जिस तरह युवा लाठियों, बंदूकों के आगे खड़े हैं और कह रहे हैं कि क्या करोगे भाई दो चार हड्डियाँ तोड़ लोगे, हम तो निहत्थे हैं, तोड़ लो , मगर यहाँ से हटेंगे नहीं, यहीं रहेंगे.
और कोई लीडर नही इनका
बिना नेता के यह एकजुटता?
यह जज़्बा?
भरोसा नही हो रहा
यह इक्कीसवीं सदी के
25 वें साल की युवा पीढ़ी है
वे गाँधी को गोली से नहीं मार पाए,
गाँधी अब तक जिंदा है और
इस देश में हमेशा ज़िंदा रहेंगे,

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