नवरात्रि का अध्यात्म, इतिहास और कोटा की परम्परा ऐतिहासिक तथ्य है, नवरात्रि , शक्ति की साधना, आस्था का इतिहास और बदलते समय में हमारी परम्पराएँ आध्यात्मिक चेतना से सामाजिक सरोकार तक हमें बहुत कुछ सीख देती हैं, कोटा की ऐतिहासिक विरासत का एक तथ्यात्मक अध्ययन, अगर हम देखें तो, नवरात्रि केवल पर्व नहीं, आत्मशक्ति के जागरण का अवसर है, भारतीय संस्कृति में नवरात्रि का स्थान केवल एक धार्मिक उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, साधना, अनुशासन, नारी सम्मान और बुराइयों पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में भी है, नौ रातों तक चलने वाली यह साधना मनुष्य को अपनी आंतरिक शक्तियों को पहचानने, अपने विकारों पर नियंत्रण रखने और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का संदेश देती है,
नवरात्रि का शाब्दिक अर्थ है—नौ रातें, भारतीय धार्मिक परम्परा में वर्ष के दौरान चैत्र और आश्विन नवरात्रि विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं, चैत्र नवरात्रि वसंत ऋतु में आती है, जबकि शारदीय नवरात्रि वर्षा ऋतु के बाद आश्विन मास में मनाई जाती है, देवी दुर्गा की आराधना से जुड़ा यह पर्व शक्ति, साहस, करुणा और धर्म की रक्षा का संदेश देता है, इसका आध्यात्मिक अर्थ केवल मंदिर में दीप जलाने या व्रत रखने तक सीमित नहीं है, वास्तविक साधना यह भी है कि मनुष्य अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, लोभ, अन्याय और भेदभाव पर विजय प्राप्त करे, नवरात्रि की सार्थकता तभी है, जब देवी की पूजा के साथ महिलाओं का सम्मान, बेटियों की सुरक्षा, कमजोरों की सहायता और समाज में न्याय एवं सद्भाव की स्थापना को भी जीवन का उद्देश्य बनाया जाए, धार्मिक और शास्त्रीय दृष्टि से नवरात्रि का महत्त्व अगर हम देखें तो
देवी-आराधना की परम्परा भारतीय धार्मिक साहित्य में प्राचीन काल से मिलती है, देवी को सृष्टि की शक्ति, संरक्षण और परिवर्तन के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है,
मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत देवी माहात्म्य, जिसे दुर्गा सप्तशती या चंडी पाठ भी कहा जाता है, देवी-उपासना का एक प्रमुख ग्रंथ है, इसमें महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ तथा अन्य असुरों के विरुद्ध देवी के संघर्ष का वर्णन मिलता है , इन कथाओं का धार्मिक संदेश यह है कि जब अहंकार, अत्याचार और अन्याय अपनी सीमा पार करते हैं, तब उनके प्रतिरोध के लिए शक्ति का जागरण आवश्यक हो जाता है ,
देवी माहात्म्य के अनुसार, देवी को केवल एक युद्ध करने वाली शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि संसार का पालन करने वाली, संकटों से रक्षा करने वाली और भक्तों को अभय देने वाली शक्ति के रूप में भी चित्रित किया गया है, यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात समझनी चाहिए, धार्मिक आख्यान आस्था और आध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं; उनके प्रत्येक प्रसंग को आधुनिक इतिहास की घटना मानने के लिए स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण आवश्यक होंगे, श्रीमद्भगवद्गीता का आध्यात्मिक संदेश के तहत
