यूँ तो धर्म मज़हब सभी के है , लेकिन धर्म के सिद्धांतों पर चल कर लोगों की खिदमत करने , उनके बुरे वक़्त में काम आने , उनकी मदद के लिए , पत्थर का कलेजा चाहिए , यूँ ही , अपने अपने धार्मिक स्थलों को मोडिफाई करना ,, सुविधाभोगी , आकर्षक बनाना , कोई मायने नहीं रखता ,, क्योंकि धर्म के लिए आस्था की ज़रूरत होती है , विलासिता की नहीं , जी हाँ दोस्तों , में बात कर रहा हूँ , हमारे इन्डिया की , मेरे भारत महान की , यहां संकट काल में , मददगार के रूप में , मज़हब के प्रतिशत के हिसाब से हम नगण्य रहे है , जबकि , सरदार , असरदार होकर सामने आये है ,, , में सेल्यूट करता हूँ , मेरे सिक्ख सरदार भाइयों को , जिन्होंने अपने धर्म के प्रति आस्था के साथ , साथ धर्म में लिखे व्यवहारिक ज्ञान को स्वीकार किया , अंगीकार किया और सेवादारी को अपने व्यवहार में लाये , हर गुरूद्वारे में भूखों के लिए लंगर , भूखे सभी भूखे चाहे वोह किसी भी धर्म , मज़हब , किसी भी शहर , गाँव के ही क्यों ना हो ,, ,लेकिन अब जब अचानक भारत में , कोविड संक्रमण का पहाड़ टुटा , त्राहि त्राहि शुरू हुई , ऑक्सीजन की कमी ,बिस्तरों की कमी , अस्पतालों की कमी ,, दवाइयों की कमी , सरकार की हर जगह असफलता , ऐसे में , सिख समुदाय ने फिर खुद को असरदार साबित किया ,,, देश के सिक्ख भाइयों ने ,, देश के अधिकतम बढे शहरों में , भूखों के लिए लंगर शुरू रखा ही सही , लकिन आपात काल से चिकित्स्कीय संघर्ष के लिए , हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठे ,, इधर उधर आरोप प्रत्यारोप नहीं लगाए ,, सीधे मुक़ाबले पर खड़े हुए , हालात की नज़ाकत को समझा , और हर बढे शहर में , एक नए अस्पताल सिस्टम के साथ उठ खड़े हुए , डॉक्टर ,ऑक्सीजन , तात्कालिक , आपात चिकित्सा की सभी सुविधाएं कोविड हा हाकार में , अधिकतम गरीबों के लिए मददगार बनी , और सैकड़ों नहीं , हज़ारो हज़ार लोगों को मरने से बचाया गया ,, आपात काल में , यक़ीनन सिक्ख भाइयों का यह काम , एक इतिहास है , लेकिन इससे भी बढ़ी बात यह है के , सिक्ख भाइयों ने ,भविष्य के खतरे को भांप कर , इस अव्यवस्था को समझा , ,पहचाना अध्ययन किया , और अपने धर्म में लिखित सेवादारी के इतिहास को एक बार फिर साबित किया , सिक्ख भाइयों ने , मौके की नज़ाकत देखी और गुरुद्वारों के सोंदर्यकरण , विलासिता सहित अन्य अनुपयोगी खर्चों को रोककर , हर जगह , ज़रूरी सुविधाओं के साथ , चिकित्सालय खोलने की कार्ययोजना तय्यार की सेल्यूट मेरे सिक्ख भाइयों , में सलाम करता हूँ , धर्म भी है , आस्था भी है , और इस आस्था में , दिए गए सेवादारी के आदेश की पालना भी है ,, में अपने धर्म इस्लाम की बात करूँ , यक़ीनन हर तरह से इस्लाम में हुक है ,यतीम , बेवा , बीमार ,मुसाफिर , ज़रूरत मंद की मदद करना ,, यूँ तो रईस लोगों की कमी नहीं है ,,, लेकिन वक़्फ़ बोर्ड की व्यवस्था हर राज्य में है ,, हर शख्स पर ढाई प्रतिशत , ज़कात इस्लामिक आदेश के तहत लागू है ,, फितरा ,, ज़कात तो अलग है , यह ढाई प्रतिशत , करोड़ों , करोड़ नहीं , अरबों अरब रूपये होता है , इसके अलावा मज़हबी प्रोग्राम के नाम पर , जुलुस , कार्य्रकमों , खासकर , मज़हबी दावतों के नाम पर ,, करोड़ों करोड़ रूपये तो हम यूँ ही , हर साल खर्च कर डालते है ,,, लेकिन हमारे ना तो लंगर है , ना ही हमारे खुद के ऐसे अस्पताल जिसमे हम ज़रूरतमंदों का मुफ्त इलाज कर सके , में , हमारी सियासत करने वाले ,, व्यापारियों की बात नहीं कर रहा हूँ , जो मेडिकल कॉलेज के नाम पर इलाज का , शिक्षा का व्यापार कर रहे है ,, वोह तो उस रूपये से , हमारे लीडर बनने की कोशिशों में है ,, लेकिन सिक्ख भाइयों की इस लंगर गिरी , चिकित्सालय खोलने