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25 सितंबर 2026

कोटा की अनंत चतुर्दशी: एक ठेले से शुरू हुआ जुलूस, जो बना देश के प्रमुख गणेश उत्सवों में शामिल

 

कोटा की अनंत चतुर्दशी: एक ठेले से शुरू हुआ जुलूस, जो बना देश के प्रमुख गणेश उत्सवों में शामिल
कोटा की अनंत चतुर्दशी शोभायात्रा केवल धार्मिक जुलूस नहीं, बल्कि शहर के सामाजिक, सांस्कृतिक और अखाड़ा-परंपरा के इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। आज जिस आयोजन में हजारों कलाकार, अखाड़ेबाज, झांकियां, भजन मंडलियां और लाखों श्रद्धालु दिखाई देते हैं, उसकी शुरुआत बहुत छोटे स्तर से हुई थी।
भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार आज कोटा में अनंत चतुर्दशी पर लगभग 80–100 गणेश प्रतिमाएं, 70 से अधिक अखाड़े और करीब 10,000 अखाड़ेबाज भाग लेते हैं तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु शोभायात्रा देखने पहुंचते हैं।
1950: एक ठेले से शुरुआत
कोटा की इस ऐतिहासिक परंपरा की शुरुआत को लेकर उपलब्ध स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में वर्ष 1950 प्रमुख रूप से सामने आता है। 25 सितंबर 1950 को पाकिस्तान से भारत आए डॉ. रामकुमार ने पाटनपोल क्षेत्र से भगवान गणेश की प्रतिमा को एक साधारण ठेले पर रखकर भजन-कीर्तन करते हुए शोभायात्रा निकाली।
उस समय इस यात्रा में लगभग 15 लोग शामिल हुए थे। प्रतिमा को रामपुरा क्षेत्र की छोटी समाध तक ले जाकर चंबल में विसर्जित किया जाता था।
एक अन्य स्थानीय ऐतिहासिक विवरण में इसी परंपरा के आरंभिक स्वरूप में भजन-कीर्तन मंडली, नृत्य और हाथ ठेले पर गणेश प्रतिमा ले जाने का उल्लेख मिलता है।
यही छोटा धार्मिक प्रयास धीरे-धीरे पूरे कोटा शहर के सामूहिक उत्सव में बदल गया।
अखाड़ों के जुड़ने से बदला स्वरूप
शोभायात्रा के विस्तार में अखाड़ों और व्यायामशालाओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही। उपलब्ध विवरण के अनुसार 1952 से अखाड़े इस शोभायात्रा से जुड़ने लगे और 1954 तक लाडपुरा, बोट के बालाजी, रामपुरा, टिपटा और कोटड़ी सहित विभिन्न क्षेत्रों के अखाड़े इसमें शामिल हो चुके थे।
इससे जुलूस केवल गणेश प्रतिमा के विसर्जन की यात्रा नहीं रहा, बल्कि इसमें—
पारंपरिक अखाड़ेबाजी
कुश्ती और व्यायाम प्रदर्शन
लाठी एवं अन्य पारंपरिक कौशल
भजन-कीर्तन
धार्मिक झांकियां
सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदेश
जुड़ते चले गए।
1955 की घटना और जुलूस का पुनर्गठन
स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में 1955 में धार के अखाड़े के पहलवान गजानंद जी की हत्या के बाद पैदा हुई परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है। इसी संदर्भ में बाबा गोपीनाथ जी भार्गव द्वारा शोभायात्रा को पुनः संगठित करने और आगे बढ़ाने की भूमिका बताई जाती है।
बाद के दशकों में शोभायात्रा लगातार बड़ी होती गई। एक हालिया स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार श्रीराम गोदावरी धाम अखाड़े की स्थापना 1971 में हिंद केसरी चंदगी राम ने की थी और अखाड़ा परंपरा ने कोटा के अनंत चतुर्दशी आयोजन को और विस्तार दिया।
1990 के बाद आया विराट स्वरूप
स्थानीय इतिहास-सामग्री में बाबा गोपीनाथ जी भार्गव की भूमिका का उल्लेख करते हुए 1990 के आसपास शोभायात्रा को और भव्य स्वरूप मिलने की बात कही गई है।
समय के साथ कोटा के अलग-अलग मोहल्लों और संस्थाओं द्वारा गणेश प्रतिमाएं स्थापित की जाने लगीं। दस दिनों तक पूजा-अर्चना, आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते हैं और अनंत चतुर्दशी के दिन ये प्रतिमाएं शोभायात्रा में शामिल होती हैं।