श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 16 में दैवी और आसुरी गुणों का वर्णन है, अभय, सत्य, आत्मसंयम, दया और अहिंसा जैसे गुणों को दैवी सम्पदा में गिना गया है,
गीता का यह संदेश नवरात्रि की साधना के लिए भी प्रासंगिक है, धार्मिकता का मूल्य केवल बाहरी अनुष्ठान से नहीं, बल्कि मनुष्य के आचरण से भी आँका जाना चाहिए, यदि कोई व्यक्ति देवी की पूजा करता है, लेकिन महिलाओं का अपमान करता है, कमजोरों के अधिकारों का हनन करता है या अन्याय का साथ देता है, तो उसे अपनी धार्मिक साधना के वास्तविक उद्देश्य पर विचार करना चाहिए, नौ देवियाँ और नौ दिनों की साधना
नवरात्रि में परम्परागत रूप से माँ शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है, भक्त इन नौ स्वरूपों में शक्ति के विभिन्न गुणों का दर्शन करते हैं, शैलपुत्री — स्थिरता और दृढ़ संकल्प, ब्रह्मचारिणी , तपस्या, धैर्य और अनुशासन,
चंद्रघंटा — साहस और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की शक्ति।
कूष्मांडा — सृजन और जीवन की ऊर्जा, स्कंदमाता — मातृत्व, स्नेह और संरक्षण।
कात्यायनी — पराक्रम और संकल्प, कालरात्रि — भय पर विजय और संकटों का सामना,
महागौरी — पवित्रता और शांति, सिद्धिदात्री — साधना की पूर्णता और आध्यात्मिक उपलब्धि, इन गुणों को केवल पूजा के मंत्रों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, ये जीवन में अपनाए जाने वाले नैतिक आदर्श भी हैं, नवरात्रि हमें सिखाती है कि शक्ति का उद्देश्य दूसरों पर प्रभुत्व जमाना नहीं, बल्कि स्वयं को अनुशासित करना और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की क्षमता विकसित करना है ,घटस्थापना, व्रत, दुर्गा सप्तशती और कन्या पूजन की परम्परा, नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना या कलश स्थापना की जाती है, विभिन्न क्षेत्रों में पूजा-पद्धति में अंतर हो सकता है, लेकिन सामान्यतः कलश को शुभता, जीवन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, अनेक परिवारों में अखंड ज्योति जलाई जाती है, दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है, फलाहार रखा जाता है और प्रतिदिन आरती की जाती है, अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन की परम्परा भी प्रचलित है, इसमें छोटी बालिकाओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान देकर भोजन कराया जाता है और उपहार दिए जाते हैं, इस परम्परा का सामाजिक अर्थ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, यदि हम छोटी बालिकाओं को देवी मानकर पूजते हैं, तो उनके बड़े होने पर उनकी स्वतंत्रता, शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य और समान अधिकारों का सम्मान करना भी हमारा कर्तव्य है, कन्या पूजन का वास्तविक संदेश तभी पूरा होगा, जब समाज में बेटियों को बोझ न समझा जाए, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को स्वीकार न किया जाए और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए परिवार, समाज तथा प्रशासन अपनी जिम्मेदारी निभाएँ,
कोटा की नवरात्रि धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत महत्वपूर्ण है,
