आपका-अख्तर खान

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25 मई 2021

यूँ तो धर्म मज़हब सभी के है , लेकिन धर्म के सिद्धांतों पर चल कर लोगों की खिदमत करने , उनके बुरे वक़्त में काम आने , उनकी मदद के लिए , पत्थर का कलेजा चाहिए , यूँ ही , अपने अपने धार्मिक स्थलों को मोडिफाई करना ,, सुविधाभोगी , आकर्षक बनाना , कोई मायने नहीं रखता

 यूँ तो धर्म मज़हब सभी के है , लेकिन धर्म के सिद्धांतों पर चल  कर लोगों की खिदमत करने , उनके बुरे वक़्त में काम आने , उनकी मदद के लिए , पत्थर का कलेजा चाहिए , यूँ ही , अपने अपने धार्मिक स्थलों को मोडिफाई करना ,, सुविधाभोगी , आकर्षक बनाना , कोई मायने नहीं रखता ,, क्योंकि  धर्म के लिए आस्था की ज़रूरत होती है , विलासिता की नहीं , जी हाँ दोस्तों , में बात कर रहा हूँ , हमारे इन्डिया की  , मेरे भारत महान की , यहां संकट काल में , मददगार के रूप में , मज़हब के प्रतिशत के हिसाब से  हम नगण्य रहे है , जबकि ,  सरदार , असरदार होकर सामने आये है ,, , में सेल्यूट करता हूँ , मेरे सिक्ख सरदार भाइयों को , जिन्होंने अपने धर्म के प्रति आस्था के साथ , साथ धर्म में लिखे व्यवहारिक ज्ञान को स्वीकार किया , अंगीकार किया और सेवादारी को अपने व्यवहार में लाये , हर गुरूद्वारे में भूखों के लिए लंगर , भूखे सभी भूखे चाहे वोह किसी भी धर्म , मज़हब , किसी भी शहर , गाँव के ही क्यों ना हो ,, ,लेकिन अब जब अचानक भारत में , कोविड संक्रमण का पहाड़ टुटा , त्राहि त्राहि शुरू हुई , ऑक्सीजन की कमी ,बिस्तरों की कमी , अस्पतालों की कमी ,, दवाइयों की कमी , सरकार की हर जगह असफलता , ऐसे में , सिख समुदाय ने फिर खुद को असरदार साबित  किया ,,, देश के सिक्ख भाइयों ने ,, देश के अधिकतम बढे शहरों में , भूखों के लिए लंगर शुरू रखा ही सही , लकिन आपात काल से चिकित्स्कीय संघर्ष के लिए , हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठे ,, इधर उधर आरोप प्रत्यारोप नहीं लगाए ,, सीधे मुक़ाबले पर खड़े हुए , हालात की नज़ाकत को समझा , और हर बढे शहर में , एक नए अस्पताल सिस्टम के साथ उठ खड़े हुए , डॉक्टर ,ऑक्सीजन , तात्कालिक , आपात चिकित्सा की सभी सुविधाएं कोविड हा हाकार में ,  अधिकतम गरीबों के लिए मददगार बनी , और सैकड़ों नहीं , हज़ारो हज़ार लोगों को मरने से बचाया गया ,, आपात काल में , यक़ीनन सिक्ख भाइयों का यह काम , एक इतिहास  है , लेकिन इससे भी बढ़ी बात यह है के , सिक्ख भाइयों ने ,भविष्य के खतरे को भांप कर , इस अव्यवस्था को समझा , ,पहचाना  अध्ययन किया , और अपने धर्म में लिखित सेवादारी  के  इतिहास को एक बार फिर साबित किया ,  सिक्ख   भाइयों ने ,  मौके  की नज़ाकत देखी और गुरुद्वारों के सोंदर्यकरण , विलासिता सहित अन्य अनुपयोगी खर्चों को रोककर , हर जगह , ज़रूरी सुविधाओं के साथ ,  चिकित्सालय खोलने की कार्ययोजना तय्यार  की सेल्यूट मेरे सिक्ख भाइयों ,  में सलाम करता हूँ , धर्म भी है , आस्था भी है , और इस आस्था में , दिए गए सेवादारी के आदेश की पालना भी  है ,, में अपने धर्म इस्लाम की बात करूँ , यक़ीनन हर तरह से इस्लाम  में हुक है  ,यतीम , बेवा , बीमार ,मुसाफिर , ज़रूरत मंद की मदद करना ,, यूँ तो  रईस लोगों की कमी नहीं है ,,,  लेकिन वक़्फ़ बोर्ड की व्यवस्था हर राज्य में  है ,,  हर शख्स पर ढाई प्रतिशत , ज़कात इस्लामिक आदेश के तहत लागू है  ,, फितरा ,,  ज़कात  तो अलग है  ,  यह ढाई प्रतिशत , करोड़ों , करोड़ नहीं  , अरबों अरब रूपये होता है , इसके अलावा मज़हबी प्रोग्राम के नाम पर , जुलुस ,  कार्य्रकमों ,  खासकर , मज़हबी दावतों के नाम पर ,, करोड़ों करोड़ रूपये तो हम  यूँ  