परकोटे की गलियों से किशोर सागर तक
कोटा की शोभायात्रा की एक विशेष पहचान उसका ऐतिहासिक मार्ग है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार यात्रा सूरजपोल गेट से प्रारंभ होकर पुराने शहर की चारदीवारी से गुजरती हुई किशोर सागर की बारादरी तक पहुंचती है।
अर्थात यह यात्रा केवल वर्तमान को नहीं, बल्कि कोटा के पुराने शहर, उसके दरवाजों, बाजारों, गलियों और परकोटे की ऐतिहासिक विरासत को भी अपने साथ लेकर चलती है।
रास्ते में शहरवासी अपने घरों और प्रतिष्ठानों से शोभायात्रा का स्वागत करते हैं। विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा श्रद्धालुओं के लिए जलपान एवं अन्य सेवाओं की व्यवस्था की जाती है।
अखाड़ेबाजी: जुलूस की विशिष्ट पहचान
कोटा के अनंत चतुर्दशी जुलूस की सबसे अलग पहचान उसकी अखाड़ा संस्कृति है।
आज इसमें मलखंभ, फायर मलखंभ, ब्लाइंड मलखंभ और दूसरे पारंपरिक व्यायाम एवं कौशल प्रदर्शन देखने को मिलते हैं। सरकारी पर्यटन विवरण में 70 से अधिक अखाड़ों और लगभग 10,000 अखाड़ेबाजों की भागीदारी का उल्लेख है।
नई पीढ़ी के बच्चे और युवतियां भी इन पारंपरिक कलाओं का प्रशिक्षण ले रहे हैं। हालिया रिपोर्ट के अनुसार अब यह परंपरा छह दर्जन से अधिक अखाड़ों और सैकड़ों झांकियों तक पहुंच चुकी है।
धर्म के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश
अनंत चतुर्दशी मूलतः भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना का पर्व है। इस दिन अनंत सूत्र धारण करने की परंपरा है। वहीं गणेशोत्सव की दस दिवसीय परंपरा में इसी दिन भगवान गणेश की प्रतिमाओं का विसर्जन भी किया जाता है।
इसलिए कोटा में यह दिन दो धार्मिक परंपराओं को एक साथ जोड़ता है—अनंत भगवान की पूजा और गणेश प्रतिमा का विसर्जन।
आज की शोभायात्रा में धार्मिक आस्था के साथ कला, संगीत, व्यायाम, लोकसंस्कृति और सामाजिक सहभागिता भी दिखाई देती है।
कोटा की पहचान बन चुका आयोजन
भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार कोटा के अनंत चतुर्दशी महोत्सव में लगभग चार लाख लोगों की भागीदारी होती है और देश के विभिन्न क्षेत्रों से लोग इसे देखने आते हैं।
2025 में भी मीडिया रिपोर्टों ने कोटा की गणपति विसर्जन शोभायात्रा को लगभग 5 किलोमीटर लंबी बताया था।
इस प्रकार 1950 में एक छोटे ठेले पर शुरू हुई यात्रा ने सात दशकों से अधिक समय में विशाल जनउत्सव का रूप ले लिया।
इतिहास का संदेश
कोटा की अनंत चतुर्दशी हमें यह बताती है कि बड़े सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन हमेशा बड़े संसाधनों से शुरू नहीं होते। कभी-कभी एक व्यक्ति की श्रद्धा, एक छोटी प्रतिमा, एक ठेला और कुछ लोगों का भजन-कीर्तन ही आने वाली पीढ़ियों के लिए परंपरा की नींव रख देता है।
आज सूरजपोल से लेकर पुराने कोटा शहर और किशोर सागर तक उमड़ता जनसमुद्र उसी छोटी शुरुआत की विस्तारित कहानी है।
1950 में लगभग 15 लोगों की यात्रा से शुरू हुआ यह क्रम आज कोटा की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुका है। गणपति बप्पा की विदाई के साथ अखाड़ों की परंपरा, झांकियों की कला, भजन-कीर्तन और शहरवासियों की सामूहिक भागीदारी—सब मिलकर इसे कोटा के सबसे विशिष्ट वार्षिक आयोजनों में स्थान देते हैं।
“एक ठेले से निकली गणेश यात्रा, आज कोटा की सांस्कृतिक विरासत बन गई है।”
अनंत चतुर्दशी क्यों और कैसे मनाई जाती है?
