
बहुत इन्तिज़ार के बाद
चमन में आई हे बहार ,
मगरे हमें था इन्तिज़ार जिस बहार का
यह वोह बहार नहीं
यहाँ तो चमन में खिले हें फुल
हमें हे काँटों की जरूरत
हमें फूलों से प्यार नहीं
इतने इन्तिज़ार के बाद भी
आज कहते हें हम
जिसका था इन्तिज़ार शिद्दत से हमें
हाँ यह वोह बहार नहीं।
००० अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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