ने सरकार को चेताया है कि आंदोलन को जल्द खत्म करने का रास्ता सुझाए, वरना आमजन करो या मरो की स्थिति पर पहुंच जाएगा। आईबी का मानना है कि अब आंदोलन महात्मा गांधी के अंग्रेजों के खिलाफ 1942 के आंदोलन 'करो या मरो' की तरह पेश किए जाने लगा है। जितना जल्दी हो, मामले को सुलझाया जाए।

पिछले एक महीने से सरकार को हर मोड़ पर आगाह कर रही खुफिया एजेंसी की अघिकांश रिपोर्टे सरकारी हुक्मरान जैसे नजरअंदाज कर रहे हैं, उससे आईबी के अघिकारी न सिर्फ हैरान हैं, बल्कि निराश भी हैं। बावजूद इसके एजेंसी ने सरकार को चेताया कि तबीयत बिगड़ने पर अन्ना को कुछ हो गया तो देश में कानून व्यवस्था की स्थिति संभालना मुश्किल हो जाएगी।

हाथ में झंडा नहीं डंडा होगा :
एजेंसी ने आगाह किया कि अन्ना के साथ किसी अनहोनी पर युवा वर्ग आपा खो सकता है। उनके हाथ में थमे हर झंडे के नीचे एक डंडा (लाठी) है। सरकार को बताया कि आंदोलन हर शहर, गांव तक फैल चुका है। हालांकि न्यूज चैनल्स पर तो अघिक टीआरपी वाले शहरों के ही प्रदर्शन दिखाए जा रहे हैं।

यूं खारिज हुई रिपोर्ट : देशभर से खुफिया एजेंसी के अघिकारी काफी समय से आंदोलन से जुड़ी हर रिपोर्ट दिल्ली मुख्यालय भेज रहे हैं। इसी रिपोर्ट को सरकार के पास भिजवाया जाता है। एजेंसी सूत्रों ने बताया कि अन्ना की गिरफ्तारी से होने वाले नफे नुकसान संबंधी एक खुफिया रिपोर्ट को एक मंत्री ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि डमरू बजाकर तो मदारी भी भीड़ एकत्र कर लेता है। चिंता की कोई बात नहीं है, जबकि एजेंसी की मंशा इसे मदारी का डमरू नहीं, भगवान शिव का डमरू बताने की थी।

अहम किरदार : हजारे के पिछले अनशन को सरकार ने खुफिया एजेंसी के ही चेताने पर खत्म कराया था। एजेंसी ने आंदोलन के बड़ा रूप लेने की बात कही थी, जो इस बार के आंदोलन में दिखाई दे रही है। लेकिन, रामदेव मामले में घिरने पर गृह मंत्रालय ने सारा ठीकरा खुफिया एजेंसी के सिरफोड़ कर पल्ला झाड़ लिया था।

सांसदों की आफत : आईबी को कई राज्यों से खबर मिली कि अन्ना समर्थकों के प्रदर्शन व व्यवहार से कई सांसद नाराज व परेशान हैं। उत्तरप्रदेश के कुछ सांसदों ने स्थानीय पुलिस से नाराजगी जताई कि प्रदर्शनकारी उनसे जन लोकपाल पर राय नहीं ले रहे बल्कि बिल के बारे में मौखिक के बजाय लिखित में समर्थन लेने की जबरन कोशिश कर रहे हैं।

...यह सरकार का फेलियर है-दोभाल
आईबी के पूर्व निदेशक अजित दोभाल ने 'पत्रिका' को बताया कि किसी आंदोलन में जनाक्रोश और उसके मूड के बारे में आईबी सरकार को बताता है। उसी आधार पर निपटने के तरीके खोजे जाते हैं लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के कारण सरकारें आईबी रिपोर्टे नजरअंदाज कर देती हैं।

अन्ना आंदोलन में भी आईबी ने आगाह किया होगा लेकिन जैसे आंदोलन बढ़ रहा है, वह खुफिया एजेंसी का नहीं सरकार का फेलियर है। आईबी सरकार को आकलन करके ही सलाह देता है। निर्णय का अधिकार सरकार का है। आंदोलन खुले में होे रहा है और दिख रहा है। लिहाजा आईबी को किसी सूत्र पर निर्भर नहीं रहना है इसलिए एजेंसी की तमाम सूचनाएं सही होती हैं।

अरविंद शर्मा

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