ईरान की यह तस्वीर मन को भीतर तक झकझोर देती है।
सफेद कफनों में लिपटी छोटी-छोटी बच्चियाँ, सिरहाने रखी उनकी मुस्कुराती तस्वीरें और बिलखते हुए माता-पिता — यह दृश्य केवल का नहीं, पूरी मानवता की असफलता का आईना है।
जो उम्र किताबों, खेल और सुनहरे सपनों की थी, वह नफरत, सत्ता की हिंसा और युद्ध की राजनीति की भेंट चढ़ गई। स्कूल जाने वाली मासूम बच्चियाँ किसी भी संघर्ष का हिस्सा नहीं थीं, फिर भी सबसे बड़ी कीमत उन्हें चुकानी पड़ी।
दुनिया में कहीं भी बच्चों पर हमला केवल एक देश का आंतरिक मामला नहीं होता — यह पूरी मानवता के खिलाफ अपराध है।
बच्चों का जीवन किसी भी राजनीतिक, धार्मिक या सैन्य संघर्ष से कहीं अधिक बड़ा और पवित्र होता है।
हम शायद केवल संवेदना जता सकते हैं, उनके परिवारों के दुःख में सहभागी होने की बात कह सकते हैं। पर सच यही है — मासूम बच्चों की लाशों पर खड़ी कोई भी व्यवस्था कभी न्यायपूर्ण नहीं हो सकती।
ईश्वर दिवंगत आत्माओं को शांति दे और दुनिया को इतनी संवेदना दे कि भविष्य में किसी भी बच्चे का बचपन युद्ध की आग में न जले

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