मौलाना अबुल कलाम आज़ाद केवल व्यक्ति नहीं आजाद भारत की साझा विरासत जीवित चेतना थे।
कोटा
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की पुण्य तिथि की पूर्व संध्या पर आज विज्ञान नगर
स्थित एक निजी स्कूल मे कार्यक्रम आयोजित कर देश के पहले शिक्षा मंत्री
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को याद किया गया।
मुख्य वक्ता
कोटा ए. एम. पी. के संयोजक इंजिनियर सिराज अंसारी ने कहा कि, मौलाना अबुल
कलाम आज़ाद केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वे भारत की साझा विरासत की जीवित चेतना
थे। ऐसे समय में जब धर्म को सत्ता का औज़ार बनाया जा रहा है, आज़ाद का
जीवन हमें याद दिलाता है कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को जोड़ना
है, बाँटना नहीं।
आज़ाद ने इस्लाम को संकीर्ण पहचान
की दीवारों में क़ैद नहीं किया, बल्कि उसे इंसानियत, ज्ञान और नैतिक साहस
से जोड़ा। उन्होंने साफ़ कहा था कि “अगर कोई व्यक्ति मज़हब के नाम पर इंसान
से नफ़रत करना सिखाता है, तो वह मज़हब नहीं, सियासत कर रहा है।” आज यह
वाक्य सत्ता के गलियारों में सबसे असहज सत्य बन चुका है।
एक
उम्मीद सेवा संस्था के अध्यक्ष डॉ. रियाज अहमद ने कहा कि, स्वतंत्रता
आंदोलन में मौलाना आज़ाद की भूमिका अक्सर सुविधाजनक ढंग से कम करके दिखाई
जाती है। जबकि सच्चाई यह है कि वे गांधी और नेहरू के समकक्ष विचार-स्तंभ
थे। कांग्रेस के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष होने के बावजूद उन्होंने सत्ता की
नहीं, सिद्धांतों की राजनीति की। विभाजन के समय उन्होंने मुसलमानों से
कहा—डरकर भागना समाधान नहीं है, भारत तुम्हारा भी उतना ही है जितना किसी और
का। यह साहसिक वक्तव्य आज भी अल्पसंख्यकों को आईना दिखाता है।
देश
के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में आज़ाद ने आधुनिक भारत की बुनियाद रखी।
आईआईटी, यूजीसी, साहित्य अकादमी और वैज्ञानिक संस्थानों की कल्पना उनके
बिना अधूरी थी। उन्होंने समझ लिया था कि अज्ञान सबसे खतरनाक गुलामी है—और
शिक्षा ही सबसे बड़ी आज़ादी।
आज जब इतिहास को सुविधा
के अनुसार बदला जा रहा है, तब मौलाना आज़ाद को याद करना एक राजनीतिक नहीं,
नैतिक ज़रूरत है। वे उन चंद नेताओं में थे जिनकी पहचान धर्म से नहीं,
राष्ट्र और विवेक से तय होती थी। वे मुसलमान थे, लेकिन संप्रदायवादी नहीं;
राष्ट्रवादी थे, लेकिन उग्र नहीं; आधुनिक थे, लेकिन अपनी जड़ों से कटे
नहीं।
Y G न ग्रुप के निदेशक अरशद अंसारी ने कहा कि,
मौलाना आज़ाद का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा राष्ट्रवाद शोर नहीं
करता, बल्कि समाज को शिक्षित करता है; नफ़रत नहीं फैलाता, बल्कि भरोसा पैदा
करता है। आज जब देश को सबसे ज़्यादा उसी भरोसे की ज़रूरत है, तब मौलाना
अबुल कलाम आज़ाद को पढ़ना नहीं—समझना ज़रूरी है। इस अवसर पर जावेद खान,
जाहिद निजामी आदि भी मौजूद रहे.
सादर प्रकाशनार्थ
दैनिक........
नूर अहमद पठान
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