राजस्थान का हाड़ौती क्षेत्र अपनी विशिष्ट धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परम्पराओं के लिए जाना जाता है, कोटा में देवी-आराधना, मंदिरों की परम्परा और दशहरा उत्सव का इतिहास शहर की सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है, कोटा की नवरात्रि परम्परा को समझने के लिए आशापुरा माता मंदिर, दाढ़ देवी मंदिर और रियासतकालीन दशहरा समारोह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं, इन परम्पराओं के अध्ययन में यह अंतर करना आवश्यक है कि किसी मंदिर की स्थापना का इतिहास क्या है, वहाँ पूजा की परम्परा कब से चली आ रही है और कोटा के दशहरा मेले का ऐतिहासिक विकास कब हुआ, ये तीनों बातें आपस में संबंधित होने के बावजूद एक ही ऐतिहासिक घटना नहीं हैं, कोटा दशहरा मेले का इतिहास, भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के उत्सव पोर्टल पर उपलब्ध विवरण के अनुसार, कोटा के दशहरा मेले का इतिहास वर्ष 1723 ईस्वी से जोड़ा जाता है, इस विवरण में बताया गया है कि महाराव दुर्जनशाल सिंह हाड़ा के शासनकाल में दशहरा समारोह की परम्परा आरम्भ हुई,
प्रारम्भिक आयोजन में विभिन्न मंदिरों में धार्मिक कार्यक्रम और राजकीय समारोह प्रमुख थे, राजसी शोभायात्राओं तथा ठिकानेदारों के दरबार से जुड़ी परम्पराओं का भी उल्लेख मिलता है ,बाद में कोटा के शासकों ने इस उत्सव का विस्तार किया, विशेष रूप से महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय के शासनकाल में दशहरा आयोजन को अधिक भव्य और आकर्षक स्वरूप मिलने का उल्लेख सरकारी पर्यटन विवरण में किया गया है, समय के साथ यह उत्सव धार्मिक समारोह से आगे बढ़कर विशाल मेले, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, लोककलाओं, व्यापारिक गतिविधियों और जनसहभागिता का प्रमुख अवसर बन गया, किशोरपुरा कोटा का आशापुरा माता मंदिर आस्था और दशहरा परम्परा का प्रमुख केन्द्र है, कोटा के दशहरा मैदान के निकट स्थित आशापुरा माता मंदिर शहर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है,
इस मंदिर के इतिहास के सम्बन्ध में प्रकाशित विवरणों में बताया गया है कि इसका निर्माण 1264 ईस्वी में बूंदी के राजकुमार जैतसिंह से जोड़ा जाता है, मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण महाराव उम्मेद सिंह द्वारा 1911 में करवाए जाने का भी उल्लेख मिलता है, ये तिथियाँ प्रकाशित ऐतिहासिक विवरणों पर आधारित हैं, इनके निर्णायक सत्यापन के लिए मंदिर के अभिलेख, शिलालेख अथवा संबंधित राजकीय दस्तावेजों का अध्ययन उपयोगी होगा,
स्थानीय धार्मिक परम्परा में आशापुरा माता मंदिर का विशेष स्थान है, दशहरा मेले के शुभारम्भ से पहले यहाँ पूजा-अर्चना किए जाने और पूर्व राजपरिवार की ओर से पारम्परिक रीति-रिवाजों का निर्वाह किए जाने का उल्लेख प्रकाशित विवरणों में मिलता है,
इस परम्परा का महत्त्व केवल धार्मिक नहीं है, यह कोटा की ऐतिहासिक स्मृति और वर्तमान सांस्कृतिक जीवन के बीच निरन्तरता का भी प्रतीक है,
नवरात्रि में मंदिरों में होने वाली पूजा हमें याद दिलाती है कि धार्मिक विरासत केवल इमारतों में नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं, अनुष्ठानों और सामुदायिक सहभागिता में भी जीवित रहती है, दाढ़ देवी मंदिर , कोटा राजपरिवार की धार्मिक परम्परा का ऐतिहासिक तथ्य है, कोटा के निकट स्थित दाढ़ देवी माता मंदिर भी क्षेत्र की प्रमुख धार्मिक आस्था का केन्द्र है, इसे कोटा के पूर्व राजपरिवार की कुलदेवी की परम्परा से जोड़ा जाता है,