अनंत चतुर्दशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है। यह मुख्यतः भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा का पर्व है। इसी दिन गणेश चतुर्थी से आरम्भ हुए गणेशोत्सव का समापन और गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन भी किया जाता है। इसलिए यह दिन धार्मिक दृष्टि से दो प्रमुख परंपराओं—अनंत भगवान की आराधना और गणेश विसर्जन—से जुड़ा है।
अनंत चतुर्दशी क्यों मनाते हैं?
‘अनंत’ का अर्थ है—जिसका अंत न हो, अर्थात भगवान विष्णु का अनंत स्वरूप। इस दिन श्रद्धालु परिवार की सुख-समृद्धि, संकटों से रक्षा और मनोकामना की पूर्ति के लिए भगवान विष्णु की पूजा करते हैं।
इसके साथ अनंत सूत्र बांधने की परंपरा है। सामान्यतः पुरुष दाहिने और महिलाएं बाएं हाथ में अनंत सूत्र धारण करती हैं। इसमें चौदह गांठें लगाने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है, जिन्हें विष्णु के अनंत स्वरूप तथा चौदह लोकों से जोड़ा जाता है।
अनंत व्रत की कथा
पुराणिक परंपरा में राजा सुमन्त, उनकी पत्नी दीक्षा और पुत्री सुशीला की कथा प्रसिद्ध है। कथा के अनुसार सुशीला ने अनंत भगवान की पूजा करके अनंत सूत्र धारण किया। इससे परिवार में सुख-समृद्धि आई, लेकिन बाद में अनंत सूत्र के प्रति अविश्वास और उसका अनादर होने पर विपत्तियां आईं। अंततः अनंत भगवान की श्रद्धापूर्वक उपासना से स्थिति सुधरी।
इस कथा का धार्मिक संदेश है कि श्रद्धा, संयम और धर्माचरण जीवन में स्थिरता और कल्याण के साधन हैं।
पूजा कैसे की जाती है?
अनंत चतुर्दशी के दिन सामान्यतः:
प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहने जाते हैं।
पूजा स्थल पर भगवान विष्णु/अनंत भगवान की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है।
कलश स्थापित कर पूजा की जाती है।
रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं।
अनंत सूत्र की पूजा की जाती है।
अनंत भगवान की कथा सुनी या पढ़ी जाती है।
परिवार के सदस्य अनंत सूत्र धारण करते हैं।
भगवान विष्णु की आरती और प्रार्थना की जाती है।
कई परिवार व्रत रखते हैं और पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं।
गणेश विसर्जन इसी दिन क्यों?
गणेशोत्सव की परंपरा में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश प्रतिमा स्थापित करके कई स्थानों पर 10 दिनों तक पूजा की जाती है। दसवें दिन, अर्थात अनंत चतुर्दशी, गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।
इसका भाव यह है कि गणपति को घर और सार्वजनिक पंडाल में श्रद्धापूर्वक आमंत्रित करने के बाद उन्हें सम्मानपूर्वक विदाई दी जाए और उनकी प्रतिमा को जल में विसर्जित किया जाए।
इसी कारण महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश सहित अनेक क्षेत्रों में अनंत चतुर्दशी का दिन गणेश विसर्जन का विशाल पर्व बन गया है।
कोटा की विशेष परंपरा
कोटा में अनंत चतुर्दशी का विशेष महत्व है। यहां गणेश प्रतिमाओं की भव्य शोभायात्रा के साथ अखाड़े, पारंपरिक व्यायाम-कौशल, झांकियां, बैंड, भजन-कीर्तन और बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। इसने धार्मिक पर्व को कोटा की विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक परंपरा का रूप दिया है।
अनंत चतुर्दशी भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना, अनंत सूत्र धारण और व्रत का पर्व है; तथा गणेशोत्सव की परंपरा में इसी दिन गणपति की प्रतिमा को श्रद्धापूर्वक विदाई देकर विसर्जन किया जाता है। अख़्तर खान अकेला कोटा 9829086339

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