अदालत के आदेश को कागज़ का टुकड़ा समझने वाले पुलिस अधिकारीयों में से एक को
कोटा की भ्रस्टाचार निरोधक अदालत ने सबक़ सिखाते हुए कस्टडी में लिया
,,कस्टडी में लेते ही इन अफसर के होश फाख्ता हो गए ,हाथ जोड़ी ,अदालत के
आदेश नहीं मानने के मामले में बहानेबाज़ी के बाद इन अफसर को पांच सो रूपये
जुर्माने के बाद छोड़ा गया ,,अदालतों के आदेश के घोर उलंग्घन के क़िस्से नए
नहीं है ,हर अदालत परिसर में सेकड़ों ऐसे अदालती आदेशों के उलंग्घन के
क़िस्से रोज़ मर्रा देखने को मिलते है ,,लेकिन न्यायिक अधिकारीयों में
कुछ ही मर्द होते है जो न्यायिक आदेशों के सम्मान की पालना में न कोई छोटा
,न कोई बढ़ा ,न कोई अफसर ,न कोई फ़क़ीर देखते है और सख्ती से पालना नहीं होने
पर ऐसे लोगो को सबक़ सिखाते है ,में कोटा भ्रस्टाचार न्यायालय के ऐसे
इन्साफ पसंद निष्पक्ष ,बहादुर जज को सेल्यूट करता हूँ ,सभी न्यायिक अधिकारी
जो उनकी पत्रावलियों में गवाहों के सम्मन ,,गिरफ्तारी वारंट ,,ज़मानती
वारंट तामील के बाद नहीं लौटाते ,कोई रिपोर्ट पेश नहीं करते ,,अनुसंधान
रिपोर्टों को आदेश के बाद भी समय पर प्रस्तुत नहीं करते ,,अदालत के आदेश के
बाद भी कई दिनों तक परिवाद थाने पहुंचने के बाद भी एफ आई आर नहीं काटते
,,वगेरा वगेरा ,,न जाने कितना उलंग्घन करते है ,ऐसे लोगो के खिलाफ एक बार
चेतावनी के बाद अगर अदालते ज़िम्मेदार पुलिस अधिकारी के खिलाफ प्रचलित विधि
क़ानून के तहत प्रसंज्ञान लेकर उन्हें दंडित करे ,सख्ती दिखाए ,तो टालम टोल
बहाने बाज़ अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही होने के बाद अदालतों के तलबी
,,गवाही के कई मामलात पटरी पर आ जाएंगे ,,तुरंत मुक़दमे दर्ज होकर अनुसंधान
होने लगेगा ,,जांच रिपोर्टें समयबद्ध कार्यक्रम के तहत पेश होने लगेंगी
,बहानेबाज़ी खत्म होगी ,,इसके लिए हायकोर्ट तो सख्त है ,,अब कोटा की
भ्रस्टाचार निरोधक अदालत ने जो सख्ती दिखाकर एक उदाहरण पेश किया है उसका
अनुसरण सभी को करना होगा ,,यहां तक के बार कौंसिल ऑफ़ राजस्थान ,,जिला बार
एसोसिएशन को पुलिस अधिकारीयों ,न्यायिक अधिकारीयों से समन्वय स्थापित कर
न्याय में देरी के इस प्रमुख कारण पर जागरूकता के लिए सेमनारे भी आयोजित
करना चाहिए ,,,हर ज़िले में ऐसे सभी मामलों के निस्तारण ,,सुझाव ,मार्गदर्शन
के लिए जिला जज की अध्यक्षता में हर तीन माह में समीक्षा की बैठक का जो
प्रावधान परिपत्र है उसके तहत सख्ती से ऐसी बैठके लगातार आयोजित हो ,ऐसी
बैठकों में अभिभाषक परिषद के अध्यक्ष ,जिलाजज ,जिलाकलेक्टर ,पुलिस अधीक्षक
के समक्ष इन मुद्दों को ज़िम्मेदारी से उठाये तो भी थोड़ा बदलाव सम्भव होगा
,,,ऐसी बैठकों के फैसले भी मीडिया के ज़रिये सार्वजनिक हो ताकि ,पुरे
अधीनस्थ अधिकारीयों कर्मचारियों ,,वकीलों ,,पक्षकारों को भी फैसलों की
जानकारी मिल सके और इनकी पालना नहीं करने वाले अधिकारीयों के खिलाफ
कार्यवाही को लेकर एक जागरूकता अभियान चल सके ,,अख्तर खान अकेला कोटा
राजस्थान
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