आपका-अख्तर खान

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22 अगस्त 2021

बढे लोगों की छोटी बातें , अजीब लगती है , लेकिन फिर भी , आखरी वक़्त में , क्या खाक , मुसलमान होंगे , वाली कहावत , अब झूंठी सी लगती है ,, हमारे अपने , लीडर , जो इस शासन में तीन साल तक , ख़ामोशी से बैठे रहे

 बढे लोगों की छोटी बातें , अजीब  लगती है ,  लेकिन फिर भी ,  आखरी वक़्त में ,  क्या खाक , मुसलमान होंगे , वाली कहावत , अब झूंठी सी लगती है ,, हमारे अपने , लीडर , जो इस  शासन में तीन साल तक , ख़ामोशी से बैठे रहे , एक आवाज़ उन्होंने किसी के लिए हमदर्दी की सार्वजनिक रूप से या फिर हाईकमान को पत्र लिखकर ,  नहीं उठाई  ,  अब  ,  तीन साल बाद  , जब  उनकी अपनी सारी उम्मीदें धूमिल सी लगने लगी  है  , तो फिर वोह , हमारी क़ौम के साथ ,क़ौम की  डिमांड  के साथ ,  आधे अधूरे ,  उठ खड़े हुए है ,  अशोक गहलोत के खिलाफ यक़ीनन  कुछ  लोगों  की साज़िशे हैं  , एक तरफ कोरोना की वजह से , दो  सालों  में सारी व्यवस्थाएं सभी कोशिशों के बावजूद भी डगमगाई , दूसरी तरफ , मानेसर बगावत , के बाद , कुछ अख़बारों की मुख्यमंत्री बदलने की फ़र्ज़ी खबरों से भी , हालात बेकाबू से रहे , रोज़ मीटिंगे रोज़  , कांग्रेस की जगह , व्यक्ति की गुटबाजियों के नाम पर उनके अपने लोगों को सेट करने की डिमांड चार्टर के आगे , यक़ीनन अशोक  गहलोत को जो  बेहतर से बेहतर सुशासन देना ,था   छत्तीस क़ौमों को  प्रतिनिधित्व देना था , किसी व्यक्ति विशेष के नहीं , कांग्रेस के समर्पित लोगों को एजस्ट करना ,था  उसकी जगह , सरकार बनाये रखना ,, कांग्रेस के स्वाभिमान की रक्षा करना , कांग्रेस में अटूट एकता बनाये रखना उनकी प्राथमिकता बन गयी  ,, कई आयोग , कई इदारे , खाली पढ़े है  , चुनावी मुद्दे , चुनावी वायदे , कई पुरे हुए , कई पुरे करने के प्रयासों में हैं  ,  कहते है ,कुछ तो मुजबोरियाँ रही होंगी , वरना यूँ ही हर कोई बेवफा नहीं होता ,, कमोबेश , कांग्रेस के महत्वपूर्ण पदों पर रहे ,  काफी लोग  , बेवफाई के रास्ते पर चल निकले है  ,जो लोग अपनी क़ौमे के हर अत्याचार पर , खामोश रहे , समर्थक रहे , पक्षपात , मनमानी पर , पहले भी कई  सालों तक शासन में रहते , चुप्पी  साधे रहे ,तीन सालों तक   उन्हें क़ौम    कोई भी मुद्दे , कोई भी दर्द नज़र  नहीं आया , जो लोग पहले , पूर्व केंद्रीय  मंत्रियों के साथ ,  पुरे राजस्थान के हर ज़िले के कुछ लोगों को बुलाकर , खाना पार्टी  की सियासत कर चुके हों , उस वक़्त  भी जिन  लोगों  ने ,क़ौम के हक़ की कोई आवाज़ नहीं उठाई  हो  , जिन्होंने , मुख्यमंत्री को  , क़ौम के  मुद्दों पर ,  कोई  पत्र नहीं  लिखा हो  , मिलकर ,क़ौम के हक़ में बगावती तेवर नहीं दिखाए हों  ,    वोह अचानक सक्रिय हो गए , वोह अचानक , जी 25 की  तरह मुद्दे 19 हो  गए ,,  उन  उन्नीस   मुद्दों में ,हमारे इबादत घरों की रोकी गयी ,  इबादत घरों की इज़ाज़तों का मुद्दा नहीं है , हमारे लोगों को उचित प्रतिनिधित्व देने , मंत्री मंडल में , प्रतिनिधत्व देने , , सभी  पदों को तुरंत भरने , और अल्पसंख्यक आयोग , मदरसा बोर्ड , वक़्फ़ विकास परिषद ,वक़्फ़ बोर्ड  ,  मेवात बोर्ड ,  अल्पसंख्यक वित्त विकास निगम के अलावा , दूसरे बोर्डों में ,  अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व देने की