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03 फ़रवरी 2026

थैलेसीमिया मरीज बेहाल: एमबीएस में दवा आई, पर 10 दिन की देकर लौटाया

 

थैलेसीमिया मरीज बेहाल: एमबीएस में दवा आई, पर 10 दिन की देकर लौटाया
कल दिए ज्ञापन का असर, लेकिन व्यवस्था नाकाफी; बच्चों को महीने में 3 बार लाइन में लगना पड़ रहा
कोटा | 3 फरवरी
एमबीएस अस्पताल में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों और मरीजों की परेशानियां अभी भी खत्म नहीं हुई हैं। सोमवार को सामाजिक कार्यकर्ताओं निवर्तमान पार्षद सलीना शेरी के द्वारा अधीक्षक को दिए गए ज्ञापन के बाद अस्पताल में आयरन-चेलेशन की जरूरी दवाइयाँ (Deferasirox व Desferal) तो पहुंच गईं, लेकिन सप्लाई कम होने के कारण मरीजों को एक माह की जगह सिर्फ 10 दिन की दवा देकर लौटा दिया गया।
मंगलवार को दीपक अटरू क्षेत्र से दवा लेने पहुंचा, उसे भी सिर्फ 10 दिन की दवा दी गई। इसी तरह प्रदीप राठौर और साहिल को भी 10 दिन की दवा देकर वापस कर दिया गया। इससे परिजनों की चिंता और बढ़ गई है, क्योंकि गंभीर बीमारी में नियमित और पूरी खुराक न मिलना बच्चों की सेहत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
तीन बार लाइन में लगने की मजबूरी
परिजनों का कहना है कि पहले एक माह की दवा मिलने से बच्चों को महीने में एक बार ही अस्पताल आना पड़ता था। अब 10-10 दिन की दवा मिलने से बच्चों को महीने में तीन बार लाइन में लगना पड़ेगा।
दवा लेने की प्रक्रिया भी काफी जटिल है—
पहले दवा काउंटर पर लंबी लाइन लगाकर पर्चा बनवाना पड़ता है,
फिर उप अधीक्षक के पास सील-साइन करवाने जाना होता है।
इस पूरी प्रक्रिया में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे थक जाते हैं और कई बार उनकी तबीयत भी बिगड़ जाती है।
निवर्तमान पार्षद सलीना शेरी ने उठाई मांग कि थैलेसीमिया बच्चों के लिए यह व्यवस्था अमानवीय है। उन्होंने मांग की है कि मरीजों को एक माह की दवा एक साथ दी जाए,थैलेसीमिया मरीजों के लिए अलग काउंटर बनाया जाए,वहीं पर पर्चा, सील-साइन और दवा देने की पूरी प्रक्रिया पूरी की जाए, ताकि बच्चों को बार-बार लाइन में न लगना पड़े।कल के ज्ञापन के बाद दवाइयाँ तो आईं, पर समस्या जस की तस परिजनों का कहना है कि कल दिए गए ज्ञापन के बाद दवाइयाँ आना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन सप्लाई कम होने से राहत अधूरी है। अगर नियमित और पर्याप्त मात्रा में दवाइयाँ नहीं मिलीं तो थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की जान पर खतरा बना रहेगा।
सामाजिक कार्यकर्ता निवर्तमान पार्षद सलीना शेरी ने प्रशासन से मांग की है कि थैलेसीमिया मरीजों के लिए दवाइयों की स्थायी व्यवस्था की जाए, ताकि उन्हें बार-बार परेशान न होना पड़े और इलाज में कोई रुकावट न आए।

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