राजस्थान पर्यटन विभाग के विवरण में दाढ़ देवी मंदिर और चैत्र नवरात्रि के दौरान आयोजित होने वाले नौ दिवसीय मेले का उल्लेख मिलता है,
नवरात्रि के समय मंदिरों में दर्शन, पूजा, धार्मिक आयोजन और मेलों में सहभागिता केवल शहरी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती, कोटा के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के श्रद्धालु भी इन धार्मिक अवसरों से जुड़े रहते हैं,
दाढ़ देवी मंदिर की परम्परा इस बात का उदाहरण है कि हाड़ौती में देवी-आराधना का स्वरूप मंदिर, ग्रामीण समाज, राजपरिवार की ऐतिहासिक स्मृति और आम जनमानस के बीच फैला हुआ है,व
हालाँकि, मंदिर की स्थापना की निश्चित तिथि, प्राचीन पूजा-पद्धति और राजकीय अनुष्ठानों के विस्तृत विवरण के लिए अतिरिक्त ऐतिहासिक शोध आवश्यक है, कोटा की नवरात्रि और दशहरा , पुरानी परम्पराओं से आधुनिक आयोजनों तक रियासतकालीन कोटा में दशहरा उत्सव धार्मिक अनुष्ठानों, राजकीय समारोहों और सामुदायिक भागीदारी से जुड़ा हुआ था, समय के साथ इसमें अनेक परिवर्तन हुए,
आज कोटा दशहरा मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोकसंस्कृति, मनोरंजन, पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी महत्त्वपूर्ण हिस्सा है,
वर्तमान आयोजनों में रामलीला, रावण दहन, लोकनृत्य, भजन संध्या, कवि सम्मेलन, , संगीत कार्यक्रम और व्यापारिक गतिविधियाँ शामिल होती हैं,
इन परिवर्तनों को केवल परम्परा के क्षरण के रूप में देखना उचित नहीं होगा, सांस्कृतिक उत्सवों का बदलना सामाजिक जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया भी है, आधुनिक आयोजनों से कलाकारों, दुकानदारों, छोटे व्यापारियों और स्थानीय व्यवसायों को अवसर मिलता है, साथ ही, नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित होने का मंच मिलता है,
लेकिन इसके साथ एक प्रश्न भी जुड़ा हुआ है—क्या हम अपने प्राचीन धार्मिक अनुष्ठानों, लोकगीतों, पारम्परिक कला और मंदिरों के इतिहास को उतनी ही गंभीरता से सुरक्षित रख रहे हैं, जितनी भव्यता से सार्वजनिक उत्सव आयोजित करते हैं? इस प्रश्न का उत्तर केवल अनुमान से नहीं दिया जा सकता, इसके लिए पुराने अभिलेखों, समाचारपत्रों, स्थानीय कलाकारों की स्मृतियों और वर्तमान आयोजनों का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है, कोटा की एक विशिष्ट परम्परा नांता के जेठी पहलवानों की रही है, यहां का दशहराकोटा की सांस्कृतिक विरासत में नांता क्षेत्र के जेठी पहलवानों की दशहरा परम्परा भी उल्लेखनीय है, विवरण के अनुसार, जेठी समुदाय के पहलवान रावण के मिट्टी के पुतले को जलाने के बजाय उसे पैरों से कुचलकर विजय का प्रतीकात्मक प्रदर्शन करते हैं,
