' दिन है टूटे गमले जैसा...':कुमार शिव
कई अंधेरों को अपदस्थ किया है
सूरज तेरा बन्दोबस्त किया है।
कुछ फूलों ने अनुमोदन चाहा था
हों असहमत,उनको निरस्त किया है।
सूरज का बंदोबस्त और असहमत को निरस्त करनेवाले दिग्गज नवगीतकार कुमार शिव अब हमारे बीच नहीं रहे।21 मार्च की दोपहर उनका निधन हो गया।वे काफी समय से बीमार थे पर अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और नवगीत के प्रति जबरदस्त समर्पण को वे अंत तक जिलाये रखे।ओम प्रभाकर के निधन के लगभग एक माह के भीतर नवगीत का यह स्तम्भ भी ढह गया।
फोन पर ही अपनत्व उड़ेलनेवाले कानून के इस ज्ञाता की रग रग से गीत बहता था।हिंदी पत्रकारिता में जब मैं घुटुअल चल रहा था,तब मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिंदगी में कभी 'धर्मयुग' जैसी पत्रिका में काम करूंगा। वे ग्वालियर के दिन थे।वार था बुधवार यानी 'धर्मयुग' के आने का दिन।उस बुधवार जब 'धर्मयुग' पढ़ा तो रंगीन पेज पर फोटू सहित कुमार शिव का एक नवगीत था:
काट रहे हैं
दिन कपास से।
नाच रहे है तकली जैसे
बज उठते हैं ढपली जैसे
हंस रहे हैं,पर उदास से।
कात रहे हैं,दिन कपास से।
इसकी अंतिम पंक्तियों ने मुझे बुरी तरह झकझोर दिया:
मित्रों ने उपकार किया है,
नागफनी सा प्यार दिया है।
सब खाली बोतल,गिलास से।
काट रहे हैं दिन कपास से ।
यह गीत पढ़कर मैं अंदर तक हिल गया।सुरेंद्र सुकुमार मेरे कथाकार मित्र थे।वे मंच पर भी सक्रिय थे।कोटा से भी उनका रिश्ता था।उनसे नम्बर लेकर एसटीडी के युग में मैंने कुमार शिव से बात की।वह बात कब आत्मीय रिश्ते में तब्दील हो गयी मुझे नहीं मालूम। पर 1986 में जब मैं 'धर्मयुग' में आ गया,डॉ धर्मवीर भारती मेरे सम्पादक थे तब से गणेश मंत्री जी के कार्यकाल तक वे हिंदी के इकलौते ऐसे लेखक थे जो टाइम्स ऑफ इंडिया के मुम्बई ऑफिस में सम्पादक को खोजते नहीं,एक सामान्य से उपसम्पादक को खोजते आते थे।
वे बड़े कद के लेखक थे।मानवीयता से,संस्कारों से लबालब।कानूनी दांवपेच के भी उतने ही जानकार थे, जितनी नवगीत की बारीकियों का उन्हें ज्ञान था।11 अक्टूबर,1946 को जनमे कुमार शिव के 'शंख रेत के चेहरे','पंख धूप के','आईना जमीन का देखा' जैसे नवगीत संग्रह बेहद चर्चित हैं।सूर्य अकसर उनके लेखन के केंद्र में रहा है।वे कहते थे,'सवाल करने का सही नायक भी तो वही है'।वे लिखते हैं:
किये जो प्रश्न मैंने सूर्य से
उनका मिला उत्तर,
खुली खिड़की,लिफाफा धूप का
आकर गिरा भीतर।
पर आज मन बहुत विचलित है मेरे अत्यंत पसन्दीदा नवगीतकार।व्यथित मन से आपकी ही पंक्तियाँ आपको सादर, सस्नेह,सप्रेम:
तुम क्या गए
सूर्य कजलाया,
पड़ी चाँद में
कई दरारें।
बिलकुल भी सम्भव नहीं है नवगीत के शिखर कलश को भूल जाना,भुला पाना। ( हरीश की वाल से)
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