ही  ,  हर साल   खर्च कर डालते है  ,,,   लेकिन हमारे  ना तो लंगर है , ना ही हमारे खुद के ऐसे अस्पताल जिसमे हम ज़रूरतमंदों का मुफ्त इलाज कर सके , में , हमारी सियासत करने वाले ,, व्यापारियों की बात नहीं कर रहा हूँ ,  जो  मेडिकल  कॉलेज के नाम पर इलाज का , शिक्षा का व्यापार कर रहे है ,, वोह तो उस रूपये से , हमारे लीडर बनने की कोशिशों में है ,, लेकिन सिक्ख भाइयों की इस लंगर गिरी , चिकित्सालय  खोलने की दरियादिली से , हमे सबक़ तो लेना ही चाहिए , हमारे पास हर ज़िले में ,  अस्पताल के लिए वक़्फ़ की ज़मीन मिल सकती  है , रुपया अगर ज़कात प्रबंधन ईमानदारी से हो जाए तो आसानी से मिल  सकता है ,, व्यवस्था बन सकती है  , लेकिन हम हमारे इस्लाम  के दिए गए निर्देशों के बाद भी ,  इस्लाम के इस प्रबंधन को अपनाना ही नहीं चाहते  , अपनी सहूलियत से इस्लाम  के तोर तरीके हम  अपनाने लगे है ,लिखित इस्लाम के सिद्धांतों से हम दूर होते  जा रहे है , खिदमत ऐ ख़ल्क़ से हम  खुद  को  अलग  करते रहे है , मस्जिदों , मज़ारों में ,  महंगे झूमर , सजावट , उर्स पर लाखों रूपये के क़व्वाल  ,, तो मस्जिदों  में , एयरकंडीशन सहित अनेक सुविधाएं , कई खर्च  ऐसे है जो हम कम कर सकते है , और लंगरदारी , चिकित्स्कीय व्यवस्था में , ज़रूरतमंदों के हम मददगार बन सकते है  ,, मज़हब हमारा , आदेश अल्लाह का हमे , और देखिये हमारा काम दूसरे लोग  कर रहे है  ,, हमारे हिन्दू भाइयों से तो में क्या कहूं वोह खुद समझदार है , उन्हें भी सोचना होगा ,, उनके  लिए सुविधायुक्त  ,  मंदिर मठ ज़रूरी है , या फिर ,  पूजा स्थल , आस्था स्थल ,  के अलावा , उन्हें ,  मानवसेवा के लिए अस्पताल भी चाहिए , यूँ तो हिन्दू भाइयों की तरफ से संघ ने , हर ज़िले में भारत विकास परिषद के आस्पताल  खोले है , यक़ीनन   वोह इस  आपात काल  में उपयोगी  ,, संजीवनी साबित हुए है , जेन बंधुओं  का भी अपना सिस्टम , अपनी व्यवस्था ,,  अनुकूल  रही   है  ,,   लेकिन अब हमें समझना होगा , हर धर्म मज़हब , की  किताबों में ,ईश्वरीय , अल्लाह ,वाहेगुरु ,  जीसस , महावीर स्वामी   के आदेशों में , एक ही बात  कोमन है ,सेवा करो  ,,  गरीबों  की सेवा करो ,  भूखों  को   खाना खिलाओ , बीमार , बेवा , गरीब ,  मरीज़  , मुसाफिर की मदद करो ,  तो फिर हम  सब  मिलजुलकर ,या  फिर अपने समाज के सिद्धांतों के तहत , आने वाले कल की चिकित्स्कीय  आपात व्यवस्था से  निपटने के लिए ,,  हर तरफ , एक हॉस्पिटल खोलने का  संकल्प  लेकर क्यों  नहीं   आते ,,  हमारी फ़िज़ूल  खर्ची  ,  , मज़हबी  फ़िज़ूल  खर्चियाँ हम  रोकें , जुलुस ,  वगेरा के खर्चों को कम  कर , अपने प्रबंधन को संभाले , ज़कात के रुपयों  को  व्यवस्थित करे , और ज़रूरतमंदों  के लंगर , इलाज , वगेरा के आवश्यक  खर्च पर ही ,  यह खर्च हो , इसकी व्यवस्था सुनिश्चित करे ,,  लेकिन हर बारे मुसीबतें आती है , सोचते है  ,,, देखते है  ,, व्यवस्थाएं बनाते  है , नतीजे के नाम पर फैसला सिफर ही निकलता है , इस बार ऐसा नहीं होना चाहिए , हमे खुद को बदलना होगा , हमे अपने मज़हब ,  धर्म के ओरिजनल सेवाभावी  सिद्धांतों की तरफ लौटना होगा ,, आपसी  ,  झगड़े ,  मनमुटाव खत्म करना होंगे , क्या  हम  आप  ऐसा कर सकेंगे , अगर दिल से कोशिश की , तो इंशाअल्लाह कर सकेंगे ,   नहीं तो ईश्वर , अल्लाह ,भगवान ,  वाहेगुरु , जीसस , महावीरस्वामी तो सब  के कहे अनुसार मालिक  है  ,  तो है  , लेकिन  फिर से ऐसी परेशानी के वक़्त हमे दर दर भटकना ना पढ़े , इस तरफ तो हमे सोचना ही होगा ,,,  अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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