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25 मार्च 2026

राजस्थान सेवानिवृत पुलिस कल्याण संस्थान ने कलेक्ट्री पर प्रदर्शन कर केंद्र की पेंशन विरोधी नीतियों का विरोध किया

 

राजस्थान सेवानिवृत पुलिस कल्याण संस्थान ने कलेक्ट्री पर प्रदर्शन कर केंद्र की पेंशन विरोधी नीतियों का विरोध किया
के डी अब्बासी
कोटा, मार्च। राजस्थान सेवानिवृत पुलिस कल्याण संस्थान ने कलेक्ट्री पर प्रदर्शन कर केंद्र की पेंशन विरोधी नीतियों का विरोध किया।
राजस्थान सेवानिवृत पुलिस कल्याण संस्थान ने आज 2026 को केंद्र सरकार की पेंशन विरोधी नितियो के खिलाफ काला दिवस मनाया तथा प्रधानमंत्री,
को जिला कलेक्टर के माध्यम से ज्ञापन देकर प्रस्तुत कर वित्त विधेयक- 2025 के आपत्तिजनक प्रावधानों को रद्द करने की मांग की।
संगठन के संभागीय अध्यक्ष नवनीत महर्षि ने बताया कि यदि यह अधिनियम लागू होता है तो पेंशन भोगियों की सेवानिवृत्ति की तिथि, पेंशन पात्रता के संबंध में वर्गीकरण और उनके बीच के अंतर का आधार होगा जिससे केंद्रीय वेतन आयोग (या किसी भी वेतन आयोग) के कार्यकाल से पहले के पेंशनर्स वेतन आयोग की सिफारिश के लाभ से वंचित हो जाएंगे । मौजूदा पेंशन भोगियों को इस कठिन समय में पेंशन वृद्धि का लाभ न मिलने के कारण आर्थिक हानि उठानी पड़ेगी। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रकरण संख्या- 5939-41/1980 - डी. एस. नाकरा व अन्य बनाम भारत संघ में आदेशित किया था कि पेंशन एक सामाजिक कल्याणकारी व्यवस्था है जो उन लोगों को सामाजिक आर्थिक न्याय प्रदान करती है जिन्होंने अपने जीवन के सुनहरे दिनों में नियोक्ता अर्थात केंद्र अथवा राज्य सरकार के लिए इस आश्वासन के साथ कि वृद्धावस्था में उन्हें बेसहारा नहीं छोड़ा जाएगा, अथक परिश्रम किया है। इस निर्णय में यह भी स्पष्ट किया गया था कि पेंशन योजना का उद्देश्य पेंशन भोगियों को अभाव मुक्त, सम्मान
जनक, स्वतंत्र और सेवानिवृत्ति से पहले के स्तर के समकक्ष जीवन स्तर प्रदान करना है। यह अधिनियम 01 जनवरी, 2026 से पहले सेवानिवृत हुए मौजूदा पेंशनर्स के लिए अपूरणीय क्षतिकारक सिद्ध होगा। अतः
संगठन ज्ञापन के माध्यम से भारत सरकार से अनुरोध किया गया है कि जिस प्रकार सातवें केंद्रीय वेतन आयोग द्वारा 01 जनवरी, 2016 से पहले सेवानिवृत हुए और
01 जनवरी, 2016 को या उसके बाद सेवानिवृत हुए पेंशनर्स के बीच समानता की सिफारिश की गई थी और केंद्र सरकार द्वारा इसे जनवरी, 2016 से स्वीकार भी किया गया था, ठीक उसी प्रकार आठवे केंद्रीय वेतन आयोग में भी इस सिद्धांत को यथावत रखा जाए।

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