इस परम्परा में लिंबाजा माता की पूजा, ढोल-नगाड़े, अखाड़े की परम्परा और सामुदायिक सहभागिता का उल्लेख किया गया है। समाचार में इस अनुष्ठान को लगभग 200 वर्ष पुरानी परम्परा बताया गया है, इस विवरण से यह स्पष्ट होता है कि कोटा में दशहरा और देवी-आराधना का सांस्कृतिक स्वरूप केवल एक बड़े मेले तक सीमित नहीं है, विभिन्न समुदायों की अपनी विशिष्ट परम्पराएँ भी इस विरासत को समृद्ध बनाती हैं, इस परम्परा की सटीक ऐतिहासिक शुरुआत और उसके क्रमिक विकास की पुष्टि के लिए जेठी अखाड़े के पुराने दस्तावेजों तथा मौखिक इतिहास का संकलन उपयोगी हो जाता है, नवरात्रि पूजा में वर्तमान बदलाव प्रासंगिक है, आस्था, तकनीक और सामाजिक जीवन, समय के साथ कोटा में नवरात्रि मनाने के तौर-तरीकों में भी परिवर्तन दिखाई देता है, घर-घर में घटस्थापना, दुर्गा सप्तशती का पाठ, व्रत, आरती और कन्या पूजन जैसी परम्पराएँ जारी हैं, दूसरी ओर, सार्वजनिक पंडालों, सामूहिक भजन संध्याओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और डिजिटल माध्यमों से धार्मिक सामग्री साझा करने का चलन भी बढ़ा है, आज श्रद्धालु ऑनलाइन आरती देखते हैं, धार्मिक प्रवचन सुनते हैं और दूर रहते हुए भी परिवार के साथ पूजा से जुड़े रहते हैं,
इन बदलावों के सकारात्मक पक्ष हैं, धार्मिक जानकारी तक पहुँच आसान हुई है और अधिक लोग सामूहिक आयोजनों में भाग ले सकते हैं, लेकिन उत्सव की सफलता को केवल भीड़, सजावट, ध्वनि-विस्तारक यंत्रों या खर्च से नहीं आँकना चाहिए,
नवरात्रि का वास्तविक मूल्य श्रद्धा, संयम, सेवा, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय व्यवहार में दिखाई देना चाहिए,
सार्वजनिक आयोजनों में स्वच्छता, यातायात व्यवस्था, अग्नि सुरक्षा, महिलाओं की सुरक्षा, दिव्यांगों के लिए सुविधाएँ और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हैं जितनी धार्मिक सजावट, नवरात्रि और नारी सम्मान का विशिष्ट सम्बन्ध पूजा से आगे बढ़कर अधिकारों की रक्षा से है, नवरात्रि में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, भारतीय समाज में माँ, बहन, बेटी और स्त्री के प्रति सम्मान की भावना भी इसी सांस्कृतिक परम्परा से जुड़ी हुई है,
लेकिन केवल धार्मिक प्रतीकों का सम्मान पर्याप्त नहीं है। महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, समान अवसर, स्वतंत्रता और न्याय मिलना भी आवश्यक है,
बेटियों की सुरक्षा के लिए परिवार, विद्यालय, समाज, पुलिस और प्रशासन की अपनी-अपनी जिम्मेदारी है, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, उत्पीड़न और भेदभाव को रोकने के लिए कानून का निष्पक्ष पालन और सामाजिक जागरूकता आवश्यक है,
यदि नवरात्रि के दौरान हम देवी के सामने दीप प्रज्वलित करते हैं, तो हमें अपने घरों और समाज में ऐसा वातावरण बनाने का संकल्प भी लेना चाहिए जहाँ किसी बेटी को भय में जीवन न बिताना पड़े,
यदि हम कन्या पूजन करते हैं, तो बालिकाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता भी करें,
यदि हम शक्ति की आराधना करते हैं, तो अन्याय के सामने मौन रहने के बजाय न्याय का साथ देने का साहस भी विकसित करें,
यही धार्मिक आस्था और सामाजिक उत्तरदायित्व का सार्थक संगम है, धर्म, सद्भाव और मानवता भारत की सांस्कृतिक परम्पराएँ विविधता के बीच सह-अस्तित्व का संदेश भी देती हैं, अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा-पद्धतियाँ, लोकाचार और धार्मिक आयोजन भिन्न हो सकते हैं, लेकिन सत्य, करुणा, न्याय और मानवीय गरिमा जैसे मूल्यों का महत्त्व व्यापक है,