की दरियादिली से , हमे सबक़ तो लेना ही चाहिए , हमारे पास हर ज़िले में , अस्पताल के लिए वक़्फ़ की ज़मीन मिल सकती है , रुपया अगर ज़कात प्रबंधन ईमानदारी से हो जाए तो आसानी से मिल सकता है ,, व्यवस्था बन सकती है , लेकिन हम हमारे इस्लाम के दिए गए निर्देशों के बाद भी , इस्लाम के इस प्रबंधन को अपनाना ही नहीं चाहते , अपनी सहूलियत से इस्लाम के तोर तरीके हम अपनाने लगे है ,लिखित इस्लाम के सिद्धांतों से हम दूर होते जा रहे है , खिदमत ऐ ख़ल्क़ से हम खुद को अलग करते रहे है , मस्जिदों , मज़ारों में , महंगे झूमर , सजावट , उर्स पर लाखों रूपये के क़व्वाल ,, तो मस्जिदों में , एयरकंडीशन सहित अनेक सुविधाएं , कई खर्च ऐसे है जो हम कम कर सकते है , और लंगरदारी , चिकित्स्कीय व्यवस्था में , ज़रूरतमंदों के हम मददगार बन सकते है ,, मज़हब हमारा , आदेश अल्लाह का हमे , और देखिये हमारा काम दूसरे लोग कर रहे है ,, हमारे हिन्दू भाइयों से तो में क्या कहूं वोह खुद समझदार है , उन्हें भी सोचना होगा ,, उनके लिए सुविधायुक्त , मंदिर मठ ज़रूरी है , या फिर , पूजा स्थल , आस्था स्थल , के अलावा , उन्हें , मानवसेवा के लिए अस्पताल भी चाहिए , यूँ तो हिन्दू भाइयों की तरफ से संघ ने , हर ज़िले में भारत विकास परिषद के आस्पताल खोले है , यक़ीनन वोह इस आपात काल में उपयोगी ,, संजीवनी साबित हुए है , जेन बंधुओं का भी अपना सिस्टम , अपनी व्यवस्था ,, अनुकूल रही है ,, लेकिन अब हमें समझना होगा , हर धर्म मज़हब , की किताबों में ,ईश्वरीय , अल्लाह ,वाहेगुरु , जीसस , महावीर स्वामी के आदेशों में , एक ही बात कोमन है ,सेवा करो ,, गरीबों की सेवा करो , भूखों को खाना खिलाओ , बीमार , बेवा , गरीब , मरीज़ , मुसाफिर की मदद करो , तो फिर हम सब मिलजुलकर ,या फिर अपने समाज के सिद्धांतों के तहत , आने वाले कल की चिकित्स्कीय आपात व्यवस्था से निपटने के लिए ,, हर तरफ , एक हॉस्पिटल खोलने का संकल्प लेकर क्यों नहीं आते ,, हमारी फ़िज़ूल खर्ची , , मज़हबी फ़िज़ूल खर्चियाँ हम रोकें , जुलुस , वगेरा के खर्चों को कम कर , अपने प्रबंधन को संभाले , ज़कात के रुपयों को व्यवस्थित करे , और ज़रूरतमंदों के लंगर , इलाज , वगेरा के आवश्यक खर्च पर ही , यह खर्च हो , इसकी व्यवस्था सुनिश्चित करे ,, लेकिन हर बारे मुसीबतें आती है , सोचते है ,,, देखते है ,, व्यवस्थाएं बनाते है , नतीजे के नाम पर फैसला सिफर ही निकलता है , इस बार ऐसा नहीं होना चाहिए , हमे खुद को बदलना होगा , हमे अपने मज़हब , धर्म के ओरिजनल सेवाभावी सिद्धांतों की तरफ लौटना होगा ,, आपसी , झगड़े , मनमुटाव खत्म करना होंगे , क्या हम आप ऐसा कर सकेंगे , अगर दिल से कोशिश की , तो इंशाअल्लाह कर सकेंगे , नहीं तो ईश्वर , अल्लाह ,भगवान , वाहेगुरु , जीसस , महावीरस्वामी तो सब के कहे अनुसार मालिक है , तो है , लेकिन फिर से ऐसी परेशानी के वक़्त हमे दर दर भटकना ना पढ़े , इस तरफ तो हमे सोचना ही होगा ,,, अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान
तुम अपने किरदार को इतना बुलंद करो कि दूसरे मज़हब के लोग देख कर कहें कि अगर उम्मत ऐसी होती है,तो नबी कैसे होंगे? गगन बेच देंगे,पवन बेच देंगे,चमन बेच देंगे,सुमन बेच देंगे.कलम के सच्चे सिपाही अगर सो गए तो वतन के मसीहा वतन बेच देंगे.
25 मई 2021
यूँ तो धर्म मज़हब सभी के है , लेकिन धर्म के सिद्धांतों पर चल कर लोगों की खिदमत करने , उनके बुरे वक़्त में काम आने , उनकी मदद के लिए , पत्थर का कलेजा चाहिए , यूँ ही , अपने अपने धार्मिक स्थलों को मोडिफाई करना ,, सुविधाभोगी , आकर्षक बनाना , कोई मायने नहीं रखता
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