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05 मार्च 2026

वर्चस्व की अंधी दौड़ और दम तोड़ती इंसानियत क्या हम विनाश के मुहाने पर हैं

 

वर्चस्व की अंधी दौड़ और दम तोड़ती इंसानियत क्या हम विनाश के मुहाने पर हैं
​आज वैश्विक परिदृश्य को देख ऐसा प्रतीत होता है कि दुनिया तरक्की के चरम पर नहीं बल्कि एक गहरे विनाश की ओर बढ़ रही है जहाँ इतिहास गवाह है कि जब-जब महाशक्तियों ने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया उसकी सबसे बड़ी कीमत मासूम 'इंसानियत' ने चुकाई है। जापान के हिरोशिमा और नागासाकी से शुरू हुआ यह सिलसिला आज इराक और सीरिया जैसे मुल्कों की राख तक पहुँच चुका है जहाँ एक ही खूनी पैटर्न हर जगह नज़र आता है कि महाशक्तियों का 'सुधार' या 'शांति' के नाम पर किसी मुल्क में दाखिल होना वहां की स्थापित सत्ताओं को उखाड़ फेंकना और फिर पूरे देश को खंडहर बनाकर अपने हाल पर छोड़ देना। इराक में जो हुआ वह दुनिया के सामने है जहाँ सत्ता बदली गई लेकिन आज वहां केवल मलबे का ढेर बचा है और यही हाल अफगानिस्तान का रहा जहाँ दो दशकों तक जंग की आग भड़काने के बाद वहां की आम जनता और मासूमों को रातों-रात उनके नसीब पर छोड़कर महाशक्तियाँ निकल गईं जो किसी की हार या जीत नहीं बल्कि उस भरोसे की हार है जो एक आम नागरिक अपनी सुरक्षा के लिए करता है। आज सीरिया की गलियां और ईरान की दहलीज पर खड़ी युद्ध की आहट चीख-चीख कर कह रही है कि यह लड़ाई सिर्फ सरहदों की नहीं बल्कि संसाधनों और 'धंधे' पर कब्जे की है जिसमें जब कोई बड़ी शक्ति किसी छोटे देश के व्यापार और उसके आत्म-सम्मान को कुचलकर अपना साम्राज्य खड़ा करती है तो वहां से वैश्विक अशांति का जन्म होता है। जिस तरह से आज बेगुनाहों का कत्ल आम हो गया है और दुनिया तमाशा देख रही है वे साफ तौर पर उन रूहानी चेतावनियों की याद दिलाते हैं जिन्हें 'कयामत के आसार' कहा गया है क्योंकि जब समाज में न्याय खत्म हो जाए और इंसानियत का कद छोटा पड़ जाए तो समझना चाहिए कि वक्त का आखिरी पड़ाव करीब है और हथियार कभी शांति नहीं ला सकते वे केवल आने वाली नस्लों के लिए बर्बादी और नफरत छोड़ते हैं जबकि दुनिया को आज बारूद की नहीं बल्कि एक ऐसे न्यायपूर्ण तंत्र की ज़रूरत है जहाँ हर इंसान का जीवन सम्मान और काम सुरक्षित रहे।

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