कोटा की ऐतिहासिक पहचान भी केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, हाड़ौती की लोकसंस्कृति, विभिन्न समुदायों की परम्पराएँ, लोककलाएँ, साहित्य और साझा सामाजिक जीवन ने इस शहर को विशिष्ट बनाया है, नवरात्रि के अवसर पर हमें ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करना चाहिए जिसमें श्रद्धालु सम्मानपूर्वक पूजा कर सकें, सार्वजनिक कार्यक्रम सुरक्षित रहें और किसी भी समुदाय के प्रति घृणा या अपमान को प्रोत्साहन न मिले,
धार्मिक आस्था जब मानवता से जुड़ती है, तब वह समाज को जोड़ने वाली शक्ति बनती है,
ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने की जरूरत कोटा में चुनोतिपूर्ण है, कोटा की नवरात्रि और दशहरा परम्परा का प्रमाणिक इतिहास तैयार करने के लिए केवल प्रचलित मान्यताओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है,
इसके लिए आशापुरा माता और दाढ़ देवी मंदिरों के उपलब्ध अभिलेखों एवं शिलालेखों का दस्तावेजीकरण, कोटा रियासत के दशहरा समारोहों से संबंधित राजकीय आदेशों और व्यय अभिलेखों का अध्ययन,
पुराने समाचारपत्रों, तस्वीरों और कार्यक्रम पुस्तिकाओं का संग्रह,
मंदिरों के पुजारियों, स्थानीय इतिहासकारों, कलाकारों और बुजुर्ग नागरिकों से मौखिक इतिहास का संकलन,
नांता के जेठी पहलवानों जैसी विशिष्ट सामुदायिक परम्पराओं का रिकॉर्ड तैयार करना,
पुराने और वर्तमान दशहरा आयोजनों की तुलना करके सांस्कृतिक बदलावों का तथ्यात्मक विवरण तैयार करना,
राजस्थान राज्य अभिलेखागार के विवरण के अनुसार, कोटा के ऐतिहासिक अभिलेख 1675 से 1948 ईस्वी तक की अवधि से संबंधित हैं और इनमें हाड़ौती, अंग्रेजी तथा उर्दू भाषाओं में दस्तावेज उपलब्ध हैं, इन्हें सजोंना ज़रूरी है,
ये अभिलेख कोटा के रियासतकालीन इतिहास, धार्मिक आयोजनों और प्रशासनिक परम्पराओं पर आगे शोध करने के लिए उपयोगी हो सकते हैं। प्रत्येक विषय से संबंधित दस्तावेज की उपलब्धता और सामग्री का सत्यापन अलग से करना होगा, नवरात्रि शक्ति की आराधना का पर्व है, लेकिन इस शक्ति का सबसे सुंदर रूप वह है जो मनुष्य को न्यायप्रिय, संवेदनशील, साहसी और जिम्मेदार बनाए,
कोटा की नवरात्रि परम्परा में देवी मंदिरों की आस्था, रियासतकालीन इतिहास, दशहरा मेले की सांस्कृतिक विरासत और आम नागरिकों की सहभागिता के अनेक आयाम मौजूद हैं, समय के साथ उत्सवों का स्वरूप बदला है, धार्मिक अनुष्ठानों के साथ आधुनिक मंचीय कार्यक्रम, पर्यटन और व्यापारिक गतिविधियाँ जुड़ी हैं, इस परिवर्तन के बीच हमारी जिम्मेदारी है कि हम परम्परा के प्रमाणिक इतिहास को सुरक्षित रखें और उसकी मूल मानवीय भावना को जीवित रखें, नवरात्रि की सच्ची साधना केवल नौ दिनों की पूजा नहीं, बल्कि पूरे वर्ष सत्य, न्याय, करुणा, नारी सम्मान और सामाजिक सद्भाव के मूल्यों पर चलने का संकल्प है,
आइए, इस नवरात्रि हम केवल दीप जलाने का ही नहीं, बल्कि अज्ञान, अन्याय, भेदभाव और हिंसा के अंधकार को मिटाने का संकल्प लें, यही नवरात्रि का आध्यात्मिक संदेश है, यही हमारी सांस्कृतिक विरासत की आत्मा है और यही एक बेहतर समाज के निर्माण का मार्ग है।
— एडवोकेट अख्तर खान अकेला

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