मांग नहीं उठा पाए हों , जो  लोग  ,  भर्ती बोर्ड ,  सुचना आयोग , लोक  सेवा आयोग ,  मानवाधिकार आयोग , सहित किए पदों की भर्ती के वक़्त , अल्पसंख्यकों   की उपेक्षा पर चुप  , खामोश रहे हों , वोह आज ,  जब  वार्ड पार्षदों को   सहवृत किये जाने की  कार्यवाही  पूरी हो जाने के बाद ,वार्ड पार्षद सहवृत करने की मांग उठाये , जब विधानसभा में ,  नो सितंबर के बाद , कुछ घोषणाएं होना हों ,  तो उन संभावित घोषणा के मुद्दे उठाये , वोह भी मुख्यमंत्री से  नहीं ,  हाईकमान  ,प्रभारी के सामने ज़रिये लेटर मुद्दे उठाये , मिलकर , इन बातों पर ,  मुख्यमंत्री ,  या  फिर ,   हाईकमान ,  या फिर प्रभारी महोदय से ,,,  कोई चर्चा नहीं करे , कोई  दबाव  नहीं बनाये , सिर्फ एक  कागज़ , एक पत्र लिखा जाए , तो फिर तीन साल  के बाद इस अंगड़ाई  का स्वागत करें ,  या फिर तिरस्कार समझ   नहीं  आ रहा है  ,  लेकिन फिर भी , अगर  इन मुद्दों  पर , ऐसे लोग जो ऊँचे से  भी ऊँचे पदों पर रह चुके हों  ,जो निति निर्धारक हों , जो वक़्फ़ ,  मदरसा  ,चिकित्सा , शिक्षा सहित  सभी मुद्दों पर , इंचार्ज रहे हों ,  अगर  वोह सिर्फ पत्र लिखते  है , और वोह  भी तीन साल बाद पत्र लिखते  है  , वोह भी   मुख्यमंत्री के स्थान पर , हाईकमान को पत्र लिखते हों , तो फिर हम उनके ऐसे दिखावटी ,  लेटलतीफी विरोध का तिरस्कार करते  है ,   क्यौंकि वोह इन वर्तमान सियासी हालातों में ,, किसी के हथियार बनने की तरह है , और अगर वोह सच्चे है , अगर वोह सच्चे हमदर्द हैं , तो ऐलान करें ,  विधानसभा के सामने , जायज़  तरीके से ,  प्रेस  कॉन्फ्रेंस बुलवाये , राजस्थान  के  इनके अपने वर्ग की जिलेवार समस्याओं ,  प्रदेश की सभी इदारों  की समस्याओं का कच्चा चिटठा तय्यार,  करें और हाईकमान के समक्ष   खुल कर टारगेट फिफ्टीन  , हिस्सेदारी फिफ्टीन , पंद्रह सूत्रीय कार्यक्रमों की शत प्रतिशत क्रियान्विति , सभी इबादत घरों की , वाजिब मामलों की  तत्काल इजाज़त , , टिकती में हिस्सेदारी , सत्ता में सांझेदारी , सभी इदारों में , नौकरशाहों  की जगह कार्यर्कताओं की नियुक्तियां ,  उर्दू , मदरसे , वक़्फ़ सम्पत्तियों की अधिसूचना , वक़्फ़ के पुराने बक़ाये रुपयों  की देनदारी , भर्ती बोर्डों में ,  सच्चर ,  रंगनाथ मिश्र के सुझावों की शत प्रतिशत पूर्ति के लिए संघर्ष करें ,  धरना दें , तो हम सब  उनके नेतृत्व का समर्थन करेंगे , उनके साथ खड़े मौजूद मिलेंगे ,  ,लेकिन अचानक , तीन साल बाद ,वोह भी जब आप  राजस्थान के हर ज़िले के कुछ लोगों को बुलाकर , डिप्लोमेसी लंच पार्टी कर चुके हो , तब आपने यह बातें नहीं उठाई , तो फिर दर्द होता है ,  लेकिन ख़ुशी इस बात की होती है , के चाहे सियासत ही सही , चाहे गुस्सा ही सही , चाहे ,  इस्तेमाल होकर ही सही , चाहे पूरी हमारी ज़रूरतों का डिमांड चार्टर नहीं  , लेकिन कुछ तो आपने ,  लिखा  ,कुछ तो आपने , वाइरल किया ,,  आगे बढ़ो , खुद को साबित करों ,  हम  सब आपके इन  मुद्दों पर ,अगर इस  तरह से ,  मुक़ाबिल आते हो , तो  पिछली  सभी खामोशियाँ  के सुबूतों  को भुलाकर हम आपके नेतृत्व में , आपके साथ खड़े मिलेंगे ,लेकिन अगर किसी  के कहने पर , किसी  के खिलाफ साज़िश में  है , तो फिर  अल्लाह रहम  करे ,,  ,, अख्तर  खान अकेला कोटा राजस्थान

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